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सेवकाई में चरित्र क्यों महत्वपूर्ण है?

Why Does Character Matter in Ministry?

परमेश्वर सामर्थी और प्रेममय है, तथा अपने महान् नाम की महिमा के प्रति जलन रखने वाला है। यशायाह 44:23–24 में प्रभु स्वयं को “छुड़ानेवाला” कहता है और घोषणा करता है कि उसने अपनी प्रजा का उद्धार किया है तथा वह “इस्राएल में महिमा पाएगा।” परमेश्वर पापियों के उद्धार के द्वारा अद्वितीय रीति से महिमान्वित होता है। 

 तो फिर, अधिक पापियों का उद्धार क्यों नहीं हो रहा है? सुसमाचार का प्रचार करने वाली और अधिक कलीसियाएँ लोगों से खचाखच क्यों नहीं भर रही हैं? अधिक कलीसियाएँ ऐसे पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों से क्यों नहीं भर रही हैं जो धार्मिकता के लिए भूखे और प्यासे हैं? संक्षेप में, वह आत्मिक जागृति कहाँ है जिसे देखने के लिए मसीही लालायित रहते हैं?

प्रायः ख्रीष्ट की प्रजा के मध्य आत्मिक जागृति का अभाव और ख्रीष्ट के अगुओं के जीवन में पवित्रता का अभाव साथ-साथ पाया जाता है। 

निश्चय ही, इसके अतिरिक्त अन्य कारण भी कार्य कर रहे होते हैं। जो कलीसियाएँ सुसमाचार के संदेश को हल्का कर देती हैं, वे बहुत कम सच्चे हृदय-परिवर्तन देखेंगी। जो पास्टर मनोरंजन को प्राथमिकता देते हैं, वे अपनी कलीसियाओं को पश्चाताप के आँसुओं तक नहीं पहुँचा पाएँगे। और जो मसीही अगुवे स्वयं पश्चाताप की उपेक्षा करते हैं, वे बहुत कम सच्चे हृदय-परिवर्तित लोगों को देखेंगे।

फिर भी, उतना ही सत्य यह भी है कि जो प्रचारक अपने स्वयं के चरित्र की उपेक्षा करते हैं, उन्हें अपनी कलीसियाओं में आत्मिक जागृति की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर ने अपनी सार्वभौमिक बुद्धि में यह प्रकट किया है कि जब उसकी कलीसिया की वृद्धि की बात आती है तो उसके अगुवों की नैतिक धार्मिकता अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है।

 “उद्धार यहोवा की ओर से है!” 

तो फिर योना के विषय में क्या कहा जाए? उसे नीनवे जाने के लिए लगभग घसीटकर ले जाना पड़ा, फिर भी पूरे नगर ने उद्धार देने वाले विश्वास को ग्रहण किया। यिर्मयाह के विषय में क्या? इस  ईश्वरभक्त व्यक्ति ने पूरे मन से परमेश्वर का संदेश सुनाया, फिर भी उसे एक पूरे राष्ट्र की अस्वीकृति का सामना करना पड़ा—ऐसे राष्ट्र की, जो सत्य को भली-भाँति जानता था। पतरस के विषय में क्या? उस त्रुटिपूर्ण  प्रेरित ने यरूशलेम में पिन्तेकुस्त के दिन एक सामर्थी उपदेश दिया, और हज़ारों लोग उद्धारकारी विश्वास में आ गए। और अंत में, हमारे निष्पाप उद्धारकर्ता के विषय में क्या? उसने एक सिद्ध जीवन जिया, फिर भी उसे आत्मिक जागृति नहीं, वरन् अस्वीकृति का सामना करना पड़ा। 

इस प्रकार के उदाहरण यह सिद्ध करते हैं कि योना ने जो घोषणा की थी, वह सत्य है: “उद्धार यहोवा की ओर से है!” (योना 2:9)। सरल सत्य यह है कि हम आत्मिक जागृति उत्पन्न नहीं कर सकते। ठोस धर्मसिद्धान्त, विश्वासयोग्य प्रचार और निष्कलंक चरित्र भी किसी एक व्यक्ति के मन-परिवर्तन की गारंटी नहीं दे सकते। उद्धार पर परमेश्वर का ही सार्वभौमिक अधिकार है और यही इस विषय का आरम्भ भी है और अन्त भी। जो लोग कल उद्धार पाएँगे, उनके नाम आज ही मेमने की जीवन की पुस्तक में लिखे हुए हैं। परमेश्वर के चुने हुए लोग उसके सिद्ध समय में उद्धारकारी विश्वास में अवश्य आएँगे। 

फिर भी , हमारे महान् परमेश्वर ने उद्धार के साधनों और उसके लक्ष्य दोनों को पहले से ठहराया है। नए नियम में एक से अधिक स्थानों पर कलीसिया के प्राचीनों को कलीसिया की भलाई के लिए पवित्र जीवन जीने की शिक्षा दी गई है। यदि पास्टर स्वयं विश्वासयोग्य सेवकाई का आदर्श प्रस्तुत नहीं करते, तो उन्हें अपनी सेवकाई के फलदायी होने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। 

1 पतरस 5:2-3 में अगुवों को दिए गए पतरस के निर्देश पर विचार करें: 

अपने मध्य स्थित परमेश्वर के झुंड की रखवाली करो, और यह किसी दबाव से नहीं, पर स्वेच्छा से तथा परमेश्वर की इच्छा के अनुसार, तुच्छ कमाई के लिए नहीं वरन् उत्साहपूर्वक करो। जो लोग तुम्हें सौंपे गए हैं, उन पर प्रभुता न जताओ, परन्तु अपने झुण्ड के लिए आदर्श बनो।

इन चरवाहों को झुंड के लिए आदर्श होना क्यों आवश्यक है? क्या एक प्रचारक के लिए केवल सत्य और सही बातें कहना ही पर्याप्त नहीं है?क्या यह वास्तव में मायने रखता है कि वह अपने घर की चारदीवारी के भीतर क्या करता है? हाँ, यह वास्तव में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि प्रेरित पौलुस ने तीमुथियुस से कहा कि उसके श्रोताओं का उद्धार उसके जीवन और उसकी शिक्षा, दोनों से जुड़ा हुआ है: “अपने ऊपर और अपनी शिक्षा पर विशेष ध्यान दे और इन बातों पर स्थिर रह, क्योंकि ऐसा करने से तू अपने और अपने सुनने वालों के उद्धार का कारण होगा”। निस्संदेह, पौलुस जानता था कि उद्धार यहोवा की ओर से है। और फिर भी, परमेश्वर की अगम्य व्यवस्था में, जिस पात्र के द्वारा सुसमाचार का प्रचार होता है, उसका शुद्ध होना आवश्यक है।

एक पवित्र सेवक परमेश्वर के हाथ में एक प्रबल अस्त्र है।

स्कॉटलैंड के पास्टर रॉबर्ट मरे मैकशेन अपने बड़े भाई की असामयिक मृत्यु के बाद विश्वास में आए। सन् 1835 में उन्होंने ईश्वरविज्ञान की शिक्षा पूरी की और यह दृढ़ निश्चय किया कि जितने दिन परमेश्वर उन्हें देगा, उतने दिन वे पूरे मन से प्रभु के पीछे चलेंगे। सेंट पीटर्स डण्डी, में सेवक नियुक्त  होने से कुछ समय पहले उन्होंने लिखा, “जीवन बहुत शीघ्र समाप्त हो रहा है; “अनन्तकाल के लिए शीघ्रता करो।” परन्तु अनन्तकाल उनकी अपेक्षा से कहीं पहले आ पहुँची। वे केवल उनतीस वर्ष की आयु में ही प्रभु के पास चले गए, किन्तु उससे पहले वे व्यक्तिगत पवित्रता के महत्व को भली-भाँति समझ चुके थे।

मैकशेन ने अपने सहकर्मी पास्टरों को प्रोत्साहित किया कि वे अपने झुण्ड के लिए आदर्श बनें। उन्होंने उन्हें अपने जीवन और अपनी शिक्षा पर सावधानी रखने की यह शिक्षा दी: 

सब बातों से बढ़कर, अपने आत्मिक जीवन की उन्नति करो। तुम्हारी अपनी आत्मा ही तुम्हारी पहली और सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। व्यक्तिगत पवित्रता में निरन्तर बढ़ने का प्रयत्न करो। परमेश्वर महान् प्रतिभाओं को उतना आशीष नहीं देता, जितना वह यीशु के सदृश बनने को देता है। एक पवित्र सेवक परमेश्वर के हाथ में एक प्रबल अस्त्र है। जब तुम्हारा विवेक शुद्ध हो और तुम्हारा हृदय परमेश्वर के आत्मा से परिपूर्ण हो, तब तुम्हारे द्वारा बोला गया एक शब्द भी अविश्वास और पाप में बोले गए दस हज़ार शब्दों से कहीं अधिक मूल्यवान होता है।

परमेश्वर केवल इस बात की चिन्ता नहीं करता कि हम क्या कहते हैं; वह इस बात की भी चिन्ता करता है कि हम कैसे व्यक्ति हैं। इसलिए यदि किसी मसीही अगुवे का विवेक मलिन हो और उसका हृदय मूर्खतापूर्वक पाप के निरन्तर अभ्यास में फँसा रहे, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि प्रभु उसकी सेवकाई से अपनी आशीष का हाथ हटा ले।

नहीं, हम शुद्ध धर्मसिद्धान्त और पवित्र जीवन के द्वारा आत्मिक जागृति उत्पन्न नहीं कर सकते; परन्तु इनके बिना आत्मिक जागृति की अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।