परमेश्वर की महिमा के लिए ईश्वरविज्ञान - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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परमेश्वर की महिमा के लिए ईश्वरविज्ञान

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का छठवां अध्याय है: वर्तमान सर्वदा के लिए महत्व रखता है

ईश्वरविज्ञान के अध्ययन को कभी स्वयं में अन्त नहीं होना चाहिए। ठोस सिद्धान्त का लक्ष्य कभी ऐसे लोगों को उत्पन्न करना नहीं जिनके मस्तिष्क भरे हुए हैं परन्तु ऐसे लोगों को उत्पन्न करना है जिनके हृदय खाली और जीवन बंजर हैं। धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान का उद्देश्य कभी भी “नीरस चुने हुओं”(frozen chosen) को उत्पन्न करना नहीं है। इसके विपरीत, परमेश्वर का ज्ञान और उसकी सच्चाई का अभिप्राय हमें उसे जानने और उसकी आराधना करने की ओर ले जाना है। पवित्रशास्त्र की शिक्षा हमारे हृदयों को परमेश्वर के प्रति भक्ति के साथ प्रज्वलित करने और उसके लिए जीने के लिए प्रेरित करने के लिए दी गयी है। संक्षेप में, सुदृढ़ ईश्वरविज्ञान को उत्साहपूर्ण स्तुतिगान उत्पन्न करना चाहिए।

हम दिखावे के लिए शिक्षित होने के लिए ईश्वरविज्ञान का अध्ययन नहीं करते हैं। ईश्वरविज्ञान केवल उच्चतम लक्ष्य का एक साधन है। हम परमेश्वर के सत्य का अध्ययन उसको बेहतर रूप से जानने और स्वयं को परिपक्व बनाने के लिए करते हैं। ईश्वरविज्ञान हमारे मनों को नया करता है। यह हमारे हृदयों को प्रज्वलित करता है। यह हमारी आराधना को ऊँचा उठाता है। यह हमारी प्रार्थनाओं को निर्देशित करता है। यह हमारे प्राणों को दीन करता है। यह हमारे मार्ग को प्रकाशित करता है। यह हमारी चाल को ऊर्जान्वित करता है। यह हमारे जीवनों को पवित्र करता है। यह हमारे विश्वास को दृढ़ करता है। यह हमारे उत्साह को गहरा करता है। यह हमारी सेवकाईयों को तीव्र करता है। यह हमारी साक्षी को दृढ़ करता है। ईश्वरविज्ञान यह सब—एवं और भी बहुत कुछ करता है। इस जीवन की खोज का हर पहलू परमेश्वर के लिए महिमा लाता है।

हम वह सब  जो करते हैं उसमें हमें परमेश्वर को महिमा देना है। पौलुस लिखता है, “चाहे तुम खाओ या पीओ या जो कुछ भी करो, सब परमेश्वर की महिमा के लिए करो” (1 कुरिन्थियों 10:31)। परमेश्वर को आदर देने के इस आदेश में ईश्वरविज्ञान का अध्ययन भी सम्मिलित है। प्रेरित चेतावनी देता है, यदि यह परमेश्वर एवं औरों से प्रेम करने की ओर नहीं ले जाता तो “ज्ञान घमण्डी बनाता है” (8:1)। हमें उस विश्वास का अध्ययन करना चाहिए “जो पवित्र लोगों को एक ही बार सदा के लिए सौंपा गया था” (यहूदा 1:3), अन्ततः परमेश्वर और हमारे प्रभु यीशु के पूर्णज्ञान” के लिए (2 पतरस 1:2)। परिणामस्वरूप, यह सत्य, हमें उसके नाम के कारण उसे महिमा देने के लिए उत्साहित करेगा।

एक महत्वपूर्ण पद इस सत्य को विशेष रूप से स्पष्ट करता है। पौलुस लिखता है: “क्योंकि उसी की ओर से, उसी के द्वारा और उसी के लिए सब कुछ है। उसी की महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन” (रोमियों 11:36)। यह अंगीकार नष्ट होने वाले पापियों के लिए परमेश्वर के उद्धार पर पौलुस की सबसे प्रगाढ़ शिक्षा को समाप्त करता है। पौलुस ने दण्डाज्ञा, धर्मी ठहराए जाने, पवित्रीकरण, महिमान्वीकरण, और चुने जाने के महान सिद्धान्तों की व्याख्या की और फिर वह परमेश्वर की इस उत्साहपूर्ण स्तुति में लग गया। आइए इस स्तुतिगान पर ध्यानपूर्वक विचार करें और प्रेरित के परमेश्वर को महिमा देने के प्रत्युत्तर का अनुकरण करें।

यह पद तीन पूर्वसार्गिक वाक्यांशों के साथ आरम्भ होता है—“उस की ओर से और उसी के द्वारा और उसी के लिए”—जिसके पश्चात् तीन सर्व-सामेशी शब्द हैं, “सब कुछ है” (रोमियों 11:36)। यह अब तक का लिखा सबसे व्यापक वाक्य है। यह एक पूर्ण मसीही विश्वदृष्टि है। यह स्वयं में एक वास्तविक विधिवत ईश्वरविज्ञान है। यहाँ बाइबल का सम्पूर्ण कथानक कुछ शब्दों में है। संक्षेप में यह संसार का इतिहास है। इन तीन वाक्यांशों की सीमा के बाहर कुछ भी नहीं है। “सब कुछ” में तीन प्रमुख क्षेत्रों में सब बातें सम्मिलित हो जाती हैं: सृष्टि, इतिहास और उद्धार।

पहले, प्रेरित लिखता है कि सब बातें “उसी की ओर” से हैं। यह अनन्तकाल पूर्व की इंगित करता है, जब परमेश्वर ने जो कुछ भी घटित होने वाला था उसकी मुख्य योजना तैयार की। परमेश्वर अपने अनन्त उद्देश्य (“उसी के द्वारा”) का रचयिता  है। जगत की उत्पत्ति से पूर्व, परमेश्वर ने पृथ्वी के विस्तारपूर्वक विवरण के साथ-साथ सारी सृष्टि की रूपरेखा तैयार कर ली थी (अय्यूब 38-39)। इसके अतिरिक्त, उसने अपनी अनन्त आज्ञप्ति का प्रारूप तैयार किया जिसमें वह सब सम्मिलित था जो समय के भीतर होगा (यशायाह 46:8-9)। बहुत पहले, परमेश्वर ने अपने चुने हुओं को चुना (रोमियों 8:29; इफिसियों 1:4; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13)। फिर उसने उनके उद्धार को सुरक्षित करने के लिए उन्हें अपने पुत्र के सुपुर्द कर दिया (यूहन्ना 6:37)। सृष्टि, इतिहास और उद्धार की यह सारी पूर्व योजना “उसी की ओर” से है।

दूसरा, पौलुस कहता है कि सब कुछ “उसी के द्वारा” हैं। इसका अर्थ है कि, समय के भीतर, परमेश्वर उस “सब कुछ” को घटित होने देगा जिसकी उसने योजना बनायी है। वह सृष्टिकर्ता है जिसके मुख की श्वाँस से सारा संसार अस्तित्व में आया (उत्पत्ति 1:1; भजन 33:6-7) और जो निरन्तर अपनी सामर्थ से इसे बनाए रखे है (कुलुस्सियों 1:16; इब्रानियों1:2)। इसके अतिरिक्त, वह प्रयोजन के कार्यों का संचालन करता, सब कुछ अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार करता है (इफिसियों 1:11)। एक वैकल्पिक रणनीति अपनाने के उद्देश्य से वह कभी अपनी मूल योजना से हटता नहीं है। उसके सम्प्रभु उद्देश्य से पृथक कुछ भी, यहाँ तक कि एक छोटी सी गतिविधि भी नहीं हो सकती (नीतिवचन 16:33; मत्ती 10:29)। सौभाग्य, दुर्भाग्य, आकस्मिक घटना, या भाग्य जैसी बातें अवास्तविक हैं। इसके अतिरिक्त, अपने सभी चुने हुओं के उद्धार में परमेश्वर का कार्य पूर्ण रूप से प्रभावशाली है। अपने पुत्र और पवित्र आत्मा के माध्यम से कार्य करने के द्वारा, परमेश्वर अपने चुने हुओं को कायल करता, बुलाहट देता, अपनी ओर बुलाता, पुनरुजीवित करता, पवित्र करता, रक्षा करता और महिमा देता है (यूहन्ना 6:37-40,44; रोमियों 8:29-30)।

तीसरा, फिर पौलुस लिखता है कि “सब कुछ” “उसी के लिए” है। यह इस बात पर बल देता है कि परमेश्वर सब बातों को अपनी महिमा की ओर निर्देशित करता है। इस भौतिक संसार का सर्वोच्च उद्देश्य उसके प्रताप का प्रदर्शन करना है (भजन 19:1)। इतिहास में जो भी वह नियोजित करता है, वह उसके नाम की महानता को प्रदर्शित करने के लिए है (यशायाह 48:11)। वह सब कुछ जो वह नष्ट होने वाले पापियों को बचाने के लिए उद्धार में करता है, वह उसके अनुग्रह की महिमा की स्तुति के लिए है (इफिसियों 1:3, 6, 12, 14)। सब बातों का यह उच्चतम लक्ष्य है: सोली दियो ग्लोरिया —केवल परमेश्वर की महिमा के लिए ही।

सब कुछ परमेश्वर “की ओर” से है, जो कि अनन्तकाल पूर्व से उसकी सम्प्रभु इच्छा से आगे बढ़ रहा है। सब कुछ उसी “के द्वारा” है, जो कि समय के भीतर उसकी सम्प्रभु गतिविधि के द्वारा पूरा किया गया है। सब कुछ उसी “के लिए” है, जो कि सदैव के लिए उसकी सम्प्रभु महिमा को बढ़ावा दे रहा है। जो कुछ भी उसने नियोजित और पूर्वनिर्धारित किया, उसने अपने स्वयं के उद्देश्य और आनन्द के लिए प्रदर्शन और बनाए रखने के लिए करता है।

फिर पौलुस कहता है कि यह सर्वोपरि ईश्वरविज्ञान है —और केवल  यह ईश्वरविज्ञान है—जो कि निम्नलिखित स्तुतिगान को उत्पन्न करता है: “उसी कि महिमा युगानुयुग होती रहे, आमीन।” यहाँ, परमेश्वर के विषय में यह उच्च सिद्धान्त उसके प्रति हमारी गहरी भक्ति की ओर ले जाता है। वह, जिसने सब कुछ को बनाया और सब कुछ को नियंत्रण करता है, जो अपने सब चुने हुओं का हृदय परिवर्तित करता है, सारी महिमा के योग्य है। मनुष्य के लिए कोई महिमा नहीं है। न ही इसे परमेश्वर और मनुष्य के मध्य विभाजित किया जाना चाहिए। हमारा जलन रखने वाला परमेश्वर किसी और के साथ अपनी महिमा साझा नहीं करेगा (यशायाह 42:8)।

महिमा  शब्द (यूनानी में डॉक्सा) में “किसी की सही राय या अनुमान का अर्थ” सम्मिलित है। यह किसी की प्रतिष्ठा का विचार रखता है। डॉक्सा  शब्द से हमें अंग्रेजी का शब्द ऑर्थोडॉक्स  शब्द प्राप्त होता है जिसका अर्थ है किसी के विषय में सही विश्वास। यह महान ख्याति और प्रतिष्ठा वाले एक प्रसिद्ध व्यक्ति के विषय में उच्च राय का उल्लेख करने के लिए चलन में आया था। यह एक व्यक्ति के उच्च पद के कारण सम्मान को इंगित करता है। जितना महान व्यक्ति होगा, उतना ही महान उसका सम्मान होना चाहिए। इसी प्रकार, जितना अधिक हम ईश्वरविज्ञान का अध्ययन करेंगे, उतने ही ऊँचा परमेश्वर के विषय में हमारा दृष्टिकोण होगा। परिणामस्वरूप, उतना ही अधिक हम उसकी स्तुति करेंगे।

बाइबल महिमा  के विषय में दो भिन्न-भिन्न प्रकार की बात करती है जिसमें अन्तर रहना चाहिए। पहली है परमेश्वर की अन्तरनिहुत  महिमा। यह जो परमेश्वर है उस सबका योग और सार है। यह महिमा उसके ईश्वरीय अस्तित्व की सम्पूर्णता का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें उसके ईश्वरीय गुणों की सारी सिद्धता सम्मिलित है। यह अन्तरनिहित महिमा सदैव से एक समान है, कभी बढ़ती या घटती नहीं है। अनन्तकाल से अनन्तकाल तक, परमेश्वर—वह है “जो था, और जो है, और जो आने वाला है” (प्रकाशितवाक्य 4:8)। हम परमेश्वर को उसकी अन्तरनिहित महिमा नहीं दे सकते हैं। वह जो है हम उसमें हम जोड़ या निकाल नहीं सकते हैं।

बाइबल उसकी दी गयी  महिमा की भी बात करती है। उसकी अन्तरनिहित महिमा को निहारने का केवल यह ही उचित प्रत्युत्तर है। यह महिमा जो हमें उसे देनी चाहिए। जितना अधिक हम परमेश्वर की आन्तरिक महिमा को समझेंगे, उतना अधिक हम उसको महिमा देंगे। जितना अधिक परमेश्वर के विषय में हमारा ज्ञान होगा, उतनी अधिक उसके लिए हमारी आराधना होगी। परमेश्वर के लिए उच्च दृष्टिकोण उच्च स्तुति को उत्पन्न करता है। जो व्यक्ति परमेश्वर को अधिक गहराई से जानने में बढ़ता है वह और अधिक उत्साह से उसकी स्तुति करेगा।

यह महिमा परमेश्वर को “सदा के लिए” या शाब्दिक रूप से “युगों तक” दी जानी है। पौलुस यह स्वीकार करता है कि समय आने पर या अनन्तकाल में एक भी ऐसा क्षण नहीं होगा जब वह परमेश्वर को महिमा नहीं दे रहा होगा। यह उसकी वर्तमान की लालसा है, और आने वाले युगों में यह ही उसका उत्साह होगा। यह ही सर्वश्रेष्ठ उद्देश्य है जिसके लिए उसकी रचना हुयी थी। और इसी लिए हम अस्तित्व में हैं। हमें अभी और सदा के लिए परमेश्वर की महिमा के लिए जीने के लिए लग जाना है।

हम कभी भी परमेश्वर की स्तुति करना नहीं छोड़ेंगे, क्योंकि वह अविनाशी है और उसका कभी अन्त न होगा: ”अब युग युग के राजा-अर्थात् अविनाशी, अदृश्य और अद्वैत परमेश्वर- का आदर और महिमा युगानुयुग होती रहे। आमीन” (1 तीमुथियुस 1:17)। “महिमा” उसे “सदा के लिए” दी जाएगी क्योंकि वह आने वाले युगों में राजा के रूप में सर्वोच्च रूप से शासन करेगा।

इस पद का अन्तिम शब्द पौलुस का उस ईश्वरविज्ञान का अन्तिम कथन है जो उसने अभी अभी सिखाया है। वह समाप्त करता है, “आमीन”। यह गुंजायमान है। “यह सत्य है।“ अन्य शब्दों में, “यह सही है”; “ऐसा ही हो”; “हाँ!” ईश्वरविज्ञान को हमारे हृदयों में यह उत्साही प्रत्युत्तर को उत्पन्न करना चाहिए। परमेश्वर के विषय के इस सत्य को जीवन में एक प्रभावी, केन्द्रिय विषय का निर्माण करना चाहिए। यही हमारे हृदय की सबसे प्रमुख धड़कन और शक्तिशाली उत्साह होना चाहिए। यही हमारा सबसे गहरा उत्साह और सर्वोच्च प्रेरणा होनी चाहिए। हम परमेश्वर की महिमा के लिए जीना और मरना—और फिर सदा के लिए जीना है।

हमारा ईश्वरविज्ञान का अध्ययन परमेश्वर की महिमा के लिए हो। यह हमें उसे वह स्तुति देने के लिए प्रेरित करे जो कि केवल उसकी है। आमीन।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया
स्टीवन जे. लॉसन
स्टीवन जे. लॉसन
डॉ. स्टीवन जे. लॉसन वनपैशन मिनिस्ट्रीज़ के अध्यक्ष और संस्थापक हैं, जो लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के एक सह शिक्षक हैं, और कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें, फाउंडेशन ऑफ ग्रेस और द मूमेन्ट ऑफ ट्रूथ सम्मिलित है।