ज़्यूरिक क्रान्तिकारी: उलरिक ज़्विंग्ली- लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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ज़्यूरिक क्रान्तिकारी: उलरिक ज़्विंग्ली

मार्टिन लूथर, हेनरिक बुलिंगर और जॉन कैल्विन को छोड़कर, सबसे महत्वपूर्ण आरम्भिक धर्मसुधारक, उलरिक ज़्विग्ली थे। एक पहली पीढ़ी के धर्मसुधारक के रूप में, उन्हें स्विट्ज़रलैण्ड प्रोटेस्टेंटवाद का संस्थापक माना जाता है। इसके साथ, इतिहास उन्हें पहले धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानी के रूप में स्मरण करता है। यद्यपि कैल्विन बाद में, एक ईश्वरविज्ञानी के रूप में ज़्विग्ली से आगे निकल गए, वह ज़्विंग्ली के चौड़े कन्धों के आधार पर खड़े थे।

लूथर के संसार में आने के दो महीने से भी कम समय बाद, ज़्विंग्ली का जन्म 1 जनवरी, 1484 को, आधुनिक समय के स्विट्ज़रलैण्ड के पूर्वी भाग में ज़्यूरिक से चालीस मील दूर एक छोटे से गाँव वाइल्डहाउस में हुआ था। उनके पिता, उलरिक सीनियर, कृषि कार्य से बढ़कर एक साधन वाले उच्च-मध्यम-वर्ग के पुरुष, सफल किसान और चरवाहा और साथ ही जिले के मुख्य मजिस्ट्रेट बन गए थे। इस समृद्धि ने उन्हें अपने बेटे को एक उत्कृष्ट शिक्षा प्रदान करने के लिए सशक्त किया। उन्होंने एक ऐसे घर की अगुवाई की, जहाँ युवा उलरिक में विशिष्ट स्विट्ज़रलैण्ड सम्बन्धी मूल्यों को मस्तिष्क में बैठाया गया था: प्रबल स्वतंत्रता, दृढ़ देशभक्ति, धर्म के प्रति धुन और ज्ञान में वास्तविक रुचि।

बड़े उलरिक ने अपने बेटे की बौद्धिक क्षमताओं को शीघ्र पहचान लिया और उसे पढ़ना और लिखना सिखाने के लिए उसके चाचा, एक पूर्व पादरी के पास भेज दिया। अपनी समृद्धि के कारण, ज़्विंग्ली के पिता अपने पुत्र को आगे की शिक्षा प्रदान करने में सक्षम थे। 1494 में, उन्होंने दस वर्षीय उलरिक को बासेल के हाई स्कूल में भेजा, जहाँ उन्होंने लतीनी, तर्क-विर्तक और संगीत का अध्ययन किया। उन्होंने इतनी तीव्रता से प्रगति किया कि उनके पिता ने उन्हें 1496 या 1497 में बर्न में स्थानांतरित कर दिया, जहाँ उन्होंने एक प्रसिद्ध मानवतावादी हेनरिक वोफ्लिन के अधीन अपनी पढ़ाई जारी रखी। यहाँ ज़्विंग्ली को पुनर्जागरण के विचारों और विद्वानी साधनों का विशेष समय प्राप्त हुआ। उनकी प्रतिभा को डोमिनिकन मठवासियों ने पहचाना, जिन्होंने उन्हें अपने धर्मसंघ में लेने का प्रयास किया, किन्तु ज़्विंग्ली के पिता नहीं चाहते थे कि उनका पुत्र सन्यासी बने।

वियना और बासेल के विश्वविद्यालय

1498 में, ज़्विंग्ली के पिता ने उन्हें वियना विश्वविद्यालय भेजा, जो शास्त्रीय अध्ययन का एक केन्द्र बन गया था जब मानववाद (humanist) अध्ययन ने मतवाद (Scholasticism) के विस्थापित किया। वहाँ उन्होंने दर्शनशास्त्र, खगोल विज्ञान, भौतिकी और प्राचीन उत्कृष्ट साहित्य का अध्ययन किया। 1502 में, उन्होंने बासेल विश्वविद्यालय में भरती लिया और अच्छी मानववाद की शिक्षा प्राप्त की। कक्षा में, वह ईश्वरविज्ञान के प्रोफेसर, थॉमस विटनबैक के प्रभाव में आए, और कलीसिया में हो रहे दुर्व्यवहारों से अवगत होने लगे। जैसे उन्होंने आगे उत्कृष्ट साहित्य का अध्ययन किया और लतीनी भी सिखाई। उन्होंने उस विद्यालय से अपनी स्नातक (1504) और पर-स्नातक की (1506) डिग्री प्राप्त की।

ज़्विंग्ली को रोमन कैथोलिक कलीसिया में पुरोहित का कार्य करने के लिए ठहराया गया था और उन्होंने तुरन्त अपने बचपन की कलीसिया, ग्लैरस में एक पादरी का पद मोल लिया। धर्मसुधार से पहले किसी राजकुमार को पैसा देकर कलीसिया में पद प्राप्त करना एक सामान्य बात थी। उनका समय प्रचार करने, शिक्षा देने, लोगों की देख-भाल में बीतता था। उन्होंने स्वयं को बहुत व्यक्तिगत अध्ययन के लिए समर्पित किया, स्वयं को यूनानी सिखाते और कलीसियाई पिता और प्राचीन उत्कृष्ट लेखों का अध्ययन करते हुए। वह अन्यजाति के दार्शनिकों और प्राचीन कवियों से आसक्त हो गया। सबसे महत्वपूर्ण रूप से, उन्होंने डेसिडेरियस इरास्मस के मानवतावादी लेखन को पढ़ना आरम्भ किया और उनकी विद्वता और भक्ति से गहराई से प्रभावित हुए। यह इरास्मस के साथ एक बहुमूल्य पत्राचार का कारण बना।

ग्लैरस में अपनी सेवा के समयकाल में, 1506 से 1516 तक, ज़्विंग्ली ने दो बार युवा स्विस किराए के सैनिकों के पादरी के रूप में कार्य किया। किराये के लिए स्विस सैनिक यूरोप भर में बहुत मांग में थे और स्विस क्षेत्रों के लिए आय का एक प्रमुख स्रोत थे। यहां तक ​​कि पोप के चारों ओर स्विस सैनिक थे। किन्तु इस कार्य में कई उत्तम स्विस युवकों का जीवन बलिदान हुआ। एक पादरी के रूप में, ज़्विंग्ली ने उनमें से कई को एक-दूसरे से लड़ते देखा, स्विस लोगों को विदेशी शासकों के लिए विदेशी धरती पर स्विस लोगों की हत्या करते हुए। उन्हें अनगिनत बार अन्तिम संस्कार का प्रबन्ध करना पड़ा। मारिग्नानो की लड़ाई (1515) ने लगभग दस हज़ार स्विस जीवन ले लिया। ज़्विंग्ली इस प्रणाली से घृणा करने लगे और इसके विरुद्ध प्रचार करने लगे।

ग्लैरस में उनका अन्तिम वर्ष बहुत महत्वपूर्ण प्रमाणित हुआ। यह उस समय था जब ज़्विंग्ली पवित्रशास्त्र के एक सुसमाचारीय समझ में आए। इरास्मस ने उस वर्ष अपना यूनानी नया नियम प्रकाशित किया, और ज़्विंग्ली ने इसे बड़ी धुन के साथ पढ़ा; यह कहा जाता है कि उन्होंने पौलुस की पत्रियों को मूल भाषा में याद किया। यह लूथर द्वारा अपने पंचान्नवे थिसिस के वेटनबर्ग कासल चर्च के द्वार पर ठोकने के एक वर्ष से कुछ अधिक समय पहले घटित हुआ। अपने पवित्रशास्त्र के अध्ययन के कारण, लूथर के विचारों के बारे में कोई जानकारी न होते हुए, ज़्विंग्ली ने उसी संदेश का प्रचार करना आरम्भ किया, जो लूथर शीघ्र ही घोषणा करने वाला था। उसने लिखा: “इससे पहले कि क्षेत्र में किसी ने भी लूथर के बारे में सुना हो, मैंने 1516 में मसीह के सुसमाचार का प्रचार करना आरम्भ किया…। मैंने सुसमाचार का प्रचार करना आरम्भ कर दिया, इससे पहले कि मैंने लूथर का नाम भी सुना था…। लूथर ने, जिसका नाम मैं कम से कम दो और वर्ष तक नहीं जानता था, निश्चित रूप से मुझे निर्देश नहीं दिया था। मैंने केवल पवित्र शास्त्र का अनुसरण किया।”

आइन्सीडेल्न में प्रसिद्ध प्रचारक

राजनैतिक दबाव और किराए के सैनिकों की लड़ाई के विरुद्ध उनके उपदेशों के कारण, ज़्विंग्ली को 1516 में ग्लैरस छोड़ना पड़ा। उन्होंने 1518 तक आइन्सीडेल्न के बेनेडिक्ट मठ में एक पादरी के रूप में कार्य किया। आइन्सीडेल्न एक सैरगाह शहर था जो कुंवारी मरियम के लिए अपने तीर्थस्थान के लिए जाना जाता था। यह तीर्थस्थल स्विट्ज़रलैण्ड और उससे आगे के हिस्सों से बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता था। इस व्यापक दर्शकों ने ज़्विंग्ली के उपदेश को सुना, जिसने उनकी प्रसिद्धि और प्रभाव को बढ़ाया।

आइन्सीडेल्न ग्लारस से छोटा था, इसलिए उसके कर्तव्य कम थे। इसने उनको पवित्रशास्त्र और कलीसियाई पिताओं के अध्ययन के लिए अधिक समय दिया। उन्होंने ऐम्ब्रोस, जेरोम, क्रिसोस्टोम और ऑगस्टीन के लेखों के साथ-साथ इरास्मस के लेखों को भी पढ़ा। इसके अतिरिक्त, उसने इरास्मस के यूनानी नये नियम को हाथ से लिखा। जब उन्होंने स्वयं को एक लोकप्रिय उपदेशक के रूप में प्रतिष्ठित किया, तो उन्होंने कलीसिया के कुछ दुरुपयोग पर भी आक्रमण करना आरम्भ कर दिया, विशेष रूप से पाप क्षमा के लिए पत्रों की बिक्री, और उनके उपदेश ने एक दृढ़ सुसमाचारीय प्रचार की ध्वनि लेना आरम्भ किया। हालाँकि, ज़्विंग्ली ने अभी तक कलीसिया के विश्वास में परिवर्तन की आवश्यकता नहीं देखी थी। किन्तु, उनको लगा कि सुधार को मुख्य रूप से संस्थागत और नैतिक होना चाहिए। इसके साथ, वह अपने शिक्षण में पवित्रशास्त्र से अधिक कलीसियाई पिताओं पर निर्भर रहे। वे अभी तक सुधार के कार्य के लिए तैयार नहीं थे।

दिसम्बर 1518 में, ज़्विंग्ली के बढ़ते प्रभाव ने उनके लिए ज़्यूरिक में ग्रोसमुन्स्टर (बड़ा कैथीड्रल) में “लोगों के पादरी” के पद को प्राप्त कराया। यह पास्टर का कार्य एक महत्वपूर्ण स्थान था। ज़्विंग्ली ने तुरन्त कलीसिया के तिथिपत्र के अनुसार प्रचार करने के सामान्य अभ्यास को बन्द किया। इसके स्थान पर, उन्होंने घोषणा की कि वह बाइबल की पूरी पुस्तकों को क्रम से प्रचार करेंगे। 1 जनवरी, 1519 को, उनके पैंतीसवें जन्मदिन को, ज़्विंग्ली ने मत्ती में व्याख्यात्मक प्रचार की एक श्रृंखला आरम्भ किया, जो यूनानी स्थल के उनके व्याख्या से तैयार किए गए थे। उन्होंने इस निरंतर शैली को तब तक जारी रखा जब तक कि उन्होंने पूरे नए नियम का प्रचार नहीं कर लिया। इस महत्वाकांक्षी योजना में छह वर्ष लगे और इसने सुधार के कार्य के लिए नींव तैयार की गई जो आने वाला था।

1519 में, पतझड़ के समय, ज़्यूरिक को प्लेग का प्रकोप झेलना पड़ा। इसके सात हज़ार नागरिकों में से दो हज़ार की मृत्यु हो गई। ज़्विंग्ली ने बीमार और मर रहे लोगों की देखभाल के लिए शहर में रहने का निर्णय किया। इस प्रक्रिया में, वह स्वयं इस बीमारी की चपेट में आ गए और लगभग मरने पर थे। उनके तीन महीने की स्वास्थ्य में सुधार होने के समय ने उन्हें परमेश्वर पर भरोसा करने के बारे में बहुत कुछ सिखाया। इस व्यक्तिगत बलिदान ने भी लोगों के मध्य उनकी लोकप्रियता को बढ़ाया।

सुधार का परिचय

जैसे-जैसे ज़्विंग्ली ने बाइबल का क्रमबद्ध प्रचार किया, उसने स्थल में सामने आई सच्चाइयों को उजागर किया, भले ही वे कलीसिया की ऐतिहासिक परम्परा से भिन्न हों। इस प्रकार का प्रत्यक्ष प्रचार बिना चुनौतियों के नहीं था। 1522 में, उनके कुछ सदस्यों ने चालीस दिन के उपवास (lent) के समय मांस खाने के बारे में कलीसिया के नियम की अवहेलना की। ज़्विंग्ली ने मसीही स्वतंत्रता की बाइबलीय सच्चाइयों पर आधारित उनके अभ्यास का समर्थन किया। उन्होंने ऐसे प्रतिबन्धों को मानव निर्मित के रूप में देखा। उसी वर्ष, उन्होंने अपने बहुतों में से प्रथम धर्मसुधार लेखन की रचना की, जिसने पूरे स्विट्ज़रलैण्ड में उनके विचारों को प्रसारित किया।

नवम्बर 1522 में, ज़्विंग्ली ने कलीसिया और राज्य में बड़े सुधार लाने के लिए अन्य धार्मिक अगुवों और नगर समिति के साथ कार्य करना आरम्भ किया। जनवरी 1523 में, उन्होंने सरसठ थिथिस  लिखे, जिसमें उन्होंने कई मध्ययुगीन विचार-धाराओं को नकार दिया, जैसे कि बलपूर्वक उपवास, पादरियों का ब्रह्मचर्य, शोधन स्थान, मिस्सा, तथा पादरी मध्यस्थता। इसके साथ, उन्होंने कलीसिया में चित्रों के उपयोग पर प्रश्न उठाना आरम्भ किया। जून 1524 में, ज़्यूरिक शहर ने, उसके अगुवाई का अनुसरण करते हुए निर्णय लिया कि सभी धार्मिक चित्र कलीसियाओं से हटाए जाएं। और 1524 में ही, ज़्विंग्ली ने सुधार का एक और कदम उठाया—उसने एक विधवा ऐना रेइनहार्ड से विवाह किया। यह सब प्रतीत होता है कि ज़्विंग्ली के लूथर के बारे में सुनने से पहले हुआ था। यह वास्तव में परमेश्वर का एक स्वतंत्र काम था।

1525 तक, ज़्यूरिक में धर्मसुधार आंदोलन ने महत्वपूर्ण गति को प्राप्त किया था। 14 अप्रैल, 1525 को, मिस्सा (कैथलिक प्रभु-भोज) को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया और ज़्यूरिक में और उसके आसपास प्रोटेस्टेन्ट आराधना सभाओं का आरम्भ किया गया। ज़्विंग्ली ने केवल वही लागू करने के लिए चुना जो पवित्रशास्त्र में सिखाया गया था। उन सब को अस्वीकार कर दिया गया जिनके लिए स्पष्ट पवित्रशास्त्र का समर्थन नहीं था। पवित्रशास्त्र के वचनों को लोगों की भाषा में पढ़ा और प्रचार किया गया था। पूरी मण्डली ने, न केवल पादरियों ने, एक साधारण प्रभु-भोज सेवा में रोटी और दाखरस दोनों प्राप्त किया। सेवक ने भाषण के स्थान में पाए जाने वाले कपड़े पहना न कि जो  कैथोलिक वेदी पर पहने जाते थे। मरियम और सन्तों की उपासना निषिद्ध थी, पापमुक्ति पत्र पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और मृतकों के लिए प्रार्थनाओं को रोक दिया गया। रोम से अलगाव पूरा हो गया था।

ऐनाबैप्टिस्ट: अतिवादी धर्मसुधारक

ज़्विंग्ली ने एक नए समूह के साथ वाद-विवाद में भी प्रवेश किया, जिसे ऐनाबैप्टिस्ट्स (Anabaptists) या रीबैपेटाइज़र्स (Rebaptizers) के रूप में जाना जाता है, एक और अधिक कट्टरपंथी सुधार आंदोलन जो 1523 में ज़्यूरिक में आरम्भ हुआ था। हालाँकि ज़्विंग्ली ने बहुत बदलाव किए थे, वह इन विश्वासियों के लिए पर्याप्त रूप से आगे तक नहीं गया था। ऐनाबैप्टिस्टों के लिए, केवल विश्वासियों को बपतिस्मा देने का विषय रोमन कैथोलिक कलीसिया से कम महत्व का था। ऐनाबैप्टिस्टों ने कलीसिया के सम्पूर्ण पुनर्निर्माण की मांग की जो एक क्रान्ति के समान था।

ज़्विंग्ली ने ऐनाबैप्टिस्ट के प्रस्तावों को मौलिक अतिवादी के रूप से देखा। ऐनाबैप्टिस्ट द्वारा कलीसिया और समाज के तत्काल कायापलट की मांग के प्रतिउत्तर में, उन्होंने रोम से परिवर्तन में संयम और धैर्य का आग्रह किया। उन्होंने सलाह दी कि ऐनाबैप्टिस्ट को निर्बल भाइयों की सहना चाहिए जो धीरे-धीरे धर्मसुधारकों के शिक्षण को स्वीकार कर रहे थे। हालाँकि, इस दृष्टिकोण ने ज़्विंग्ली और कट्टरपंथियों के बीच संघर्ष को बड़ा ही करने का कारण बना।

शहर में सभी शिशुओं के बपतिस्मा के लिए ज़्यूरिक के अधिकारियों द्वारा आदेश बहुत विस्फोटक प्रमाणित हुआ। ऐनाबैप्टिस्टों ने भारी विरोध में ज़्यूरिक की सड़कों में जुलूस निकालने के द्वारा प्रतिउत्तर दिया। अपने शिशुओं को बपतिस्मा देने के स्थान पर, उन्होंने 1525 में एक-दूसरे को पानी उँडेलकर या डुबोकर बपतिस्मा दिया। उन्होंने ज़्विंग्ली के कलीसियाई विषयों पर नगर समिति के अधिकार की पुष्टि को भी अस्वीकार किया और कलीसिया और राज्य से पूर्णत: अलगाव की पैरवी की।

ऐनाबैप्टिस्ट अगुवों को क्रांतिकारी शिक्षण के आरोप में पकड़ा गया और दोष लगाया गया। कुछ की डुबोकर मौत हो गई। यह ज्ञात नहीं है कि ज़्विंग्ली मृत्यु दण्ड से सहमत थे, किन्तु उन्होंने उनका विरोध नहीं किया 

प्रभु-भोज विवाद

इस बीच, प्रभु-भोज को लेकर ज़्विंग्ली और लूथर के बीच विवाद होना आरम्भ हुआ। लूथर द्वितत्त्ववाद (consubstantiation) को मानते थे, यह विश्वास कि मसीह की देह और लहू, तत्वों में, उनके माध्यम से, या उनके नीचे उपस्थित थे। उन्होंने कहा कि उन तत्वों में मसीह की एक वास्तविक उपस्थिति थी, हालाँकि वह तत्व परिवर्तन (transubstantiation) के रोमन कैथोलिक शिक्षण से अलग थे, जो मानते हैं कि मिस्सा के समय पादरी द्वारा आशीर्वाद दिए जाने पर तत्व मसीह के शरीर और रक्त में परिवर्तित हो जाते हैं। ज़्विंग्ली ने इस मत को अपनाया प्रभु-भोज मुख्य रूप से मसीह की मृत्यु का स्मरण है—एक प्रतीकात्मक स्मरण।

धर्मसुधार आंदोलन में एकता लाने के प्रयास में, अक्टूबर 1529 में मारबर्ग वार्तालाप को बुलाया गया था। दो धर्मसुधारक आमने सामने हुए, मार्टिन ब्यूसर, फिलिप मेलान्कथन, जोहान्स ईकोलैम्पेडियस और अन्य प्रोटेस्टेन्ट अगुवे के साथ। वे उनके सामने रखे गए पंद्रह विषयों में से चौदह के सिद्धान्त में सहमत थे: कलीसिया-राज्य का सम्बन्ध, शिशु बपतिस्मा, कलीसिया की ऐतिहासिक निरन्तरता, और बहुत कुछ। किन्तु प्रभु-भोज के सम्बन्ध में कोई समझौता नहीं किया जा सका। लूथर ने कहा कि “ज़्विंग्ली एक ‘बहुत अच्छा पुरुष’ था, किन्तु ‘एक अलग आत्मा’ के साथ, और इसलिए उसने आँसू के साथ संगति के लिए बढ़ाये गए उसके हाथ को स्वीकार करने से मना कर दिया।” सहयोगियों के लिए, लूथर ने ज़्विंग्ली और उनके समर्थकों के बारे में टिप्पणी की, “मुझे लगता है कि परमेश्वर ने उन्हें अंधा कर दिया है।”

इतिहास के विचित्र विडंबनाओं में से एक में, ज़्विंग्ली, जिसने पहले किराए के सैनिकों के प्रयोग करने की प्रथा का विरोध किया था, 1531 में युद्ध भूमि में मर गए। प्रोटेस्टेन्ट और कैथोलिकों के बीच बढ़ते संघर्ष के कारण राज्यों के मध्य युद्ध छिड़ गया। ज़्यूरिक शहर दक्षिण से पांच आक्रमणकारी कैथोलिक राज्यों के विरुद्ध बचाव के लिए लड़ाई में गया। ज़्विंग्ली  ज़्यूरिक की सेना के साथ पादरी के रूप में युद्ध में जुड़ गया। कवच पहनकर और एक युद्ध-कुल्हाड़ी से लैस होकर, वह 11 अक्टूबर, 1531 को गम्भीर रूप से घायल हो गया। जब शत्रु सैनिकों ने उसे घायल पड़ा पाया, तो उन्होंने उसे मार डाला। दक्षिणी सेनाओं ने उसके शव के साथ अपमानजनक व्यवहार किया। उन्होंने उसके चार टुकड़े किए, उसके अवशेषों को टुकड़े-टुकड़े किए, और उन्हें जला दिया, फिर उसकी राख को गोबर में मिलाया और उन्हें देश से बाहर बिखेर दिया।

आज, ज़्विंग्ली की एक प्रतिमा ज़्यूरिक के वाटर चर्च में प्रमुख रूप से प्रदर्शित किया गया है। वह एक हाथ में बाइबल और दूसरे हाथ में तलवार लेकर खड़े हैं। यह प्रतिमा स्विस धर्मसुधार में ज़्विंग्ली के दृढ़ और अटल प्रभाव का प्रतिनिधित्व करती है। यद्यपि ज़्यूरिक में उसकी सेवकाई अपेक्षाकृत छोटी थी, फिर भी उन्होंने बहुत कुछ किया। सत्य के लिए अपने वीरतापूर्ण कदम के माध्यम से, ज़्विंग्ली ने ज़्यूरिक में कलीसिया का सुधार किया और अन्य धर्मसुधारकों के लिए मार्ग की अगुवाई की।

यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

स्टीवन जे. लॉसन
स्टीवन जे. लॉसन
डॉ. स्टीवन जे. लॉसन वनपैशन मिनिस्ट्रीज़ के अध्यक्ष और संस्थापक हैं, जो लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के एक सह शिक्षक हैं, और कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें, फाउंडेशन ऑफ ग्रेस और द मूमेन्ट ऑफ ट्रूथ सम्मिलित है।