चिन्ता क्या है? - लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
चिन्ता के लिए विष-नाशक
4 जनवरी 2022
चिन्ता का स्रोत
11 जनवरी 2022

चिन्ता क्या है?

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दूसरा अध्याय है: चिन्ता

चिन्ता आज संसार में तीव्रता से बढ़ती हुई प्रतीत हो रही है। एक स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, “संयुक्त राज्य में चिन्ता विकार सबसे आम मानसिक बिमारी है।” अध्ययनों से पता चला है कि पिछले कुछ वर्षों में किशोरों में भी चिन्ता बढ़ोतरी पर है। मात्र दो वर्ष पहले, बार्न्स और नोबल, संसार के सबसे बड़े पुस्तक के फुटकर विक्रेताओं में से एक, ने यह घोषणा की कि चिन्ता से सम्बन्धित पुस्तकों की बिक्री में बढ़ोतरी हुई थी, 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी के साथ। यह सब हाल ही की महामारी के प्रकोप से पहले का था। कोई सन्देह नहीं, कि चिन्ता पिछले एक वर्ष में और भी बढ़ गयी है।

मेरे बचपन की एक स्मृति है कि कोई मेरे पिता के विषय में कह रहा था, “ओह, वह बहुत ही चिन्ता करने वाला व्यक्ति है।” यह हल्के, आधे-उपहास के रूप में कहा गया था। फिर भी, यह सत्य था। मेरे पिता बहुत ही चिन्ता करने वाले व्यक्ति थे। जब मेरे दादाजी ने पारिवारिक व्यवसाय को बेच दिया, मेरे पिताजी प्रारम्भ से अपने स्वयं के व्यवसाय को निर्मित करने चले गए। यह कठिन था, माँगों से भरा कार्य जिसमें उनका समय और ध्यान व्यय होता था। उनका व्यवसाय अत्यन्त सफल हुआ, परन्तु वे वर्ष बहुत तनावपूर्ण भी थे। यह सब उनके छह बच्चों के लिए उनकी चिन्ता से अतिरिक्त था। मेरे स्वयं के छह बच्चों के साथ एक पास्टर के रूप में, मैं अपने पिता का पुत्र हूँ। मैं भी अपने बच्चों के लिए,अपने झुण्ड के लिए, और प्राय: अपने उत्तरदायित्वों के भारी भार के लिए—चिन्ता से लड़ता हूँ।

पवित्रशास्त्र के अनुसार, चिन्ता एक गम्भीर बात है। यीशु ने अपने चेलों को आज्ञा दी, “अपने प्राण के लिए चिन्ता न करना” (मत्ती 6:25)। उसी प्रकार, पौलुस ने लिखा, “किसी भी बात की चिन्ता न करो” (फिलि 4:6)। इन पदों का उद्देश्य “सब कुछ ठीक हो जाएगा” के जैसे, सान्त्वना देने वाली सम्मति होना नहीं है। ये बाइबलीय आज्ञाएँ है। इसलिए, इन्हें तोड़ना, पाप है।

फिर भी, पवित्रशास्त्र सभी चिन्ताओं को पापमय रूप में प्रस्तुत नहीं करता है। प्रेरित पौलुस, अपने पास्टरीय भूमिका में, एक विशेष प्रकार की उचित चिन्ता का अनुभव करता है। उसने कुरिन्थियों को लिखा कि अन्य कठिनाइयों का सामना करने के साथ ही साथ, “मुझे प्रतिदिन कलिसियाओं की चिन्ता दबाए रहती है” (2 कुरिन्थियों 11:28)। यूनानी शब्द जिसका अनुवाद यहाँ “चिन्ता” किया गया है वह क्रिया “चिन्तित होने” का संज्ञा रूप है जिसका उपयोग पौलुस फिलिप्पियों 4:6 करता है, जो कि ऊपर उद्धृत है। फिर भी, जैसा कि पौलुस ने कुरिन्थियों को इसका वर्णन किया, उसके पास एक पापमय चिन्ता नहीं है परन्तु ईश्वरीय, प्रेममय चिन्ता है।

निश्चित ही, पूरे ही पवित्रशास्त्र में, हम चिन्ता के विरोधी प्रारूपों को देखते हैं— एक जो कि उचित और सही है और दूसरा जो कि परमेश्वर की इच्छा के विपरीत है। वास्तव में, नया नियम दोनो प्रकार की चिन्ताओं के लिए समान यूनानी शब्दों का उपयोग करता है। पौलुस फिलिप्पियों 4:6 (मत्ती 6:25 में भी उपयोग किया गया) में पाए जाने वाले उसी यूनानी क्रिया का उपयोग करता है जब वह लिखता है कि ख्रीष्ट की देह को एक दूसरे के लिए उनकी “चिन्ता”  में एकजुट होना चाहिए (1 कुरिन्थियों 12:25)। उसी प्रकार से, पौलुस ने तीमुथियुस को फिलिप्पियों की कलीसिया में ऐसे व्यक्ति के रूप में सराहा जो, पौलुस के अन्य किसी भी सहकर्मियों से अधिक, उनकी कुशलता के लिए “शुद्ध मन से चिन्तित हो” (फिलिप्पियों 2:20)।

हमारी अधिकतर पापमय चिन्ताएँ उचित बातों से जुड़ी हुई हैं। अपने कार्य को अच्छे से करना उचित है, अपने अपने परिवार का सहयोग करने के लिए, अपने बच्चों की देख-भाल करने के लिए, उन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए जिनके लिए परमेश्वर ने आपको बुलाया है। हमें इन सबके लिए चिन्तित होना चाहिए। प्रश्न यह है, कब यह उचित चिन्ताएँ पापमय चिन्ताओं में बदल जाती हैं? कब ईश्वरीय चिन्ता ईश्वरहीन चिन्ता बन जाती हैं?

किसी स्तर पर, हम चिन्ता के विषय में वह कह सकते हैं जो कि एक न्यायाधीश ने अश्लील साहित्य के विषय में प्रसिद्ध रूप से कहा है। वह इसको परिभाषित नहीं कर सका, उसने अवलोकन किया, “ परन्तु जब मैं इसे देखता हूँ मैं इसे जानता हूँ।” हम जानते हैं कि पापमय चिन्ता क्या है क्योंकि हमने इसका अनुभव किया है। हम इसके लक्षणों को जानते हैं—पसीने से तर हथेलियाँ, तीव्रता से धड़कता हृदय, शान्त या स्थिर रहने की अक्षमता, सीने पर एक बड़े भारी बोझ के होने का बोध, नींद में कमी, और कई अन्य लक्षणों भी हैं। परन्तु पापमय चिन्ता को पापमय क्या बनाता है?

प्रारम्भ करने के लिए एक अच्छा स्थान लूका 10:38-42 में यीशु, मरियम और मार्था की कहानी से है। यीशु मरियम और मार्था के घर पर है, और मार्था अतिथियों की सेवा-टहल करने में और सम्भवतः भोजन तैयार करने में व्यस्त है। मरियम , दूसरी ओर, यीशु के पावों के समीप बैठ कर उसके वचन सुन रही थी। मार्था उत्तेजित हो जाती है और यीशु से कहती है कि मरियम को उसकी सहायता करने को कहे। परन्तु यीशु ने प्रत्युत्तर दिया: “मार्था, हे मार्था, तू बहुत सी बातों के लिए चिन्तित तथा व्याकुल रहती है; परन्तु कुछ बातें हैं, वास्तव में एक ही बात आवश्यक है, और मरियम ने उस उत्तम भाग को चुन लिया है जो उस से छीना न जाएगा” (पद 41-42)। मार्था अच्छाई में लगी रह गयी और उसकी दृष्टि उत्तम से दूर हो गयी। वह यीशु की सेवा टहल के लिए बहुत परिश्रम कर रही थी परन्तु उसने अपना ध्यान स्वयं यीशु से हटा दिया।

यह, अत्यन्त संक्षिप्त में, पापमय चिन्ता है। यह यीशु से आँखे दूर करते हुए दूसरे प्रकार की वैध बातों में लगे रहना है। अन्य शब्दों में, पापमय चिन्ता सांसारिक बातों और उत्तरदायित्वों को ख्रीष्ट से ऊपर रखती है। वे प्रथम स्थान ले लेती हैं: ख्रीष्ट दूसरा स्थान लेता है।

चार्ल्स स्पर्जन ने मार्था के लिए लिखा:  “उसका दोष यह नहीं था कि उसने सेवा टहल की। हर मसीही के लिए सेवक का स्थान लेना उचित है। उसका दोष था कि वो “सेवा टहल करते करते व्याकुल” हो उठी थी, इसलिए वह उसे भूल गयी और उसने केवल सेवा को स्मरण रखा।” यूनानी क्रिया जिसका अनुवाद ”व्याकुल” है पद 40 में उसका अर्थ है किसी व्यक्ति या किसी बात से दूर खींच लेना और अपना ध्यान किसी और बात की ओर लगना। इसका यह भी अर्थ है, जैसा कि एक यूनानी शब्दकोष प्रस्तुत करता है, “अत्यन्त व्यस्त, अत्याधिक बोझ से दबा हुआ. . . .  बनना।”   

पापमय चिन्ता ख्रीष्ट से दूर खींच जाने का परिणाम है,जो अनावश्यक बोझों को ढोने की ओर ले जाती है। इसीलिए पौलुस फिलिप्पियों को उस्ताहित करता है: “किसी भी बात की चिन्ता न करो, परन्तु प्रत्येक बात में प्रार्थना और निवेदन के द्वारा तुम्हारी विनती धन्यवाद के साथ परमेश्वर के सम्मुख प्रस्तुत की जाए। तब परमेश्वर की शान्ति, जो समझ से परे है, तुम्हारे हृदय और तुम्हारे विचारों को ख्रीष्ट यीशु में सुरक्षित रखेगी” (4:6-7)। जब आपके सांसारिक चिन्ताओं का बोझ बढ़ने लगता है, तो चिन्ता पर विजय पाने और परमेश्वर प्रदत्त शान्ति को जानने के लिए परमेश्वर की ओर प्रार्थना और निवेदन, के साथ-साथ धन्यवाद में देखें।

पापमय चिन्ता अपनी आंखे ख्रीष्ट से हटा लेने का भी परिणाम है, अनुचित बातों को खोजने या उनकी सेवा करने के द्वारा। यीशु हमें चिन्ता के विषय में उत्कृष्ट बाइबलीय खण्ड में बताता है कि पहले परमेश्वर के राज्य और धार्मिकता की खोज करो, और परिणामस्वरूप परमेश्वर वह सब देगा जिसकी हमें आवश्यकता है (मत्ती 6:33)। समस्या यह है कि हम प्रायः परमेश्वर के राज्य के स्थान पर स्वयं के छोटे राज्यों के निर्माण के लिए अधिक चिन्तित रहते हैं। यह असम्भव है, जैसा कि यीशु कहता है, कि व्यक्ति परमेश्वर और धन, या परमेश्वर और किसी सांसारिक वस्तु की सेवा करे (पद 24)। ऐसा करने का प्रयास करना निस्सन्देह पापमय चिन्ता की ओर ले जाता है। यह कोई आश्चर्य नहीं है कि हमारे बढ़ते हुए धर्मनिरपेक्ष युग में,जो कि परमेश्वर से दूर हो गया है, चिन्ता उत्थान पर होगी।

पापमय चिन्ता जैसा कि हमें परमेश्वर पर भरोसा करना चाहिए वैसा न करने का भी परिणाम है। यीशु चिन्ता करने वालों को “अल्प-विश्वासियों” के समान संदर्भित करता है (मत्ती 6:30)।  हमारे विश्वास द्वारा हमारा उद्धार हुआ है, और विश्वास द्वारा हम जीवित हैं। हमारा उद्धार हमारे विश्वास की सामर्थ पर नहीं परन्तु विश्वास के अभिप्राय पर निर्भर करता है, तब भी, हम सदैव अपने विश्वास में बढ़ सकते हैं। यीशु अपने चेलों को स्मरण कराते हुए कि उनका मूल्य पक्षियों से बढ़कर है, हमसे पक्षियों को और कैसे उन पक्षियों की परमेश्वर उनकी चिन्ता करता है देखने के लिए कहता है (पद 26)।

इसका अर्थ यह नहीं है कि हम कुछ और न करे केवल परमेश्वर का हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रतीक्षा करते रहें। पक्षी इधर-उधर अपना मुँह खोलकर परमेश्वर का उसमें भोजन गिराने की प्रतीक्षा में नहीं बैठी रहती हैं। हमें इस जीवन में कार्य करने के लिए बुलाया गया है। हमें कहा भी गया है, “यदि कोई कार्य करना न चाहे तो वह खाने भी न पाए” (2 थिस्सलुनीकियों 3:10)। परमेश्वर ने मनुष्य को कठिन परिश्रम करने के लिए परमेश्वर ने मनुष्य को रचा है। चिन्ता बहुधा उपजती है जब हमें जिस प्रकार से कार्य करना चाहिए, हम वैसे करने में विफल होते हैं।

न ही विश्वास से जीवित रहने का अर्थ यह है कि हमें कल के लिए योजना नहीं बनानी चाहिए। यीशु हमसे चिन्तित न होने के स्थान पर आज के कर्तव्यों पर ध्यान केन्द्रित करने को कहता है। फिर भी, इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें कल के लिए योजना नहीं बनानी चाहिए। परमेश्वर हमें योजनाकार बनाना चाहता है, विशेषकर भविष्य के प्रावधान करने के लिए। हम इसका एक उदाहरण यूसुफ की आने वाले अकाल के लिए तैयारियों के साथ देखते हैं (उत्पत्ति 41; नीतिवचन 6:6-8; 16:9; लूका14:28-32 भी देखें)। कल के लिए चिन्तित न होने की बुलाहट, बुलाहट है उस में विश्वासयोग्य होने की जिसे आज करने के लिए परमेश्वर ने बुलाया है, यह जानते हुए कि परमेश्वर अपने सम्प्रभु और अनुग्रहकारी हाथों में भविष्य को थामे रखता है।

“एक ही बात आवश्यक है” (लूका 10:42)। यह एक अच्छी याद दिलाने वाली बात है, हमारे अत्यन्त व्यस्त, व्याकुल संसार में। परमेश्वर स्पष्ट रूप से अपने लोगों को विभिन्न कर्तव्यों और विभिन्न बुलाहटों के लिए बुलाता है। फिर भी, एक ही बात आवश्यक है। भजनकार इसे इस प्रकार रखता है: “मैने यहोवा से एक वर माँगा है, मैं उसी के यत्न में लगा रहूँगा: कि मैं अपने जीवन भर यहोवा के भवन में ही निवास करने पाऊँ, जिस से यहोवा की मनोहरता निहारता रहूँ और उसके मन्दिर में उसका ध्यान करता रहूँ“ (भजन 27:4)। पौलुस ने इसको इस प्रकार वर्णित किया है: “यह एक काम मैं करता हूँ, कि जो बातें पीछे रह गयी हैं, उन्हें भूल कर आगे की बातों की ओर बढ़ता हुआ, लक्ष्य की ओर दौड़ा जाता हूँ कि वह इनाम पाऊं जिसके लिए परमेश्वर ने मुझे ख्रीष्ट यीशु में ऊपर बुलाया है” (फिलिप्पियों 3:13-14)। दैनिक जीवन की व्यस्तता में, आइए हम अपनी आँखे ख्रीष्ट पर लगाएँ, ख्रीष्ट को खोजें, उसके राज्य की खोज करें, और वह हमें शान्ति देगा।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
विलियम बार्कले
विलियम बार्कले
डॉ विलियम बार्कले शार्लट्ट, नॉर्थ कैरोलायना में सॉवरिन ग्रेस प्रेस्बिटेरियन चर्च के वरिष्ठ पास्टर हैं और रिफॉर्म्ड थियोलॉजिकल सेमिनरी में नया नियम के सहायक प्रोफेसर हैं। वे द सीक्रेट ऑफ कन्टेमेन्ट एंड गॉस्पेल क्लैरिटी नामक पुस्तकों के लेखक हैं।