
सोलहवीं शताब्दी में उद्धारविज्ञान की पुनर्खोज
9 जून 2026यात्रा के (भजनों) गीतों को कैसे पढ़ें
यात्रा के गीत भजन संहिता की पाँचवीं पुस्तक में पाए जाने वाले पंद्रह भजनों (120–134) का शीर्षक है। यात्रा के गीत अथवा “ऊपर चढ़ने” के भजनों के रूप में, यह संग्रह इस्राएल के स्त्री-पुरुषों की एक प्रिय गीतावली था, जिसे वे फसह, सप्ताहों और झोंपड़ियों के तीन वार्षिक तीर्थ-पर्वों के लिए यरूशलेम की यात्रा करते समय गाते थे (देखें निर्गमन 23:14–17; व्यवस्थाविवरण 16:16)।
विश्वास में हमारे पूर्वजों की भाँति, हम भी एक तीर्थयात्रा पर हैं। हमारी यात्रा इस पतित संसार से होकर नए यरूशलेम तक जाती है। इस कठिन और प्रायः खतरनाक मार्ग में, भजन हमें बुद्धिमानी से मार्गदर्शन और समृद्ध आत्मिक पोषण प्रदान करते हैं।
यदि ये भजन हमारी तीर्थ-यात्रा में सहायता करने के लिए हैं, तो हमें इन्हें कैसे पढ़ना चाहिए? पाँच दिशानिर्देश हमें एक अच्छा आरम्भ करने के लिए सहायता कर सकते हैं।
1. प्रत्येक भजन को कई बार पढ़ें और उसकी मूल संरचना की रूपरेखा तैयार करें।
क्योंकि ये भजन इब्रानी कविता के रूप में लिखे गए हैं, इसलिए आपको इस प्रकार के साहित्य के अर्थानुवाद के सिद्धान्तों से परिचित होना चाहिए। समानान्तर पंक्तियों की संरचना तथा भजन की पंक्तियों के बीच पाए जाने वाले विभिन्न सम्बन्ध जैसी विशेषताएँ आपको प्रत्येक भजन के मूल अर्थ को समझने में अच्छी सहायता देंगी। इन सिद्धांतों के बारे में अधिक जानने के लिए मैथ्यू एच. पैटन के लेख ‘इब्रानी कविता को कैसे पढ़ें’ को देखें।
2. इन भजनों में प्रयुक्त चित्रात्मक भाषा की सराहना करना सीखें।
जब आप किसी चित्र या प्रतीक का अर्थानुवाद करते हैं, तो आपको तीन प्रश्नों का उत्तर देना चाहिए। पहला, चर्चा का विषय क्या है? दूसरा, भजनकार उस विषय का वर्णन करने के लिए कौन-सा चित्र प्रयोग करता है? तीसरा, विषय और चित्र के बीच समानता का बिंदु क्या है?
भजन 133 में दो प्रभावशाली चित्र दिखाई देते हैं, जिसका विषय परमेश्वर के लोगों की एकता है। पहला चित्र तेल का है:
“देखो, यह कैसी भली और मनोहर बात है
कि भाई आपस में एक होकर रहें!
यह हारून के सिर पर के उस उत्तम तेल के समान है,
जो नीचे दाढ़ी पर अर्थात् उसकी दाढ़ी पर बहता हुआ,
उसके वस्त्रों के छोर तक पहुंच गया।” (भजन 133:1–2)
यदि एकता विषय है और तेल चित्र है, तो समानता का बिंदु क्या है? जिस तेल का दाऊद उल्लेख करता है, वह पवित्र अभिषेक का तेल है (निर्गमन 30:22–38)। उसमें सुगन्धित द्रव्य मिला होता था और वह मनोहर सुगन्ध फैलाता था। उसी प्रकार, परमेश्वर के लोगों के बीच एकता भी एक सुगन्धित और आनंददायक वातावरण उत्पन्न करती है।
दूसरा चित्र ओस का है:
यह हेर्मोन की उस ओस के समान है,
जो सिय्योन के पहाड़ों पर गिरती है!
क्योंकि यहोवा ने वहीं
सदा के जीवन की आशीष ठहराई है! (भजन 133:3)
जैसे ओस घास को ताज़गी और नया जीवन देती है, वैसे ही जब विश्वासी परमेश्वर के कार्य के लिए एक मन और एक हृदय रखते हैं, तब वे आत्मिक ताज़गी और नवीनीकरण का अनुभव करते हैं।
3. इन भजनों को यीशु ख्रीष्ट के प्रकाशन के रूप में पढ़ें।
पहले दो दिशानिर्देश हमें प्रत्येक भजन की साहित्यिक विशेषताओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहते हैं। तीसरा दिशानिर्देश हमारा ध्यान साहित्यिक पक्ष से हटाकर ईश्वरविज्ञानिक पक्ष की ओर ले जाता है। यीशु ने कहा, “उन सब बातों का जो मूसा की व्यवस्था में, नबियों तथा भजनों की पुस्तक में, मेरे विषय में लिखी गई थीं, पूरा होना अनिवार्य है” (लूका 24:44)। भजन ख्रीष्ट के विषय में हैं। सामान्यतः पाठकों को भजन 1 में यह समझने में कठिनाई नहीं होती क्योंकि यीशु ही वचन का धन्य पुरुष हैं। भजन 22 में वह त्यागा गया जन है। भजन 23 का अच्छा चरवाहा है।
परन्तु यात्रा के गीतों में हम यीशु को कहाँ पाते हैं? हम उसे यरूशलेम की ओर जाते मार्ग पर इन भजनों को गाते हुए एक विश्वासयोग्य तीर्थयात्री के रूप में देखते हैं। बारह वर्ष की आयु से, जब वह पहली बार फसह के पर्व के लिए यरूशलेम गया (लूका 2:41–51), उद्धारकर्ता नियमित रूप से तीर्थ-पर्वों का पालन करता था (देखें यूहन्ना 2:13; 6:4; 7:1–24; 13:1)। जब उसके क्रूस पर चढ़ाए जाने का समय निकट आया, तब प्रभु ने फसह के लिए यरूशलेम जाने का दृढ़ निश्चय किया (लूका 9:51)।वह एक अटल तीर्थयात्री था, यद्यपि वह जानता था कि उसकी विश्वासयोग्यता उसे दुःख और मृत्यु तक ले जाएगी (लूका 9:21–22)। जब आप इन भजनों को पढ़ें, तो यह प्रश्न पूछें: यीशु ने इन्हें किस प्रकार गाया होगा? अथवा ये भजन आपको यीशु के विषय में किस प्रकार गाने और विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं?
4. किसी भजन की पृष्ठभूमि को समझने के बाद, उसके लागूकरण की ओर बढ़ें।
चौथा दिशानिर्देश साहित्यिक और ईश्वरविज्ञानिक पक्षों से आगे बढ़कर व्यक्तिगत जीवन में लागूकरण पर ध्यान केंद्रित करता है। अपने आप को उस इस्राएली यात्री के स्थान पर रखें जो पवित्र नगर की ओर जा रहा है और स्वयं से ये प्रश्न पूछें:
- मेरे लिए नए यरूशलेम की ओर यात्रा करने वाला एक विश्वासयोग्य तीर्थयात्री होने का क्या अर्थ है?
- जिन बाधाओं का मैं सामना करता हूँ, उनसे मुझे कैसे निपटना चाहिए? (देखें भजन 121:1)
- आराधना की प्रतीक्षा और आनन्दपूर्ण उत्सव मेरे जीवन में कैसा दिखाई देना चाहिए?
5. परमेश्वर के लोगों की सामूहिक भूमिका की सराहना करना सीखें।
जब इस्राएली पर्वों के लिए यरूशलेम जाते थे, तो वे समूहों में यात्रा करते थे। जब मरियम और यूसुफ फसह के पर्व से नासरत लौटते समय पहली बार यीशु को न पाकर चिंतित नहीं हुए, तो इसका कारण यह था कि उन्होंने समझा कि वह उत्तर की ओर जा रही भीड़ में अन्य लोगों के साथ होगा (लूका 2:43–44)।
उसी प्रकार, यद्यपि हम में से प्रत्येक एक तीर्थयात्री है, फिर भी हम इस यात्रा में अकेले नहीं चलते। इसलिए हमें एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना चाहिए (भजन 122:1), अपने साथ यात्रा करने वालों के कल्याण की चिंता करनी चाहिए (भजन 122:8), यह समझना चाहिए कि हम सभी कठिनाइयों का सामना करते हैं (भजन 123:2–4), और संगति के आनन्द का रसास्वादन करना सीखना चाहिए(भजन 133)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

