
मसीही उद्धारविज्ञान के समकालीन चुनौतियाँ
2 जून 2026रोमन कैथोलिक संस्कार-केन्द्रित उद्धारविज्ञान का विकास
पेलेजियसवादी विवाद का आधिकारिक रूप से समाधान पाँचवीं और छठी शताब्दी की कई महासभाओं द्वारा ऑगस्टीन के पक्ष में किया गया। यह स्पष्ट कर दिया गया कि आदम के पाप का प्रभाव उसकी समस्त सन्तान पर पड़ा, और उद्धार केवल परमेश्वर के अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। पेलेजियसवाद और अर्ध-पेलेजियसवाद, दोनों की निन्दा की गई। दुर्भाग्यवश, कलीसिया में कुछ ऐसे विचार-प्रवाह उपस्थित थे जिन्होंने आधिकारिक घोषणाओं के बाद भी, अन्ततः कलीसिया को पुनः अर्ध-पेलेजियसवाद के दिशा की ओर धकेल दिया।
उदाहरण के लिए, नव-प्लेटोवाद मानव उद्धार को आत्मा के परमेश्वर की ओर आरोहण के रूप में समझता था, जो विभिन्न वैरागी अभ्यासों के द्वारा सम्भव होता है। ऐसे विचार मसीही मठीय समुदायों में गहराई से समा गए, और धर्मसिद्धान्तों के विकास पर उनका ईश्वरविज्ञानिक प्रभाव अत्यन्त गहरा था। ये विचार ऑगस्टीन और स्यूडो-डायोनिसियस (Pseudo-Dionysius) जैसे अत्यन्त प्रभावशाली ईश्वरविज्ञानियों के लेखों में भी पाए जाते हैं।
धर्मसुधार के समय तक पहुँचते-पहुँचते, पेलेजियसवाद के विरुद्ध संघर्ष में प्राप्त की गई बहुत-सी उपलब्धियाँ खो चुकी थीं। उद्धार की एक सम्पूर्ण कलीसियाई-संस्कारवादी व्यवस्था प्रमुख बन चुकी थी, जो परमेश्वर के अनुग्रह की अपेक्षा व्यक्तिगत योग्यता पर अधिक निर्भर थी।
रोमन कैथोलिक उद्धारविज्ञान को समझना महत्वपूर्ण है। क्योंकि उद्धार के धर्मसिद्धान्त का धर्मसुधारवादी दृष्टिकोण को पूर्णतः तब तक नहीं समझा जा सकता, जब तक कि उस ईश्वरवैज्ञानिक प्रणाली को न समझा जाए जिससे वह उत्पन्न हुआ और जिसके प्रति वह प्रतिक्रिया कर रहा था।
रोमन कैथोलिक उद्धार के धर्मसिद्धान्त को समझने के लिए आदम तक पीछे लौटना आवश्यक है। रोमन कैथोलिक ईश्वरविज्ञान के अनुसार, आदम को अच्छा बनाया गया था और वह अपने प्राकृतिक उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता था; परन्तु अपने स्वभाव के अनुसार वह अपने अन्तिम लक्ष्य—अर्थात् परमेश्वर के आनन्दप्रद दर्शन (beatific vision)—तक पहुँचने में सक्षम नहीं था। उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए आदम को अस्तित्व की प्राकृतिक अवस्था से ऊपर उठाकर अलौकिक अवस्था तक पहुँचाया जाना आवश्यक था। उसे ऐसी सामर्थ्य दी जानी थी कि वह अपनी बुद्धि के द्वारा पापमय इच्छाओं पर नियन्त्रण रख सके। यह कार्य परमेश्वर द्वारा आदम को पवित्रकारी अनुग्रह का वरदान देने के द्वारा सम्पन्न हुआ, अर्थात् ऐसा अनुग्रह जो उसके मानवीय स्वभाव से ऊपर और उससे बढ़कर था। इसी कारण इसे अतिरिक्त प्रदान किया गया वरदान कहा जाता है। इसने आदम के मानवीय स्वभाव को ऊँचा उठाया और उसे परमेश्वर के साथ एक किया। इसी के द्वारा वह अपने अन्तिम लक्ष्य को अर्जित करने योग्य बना।
जब आदम ने पाप किया, तब वह अस्तित्व की उस अलौकिक अवस्था से गिर पड़ा। पतन के परिणामस्वरूप उस अतिरिक्त प्रदान किए गए अनुग्रह के वरदान का नाश हो गया, परन्तु उसका स्वभाव पूर्णतः नष्ट नहीं हुआ। मध्यकालीन युग में इस विषय पर विभिन्न मत थे कि आदम के मानवीय स्वभाव, विशेषकर उसकी बुद्धि और इच्छा-शक्ति, को कितनी क्षति पहुँची। कुछ लोगों का कहना था कि उसका मानवीय स्वभाव थोड़ा भी भ्रष्ट नहीं हुआ, और आदम केवल उसी अवस्था में लौट आया जिसमें वह पवित्रकारी अनुग्रह का वरदान प्राप्त करने से पहले रचा गया था। अन्य लोगों ने तर्क दिया कि उसका स्वभाव आहत हो गया था। किसी भी स्थिति में, आदम की सन्तान इसी पतित अवस्था में जन्म लेती है।
ईश्वरविज्ञान में, मनुष्य जिस बात को समस्या मानता है, वही उसके समाधान के स्वरूप को निर्धारित करती है। इसलिए, उद्धार का धर्मसिद्धान्त मुख्यतः सृष्टि, पाप, और पतन के परिणामों के विषय में व्यक्ति की समझ पर निर्भर करता है। क्योंकि मध्यकालीन रोमन कैथोलिक मत के अनुसार मनुष्य की समस्या पवित्रीकारी अनुग्रह के वरदान का खो जाना था, इसलिए स्वाभाविक रूप से उन्होंने उद्धार को उसी वरदान की पुनः प्राप्ति के रूप में समझा। अतः रोमन कैथोलिक व्यवस्था में उद्धार का अर्थ है पतित मनुष्यों का पुनः अस्तित्व की अलौकिक अवस्था तक ऊँचा उठाया जाना। यह कैसे सम्पन्न होता है? रोमन कैथोलिक कलीसिया के संस्कारों के माध्यम से। दूसरे शब्दों में, रोमन कैथोलिक कलीसिया और संस्कारों का धर्मसिद्धान्त ही रोमन कैथोलिक उद्धार का धर्मसिद्धान्त है। इसी कारण मैंने इसे रोमन कैथोलिक एक्लेसियो-सैक्रडोटल सिस्टम ऑफ साल्वेशन कहा है, जहाँ “एक्लेसियो” कलीसिया को और “सैक्रडोटल” संस्कारों की व्यवस्था को सूचित करता है।
रोमन कैथोलिक व्यवस्था में, बपतिस्मा वह संस्कार है जो आदम की सन्तान को उस अलौकिक अवस्था तक ऊँचा उठाता है, जिससे आदम गिर गया था। यह उस व्यक्ति को परमेश्वर के साथ एक करता है और उसे सभी पापों से शुद्ध करता है। बपतिस्मा के माध्यम से पवित्रकारी अनुग्रह प्राण में आरोपित किया जाता है, और बपतिस्मा पाया हुआ व्यक्ति धर्मी बना दिया जाता है। इस पवित्रकारी अनुग्रह को धर्मी ठहराने वाला अनुग्रह भी कहा जाता है। इसी कारण रोमन कैथोलिक उद्धार-व्यवस्था में बपतिस्मा को धर्मीकरण का प्रमुख माध्यम माना जाता है।
बपतिस्मा के बाद, नए विश्वासी को पुष्टीकरण (confirmation) का संस्कार दिया जाता है, जो उसके पवित्रकारी अनुग्रह को बढ़ाता और दृढ़ करता है। विश्वासी प्रभु-भोज (Eucharist) के संस्कार में सहभागी होने के द्वारा भी अपने पवित्रकारी अनुग्रह को बढ़ाता और सुदृढ़ करता है। जब तक विश्वासी पवित्रीकरण अथवा धर्मीकरण की इस उच्च अवस्था में बना रहता है, तब तक वह उन भले कार्यों को कर सकता है जो अन्त में उद्धार को अर्जित करने के लिए आवश्यक माने जाते हैं। और यदि कोई व्यक्ति इस अनुग्रह की अवस्था में मरता है, तो अधिकतम यही हो सकता है कि स्वर्ग जाने से पहले उसे पाप-शोधन स्थल (purgatory) में कुछ समय बिताना पड़े।
परन्तु यदि कोई विश्वासी घोर पाप करता है (अर्थात् ऐसा पाप जिसे अत्यन्त गम्भीर अपराध माना जाता है) तो वह अनुग्रह की अवस्था से गिर जाता है। यदि कोई व्यक्ति अनुग्रह की अवस्था से बाहर मरता है, तो वह पाप-शोधन स्थल में नहीं जाता, वरन् नरक में जाता है। इसलिए उद्धार की कोई आशा रखने के लिए उस व्यक्ति का पुनः अनुग्रह की उस उच्च अवस्था में लौटाया जाना आवश्यक है। क्या इसके लिए उसे पुनः बपतिस्मा लेना होगा? नहीं। किसी व्यक्ति को केवल एक ही बार बपतिस्मा दिया जा सकता है। तो क्या पापी के लिए अब कोई आशा नहीं बचती? नहीं, क्योंकि रोमन कैथोलिक कलीसिया के पास इस उद्देश्य के लिए एक और संस्कार है। जो पापी अनुग्रह की अवस्था से गिर गया है, उसे कलीसिया के पास जाकर कायाक्लेश (penance) का संस्कार ग्रहण करना होता है। इस संस्कार के माध्यम से पापी को पुनः धर्मीकरण की अवस्था में ऊँचा उठाया जाता है, जहाँ वह अन्तिम उद्धार को अर्जित करने के लिए आवश्यक कार्य कर सके।
धर्मसुधार-काल तक पहुँचते-पहुँचते, उद्धार की यह कलीसियाई-संस्कारवादी व्यवस्था सम्पूर्ण पश्चिमी कलीसिया पर प्रभुत्व जमा चुकी थी। मसीहियों को आत्मिक अनिश्चितता की अवस्था में जीवन व्यतीत करने के लिए विवश किया जाता था; उन्हें कभी यह निश्चितता नहीं हो सकती थी कि वे वास्तव में अनुग्रह की अवस्था में हैं या नहीं। और क्योंकि स्वर्ग में केवल वही जा सकता था जो अनुग्रह की अवस्था में मरे, इसलिए इसका लोगों के आत्मिक जीवन पर अत्यन्त गहरा प्रभाव पड़ा। अपने अगले लेख में, हम उस महान् खोज पर दृष्टि डालेंगे जिसे धर्मसुधारकों ने पाया, और जिसके द्वारा वे एक बार फिर यूरोप के लोगों के लिए वास्तविक सुसमाचार ला सके।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

