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धर्मसुधारवादी परमेश्वर का धर्मसिद्धान्त

The Reformed Doctrine of God

वर्षों से, मुझे विभिन्न स्थानों पर विधिवत ईश्वरविज्ञान पढ़ाने का अवसर मिला है — सेमिनरी के कक्षाओं में, विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों में, और स्थानीय कलीसिया की कक्षाओं में भी। परन्तु मैंने जहाँ भी यह विषय पढ़ाया हो, मैं सामान्यतः सबसे पहले परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त से आरम्भ करता हूँ। ईश्वरविज्ञान, निस्सन्देह, परमेश्वर, उसके चरित्र और उसकी कार्यप्रणाली का अध्ययन करता है; इसलिए यह उचित है कि उद्धार, कलीसिया, अन्तिम बातें और विधिवत ईश्वरविज्ञान की अन्य शाखाओं पर विचार करने से पहले हम परमेश्वर के स्वभाव और उसके गुणों पर दृष्टि डालें।

जब भी मैंने परमेश्वर के सिद्धान्त को पढ़ाया है, मैं प्रायः दो कथनों से आरम्भ करता हूँ — और इन दोनों ने मेरे कई विद्यार्थियों को आश्चर्य और असमंजस में डाल दिया है। मेरी सामान्य प्रथा यह रही है कि मैं उन्हें बताता हूँ कि एक दृष्टि से देखा जाए तो धर्मसुधारवादी परम्परा में माने गए परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त में कोई विशेष रूप से अद्वितीय बात नहीं है। प्रेस्बुतिरवादी (Presbytarian), धर्मसुधारवादी बपतिस्मावादी (Reformed Baptist), डच धर्मसुधारवादी (Dutch Reformed), और अन्य धर्मसुधारवादी ख्रीष्टीय परमेश्वर के उन्हीं गुणों को मानते हैं जिन्हें लूथरवादी (Lutheran), एंग्लिकन (Anglican), मेथोडिस्ट (Methodist), पूर्वी शास्त्रसम्मत (Eastern Orthodox) और रोमन कैथोलिक (Roman Catholic) भी मानते हैं। हमारे परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त में कोई मूलभूत या क्रान्तिकारी भिन्नता नहीं है।

फिर भी, जब वही विद्यार्थी मुझसे पूछते हैं कि धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान (Reformed Theology) की सबसे प्रमुख विशिष्टता क्या है, तो मैंने कहा है कि यह हमारा परमेश्वर का धर्मसिद्धान्त है। अब यह बात मेरी पहली बात के विपरीत प्रतीत होती है, परन्तु मेरा आशय यह है कि धर्मसुधारवादी परम्परा में परमेश्वर का धर्मसिद्धान्त हमें अन्य परम्पराओं से इसलिए अलग करता है क्योंकि मैं किसी अन्य ईश्वरविज्ञान को नहीं जानता जो परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त को गम्भीरता से प्रत्येक अन्य धर्मसिद्धान्त के सन्दर्भ में लेता हो। अधिकांश विधिवत ईश्वरविज्ञानों (Systematic Theologies) में, पहले पृष्ठ पर तो परमेश्वर की सम्प्रभुता क पुष्टि की जाती है, परन्तु जैसे ही आप उद्धारविज्ञान (उद्धार का धर्मविज्ञान), युगान्तविज्ञान (अन्तिम बातों का धर्मसिद्धान्त), या नृविज्ञान (मानवता का धर्मविज्ञान) आदि विषयों पर आगे बढ़ते हैं, लेखक मानो भूल जाता है कि उसने पहले पृष्ठ पर परमेश्वर की सम्प्रभुता के विषय में क्या कहा था।

परन्तु धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानी सचेत रूप से परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त को सम्पूर्ण ख्रीष्टीय ईश्वरविज्ञान का आधार मानते हैं। यही एक कारण है कि कैल्विनवादी पुराने नियम पर इतना अधिक ध्यान केन्द्रित करते हैं। हम इस बात को ध्यान देते हैं कि परमेश्वर का चरित्र हर बात को परिभाषित करता है—ख्रीष्ट के विषय में हमारी समझ को, अपने विषय में हमारी समझ को, और उद्धार के विषय में हमारी समझ को। हम पुराने नियम की ओर इसलिए मुड़ते हैं क्योंकि यह परमेश्वर के स्वभाव और चरित्र के विषय में सम्पूर्ण सृष्टि में उपलब्ध सबसे महत्वपूर्ण स्रोतों में से एक है। धर्मसुधारवादी ख्रीष्टीय लोग पुराने नियम को अत्यन्त गम्भीरता से लेते हैं क्योंकि यह परमेश्वर के गौरव का अत्यन्त जीवन्त प्रकाशन है।

पुराने नियम में परमेश्वर के प्रमुख प्रकाशनों के विषय में सोचें। यशायाह 6 में हम पूरे पवित्रशास्त्र में परमेश्वर की पवित्रता का सबसे स्पष्ट प्रकाशन पाते हैं। फिर निश्चित रूप से, निर्गमन 3 में हम पढ़ते हैं कि यहोवा ने जलती हुई झाड़ी में मूसा को अपने विषय में और अपने वाचाई नाम का प्रकाशन किया। जो कोई परमेश्वर की स्वतन्त्रता और स्वयं-अस्तित्व को समझना चाहता है, उसे यह अध्याय अवश्य पढ़ना चाहिए। जब भी मुझे हमारे सृष्टिकर्ता की सत्य के प्रति निष्ठा और अपनी वाचा की प्रतिज्ञाओं को पूरा करने की उसकी विश्वासयोग्यता की स्मृति चाहिए होती है, मैं प्रायः उत्पत्ति 15 पर जाता हूँ, जहाँ परमेश्वर स्वयं अपने ऊपर शपथ खाता है कि वह अब्राहम को असंख्य वंशज देगा। और अपने लोगों, अपनी दुल्हन, के प्रति परमेश्वर के अटल, प्रभावशाली प्रेम के जीवन्त चित्रण के लिए, पवित्रशास्त्र में होशे की पुस्तक से उत्तम स्थान विरले ही कोई हो।

मैं और भी बहुत से उदाहरण दे सकता हूँ, पर इन सब घटनाओं में क्या समानता है? परमेश्वर के ये सभी प्रकाशन उसके लोगों के जीवन के विभिन्न संकट-कालों में हुए। यशायाह और मूसा दोनों को एक महान कार्य पर भेजा जाने वाले थे—कठोर हृदय वाले लोगों के सामने यहोवा की महिमा का प्रचार करने के लिए। ऐसे समय में उन्हें सबसे अधिक किस बात की आवश्यकता थी? सफलता की प्रतिज्ञा की नहीं—यशायाह को तो बताया गया था कि उसका सन्देश लोगों के हृदयों को और कठोर करेगा (यशायाह 6:8–13)। नहीं, उन्हें प्रभु के स्वभाव की समझ की आवश्यकता थी। जब परमेश्वर उन्हें आश्वासन देना चाहता था, तब उसने स्वयं को उन्हें दिया। यही बात अब्राहम और होशे के साथ भी सत्य थी। मानव दृष्टि से देखें तो अब्राहम के पास यह विश्वास करने का बहुत कम प्रमाण था कि परमेश्वर उसे अनेक वंशज देगा। इसलिए प्रभु ने उस कुलपिता को अपनी विश्वासयोग्यता का आश्वासन स्वयं पर विनाश का शपथ लेकर दिया—जो असम्भव है—यदि वह अपना वचन न रखे। होशे उस समय में जीवित था जब ऐसा प्रतीत होता था कि परमेश्वर ने अपने लोगों को उनकी अविश्वासयोग्यता के कारण पूर्ण रूप से त्याग दिया है। तब प्रभु यह क्या आशा दे सकता था कि वह इस्राएल से अनन्त प्रेम करता है? यह स्वयं को एक ऐसे पति के रूप में प्रकट करने के द्वारा था जो प्रेम और विश्वासयोग्यता में सिद्ध है।

धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान का परमेश्वर का धर्मसिद्धान्त और उद्धार की प्रत्येक चरण में उसके सभी गुणों पर दिया गया बल, इसे प्रभु के विषय में अन्य ख्रीष्टीय समझने की रीतियों से अलग करता है। और हमारा ईश्वरविज्ञान उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक, नए नियम जितना पुराने नियम से भी लिया गया है। तो फिर क्यों न हम परमेश्वर की पूरी सम्मति को आत्मसात करें और दोनों नियमों को गहरे समर्पण के साथ पढ़ें?

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

आर.सी. स्प्रोल
आर.सी. स्प्रोल
डॉ. आर.सी. स्प्रोल लिग्नेएर मिनिस्ट्रीज़ के संस्थापक, सैनफर्ड फ्लॉरिडा में सेंट ऐन्ड्रूज़ चैपल के पहले प्रचार और शिक्षण के सेवक, तथा रेफर्मेशन बाइबल कॉलेज के पहले कुलाधिपति थे। वह सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक थे, जिसमें द होलीनेस ऑफ गॉड भी सम्मिलित है।