
रोमन कैथोलिक संस्कार-केन्द्रित उद्धारविज्ञान का विकास
4 जून 2026सोलहवीं शताब्दी में उद्धारविज्ञान की पुनर्खोज
सोलहवीं शताब्दी में उद्धार के बाइबलीय धर्मसिद्धान्त की पुनर्खोज एक ही बार में नहीं हुई। प्रारम्भ में, आरम्भिक धर्मसुधारकों ने “धर्मीकरण” शब्द के बाइबलीय अर्थ को पुनः खोजा। उन्होंने यह जाना कि इसका अर्थ “धर्मी बनाना” नहीं, वरन् “धर्मी घोषित करना” है। इस खोज से उन्हें यह बोध हुआ कि धर्मीकरण का साधनात्मक कारण बपतिस्मा नहीं है, वरन् केवल विश्वास है। दूसरे शब्दों में, धर्मसुधारकों ने सबसे पहली यह खोजा कि मध्ययुग के अन्तिम काल की कलीसिया ने मनुष्य की महान् समस्या के समाधान को विकृत रूप में समझ लिया था।
समय के साथ, ज्यों-ज्यों वे पवित्रशास्त्र के स्थल का गहन अध्ययन करते गए और उसकी शिक्षा की तुलना रोमन कैथोलिक कलीसिया की शिक्षा से करते गए, त्यों-त्यों वे यह खोज पाए कि रोम के पास समाधान की विकृत समझ इसलिए थी क्योंकि रोम के पास समस्या की ही विकृत समझ थी। रोम का उद्धारविज्ञान, अर्थात् उद्धार का धर्मसिद्धान्त (समाधान), उउसी प्रकार विकसित हुआ था जैसा वह था, क्योंकि आदम के पाप के परिणाम (समस्या) के विषय में उसकी समझ वैसी ही थी। जैसा कि हमने पिछले लेख में देखा, रोमन कैथोलिक कलीसिया यह शिक्षा देती थी कि जब आदम का पतन हुआ, तब उसने धर्मी ठहराने वाले अथवा पवित्र करने वाले अनुग्रह का एक अतिरिक्त प्रदान किए गए वरदान को खो दिया। इस दृष्टिकोण के अनुसार, आदम और उसके वंशजों को उस अनुग्रह को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता थी, जिससे कि वे पुनः अलौकिक स्तर के अस्तित्व पर उठाए जा सकें। उनके अनुसार, यह कार्य रोमन कैथोलिक कलीसिया के संस्कारों के द्वारा पूरा होता है।
जैसे-जैसे धर्मसुधारकों ने पवित्रशास्त्र का अध्ययन किया, उन्होंने यह जाना कि मनुष्य के पतन के विषय में रोमन कैथोलिक धर्मसिद्धान्त पवित्रशास्त्र के स्थल के साथ पूर्ण न्याय नहीं करता। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि पतन में मनुष्य ने केवल अतिरिक्त-प्रदत्त अनुग्रह का वरदान ही नहीं खोया था, और न ही उसके स्वभाव को कोई थोड़ी-बहुत क्षति पहुँची थी। इसके विपरीत, जैसा कि वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन ने बाद में व्यक्त किया, पतन में
“वे अपनी मूल धार्मिकता और परमेश्वर के साथ अपनी संगति से गिर पड़े, और इस प्रकार पाप में मृत तथा प्राण और शरीर के सभी अंगों और शक्तियों मेंसामर्थ्यों में पूर्णतः भ्रष्ट हो गए।” (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन 6.2)
बाद में जिस ईश्वरविज्ञानीय शब्द का इस पतित अवस्था का वर्णन करने के लिए प्रयोग होने लगा, वह है सम्पूर्ण भ्रष्टता।
यहाँ पुनः ध्यान देने योग्य बात यह है कि मनुष्य जिस बात को समस्या मानता है, वही उसके समाधान (उद्धारविज्ञान) की समझ को निर्धारित करती है। पेलाजियस के उद्धार का धर्मसिद्धान्त वैसा ही है जैसा वह है, क्योंकि उसकी समस्या की समझ वैसी थी। रोम के उद्धार का धर्मसिद्धान्त वैसा ही है जैसा वह है, क्योंकि उसकी समस्या की समझ वैसी थी। एक मृत व्यक्ति का उद्धार और एक घायल व्यक्ति का उद्धार पूर्णतः भिन्न साधनों की माँग करते हैं।
धर्मसुधारवादी कलीसियाओं ने मनुष्य की समस्या के परमेश्वर के समाधान को उस वाचा के रूप में व्यक्त किया, जिसे परमेश्वर ने अपने और मनुष्य के बीच स्थापित की थी। वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन उद्धार के इस बाइबलीय धर्मसिद्धान्त की सबसे स्पष्ट प्रस्तुतियों में से एक है। आगे जो कुछ लिखा गया है वह बहुत-कुछ इसी विश्वास-अंगीकार वचन से लिया गया है। पाठकों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे इसके उस संस्करण को प्राप्त करें जिसमें बाइबलीय प्रमाण-पद भी सम्मिलित हों, और उन सभी का सावधानीपूर्वक अध्ययन करें।
जैसा कि वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन समझाता है, पतन से पहले परमेश्वर ने आदम के साथ एक वाचा बाँधी, “जिसमें आदम से, और उसमें उसके वंशजों से, सिद्ध और व्यक्तिगत आज्ञाकारिता की शर्त पर, जीवन की प्रतिज्ञा की गई थी” (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 7.2)। हत्त्वपूर्ण बात यह है कि, और रोम की शिक्षा के विपरीत, पतन से पहले आदम के पास व्यवस्था का पालन करने की सामर्थ्य और योग्यता थी (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन 4.2; 19.1)। इसके अतिरिक्त, मूल धार्मिकता उसके स्वभाव का अंग थी, क्योंकि उसका स्वभाव परमेश्वर के स्वरूप में सृज गया था (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन 4.2; 6.2)। यह वैसा नहीं था जैसा रोमन कैथोलिक कलीसिया सिखाती थी, अर्थात्, उसके स्वभाव में जोड़ा गया कोई अतिरिक्त-प्रदत्त वरदान।
मनुष्य के पतन के कारण, वह अब व्यवस्था का सिद्ध रूप से पालन करने में सक्षम नहीं रहा, और इस प्रकार पहली वाचा की शर्तों को पूरा करने में भी असमर्थ हो गया। अतः परमेश्वर ने,
“एक दूसरी वाचा स्थापित करना उचित समझा, जिसे सामान्यतः अनुग्रह की वाचा कहा जाता है; जिसमें वह पापियों को यीशु ख्रीष्ट के द्वारा सेंतमेत जीवन और उद्धार प्रदान करता है; उनसे उस पर विश्वास करने की माँग करता है, जिससे कि वे उद्धार पाएँ; और उन सभी को जो अनन्त जीवन के लिए नियत किए गए हैं, अपना पवित्र आत्मा देने की प्रतिज्ञा करता है, जिससे कि वे विश्वास करने के लिए इच्छुक और समर्थ बनाए जाएँ।” (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 7.3)
एकलौता पुत्र, यीशु ख्रीष्ट, अनन्तकाल से परमेश्वर और मनुष्य के बीच एकमात्र मध्यस्थ होने के लिए नियुक्त किया गया था (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 8.1)। उसे अपने उन लोगों के उद्धार के लिए नियुक्त किया गया था, जिन्हें परमेश्वर ने अपने सेंतमेत अनुग्रह और प्रेम से, ख्रीष्ट में, “जगत की नींव डाले जाने से पहले ही, अपने अनन्त और अपरिवर्तनीय प्रयोजन के अनुसार, और अपनी इच्छा की गुप्त मन्त्रणा तथा सुप्रसन्नता के अनुसार” चुन लिया (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 3.5)।
“प्रभु यीशु ने, अपनी सिद्ध आज्ञापालन और अपने आप के बलिदान के द्वारा, जिसे उसने अनन्तकालीन आत्मा के द्वारा, एक ही बार परमेश्वर को अर्पित किया, अपने पिता के न्याय को पूरी तरह सन्तुष्ट कर दिया है; और उन सभी के लिए जिन्हें पिता ने उसे सौंपा है, न केवल मेल-मिलाप, परन्तु स्वर्ग के राज्य में एक अनन्तकालीन उत्तराधिकार भी मोल लिया है।” (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 8.5)
यह मोल लिया गया छुटकारा ख्रीष्ट के द्वारा इतिहास भर में सभी चुने हुओं पर लागू किया जाता है (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 8.8)।
क्योंकि पतित मनुष्य पाप और मृत्यु की अवस्था में है, और केवल घायल या बीमार ही नहीं है, अतः वह स्वयं अपने बल पर मोल लिए गए छुटकारे को ग्रहण करने के लिए कुछ भी करने योग्य नहीं है। इसी कारण परमेश्वर चुने हुओं को मृत्यु में से प्रभावशाली रूप से बुलाता है, ठीक उसी प्रकार जैसे ख्रीष्ट ने लाज़र को कब्र में से बाहर बुलाया था। वह उन्हें पुनरुज्जीवित करता है, उन्हें आत्मिक जीवन प्रदान करता है, और उन्हें यीशु ख्रीष्ट की ओर खींचता है (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 10.1)। जिन्हें परमेश्वर बुलाता है, उन्हें वह सेंतमेत रूप से धर्मी ठहराता है। वे धर्मी ठहराए जाते हैं, अर्थात् धर्मी घोषित किए जाते हैं, अपने किसी कार्य के आधार पर नहीं, परन्तु केवल विश्वास के द्वारा ग्रहण की गई ख्रीष्ट की आरोपित धार्मिकता के आधार पर (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 11.1; 14.2)। जो प्रभावशाली रूप से बुलाए और धर्मी ठहराए जाते हैं, वे अपने सम्पूर्ण जीवन में पवित्र भी किए जाते हैं:
“पाप के समस्त शरीर का प्रभुत्व नष्ट कर दिया जाता है, और उसकी विविध अभिलाषाएँ अधिकाधिक निर्बल और मृत होती चली जाती हैं; और वे सभी उद्धारक अनुग्रहों में अधिक से अधिक जीवित और सशक्त किए जाते हैं, जिससे कि वे सच्ची पवित्रता का आचरण कर सकें, जिसके बिना कोई मनुष्य प्रभु को नहीं देख पाएगा।” (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 13.1; 16.1–7 भी देखें)
रोमन कैथोलिक कलीसिया के विपरीत, धर्मसुधारवादी कलीसियाओं ने यह भी शिक्षा दी कि:
“जिन्हें परमेश्वर ने अपने प्रिय में ग्रहण किया है, प्रभावशाली रूप से बुलाया है, और अपने आत्मा के द्वारा पवित्र किया है, वे न तो पूर्णतः, और न ही अन्ततः अनुग्रह की अवस्था से गिर सकते हैं, वरन् वे निश्चय ही अन्त तक उसमें डटे रहेंगे, और अनन्तकाल के लिए उद्धार पाएँगे।” (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 17.1)
अपने अगले लेख में हम यह देखेंगे कि नीदरलैण्ड के कुछ धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानी किस प्रकार धर्मसुधारवादी अंगीकारात्मक ईश्वरविज्ञान से असन्तुष्ट हुए, और उन्होंने उस ईश्वरविज्ञान को पुनः रोम की दिशा में ले जाना आरम्भ किया। साथ ही हम डॉर्ट की महासभा में धर्मसुधारवादी कलीसिया के प्रतिउत्तर पर भी दृष्टि डालेंगे।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

