अनुवादकों का राजकुमार: - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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वाचाई ईश्वरविज्ञानी: हेनरिक बुलिंगर
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अनुवादकों का राजकुमार:

विलियम टिन्डेल (लगभग 1494-1536) ने इंग्लैण्ड के धर्म-सुधार में बहुत बड़ा योगदान दिया है। कई लोग यह कहेंगे कि उसने बाइबल को अंग्रेजी में अनुवाद करने तथा उसके प्रकाशन कार्य का निरीक्षण करने के द्वारा निर्णायक योगदान दिया है। एक जीवनी लेखक, ब्रायन एडवर्ड्स, लिखते हैं कि टिन्डेल केवल “इंग्लैण्ड के धर्म-सुधार का केन्द्र ही नही थे,” वह “स्वयं इंग्लैण्ड के धर्म-सुधार थे।” और अपनी बाइबल में अंग्रेजी भाषा के शक्तिशाली उपयोग के कारण, इस धर्मसुधारक को “आधुनिक अंग्रेजी का पिता” कहा गया है। 

जॉन फॉक्स तो इससे भी आगे बढ़कर उन्हें “इंग्लैण्ड का प्रेरित” कहते हैं। इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि अपने स्मारकीय कार्य के द्वारा टिन्डेल ने अंग्रेजी इतिहास और पाश्चात्य सभ्यता की दिशा ही बदल दी है। 

टिन्डेल का जन्म आरम्भिक 1490 के आस-पास हुआ था, सम्भवतः 1494 में, पश्चिमी ग्रामीण इंग्लैण्ड के ग्लॉस्टशर (Gloucestershire) नामक स्थान में हुआ था। टिन्डेल परिवार उद्यमी और सम्पन्न कृषकों के महत्वपूर्ण परिवार से थे, जिनके पास विलियम को ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में भेजने हेतु साधन थे। 1506 में, बारह वर्ष की उम्र में विलियम ने मैगडलेन विद्यालय में प्रवेश लिया, जो कि आरम्भिक व्याकरण विद्यालय के समकक्ष था और मैगडलेन महाविद्यालय ऑक्फोर्ड के भीतर ही स्थित था। मैगडलेन विद्यालय में दो वर्ष रहने के बाद टिन्डेल ने मैगडलेन महाविद्यालय में प्रवेश लिया, जहाँ उन्होंने व्याकरण, गणित, ज्यामितीय, खगोलशास्त्र, संगीत, वाक्पटुता, तर्क, और दर्शनशास्त्र की शिक्षा ली। उन्होंने इंग्लैण्ड के सबसे उत्कृष्ट विद्वानों के अधीन रहकर भाषाओं की शिक्षा में बड़ी ही तीव्र उन्नति की। उसने 1512 में स्नातक की तथा 1515 में परास्नातक उपाधि (degree) प्राप्त की। ऑक्फोर्ड छोड़ने से पहले पादरी पद हेतु टिन्डेल को विधिवत रीति से किया गया।

कैम्ब्रिज और व्हाइट हॉर्स इन

इसके बाद टिन्डेल कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने के लिए गए और ऐसा माना जाता है कि वहाँ उन्होंने एक उपाधि (degree) प्राप्त की। मार्टिन लूथर के अनेक लेखों का छात्रों तथा शिक्षकों के मध्य में आदान-प्रदान किया जा रहा था, और वे लेख सम्पूर्ण परिसर में बड़ा ही उत्साह उत्पन्न कर रहे थे। इसी वातावरण में, टिन्डेल ने प्रोटेस्टैन्ट आन्दोलन के मूल सत्यों को अपनाया। 

मार्टिन लूथर द्वारा पंचानबे शोध विषयों को प्रस्तुत किए जाने के तीन वर्ष बाद ही, 1520 में कैम्ब्रिज के विद्वान नियमित रीति से इस “नये” ईश्वरविज्ञान का अध्ययन करने के लिए एक छोटे समूह में मिलने लगे। वे किंग्स कॉलेज परिसर के मदिरालय (pub) में मिलते थे जिसे व्हाइट हाउस इन कहा जाता था। जैसा कि उन्होंने जर्मनी के धर्म-सुधारक के विचारों पर विचार-विमर्श करने लगे, इसलिए छोटे समूह को “छोटी जर्मनी” के रूप में जाना जाने लगा। इस समूह में भविष्य के अनेक धर्मसुधारवादी आन्दोलन के अगुवे सम्मिलित थे। 

1521 में, टिन्डेल ने यह आभास किया कि उन्हें शैक्षिक परिवेश से हटने तथा धर्म-सुधार के सत्यों पर और अधिक ध्यानपूर्वक सोच विचार करने की आवश्यकता है। साथ ही वे यूनानी नये नियम का अध्ययन करने तथा उसे समझने के लिए भी समय निकालना चाहते थे। अतः उन्होंने ग्लॉस्टशर नामक स्थान में ही सर जॉन वाल्श (Sir John Walsh) के धनी परिवार में नौकरी करने लगे। इसी समय में उन्होंने इस बात को समझा कि लातीनी बाइबल का उपयोग करके कभी भी इंग्लैण्ड सुसमाचार से संतृप्त नहीं किया जा सकता है। वे इस बात को समझ गए थे कि “एक साधारण विश्वासी के लिए तब तक सत्य को स्थापित करना असम्भव है, जब तक कि पवित्रशास्त्र उनकी अपनी भाषा में उनके सामने प्रस्तुत न किया जाए।”

स्थानीय पादरीगण प्रायः वॉल्श के घर में भोजन करने आया करते थे और टिन्डेल ने पहली बार रोमन कैथोलिक पादरीवर्ग की भयावह अज्ञानता को देखा। एक बार भोजन करते समय उनका एक कैथोलिक पादरी से वाद-विवाद हो गया, बाद में उस पादरी ने कहा कि “हम बिना पोप के नियमों की तुलना में बिना परमेश्वर के नियमों के ही ठीक हैं।” टिन्डेल ने निडरता के साथ प्रतिउत्तर दिया कि “मैं पोप और उसके सभी नियमों का विरोध करता हूँ।” इसके बाद उसने इन प्रसिद्ध कथन कहा “यदि परमेश्वर ने मुझे कई वर्षों तक जीवन दिया तो मैं कुछ ऐसा करूँगा कि एक लड़का जो हल चलाता है, वह भी तुमसे अधिक पवित्रशास्त्र को जानेगा।” इसके बाद से ही बाइबल को अंग्रेज़ी में अनुवाद करने का महत्वाकाँक्षी कार्य टिन्डेल का प्रेरक मिशन बन गया।

एक योजना के साथ लन्दन जाना

1523 में, टिन्डेल ने अनुवाद परियोजना की आधिकारिक अनुमति प्राप्त करने के लिए लन्दन की यात्रा की। लन्दन के बिशप कथबर्ट टन्सटल के साथ मिलने का उन्होंने प्रबन्ध किया। टिन्डेल ने सोचा था कि उनकी अनुवाद परियोजना (कार्य) को टन्सटल स्वीकार कर लेंगे परन्तु उनको विरोध का सामना करना पड़ा। टन्सटल, लूथर के विचारों को फैलने से रोकने के प्रति दृढ़ था, क्योंकि वह लन्दन में होने वाले ऐसे किसी भी उथल-पुथल से भयभीत था जैसा कि जर्मनी में 1522 में लूथर की जर्मन बाइबल के प्रकाशित होने के बाद हुआ था। टन्सटल इस बात को जानता था कि अंग्रेज़ी बाइबल सभी लोगों तक पहुँचेगी और वह धर्मसुधारवादी शिक्षा को उन्नत करेगी तथा कैथोलिक कलीसिया को चुनौती देगी। टिन्डेल ने अतिशीघ्र ही इस बात को जान लिया कि उसे अनुवाद परियोजना को पूरा करने के लिए देश को छोड़ना पड़ेगा। 

अप्रैल 1524 में, टिन्डेल ने लगभग तीस वर्ष की उम्र में अपने अनुवाद और प्रकाशन कार्य को आरम्भ करने के लिए एक महाद्वीप अर्थात् यूरोप को चले गए। टिन्डेल ने अपने जीवन के अन्तिम बारह वर्ष एक भगोड़े और नियम विरोधी के रूप में लन्दन से निर्वासन का जीवन व्यतीत किया। 

हैम्बर्ग, जर्मनी में आने के बाद, ऐसा प्रतीत होता है कि टिन्डेल सबसे पहले विटनबर्ग गए जिससे कि वह लूथर के प्रभाव के अधीन रह सके, जिसने कि पोपीय अधिकार के अन्तिम प्रभाव को भी उखाड़ फेंका था। यहीं पर टिन्डेल ने यूनानी भाषा से अंग्रेज़ी में नये नियम का अनुवाद करना आरम्भ किया था।     

अगस्त 1525 में, टिन्डेल ने कोलोन नगर की यात्रा की जहाँ उन्होंने नये नियम के अपने पहले अनुवाद को पूरा किया था। इस व्यस्त नगर में टिन्डेल को उनका अनुवाद प्रकाशित करने हेतु पीटर क्विन्टल नाम का एक मुद्रक मिला। टिन्डेल चाहते थे कि किसी भी स्थिति में मुद्रण के कार्य को गुप्त रखा जाए किन्तु इस कार्य के रहस्य का भेद प्रकट हो गया। धर्मसुधार के एक कटु विरोधी जॉन कोक्लियुस ने सुन लिया और उसने तुरन्त मुद्रक पर छापा मार दिया। यद्यपि, टिन्डेल को पहले से ही चिता दिया गया था, अतः उन्होंने मुद्रित की गई प्रतियों को एकत्रित किया और रात में ही भाग गये। वे राइन से भागकर वर्म्स नगर में आ गये जो कि अधिक प्रोटेस्टेंट-अनुकूल नगर था।

1526 में, टिन्डेल को पीटर शॉफ़र नाम का एक मुद्रक मिला जो उनके अंग्रेज़ी नये नियम की छपाई को पूरा करने के लिए सहमत हो गया। यह पवित्रशास्त्र का पहला भाग था जिसका यूनानी से अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया और यंत्रवत् मुद्रित किया गया। लगभग छह हजार प्रतियाँ सुस्पष्ट सामान्य अंग्रेज़ी में छपी थीं। 1526 के वसंत ऋतु में, टिन्डेल ने अपने अंग्रेज़ी के नये नियम को कपास के गट्ठरों में छिपाकर इंग्लैण्ड को भेजना आरम्भ कर दिया। इसकी माँग आपूर्ति से कहीं अधिक बढ़ गई थी।

1526 की ग्रीष्म ऋतु तक, रोमन कैथोलिक कलीसिया के अधिकारियों को यह बात पता चल गयी कि टिन्डेल का नया नियम गुप्त रीति से एक दूसरे तक पहुँचाया जा रहा है। कैन्टरबरी के आर्चबिशप तथा लन्दन के बिशप दोनों अति क्रोधित थे। उन्होंने टिन्डेल के नये नियम की सभी प्रतियों को जितना भी वे पा सकते थे नष्ट करने का प्रयास किया और इस बात की घोषणा की कि इनको क्रय करना, बेचना या इनको रखना एक गम्भीर अपराध है। किन्तु ये कार्य टिन्डेल के अनुवाद को फैलने से रोकने में असफल हो गए। इसकी माँग और बढ़ती गई।

18 जून 1528 को, योर्क के आर्कबिशप, कार्डिनल थॉमस वोल्सी ने तीन अभिकर्ताओं को उस महाद्वीप पर टिन्डेल को आक्रामक रीति से खोजने के लिए भेजा। वोल्सी ने भी जॉन हैक्ट को आदेश दिया—जो निचले देशों (नीदरलैण्ड्स) के अंग्रेज़ राजदूत—कि निचले देशों के रीजेन्ट (राज्य अधिकारी) से इस बात की माँग करें कि वे टिन्डेल को बन्दी बनाए जाने की 

आधिकारिक स्वीकृति दें। किन्तु टिन्डेल अपनी सुरक्षा के लिए मारबर्ग में चले गए। अन्ततः हैक्ट ने इस बात की सूचना दी कि टिन्डेल को खोजा नहीं जा सका है।

पंचग्रन्थ का अनुवाद

सितम्बर 1528 में, टिन्डेल का पता लगाने के लिए दूसरा प्रयास किया गया। जॉन वेस्ट जो कि एक रोमन कैथोलिक मठवासी (friar) था, उसको इंग्लैण्ड से उस महाद्वीप पर उस भगोड़े टिन्डेल को पकड़ने और वापस लाने के लिए भेजा गया। वेस्ट एंटवर्प में उतरा और साधारण नागरिकों के समान वस्त्र पहने तथा टिन्डेल को खोजना आरम्भ किया। उसने नगरों को छान मारा और मुद्रकों के पास जाकर भी पूछताछ किया। बाध्यताओं को समझते हुए टिन्डेल मारबर्ग में रुके रहे। उन्होंने यह समय स्वयं को इब्रानी सिखाने में लगाया, ऐसी भाषा जिसे उस समय अंग्रेज़ी विश्वविद्यालय में नहीं सिखाई जाती थी जब टिन्डेल एक छात्र थे। इस नये कौशल के साथ टिन्डेल ने पंचग्रन्थ को इब्रानी से अंग्रेज़ी में अनुवाद करना आरम्भ कर दिया। 

1529 में, टिन्डेल मारबर्ग से एंटवर्प को चले गए। इस उन्नतशील नगर ने उन्हें अच्छे मुद्रक, सहानुभूति रखने वाले अंग्रेज तथा इंग्लैण्ड के लिए सीधी आपूर्ति वाला मार्ग प्रदान किया। इस नये शरणस्थान में उसने मूसा की पाँच पुस्तकों का अनुवाद पूरा किया, परन्तु उन्होंने इस बात का अनुभव किया कि इस बड़े नगर में रहना एक बड़े जोखिम की भी बात थी। उन्होंने इस बात को समझा की पंचग्रन्थ को कहीं और भी मुद्रित किया जा सकता है। अतः टिन्डेल एक जहाज़ पर सवार होकर जर्मनी की एल्बे नदी के निकास तक गए और फिर हैम्बर्ग के लिए निकले। किन्तु जहाज़ एक भयंकर तूफान की चपेट में आ गया और वह होलैण्ड के किनारे पर टूट गया। दुःख की बात थी कि उनकी पुस्तकें, लेख, और पंचग्रन्थ के अनुवाद समुद्र में खो गए। अब उन्हें सारा कार्य पुनः आरम्भ से करना पड़ा।

टिन्डेल ने अन्ततः हैम्बर्ग के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पर वॉन इमर्सन्स के घर में उसका स्वागत किया गया क्योंकि यह परिवार धर्मसुधार के प्रति बड़ी ही दृढ़ सहानुभूति रखता था। इस सुरक्षित परिवेश में टिन्डेल ने इब्रानी भाषा से पंचग्रन्थ का अनुवाद करने के लिए कठोर परिश्रम किया। इस कार्य ने 1529 में मार्च से लेकर दिसम्बर तक का समय लिया। जनवरी 1530 में, मूसा की इन पाँच पुस्तकों को एंटवर्प में मुद्रित किया गया और फिर इन्हें इंग्लैण्ड में छिपाकर भेजा गया तथा वहाँ वितरित किया गया।

नवम्बर 1530 में, थॉमस क्रामवेल (Thomas Cromwell) ने जो कि राजा हेनरी XIII का परामर्शदाता था, उसने टिन्डेल को झुकाने के लिए एक और रणनीति रची। उसने स्टीफन वोघन जो कि एक अंग्रेज़ी व्यापारी था और सुधारवाद के प्रति सहानुभूति रखता था को आदेश दिया कि वह टिन्डेल का पता लगाए। राजा की ओर से वोघन को यह निर्देश दिया गया था कि वह टिन्डेल को वेतन तथा इंग्लैण्ड वापस लौटने के लिए सुरक्षित यात्रा का प्रस्ताव दे। जब वह महाद्वीप को पहुँचा तो वोघन ने टिन्डेल को एक पत्र भेजा। टिन्डेल ने उत्तर दिया तथा अप्रैल 1531 में एंटवर्प में अनेकों गुप्त भेंट की गईं। यद्यपि, टिन्डेल इस बात से भयभीत थे कि राजा सुरक्षित यात्रा के प्रस्ताव की प्रतिज्ञा को तोड़ देगा और यह अनुवाद के कार्य को समाप्त कर देगा। इसलिए टिन्डेल ने वोघन से कहा कि वह एक ही स्थिति में वापस लौट सकते हैं—कि राजा को किसी और के द्वारा बाइबल का अनुवाद अंग्रेज़ी में अवश्य ही करवाना पड़ेगा। टिन्डेल ने कहा कि यदि राजा यह करेगा तो वह इंग्लैण्ड को वापस लौटेगा और फिर कभी भी  अनुवाद नहीं करेगा और यदि आवश्यकता पड़ी तो अपना जीवन राजा को मृत्यु तक के लिए सौंप देगा। 

19 जून को, वोघन ने एंटवर्प से वापस क्रोमवेल को इन साधारण से शब्दों में लिखा: “मैं उसे (टिन्डेल को) सदैव एक ही गीत गाते हुए सुना है।” दूसरे शब्दों में टिन्डेल अपनी बात से नहीं बदलेंगे। वह इंग्लैण्ड तब तक नहीं लौटेगा जब तक कि राजा बाइबल को अंग्रेज़ी भाषा में उपयोग करने का आदेश न दे दे। 

एंटवर्प (Antwerp) में बन्दी बनाया जाना

1534 के आरम्भ में, टिन्डेल एंटवर्प में थॉमस प्वान्ट्ज़ (Thomas Poyntz) के घर अतिथि के रूप में गए जो कि टिन्डेल की जीवनी लिखने वाले डेविड डैनियल के अनुसार “एक भले, तीक्ष्ण, मित्र तथा निष्ठावान सहानुभूति रखने वाले” धनी अंग्रेज़ व्यापारी थे। प्वान्टज़ ने टिन्डेल को अपनी सुरक्षा में रखा और यहाँ तक कि उनको वेतन भी उपलब्ध कराया। 

स्वयं को सुरक्षित अनुभव करने के बाद, टिन्डेल ने अपने नये नियम के संसोधन के कार्य को पूर्ण करने का कार्य आरम्भ किया। 1526 के प्रकाशन से इस दूसरे संस्करण में लगभग चार हजार परिवर्तन और सुधार किए गए। अब टिन्डेल की इब्रानी उतनी ही अच्छी हो चुकी थी जितनी कि उनकी यूनानी थी, जिसने होने दिया कि वह अब पुराने नियम के दूसरे भाग यहोशू से 2 इतिहास तक को कुशलतापूर्वक अनुवाद करें। 

उसी समय इंग्लैण्ड में, हैरी फिलिप्स नाम के किसी व्यक्ति को उसके पिता ने एक बड़ी धनराशि दी थी, जिसको उसे लन्दन में किसी को देना था। परन्तु फिलिप्स ने उस धन को जुए में उड़ा दिया। कलीसिया का एक अज्ञात उच्च अधिकारी—जो सम्भवतः लन्दन का बिशप जॉन स्टॉक्स्ले था—फिलिप्स की इस गम्भीर स्थिति को जानता था और उसने उसको एक बड़ी धनराशि देने का प्रस्ताव रखा यदि वह टिन्डेल का पता लगाने के लिए उस महाद्वीप अर्थात् यूरोप की यात्रा करे। अपनी निराशा के कारण फिलिप्स ने उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। वह 1535 में ग्रीष्मकाल के आरम्भिक दिनों में एंटवर्प को पहुँचा और अंग्रेज़ी व्यापारियों के साथ उसने आवश्यक सम्पर्क जोड़ना आरम्भ कर दिया। जब उसने टिन्डेल का पता लगा लिया तो उसने कुटिलतापूर्वक टिन्डेल के साथ मित्रता की और उसके विश्वास को जीत लिया। एक दिन उसने टिन्डेल को फुसलाकर एक सकरे मार्ग में ले गया, जहाँ सैनिकों ने उसको बन्दी बना लिया। एक भगोड़े के रूप में बारह वर्ष व्यतीत करने के बाद टिन्डेल को बन्दी बना लिया गया। 

इसके बाद पोइन्ट्ज़ के घर पर छापा मारा गया और टिन्डेल की बहुत सी वस्तुओं को हटाया गया। यद्यपि, किसी रीति से उसकी यहोशू से 2 इतिहास की वह मोटी हस्तलिपि उस छापे में बच गई। सम्भवतः ऐसा हुआ होगा कि यह उसके मित्र जॉन रोजर्स की वस्तुओं में रखी होगी, जिसने अन्ततः मैथ्यू बाइबल (1537) में इसे छापा था।

विलवूर्ड (Vilvoorde) के बन्दीगृह में डाला जाना

टिन्डेल को विलवूर्ड के किले में बन्दी बनाकर रखा गया जो कि ब्रूसेल्स से छः मील उत्तर में है। वहाँ टिन्डेल लगभग डेढ़ वर्ष तक दुर्बल पड़े थे जब उनकी सुनवाई के लिए तैयारियाँ की जा रही थीं। फॉक्स यह लिखते हैं कि टिन्डेल “अपने बन्दीगृह में रहने के समय में…अपने शत्रुओं को बहुत प्रभावित कर रहे थे,” क्योंकि यह बताता जाता है कि “उसने बन्दीगृह के अपने रक्षक, उसकी पुत्री और उसके घराने के अन्य लोगों को सुसमाचार सुनाया और उनका हृदय परिवर्तन हो गया था।”

अगस्त 1536 में, टिन्डेल अपनी अन्तिम सुनवाई के लिये खड़े हुए। उन पर लगाए गए आरोपों की एक लम्बी सूची उनके विरोध में तैयार की गई और उन्हें एक विधर्मी के रूप में दोषी ठहराया गया। उसी दिन टिन्डेल को सार्वजनिक सेवा में पादरी पद से बहिष्कृत किया गया। इसके बाद उन्हें सरकार के अधिकार में दण्डित करने के लिए सौंप दिया गया। और उनके लिए मृत्युदण्ड की घोषणा की गई। 

टिन्डेल को 6 अक्टूबर 1536 में मार डाला गया। उनका गला घोंट दिया गया, जला दिया गया और अन्त में उनकी देह को बारूद से उड़ा दिया गया। परन्तु अपनी मृत्यु से पहले किसी समय उन्होंने अपने अन्तिम प्रसिद्ध शब्दों को कहा “प्रभु, इंग्लैण्ड के राजा की आँखें खोल दीजिए।”

और देखें :      

  • धर्म-सुधार तथा इसके लिए कार्य करने वाले पुरुष
  • सत्य के लिए गढ़: मार्टिन लूथर
  • ज़्यूरिक की क्रान्ति: उलरिख ज़्विंग्ली
  • अनुवादकों का राजकुमार: विलियम टिन्डेल
  • वाचाई ईश्वरविज्ञानी: हेनरिक बुलिंगर
  • युगों के लिए ईश्वरविज्ञानी: जॉन कैल्विन
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।
स्टीवन जे. लॉसन
स्टीवन जे. लॉसन
डॉ. स्टीवन जे. लॉसन वनपैशन मिनिस्ट्रीज़ के अध्यक्ष और संस्थापक हैं, जो लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के एक सह शिक्षक हैं, और कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें, फाउंडेशन ऑफ ग्रेस और द मूमेन्ट ऑफ ट्रूथ सम्मिलित है।