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20 नवम्बर 2025हृदय पर एक धर्मप्रश्नोत्तरी
कभी-कभी लोग लेखकों से पूछते हैं, “आपकी लिखी हुई पुस्तकों में से आपको सबसे अच्छी कौन सी लगती हैै?” जब पहली बार यह प्रश्न पूछा जाता है, तो उत्तर प्रायः होता है, “मैं नहीं जानता; मैंने वास्तव में इस पर कभी विचार ही नहीं किया।” पर इसके विषय में सोचने के लिए विवश किए जाने पर मेरा सामान्य उत्तर यह बन गया है, “मैं नहीं जानता कि मुझे कौन सी पुस्तक सबसे अच्छी लगती है; पर मुझे सबसे अच्छा शीर्षक परमेश्वर के लिए हृदय (A Heart for God) लगता है।” मुझसे कदाचित् ही कभी पूछा जाता है, “क्यों?” पर (यदि आप पूछें) यह शीर्षक उसी बात को व्यक्त करता है जो मैं बनना चाहता हूँ: एक ऐसा मसीही जिसका हृदय परमेश्वर के लिए समर्पित हो।
सम्भवतः इसका एक कारण यह तथ्य है कि हम अतीत के दिग्गजों के कन्धों पर बैठे हैं। जॉन कैल्विन की मुहर और उसके नारे के विषय में सोचिए — एक हथेली पर प्रस्तुत किया गया हृदय और ये शब्द: “हे प्रभु, मैं अपना हृदय तुझे स्वेच्छा और सच्चाई से अर्पित करता हूँ।” या चार्ल्स वेस्ली के भजन पर विचार कीजिए:
एक ऐसा हृदय हो जो मेरे परमेश्वर की स्तुति करे!
पाप से मुक्त किया हुआ हृदय।
कुछ भजन-पुस्तकें वेस्ली के इस भजन को नहीं नहीं सम्मिलित करतीं, सम्भवतः इसलिए कि इसे वेस्ली के “सिद्ध प्रेम पूर्ण पवित्रीकरण” के धर्मसिद्धान्त की अभिव्यक्ति के रूप में पढ़ा जाता है। (वह सोचते थे कि उनकी यह लालसा इस संसार में ही पूरी हो सकती है।) परन्तु यह भावना अपने आप में निश्चय ही बाइबलीय है।
परन्तु कलीसिया के इतिहास के दिग्गजों के पीछे पवित्रशास्त्र की साक्षी खड़ी है। पहली और सबसे महान् आज्ञा यह है कि हम अपने सम्पूर्ण हृदय से अपने प्रभु परमेश्वर से प्रेम करें (व्यवस्थाविवरण 6:5)। यही कारण है कि जब परमेश्वर ने शाऊल को राजा के रूप में हटाया, तो उसने “अपने [हृदय] के अनुसार एक व्यक्ति की खोज की” (1 शमूएल 13:14), क्योंकि “परमेश्वर हृदय को देखता है” (1 शमूएल 16:7)। यह कहना स्वयंसिद्धि (truism) कि सुसमाचार के प्रति हमारी प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में, विषय का केन्द्र वास्तव में हृदय की बात है। पर भले ही यह स्वयंसिद्धि हो या न हो — यह सत्य है।
यह कैसा दिखता है, यह कैसे विकसित होता है, किन रीतियों से यह संकट में पड़ सकता है, और यह अपने आप को कैसे प्रकट करता है—इन सब बातों की चर्चा इस नए स्तंभ में धीरे-धीरे की जाएगी। परन्तु इस चरण पर, सम्भवतः हमारे लिए यह सहायक होगा यदि हम कुछ प्रारम्भिक बातों को हृदय पर एक धर्मप्रश्नोत्तरी के रूप में व्यवस्थित करें।
प्र.1. हृदय क्या है?
उ. हृदय मेरे जीवन का केन्द्रीय मूल और प्रेरक शक्ति है — बौद्धिक रूप से (यह मेरे मस्तिष्क को सम्मिलित करता है), भावनात्मक रूप से (यह मेरे प्राण को आकार देता है), और सम्पूर्ण रूप से (यह मेरे जीवन के लिए ऊर्जा प्रदान करता है)।
प्र.2. क्या मेरा हृदय स्वस्थ है?
उ. नहीं। स्वभाव से मेरा हृदय रोगग्रस्त है। जन्म से ही मेरा हृदय विकृत है और परमेश्वर का विरोधी है। उसके विचार निरन्तर बुरे ही होते हैं।
प्र.3. क्या मेरे रोगग्रस्त हृदय को चंगा किया जा सकता है?
उ. हाँ। परमेश्वर अपने अनुग्रह में मुझे एक ऐसा नया हृदय दे सकता है जिससे मैं उससे प्रेम कर सकूँ और उसकी सेवा करने की इच्छा रखूँ।
प्र.4. परमेश्वर यह कैसे करता है?
उ. परमेश्वर यह मेरे लिए प्रभु यीशु के कार्य के द्वारा और मेरे भीतर पवित्र आत्मा की सेवा के द्वारा करता है। वह सुसमाचार के सत्य के द्वारा मेरे मन को प्रकाशित करता है, मेरी बन्धी हुई इच्छा-शक्ति को पाप की दासवता से मुक्त करता है, अपने अनुग्रह से मेरी भावनाओं को शुद्ध करता है, और अपनी व्यवस्था को मेरे हृदय में फिर से लिखकर मुझे भीतर से अपने लिए जीने के लिए प्रेरित करता है जिससे कि मैं उन बातों से प्रेम करना आरम्भ करूँ जिनसे वह प्रेम करता है। बाइबल इसे “ऊपर से जन्म लेना” कहती है।
प्र.5. क्या इसका अर्थ यह है कि मैं फिर कभी पाप नहीं करूँगा?
उ. नहीं। जब तक मेरा महिमान्वीकरण नहीं हो जाता, मैं पाप से संघर्ष करता रहूँगा। परमेश्वर ने मुझे एक नया हृदय दिया है, परन्तु अभी के लिए वह चाहता है कि मैं इस पतित संसार में जीवित रहूँ। इसलिए प्रतिदिन मैं संसार, शरीर और शैतान से आने वाले पाप के दबावों का सामना करता हूँ। परन्तु परमेश्वर का वचन प्रतिज्ञा करता है कि इन सब शत्रुओं पर मैं “उसके द्वारा जिसने हमसे प्रेम किया, जयवन्त से भी बढ़कर” हो सकता हूँ।
प्र.6. वे कौन सी चार बातें हैं जिन्हें करने के लिए परमेश्वर मुझे परामर्श देता है जिससे कि मेरा हृदय उसके लिए बना रहे?
उ. पहली बात, मुझे अपने हृदय की वैसे ही रक्षा करनी चाहिए मानो सब कुछ उसी पर निर्भर करता हो। इसका अर्थ है कि मुझे अपने हृदय को प्रभु यीशु की उपस्थिति के लिए एक पवित्र स्थान के जैसे सुरक्षित रखना चाहिए, और किसी और वस्तु या व्यक्ति को उसमें प्रवेश नहीं करने देना चाहिए।
दूसरी बात, मुझे अपने हृदय को उचित आत्मिक आहार के द्वारा स्वस्थ रखना चाहिए, अर्थात् परमेश्वर के वचन के नियमित आहार से बलवान होते हुए—उसे स्वयं पढ़ना, उसके सत्य पर मनन करना, और विशेष रूप से वचन के प्रचार के द्वारा उससे पोषण पाना। मैं यह भी स्मरण रखूँगा कि मेरे हृदय के कानों के साथ आँखें भी हैं। पवित्र आत्मा मुझे बपतिस्मा के द्वारा यह चिन्ह दिखाता है कि मैं परमेश्वर के त्रिएक नाम को धारण करता हूँ, और प्रभु भोज मेरे हृदय में प्रभु यीशु के प्रति प्रेम को उत्तेजित करता है।
तीसरी बात, मुझे नियमित आत्मिक अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि जब मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व प्रेम और भरोसे की अभिव्यक्तियों में परमेश्वर के प्रति समर्पित होता है, तब आराधना के द्वारा मेरा हृदय सामर्थी होता है।
चौथी बात, मुझे प्रार्थना में लगे रहना चाहिए, जिसमें मेरा हृदय परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं को थामे रखे, उसकी इच्छा में विश्राम करे, और उसकी स्थिर करनेवाली अनुग्रह की याचना करे — और यह मैं अकेले ही नहीं, वरन् दूसरों के साथ भी करूँ, जिससे कि हम एक-दूसरे को परमेश्वर के लिए हृदय बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित करें।
इन बातों को—और बहुत सी अन्य बातों को भी—विकास, विस्तार और व्याख्या की आवश्यकता है। पर इसे एक बाइबलीय वाक्य में सारांशित किया जा सकता है। अपने पिता की पुकार सुनें: “मेरे पुत्र, अपना हृदय मुझे दे।”
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

