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बाइबल का आरम्भ आकाश और पृथ्वी की सृष्टि से होता है (उत्पत्ति 1–2), और इसका समापन नए आकाश और नयी पृथ्वी की सृष्टि के साथ होता है (प्रकाशितवाक्य 21–22)। सृष्टि और नयी सृष्टि, पवित्रशास्त्र के सम्पूर्ण उद्धार-इतिहास को पूर्ण करती हैं और उसे उचित परमेश्वर-केन्द्रित परिप्रेक्ष्य में स्थापित करते हैं। दूसरे शब्दों में, मनुष्य का उद्धार अन्तिम लक्ष्य नहीं है; वह उसके बाद का (द्वितीयक) लक्ष्य है। पवित्रशास्त्र मनुष्य-केन्द्रित नहीं है, किन्तु परमेश्वर-केन्द्रित है। अन्तिम लक्ष्य परमेश्वर और उसकी महिमा है। मनुष्य का उद्धार उसी परम लक्ष्य की पूर्ति के लिए है।
उत्पत्ति में सृष्टि के छह दिनों का पूर्ण कार्य आदम और हव्वा का रचा जाना था। किन्तु मनुष्य स्वयं में कोई अन्तिम लक्ष्य नहीं है। सातवाँ दिन यह संकेत करता है कि मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता की आराधना करने के लिए रचा गया है। परमेश्वर ने प्रथम मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधी, जिसे सामान्यतः “कार्यों की वाचा” कहा जाता है। इस वाचा के अन्तर्गत “आदम से और उसके माध्यम से उसकी सन्तान से इस प्रतिबन्ध पर जीवन की प्रतिज्ञा की गई थी कि वे पूर्ण तथा व्यक्तिगत आज्ञाकारिता पालन करेंगे” (वेस्टमिस्टंर विश्वास-अंगीकार 7.2)।
दुःखद रूप से, आदम और हव्वा ने अपने प्रेममय सृष्टिकर्ता के वचन के स्थान पर सर्प के वचन को स्वीकार किया। उन्होंने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया और “कार्यों की वाचा” के द्वारा अनन्त जीवन प्राप्त करने में असमर्थ हो गए (उत्पत्ति 3)। उनकी सन्तान भी इसी पूर्णतः खोई हुई अवस्था में जन्म लेते हैं।
पवित्रशास्त्र में उद्धार की कहानी आदम के पाप में गिरते ही आरम्भ हो जाती है। परमेश्वर आदम और हव्वा को अपने साथ स्थायी शत्रुता की स्थिति में छोड़ देने के विपरीत, सर्प से कहता है कि “मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, तथा तेरे वंश और इसके वंश के बीच में, बैर उत्पन्न करूँगा।” फिर परमेश्वर यह अद्भुत प्रतिज्ञा जोड़ता है: “वह तेरे सिर को कुचलेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा” (उत्पत्ति 3:15)। यह सर्प के विरुद्ध परमेश्वर द्वारा युद्ध की घोषणा है, और साथ ही आदम और हव्वा के लिए अनुग्रह का सन्देश भी है। इसके बाद हम जो कुछ भी पढ़ते हैं, वह सब इन प्रारम्भिक प्रतिज्ञाओं की अन्तिम पूर्ति की ओर परमेश्वर के कार्य को दिखाता है।
मनुष्य आरम्भ से निरन्तर पाप में नीचे गिरता जाता है, और अधिकाधिक भ्रष्टता और पाप में डूबता चला जाता है, इसलिए परमेश्वर जलप्रलय के द्वारा संसार का न्याय करता है (उत्पत्ति 6–9)। जो कुछ लोग बचे रहते हैं, वे भी पाप में बने रहते हैं, और परमेश्वर उनकी भाषा को भ्रमित करके उन्हें सारी पृथ्वी पर तितर-बितर कर देता है (उत्पत्ति 11)। परन्तु इसके पश्चात परमेश्वर अब्राम को बुलाता है और उसके साथ एक वाचा बाँधता है। अब्राहम से की गई प्रतिज्ञाएँ कुछ इस प्रकार हैं:
“मैं तुझे एक बड़ी जाति बनाऊंगा, और मैं तुझे आशीष दूँगा और तेरा नाम महान् करूँगा; इसलिए तू आशीष का कारण होगा; जो तुझे आशीर्वाद देंगे, मैं उन्हें आशीष दूँगा, तथा जो तुझे शाप दे, मैं उसे शाप दूँगा, और पृथ्वी के सब घराने तुझ में आशीष पाएंगे” (उत्पत्ति 12:2–3)।
यह कार्य अब्राहम के एक पुत्र के द्वारा पूरा किया जाएगा, जिसके माध्यम से मनुष्य के उद्धार का कार्य सम्पन्न होगा। अन्ततः अब्राहम के वंशज मिस्र में दास बना लिए जाते हैं। वहाँ रहते हुए, वे एक बड़ी संख्या में बढ़ जाते हैं (निर्गमन 1:7)। चार सौ वर्षों के बाद परमेश्वर मूसा को बताता है कि वह क्या करने वाला है, और उसे लोगों से यह कहने की आज्ञा दी:
इसलिए इस्राएलियों से कह: “मैं यहोवा हूँ, और मैं तुमको मिस्रियों के बोझों के नीचे से निकालूँगा। मैं तुमको उनके दासत्व से छुड़ाऊँगा। मैं अपनी भुजा बढ़ाकर और न्याय के महान् कार्य करके तुम्हें छुड़ा लूँगा। तब मैं तुमको अपनी प्रजा बनाने के लिए अपना लूँगा, और मैं तुम्हारा परमेश्वर ठहरूँगा, और तुम जान लोगे कि मैं यहोवा तुम्हारा परमेश्वर हूँ जो तुम्हें मिस्रियों के बोझों के नीचे से निकाल ले आया। और मैं तुम्हें उस देश में पहुंचाऊँगा जिसे देने की शपथ मैंने इब्राहीम, इसहाक और याकूब से खाई थी और मैं उसे तुम्हारी मीरास होने को दे दूँगा; मैं यहोवा हूँ’।” (निर्गमन 6:6–8)
“मैं तुम्हें निकालूँगा, और मैं तुम्हें भीतर ले आऊँगा।” परमेश्वर पुराने नियम में उद्धार का कार्य इसी रीति से करता है। बाद में, जब नबी एक आने वाले, और भी महान् उद्धार के कार्य के विषय में बोलते हैं, तो वे उसे निर्गमन की भाषा में ही वर्णित करते हैं।
निर्गमन के समय, परमेश्वर अपने लोगों को अपनी व्यवस्था देता है और उस बात की नींव रखता है जो भविष्य में आने वाली है अर्थात प्रतिज्ञा किए हुए देश में एक राज्य की स्थापना का। परन्तु यह राज्य राजाओं और लोगों के पापों के कारण स्थिर नहीं रह सका। परमेश्वर नबियों के द्वारा उन्हें चेतावनी देता है, किन्तु वे मन नहीं फिराते और अन्तत: निर्वासन में भेज दिए जाते हैं। फिर भी, आने वाले न्याय के विषय में दी गई भविष्यद्वाणी अन्तिम वचन नहीं है। परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि न्याय के बाद वह उद्धार का एक ऐसा कार्य करेगा जो पहले निर्गमन से भी महान् होगा। वह अपने लोगों को बचाने के लिए एक मसीहाई राजा भेजेगा। वह एक नई वाचा स्थापित करेगा और नए आकाश और नई पृथ्वी की रचना करेगा।
सैकड़ों वर्ष बाद, एक स्वर्गदूत इस्राएल की एक जवान स्त्री के पास प्रकट होता है और उसे बताता है कि उसका पुत्र वही प्रतिज्ञात् मसीहाई राजा होगा (लूका 1:26–33)। उसका नाम यीशु होगा, “क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा” (मत्ती 1:21)। यीशु ही वह है जो सर्प के सिर को कुचलने आया है। वह अब्राहम का पुत्र है जिसके द्वारा सब जातियाँ आशीष पाएँगी (मत्ती 1:1)। वह प्रतिज्ञा किया हुआ दुःख उठाने वाला सेवक है, जो हमारे अपराधों के कारण बेधा गया तथा हमारे ही अधर्म के कामों के लिए कुचला गया (यशायाह 53:5)। वह हमारे पापों के लिए मरा (1 कुरिन्थियों 15:3), और जो कोई उस पर विश्वास करेगा वह उद्धार पाएगा (यूहन्ना 3:16; प्रेरितों के काम 16:31)।
दूसरा आदम एक नई मानवता का प्रधान है, और इस महान् निर्गमन में वह अपने लोगों को पाप और अन्धकार से निकालकर अपने राज्य में लाता है, जिससे कि वे परमेश्वर की आराधना करें, उसके साथ एकता और सहभागिता में रहें तथा सदा उसके आनन्द में जीवन बिताएँ। यीशु ख्रीष्ट के उद्धार का कार्य तथा यह कार्य उसके लोगों पर लागू होना, पवित्रशास्त्र के सबसे महिमामय सिद्धान्तों में से एक है। लेखों की इस श्रृंखला में हम देखेंगे कि कलीसिया ने उद्धार के इस बाइबलीय सिद्धान्त को कैसे समझा है (और कभी-कभी त्रुटिपूर्ण रीति से भी समझा गया है), और यह समझने का प्रयास करेंगे कि इस सिद्धान्त की सही समझ हमारे मसीही जीवन के लिए क्यों अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

