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The Development of Roman Catholic Sacerdotal Soteriology

रोमन कैथोलिक संस्कार-केन्द्रित उद्धारविज्ञान का विकास

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मसीही उद्धारविज्ञान के समकालीन चुनौतियाँ

Contemporary Challenges to Christian Soteriology

डॉर्ट की धर्मसभा ने डच धर्मसुधारवादी कलीसियाओं के भीतर अरमिनियसवादी विवाद को आधिकारिक रूप से सुलझा दिया था, परन्तु अरमिनियसवाद स्वयं समाप्त नहीं हुआ, और न ही उसने मसीही उद्धारविज्ञान के लिए चुनौतियाँ उत्पन्न करना बन्द किया। वह आज तक ऐसा करता आ रहा है। तथापि, अरमिनियसवाद ही एकमात्र महत्वपूर्ण समकालीन चुनौती नहीं है। इस लेख में हम मसीही उद्धारविज्ञान के समक्ष खड़ी पाँच अन्य समकालीन चुनौतियों पर संक्षेप में दृष्टि डालेंगे।

1. धर्मीकरण के धर्मसिद्धान्त के संशोधित रूप 

मसीही उद्धारविज्ञान के समक्ष आने वाली सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में धर्मीकरण के संशोधित  धर्मसिद्धान्त सम्मिलित हैं। उदाहरणस्वरूप, प्रथम शताब्दी के यहूदीवाद की अपनी संशोधित समझ के आधार पर, “पौलुस पर नया दृष्टिकोण” के समर्थक — जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है — पौलुस के उद्धार के धर्मसिद्धान्त की एक नई समझ तक पहुँचे हैं। उदाहरण के लिए, एन. टी. राइट “धर्मीकरण” को परमेश्वर की उस घोषणा के रूप में समझते हैं कि कोई व्यक्ति पहले से ही परमेश्वर के लोगों में सम्मिलित है। तथापि, उनके अनुसार धर्मीकरण का एक वर्तमान और एक भविष्यकालीन पक्ष भी है। हमारा भविष्य का धर्मीकरण वाचा के प्रति हमारी विश्वासयोग्यता पर आधारित है।

वाचात्मक दृष्टिकोण(फेडरल विज़न) के समर्थकों ने भी धर्मीकरण के धर्मसिद्धान्त में अपने संशोधनों के द्वारा मसीही उद्धारविज्ञान को चुनौती दी है। उनकी अधिकांश शिक्षा का स्रोत वेस्टमिन्स्टर थियोलॉजिकल सेमिनरी में ईश्वरविज्ञान के  प्राध्यापक नॉर्मन शेपर्ड तक पहुँचता है, जिन्होंने विश्वास को विश्वासयोग्यता के रूप में परिभाषित किया और इस प्रकार हमारे कार्यों के एक अंश को धर्मीकरण के आधार में सम्मिलित कर लिया। वाचात्मक दृष्टिकोण के समर्थकों ने अपने-अपने ढंग से शेपर्ड के धर्मसिद्धान्त के तत्वों को “पौलुस पर नया दृष्टिकोण” के तत्वों के साथ जोड़ा है, और इसके परिणामस्वरूप, उन्होंने बाइबलीय सुसमाचार को निर्बल कर दिया है। परमेश्वर का धन्यवाद है कि सभी प्रमुख धर्मसुधारवादी सम्प्रदायों ने इन झूठे धर्मसिद्धान्तों को आधिकारिक रूप से अस्वीकार कर दिया है।

2. परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त के संशोधित रूप 

परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त में किए गए संशोधनों का उद्धारविज्ञान पर प्रभाव उतना तुरन्त स्पष्ट नहीं दिखाई देता जितना धर्मीकरण के धर्मसिद्धान्त में संशोधन का प्रभाव दिखाई देता है, परन्तु वे उतना ही महत्वपूर्ण है। क्योंकि प्रत्येक बाइबिलीय धर्मसिद्धान्त किसी-न-किसी प्रकार परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त से जुड़ा हुआ है, अतः जब परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त में संशोधन किया जाता है, तब प्रत्येक अन्य धर्मसिद्धान्त भी प्रभावित होता है। ऐसे संशोधन अब केवल ईश्वरविज्ञानीय उदारवादियों के बीच ही नहीं हो रहे हैं। स्वयं को सुसमाचारवादी और धर्मसुधारवादी कहने वाले ईश्वरविज्ञानी भी परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त में संशोधन के कार्य में लगे हुए हैं। कुछ लोग अब परमेश्वर को समय की धारा में सहभागी के रूप में वर्णित करते हैं, जो घटनाओं के घटित होने के साथ-साथ प्रतिक्रिया करता है और स्वयं को अनुकूलित करता है; जो एक क्षण से दूसरे क्षण तक अपनी इच्छा, भावनाओं और उद्देश्यों को बदलता रहता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, परमेश्वर को केवल हमारी समझ के लिए प्रतिक्रियाशील रूप में चित्रित नहीं किया गया है, वरन् वह वास्तव में परिवर्तन के अधीन है।

संक्षेप में, परमेश्वर भी अपनी सृष्टि के समान ही परिवर्तनशील बना दिया गया है। ऐसा संशोधन मसीही उद्धारविज्ञान के समक्ष जो चुनौती उत्पन्न करता है, वह स्पष्ट है। यदि परमेश्वर की इच्छा परिवर्तनशील है, तो हमारे उद्धार के विषय में  उसकी इच्छा भी परिवर्तनशील होगी। तब हमारे आशा रखने के लिए कोई स्थिर आधार शेष नहीं रहता। परमेश्वर ने उन सबको बचाने की प्रतिज्ञा की है जो ख्रीष्ट पर भरोसा रखते हैं, परन्तु यदि परमेश्वर अपना मन बदल सकता है, तो हम कैसे जानें कि वह इस प्रतिज्ञा के विषय में अपना मन नहीं बदलेगा? हम कैसे जानें कि हमारे प्रति उसका प्रेम नहीं बदलेगा?

3. ख्रीष्ट के धर्मसिद्धान्त के संशोधित रूप 

जैसा कि परमेश्वर के धर्मसिद्धान्त के संशोधित रूपों के साथ है, वैसे ही ख्रीष्ट के धर्मसिद्धान्त के संशोधित रूप भी मसीही उद्धारविज्ञान के लिए एक गम्भीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं। ऐसे संशोधनों का प्रभाव स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि सुसमाचार का केन्द्र ख्रीष्ट का व्यक्ति और उसका कार्य है (देखें 1 कुरिन्थियों 15:3–8)। यदि हम इस बात की अपनी इस समझ को बदल देते हैं कि ख्रीष्ट कौन है, तो उसने जो कुछ किया है उसके विषय में हमारी समझ भी अनिवार्य रूप से बदल जाएगी।

समकालीन समय में ख्रीष्टविज्ञान के सबसे महत्वपूर्ण संशोधनों में से एक उस शिक्षा में दिखाई देता है जिसे सामान्यतः “पुत्र की अनन्त अधीनता” कहा जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, पुत्र अनन्तकाल से पिता के अधिकार के अधीन है, और वह केवल अपने देहधारण किए हुए कार्य में ही नहीं, वरन् अपने अनन्त ईश्वरीय स्वभाव में भी पिता के अधीन रहता है। यह शिक्षा ख्रीष्ट के शास्त्रसम्मत धर्मसिद्धान्त तथा त्रिएकता के बाइबलीय धर्मसिद्धान्त के लिए एक प्रत्यक्ष चुनौती प्रस्तुत करती है। यद्यपि इसके समर्थक दावा करते हैं कि यह नीकिया के विश्वास-वचन तथा एथनेसियस जैसे व्यक्तियों  की शिक्षा के अनुरूप है, परन्तु चौथी शताब्दी के त्रिएकत्व सम्बन्धी विवादों का सावधानीपूर्वक अध्ययन यह दर्शाता है कि ऐसे विचार नीकिया के त्रिएकत्ववादियों के लेखों में नहीं, वरन् एरियसवादियों और अर्ध-एरियसवादियों के तर्कों में पाए जाते हैं — वे समूह जिन्होंने स्वयं निकिया के विश्वास वचन और उसके द्वारा परिभाषित शास्त्रसम्मत मत का विरोध किया था।

4. धार्मिक बहुलवाद

धार्मिक बहुलवाद को या तो वर्णनात्मक अर्थ में या निर्देशात्मक अर्थ में समझा जा सकता है। वर्णनात्मक अर्थ में यह सत्य है कि संसार में बड़ी संख्या में विभिन्न धर्म विद्यमान हैं, जिनके परमेश्वर और उद्धार के विषय में परस्पर विरोधी दृष्टिकोण हैं। परन्तु कुछ लोग वर्णनात्मक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर यह तर्क देने लगते हैं कि सभी धर्म और सभी धार्मिक दावे समान रूप से सत्य और मान्य हैं। यह निर्देशात्मक दृष्टिकोण मसीही उद्धारविज्ञान के लिए एक चुनौती है, क्योंकि यह इस मसीही दावे का प्रत्यक्ष विरोध करता है कि यीशु ही उद्धार का एकमात्र मार्ग है।

पतन के बाद से अनेक झूठे धर्म अस्तित्व में रहे हैं। मसीहियत इन झूठे धर्मों का सामना यीशु ख्रीष्ट के विशिष्ट दावों के साथ करती है। मसीहियों को यह कहकर अपने प्रभु के साथ विश्वासघात नहीं करना चाहिए कि ये सभी झूठे धर्म उसी एक परमेश्वर तक पहुँचने के विभिन्न मार्ग हैं।

5. सर्व-उद्धारवाद का पुनरुत्थान

सर्व-उद्धारवाद यह विचार है कि अन्त में, सभी मनुष्य (कुछ इसमें सभी स्वर्गदूतीय प्राणियों को भी जोड़ देते हैं) उद्धार पाएँगे। सर्व-उद्धारवाद कलीसिया के इतिहास में विभिन्न रूपों में विद्यमान रहा है, और हाल ही में इसकी लोकप्रियता में फिर से वृद्धि हुई है। यह पारम्परिक मसीही उद्धारविज्ञान के लिए स्पष्ट चुनौती प्रस्तुत करता है, क्योंकि यदि अन्ततः सभी लोग किसी भी स्थिति में उद्धार पा ही जाएँगे, तो सुसमाचार के प्रचार के लिए प्रेरणा बहुत कम रह जाती है। पवित्रशास्त्र में नरक की वास्तविकता और उद्धार के मार्ग के रूप में केवल ख्रीष्ट की विशिष्टता के विषय में इतना अधिक स्पष्ट शिक्षण है कि किसी सर्व-उद्धारवादी “सुसमाचार” पर विश्वास करना सम्भव नहीं है। यह मनुष्य की इच्छापूर्ण कल्पना मात्र है।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

किथ मैथिसन

किथ मैथिसन

डॉ. कीथ ए. मैथिसन, फ्लोरिडा के सैनफोर्ड में स्थित रिफॉर्मेशन बाइबल कॉलेज में व्यवस्थित ईश्वरविज्ञान के प्रोफेसर हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें द लॉर्ड्स सपर: आन्सर्स टू कॉमन क्वेश्चन्स भी सम्मिलित है।