सत्य के लिए गढ़: मार्टिन लूथर- लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
गहन ईश्वरविज्ञान
15 फ़रवरी 2021
कलीसिया को सुधारने की आवश्यकता पर जॉन कैल्विन
18 फ़रवरी 2021

सत्य के लिए गढ़: मार्टिन लूथर

मार्टिन लूथर इतिहास का एक बड़ा व्यक्ति था। कुछ का मानना है कि वह दूसरी सहस्राब्दी का सबसे महत्वपूर्ण यूरोपियन व्यक्ति था। वह मार्ग-निर्माता धर्मसुधारक था, जिसको परमेश्वर ने पहले ख्रीष्टीयता और बाद में पश्चिमी संसार के परिवर्तन के लिए एक चिंगारी के रूप में उपयोग किया। वह जर्मन धर्मसुधार का अविवादित अगुवा था। कलीसियाई भ्रष्टाचार और धर्म त्याग के दिन में, वह सत्य का एक साहसी योद्धा था; उसका प्रभावशाली प्रचार और कलम ने सच्चा सुसमाचार को पुन: स्थापित करने में सहायता की। यीशु ख्रीष्ट और सम्भवत: ऑगस्टीन को छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति की तुलना में उसके बारे में अधिक पुस्तकें लिखी गई हैं।

लूथर कड़ी परिश्रम करने वाले पृष्टभूमि से आया। उसका जर्मनी के एक छोटे शहर आइसलबेन में 10 नवम्बर 1483 को जन्मा। उसके पिता, हान्स एक तांबे के खान में काम करने वाला था, जिसने अन्ततः खानों के धातु गलाने वाला और अन्य व्यापारिक उपक्रमों में रुचि से कुछ धन अर्जित किया। उसकी माँ ईश्वरभक्त थी किन्तु धार्मिक रीति से अन्धविश्वासी थी। लूथर को रोमन कैथोलिक कलीसिया के सख्त अनुशासन के अधीन बढ़ाया गया और वह एक सफल वकील बनने के लिए उसके परिश्रमी पिता द्वारा तैयार किया गया। इस उद्देश्य से, उसने दर्शनशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की आइसेनाख में (1498-1501) और फिर एरफुर्ट विश्वविद्यालय में । एरफुर्ट विश्वविद्यालय में उसने 1502 में और कला स्नातक की डिग्री प्राप्त की और 1505 में कला स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त की।

लूथर के जीवन में एक अनपेक्षित मोड़ आया जुलाई 1505 में, जब इक्कीस वर्ष का था। वह एक तीव्र आन्धी में फंस गया और पास में बिजली गिरने से घायल हो गया। उसने डरे हुए, खदान में काम करने वाली कैथोलिक संरक्षक को पुकारा, “मेरी सहायता करो, सेंट ऐन्ना, और मैं एक मठवासी बन जाऊँगा।” लूथर आन्धी से बच गया और उसने अपने नाटकीय शपथ को पूरा किया। दो सप्ताह बाद, उसने अगस्टिनीयन मठ में प्रवेश किया। उसका पिता लूथर पर बेकार होने वाली शिक्षा पर गुस्सा था, पर लूथर अपनी शपथ को पालन करने के लिए दृढ़ था।

 स्वधार्मिकता में खोया हुआ

मठ में, लूथर को प्रेरित किया गया परमेश्वर के साथ स्वीकृति प्राप्त करने के लिए कार्यों के द्वारा। उसने लिखा: “मैंने स्वयं को यातना दी प्रार्थना, उपवास, जागरण और ठंड से; अकेली ठंड ने ही मुझे मार दिया होता . . . मैं और क्या ढूंढ रहा था ऐसा करने के द्वारा परमेश्वर के सिवाए, जिसको ध्यान देना चाहिए था मेरे सख्त पालन को मठवासी व्यवस्था और कठिन जीवन को?  मैं निरंतर सपने में चलता रहा और वास्तविक मूर्तिपूजा में जीता रहा, क्योंकि मैं ख्रीष्ट पर विश्वास नहीं करता था: मैंने उसे केवल एक कठोर और भयानक न्यायाधीश के रूप में माना जो एक मेघधनुष पर बैठा हो।” अन्य स्थान पर उसने पुन: स्मरण किया: “जब मैं एक मठवासी था, तो मैंने स्वयं को कष्ट दिया लगभग पन्द्रह वर्ष तक प्रतिदिन त्याग के साथ, स्वयं को उपवासों, जागरण, प्रार्थना और अन्य बहुत कठोर कार्यों से प्रताड़ित किया। मैंने सत्यनिष्ठा से अपने कार्यों द्वारा धार्मिकता प्राप्त करने का विचार किया।”

1507 में, लूथर को पुरोहिताई में नियुक्त किया गया। जब उसने अपना पहला मिस्सा मनाया, जैसे ही उसने पहली बार रोटी और प्याले को पकड़ा, वह तत्वपरिवर्तन के विचार से इतना भयभीत था कि लगभग बेहोश हो गया। “मैं पूरी तरह से स्तब्ध और भयभीत था,” उसने स्वीकार किया। “ मैंने अपने आप से सोचा, “मैं कौन हूँ कि मैं अपनी आंखें को या अपने हाथों को परमेश्वरीय वैभव की ओर बढ़ा सकता हूँ? क्योंकि मैं धूल और राख हूँ और पाप से भरा हुआ हूँ, और मैं जीवित और अनन्त और सच्चे परमेश्वर से बात कर रहा हूँ।” भय ने केवल परमेश्वर के साथ स्वीकृति के लिए उसके व्यक्तिगत संघर्ष को जटिल बना दिया।

1510 में, लूथर को रोम भेजा गया था, जहाँ उसने रोमी कलीसिया के भ्रष्टाचार को देखा। वह स्काला सैंक्टा  (“पवित्र सीढ़ियाँ”) पर चढ़ा, जिसे माना जाता है कि यीशु जब पिलातुस के सामने आया तो उन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ा। कल्पित कहानियों के अनुसार, सीढ़ियों को यरूशलेम से रोम ले जाया गया था, और पुराहितों ने दावा किया कि परमेश्वर उन लोगों के पापों को क्षमा कर देता था जो अपने घुटनों पर सीढ़ियों पर चढ़ते थे। लूथर ने वैसा ही किया, प्रभु की प्रार्थना को दोहराते हुए, प्रत्येक सीढ़ी को चूमते हुए, और परमेश्वर के साथ शान्ति की खोज करते हुए। परन्तु जब वह सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर पहुँचा, तो उसने पीछे देखा और सोचा, ‘‘किसे पता कि यह बात सत्य है?’’ उसको ऐसा नहीं लगा कि वह परमेश्वर के अधिक निकट था।

लूथर ने 1512 में विटनबर्ग विश्वविद्यालय से अपने ईश्वरविज्ञान में डॉक्टर की उपाधि प्राप्त की और उसे वहाँ बाइबल का प्राध्यापक नियुक्त किया गया। आश्चर्यजनक रीति से, लूथर ने अगले चौंतीस वर्षों तक इस शिक्षा के स्थान को बनाए रखा, 1546 में अपनी मृत्यु तक। एक प्रश्न ने उसे परेशान कर दिया: एक पापी मनुष्य को पवित्र परमेश्वर के सामने सही कैसे ठहराया जाता है?

1517 में, जॉन टेट्ज़ेल नामक एक भ्रमण करने वाले डोमिनिकन ने विटनबर्ग के पास क्षमा-पत्र बेचने लगा पापों की क्षमा को प्रस्तुत करते हुए। इस नीच प्रथा को धर्मयुद्ध के समय कलीसिया के लिए धन एकत्रित करने के लिए आरम्भ किया गया था। साधारण लोग कलीसिया से एक पत्र मोल ले सकते थे जो कथित रूप से एक मृतक प्रिय व्यक्ति के शोधन स्थान से छुटकारा दिलाता था। रोम ने इस झूठ से बहुत लाभ उठाया। यहाँ, आय का उद्धेश्य पोप लियो X को रोम में एक नए सेंट पीटर्स बासिलिका के निर्माण में सहायता करना था।

इस घोर दुर्व्यवहार ने लूथर को क्रोधित कर दिया। उसने निर्धारित किया कि इस बात पर सार्वजनिक वाद-विवाद होना चाहिए। 31 अक्टूबर, 1517 को उसने विटेनबर्ग में कास्ल चर्च के सामने के दरवाज़े के पर क्षमा-पत्र के बारे में निन्यानवे बातों की एक सूची को लगा दिया। चर्च के दरवाज़े पर इस तरह के थीसिस को लगाना उस समय के अध्ययन सम्बन्धी वाद-विवाद में एक सामान्य बात थी। लूथर की आशा थी प्राध्यापकों के मध्य शान्त चर्चा की, न की एक सार्वजनिक आन्दोलन को प्रेरित करना। परन्तु एक प्रति छपाई कर्ता के हाथ में आ गई, जिसने सुनिश्चित किया कि निन्यानवे थीसिस कुछ ही सप्ताहों में पूरे जर्मनी और यूरोप में छापी और फैलाई जाए। लूथर रातों रात नायक बन गया। इसी के साथ, मूल रूप से धर्मसुधार का आरम्भ हुआ था।

मीनार का अनुभव

यह सम्भव है कि लूथर का अभी भी हृदय-परिवर्तित नहीं हुआ था। अपने आत्मिक संघर्षों के बीच में लूथर रोमियों 1:17 के विषय में सोचता रहा: “ क्योंकि इसमें परमेश्वर की धार्मिकता विश्वास से और विश्वास के लिए प्रकट होती है; जैसा कि लिखा है, “परन्तु धर्मी मनुष्य विश्वास से जीवित रहेगा।” लूथर ने परमेश्वर की धार्मिकता का अर्थ उसकी सक्रिय धार्मिकता समझा था, उसका बदला लेने वाला न्याय जिसके द्वारा वह पाप का दण्ड देता है। उस सम्बन्ध में, उसने स्वीकार किया कि वह परमेश्वर की धार्मिकता से घृणा करता था। लेकिन विटिनबर्ग में कास्ल चर्च की मीनार में बैठे हुए, लूथर ने इस खण्ड पर मनन किया और इसके अर्थ के साथ संघर्ष किया। वह लिखता है:

यद्यपि मैं एक निर्दोष मठवासी के रूप में रहता था, मैंने अनुभव किया कि मैं परमेश्वर के सामने एक पापी था, जिसका विवेक बहुत परेशान था। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि वह मेरी संतुष्टि से शान्त होता था। मैं प्रेम नहीं करता था, हाँ, मैं पापियों को दण्ड देने वाले धर्मी परमेश्वर से घृणा करता था, और गुप्त रूप से, यदि ईशनिन्दात्मक रीति से नहीं, निश्चित रूप से बहुत बड़बड़ाते हुए, मैं परमेश्वर से क्रोधित था, और मैंने कहा, “जैसे कि, वास्तव में, यह पर्याप्त नहीं है, कि दुखी पापी, मूल पाप के द्वारा सर्वदा के लिए खोए हुए, दस आज्ञा के नियम के द्वारा प्रत्येक प्रकार के विपत्ति से दबाये जाते हैं, परमेश्वर के बिना सुसमाचार के साथ दुःख को जोड़े और साथ ही साथ सुसमाचार द्वारा हमें उसकी धार्मिकता और क्रोध की धमकी दिए!” इस प्रकार मैंने एक उग्र और परेशान विवेक के साथ क्रोध किया। फिर भी, मैंने लगातार उस स्थान पर पौलुस से आग्रह करता रहा, सबसे प्रबल रीति से यह जानने की इच्छा के साथ कि प्रेरित पौलुस क्या चाहता था।

अन्त में, परमेश्वर की दया से, दिन और रात मनन करते हुए, मैंने शब्दों के सन्दर्भ में ध्यान दिया, अर्थात् “परन्तु धर्मी मनुष्य विश्वास से जीवित रहेगा।” वहाँ मैं समझने लगा कि परमेश्वर की धार्मिकता वह है जिसके द्वारा धार्मिकता विश्वास के द्वारा अर्थात परमेश्वर के दान द्वारा जीता है। और अर्थ यह है: परमेश्वर की धार्मिकता सुसमाचार द्वारा प्रकट होती है, अर्थात्, वह असक्रिय धार्मिकता जिसके द्वारा दयालु परमेश्वर हमें विश्वास से धर्मी ठहराता है, जैसा लिखा है, “परन्तु धर्मी मनुष्य विश्वास से जीवित रहेगा।” यहाँ मुझे लगा कि मैं पूरी तरह से फिर से पैदा हुआ हूँ और खुले फाटकों से स्वर्ग में प्रवेश किया है। वहाँ पूर्ण रूप से वचन का दूसरा रूप मुझे दिखा गया। उसके बाद मैं स्मरण शक्ति के द्वारा वचन से होकर गया। मुझे अन्य शब्दों में भी एक समरूपता प्राप्त हुई, जैसे, परमेश्वर का कार्य अर्थात्, जो हम में परमेश्वर करता है, परमेश्वर की सामर्थ्य, जिसके द्वारा वह हमें सामर्थी बनाता है, परमेश्वर की बुद्धि, जिसके द्वारा वह हमें बुद्धिमान बनाता है, परमेश्वर की शक्ति, परमेश्वर का उद्धार, परमेश्वर की महिमा।

लूथर के हृदय-परिवर्तन का समय विवादित है। कुछ लोग सोचते हैं कि यह 1508 में ही हुआ था, परन्तु लूथर ने स्वयं लिखा कि यह 1519 में हुआ, अपने पंचानवे थीसिस को लगाने के बाद । उसके हृदय-परिवर्तन की वास्तविकता अधिक महत्वपूर्ण है। लूथर समझ गया कि उद्धार दोषियों के लिए एक भेंट था, न कि धर्मियों के लिए एक उपहार। मनुष्य भले कार्यों के द्वारा नहीं वरन् यीशु के द्वारा पूर्ण किए गए कार्य पर विश्वास करने के द्वारा बचाया जाता है। इसी प्रकार, केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना ही धर्म-सुधार का मुख्य सिद्धान्त बन गया।

पोप के अधिकार पर आक्रमण

केवल विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने ने रोम के विश्वास और कार्य द्वारा धर्मी ठहराए जाने की शिक्षा को ठोकर दिया। इस प्रकार, पोप ने लूथर को “खतरनाक सिद्धान्त” का प्रचार करने के लिए अभियोग लगाया और उसे रोम बुलाया। जब लूथर ने मना किया, तो उसे 1519 में लिपजिग में बुलाया गया एक प्रमुख कैथोलिक ईश्वरविज्ञानी जॉन एक्ख के साथ सार्वजनिक वाद-विवाद के लिए । इस विवाद में, लूथर ने पुष्टि की कि एक कलीसिया की सभा गलती कर सकती है, एक बिन्दु जिसे जॉन विक्लिफ और जॉन हस ने बनाया हुआ था।

लूथर ने आगे कहा कि पोप का अधिकार एक आधुनिक अविष्कार था। इस प्रकार के धार्मिक अन्धविश्वास, उसने कहा, नीकिया की महासभा और कलीसिया के इतिहास के विरोध में था। इससे भी बुरा, यह वचन के विरोध था। इस कदम को उठाते हुए, लूथर ने रोम के प्रमुख नस को उत्तेजित किया—पोप का अधिकार।

1520 की गर्मियों में, पॉप ने एक बुल जारी किया, एक अध्यादेश जिस पर छाप एक बुल्ला, या लाल मुहर के साथ लगाया गया। दस्तावेज़ यह कहकर आरम्भ हुआ: “उठ, हे प्रभु, और अपने लिए न्याय कर। एक जंगली सूअर ने आपके दाख की बारी पर आक्रमण किया है।” इन शब्दों के साथ, पोप लूथर को एक अनियंत्रित जानवर के रूप में सम्बोधित कर रहा था, जो कहर उत्पन्न कर रहा था। लूथर की शिक्षाओं में से इक्तालीस को झूठी, निन्दनीय, या गलत ठहराया गया।

इसके साथ, लूथर के पास साठ दिन थे पश्चाताप करने के लिए या निष्कासन का सामना करने के लिए। उसने प्रत्युत्तर दिया सार्वजनिक रूप से पोप के बुल को जलाकर । यह खुली अवहेलना से कम नहीं था। थॉमस लिन्ड्से लिखता है, “बीसवीं शताब्दी में हमारे लिए उस रोमांच की कल्पना करना कठिनाई से सम्भव है, जो पूरे जर्मनी, और वास्तव में, पूरे यूरोप में फैला, जब यह समाचार फैला कि एक गरीब मठवासी ने पोप के बुल को जला दिया था।” किन्तु यद्यपि उसे बहुत से लोगों के द्वारा स्वीकार किया गया था, लूथर कलीसिया की दृष्टि में एक चिह्नित व्यक्ति था।

वर्म्स की धर्म-सभा: लूथर का कदम

1521 में, युवा पवित्र रोमन सम्राट, चार्ल्स V, ने लूथर को जर्मनी के वर्म्स में वर्म्स की धर्म-सभा में प्रस्तुत होने के लिए बुलाया, ताकि वह आधिकारिक रूप से मुकर सके। विश्वासघाती मठवासी को एक मेज़ पर उसकी पुस्तकें दिखाई गईं। तब लूथर से पूछा गया कि क्या वह उन पुस्तकों की शिक्षा का खण्डन करेगा। अगले दिन लूथर ने अपने उन प्रसिद्ध शब्दों के साथ उत्तर दिया: “जब तक मैं वचन की साक्षी या स्पष्ट तर्क से आश्वस्त नहीं हूं, (क्योंकि मैं केवल पोप पर या सभाओं पर भरोसा नहीं करता, क्योंकि यह सुपरिचित है वे प्रायः गलत हुए हैं और वे प्रायः स्वयं से संगत नहीं हुए हैं), मैं पवित्रशास्त्रों से बंधा हूं जिन्हें मैंने उद्धृत किए हैं और मेरा विवेक परमेश्वर के वचन के लिए बंदी है। मैं कुछ भी खण्डन नहीं कर सकता और न ही करूँगा क्योंकि विवेक के विरूद्ध जाना सुरक्षित और सही नहीं है। मैं कुछ और नहीं कर सकता, मैं यहां खड़ा हूँ, परमेश्वर मेरी सहायता करें, आमीन।” ये विद्रोही शब्द धर्मसुधार का एक युद्ध का नारा बन गया।

चार्ल्स  V ने लूथर को झूठे शिक्षक के रूप में दोषी करार दिया और उसके सिर की भारी कीमत रखी। जब लूथर ने वर्म्स छोड़ा, तो दण्ड पूरा होने से पहले सुरक्षित विटिनबर्ग जाने के लिए उसके पास इक्कीस दिन थे। जब वह मार्ग में था, उसके कुछ समर्थकों ने, उसके जीवन के लिए डरते हुए, उसका अपहरण कर लिया और उसे वार्टबर्ग कास्ल ले गए। वहां, वह आठ महीने तक जनता की दृष्टि से छिपा रहा। कारावास के इस समय में, लूथर ने बाइबल का अपना अनुवाद आरम्भ किया जर्मन भाषा में, जो आम लोगों की भाषा थी। इस कार्य के द्वारा धर्मसुधार की लपटें और भी अधिक फैल जाएंगी।

10 मार्च 1522 को लूथर ने एक सन्देश में धर्मसुधार की बढ़ती सफलता को समझाया। परमेश्वर के वचन में दृढ़ विश्वास के साथ, उसने घोषणा की: “मैंने केवल परमेश्वर के वचन को पढ़ाया, प्रचार किया और लिखा; उससे अधिक मैंने कुछ नहीं किया। और मेरे सोते समय . . . वचन ने पोप के पद को इतना निर्बल कर दिया कि किसी भी राजकुमार या सम्राट ने इस तरह की हानि नहीं कराया। मैंने कुछ नहीं किया; वचन ने सब कुछ किया।” लूथर ने देखा परमेश्वर ने उसे सत्य के लिए एक मुखपत्र की तरह उपयोग किया है। धर्मसुधार की स्थापना हुई उस पर और उसकी शिक्षाओं पर नहीं, परन्तु केवल पवित्रशास्त्र के अडिग नींव पर।

 1525 में, लूथर ने कैथरीन वोन बोरा से विवाह किया। यह अद्भुत महिला भागकर बची हुई मठवासिनी थी जो कि धर्मसुधार के लिए समर्पित थी। दोनों ने विवाह करने के लिए मठवासी वाचा को छोड़ दिया। लूथर बयालीस और केटी छब्बीस वर्ष की थी। उनके मिलन से छह बच्चे उत्पन्न हुए। लूथर का पारिवारिक जीवन बहुत ही खुशहाल था, जिसने सेवकाई के मांगों को सरल कर दिया।

उसके जीवन के अन्त तक, लूथर ने भाषण देने, प्रचार करने, सिखाने, लिखने और वाद-विवाद करने का भारी कार्यभार बनाए रखा। सुधार के लिए यह कार्य अत्यधिक शारीरिक और भावनात्मक कीमत पर आया। प्रत्येक लड़ाई ने उससे कुछ निकाला और उसे अधिक निर्बल छोड़ दिया। वह जल्द ही बीमारियों का शिकार हो गया। 1537 में, वह इतना बीमार हो गया कि उसके मित्रों को डर था कि वह मर जाएगा। 1541 में, वह फिर से गम्भीर रूप से बीमार हो गया, और इस बार उसने स्वयं सोचा कि वह इस दुनिया से चला जाएगा। वह फिर से ठीक हो गया, किन्तु वह अपने अन्तिम चौदह वर्षों में विभिन्न बीमारियों से ग्रस्त था। अन्य बीमारियों के बीच, वह पित्ताशय की पथरी से पीड़ित था और यहां तक कि उसने एक आँख से देखने की क्षमता खो दिया।

 अंत तक विश्वासयोग्य

1546 के आरम्भ में, लूथर ने अपने गांव आइसलबेन तक यात्रा की। उसने वहाँ प्रचार किया और फिर मैन्सफेल्ड तक यात्रा की। दो भाईयों ने, जो मैन्सफेल्ड के प्रतिष्ठित लोग थे, उसे पारिवारिक मतभेद में मध्यस्थता करने के लिए निवेदन किया था। लूथर को दोनों में मेल होते हुए देखकर बड़ा संतोष हुआ।

उसी शाम को लूथर बीमार पड़ गया। जैसे-जैसे रात बीतती गई, लूथर के तीन पुत्र—जोनस, मार्टिन और पॉल—और कुछ मित्र उसकी ओर देखते रहे। उन्होंने उसको दबाया: “आदरणीय पिता, क्या आप ख्रीष्ट और उस सिद्धान्त के साथ खड़े हैं जिनका आपने प्रचार किया है?” धर्मसुधारक के उत्तर में एक स्पष्ट “हाँ” कहा। उसकी मृत्यु 18 फरवरी 1546 के आरम्भिक घंटों में हुई थी, उस कुण्ड के सामने जहां उसे एक बच्चे के रूप में बपतिस्मा दिया गया था।        

लूथर के शव को वेटनबर्ग ले जाया गया जब हज़ारों शोक कर्ताओं मार्ग पर खड़े थे और चर्च की घंटियाँ बजीं। लूथर को विटिनबर्ग के कास्ल चर्च के उपदेश-मंच के सामने गाड़ा गया, उसी कलीसिया में जहाँ, उन्नतीस वर्ष पहले, उसने अपने सुप्रसिद्ध पंचानबे थीसिस को द्वार पर टांगा था।

 उसकी मृत्यु पर, उसकी पत्नी कैथरीन ने उसके चिरस्थायी प्रभाव के विषय और ख्रीष्टिय धर्म पर स्मारकीय प्रभाव के विषय में लिखा: “कौन दुखी और व्यथित नहीं होगा ऐसे अनमोल व्यक्ति के खोने पर जैसे कि मेरे प्रिय स्वामी थे। उसने महान काम किए न केवल एक शहर या एक राष्ट्र के लिए, वरन् पूरे संसार के लिए ।” वह सही थी। लूथर की आवाज़ उसके दिन में पूरे यूरोपीय महाद्वीप में गूँजी और तब से शताब्दियों के लिए दुनिया भर में गूँज रही है।

यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

स्टीवन जे. लॉसन
स्टीवन जे. लॉसन
डॉ. स्टीवन जे. लॉसन वनपैशन मिनिस्ट्रीज़ के अध्यक्ष और संस्थापक हैं, जो लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के एक सह शिक्षक हैं, और कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें, फाउंडेशन ऑफ ग्रेस और द मूमेन्ट ऑफ ट्रूथ सम्मिलित है।