How Are We to Improve Our Baptism

हम अपने “बपतिस्मे को कैसे और अच्छा ” बना सकते हैं?

23 जुलाई 2026
How Are We to Improve Our Baptism

हम अपने “बपतिस्मे को कैसे और अच्छा ” बना सकते हैं?

23 जुलाई 2026

क्या यीशु हमारा आदर्श है?

Is Jesus Our Example?

ख्रीष्ट ने भी तुम्हारे लिए दुःख सहा और तुम्हारे लिए आदर्श रखा कि तुम भी उसके पदचिह्नों पर चलो। (1 पतरस 2:21)

एक अर्थ में इसका उत्तर सरल है। क्या यीशु हमारा आदर्श है? हाँ, यीशु हमारा आदर्श है, किन्तु केवल हमारा आदर्श ही नहीं है, और उसका अनुसरण करना हमारे विश्वास की नींव नहीं है।

ख्रीष्ट का अद्वितीय उद्धारकारी कार्य

पतरस यह लिखने से पहले कि यीशु ने हमारे लिए “एक आदर्श छोड़ा है, ताकि [हम] उसके पदचिह्नों पर चलें,” पहले यह कहता है कि “ख्रीष्ट ने तुम्हारे लिए दुःख सहा”- उस प्रकार से नहीं जिस प्रकार से हम दूसरों के लिए दुःख सहते हैं। जब यीशु ने क्रूस पर दुःख सहा, तो उसने “अपनी देह में हमारे पापों को उठा लिया”; उसने हमारे लिए घायल होकर हमारे घावों को स्वस्थ किया (1 पतरस 2:24)। एक समय तुम (हम) तो भेड़ो की भांति भटक रहे थे, और उसके इस अद्वितीय कार्य ने हमें हमारे पाप से छुड़ाया, जिससे हम पवित्रता में जीवन बिताएँ (1 पतरस 2:25)।

अपने जीवन, मृत्यु और पुनरूत्थान में यीशु ने हम सबके लिए- जो विश्वास के द्वारा उससे जुड़े है – वह कार्य किया जो हम स्वयं अपने लिए या किसी और के लिए नहीं कर सकते थे। हम अपने साथी (सह) पापियों को उनके पापों के अनन्त परिणामों से छुटकारा दिलाने के लिए मृत्यु नहीं सह सकते है। परन्तु यीशु, जो स्वयं परमेश्वर और सिद्ध मनुष्य, होते हुए भी क्रूस पर पापियों के लिए स्वयं को बलिदान कर दिया। ख्रीष्ट ने हमारे लिए दुःख सहा— जो उस पर विश्वास करते हैं।

चारों सुसमाचारों का चरम बिन्दु यही है कि यीशु वह कार्य कर रहा है जो हम अपने लिए स्वयं नहीं कर सकते थे। इन सुसमाचारों का पहली और मुख्य बात यह नहीं है कि हम ठीक वैसे ही करें जैसा यीशु ने किया किन्तु जैसा यूहन्ना बहुत स्पष्टता के साथ लिखता है कि हम यीशु पर विश्वास करें: “परन्तु ये जो लिखे गए हैं इसलिए लिखे गए कि तुम विश्वास करो कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है, और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ” (यूहन्ना 20:31)। 

यीशु के चेलों के रूप में उसका अनुकरण करना-

यीशु के पदचिह्नों पर चलने की शिक्षा के लिए सुसमाचार कितने समृद्ध हैं!उसके कार्य की मूल उपलब्धि ऐसी है जिसका अनुकरण नहीं किया जा सकता, फिर भी उसका मानवीय जीवन, उसके वचन और उसके कार्य ऐसे अद्भुत आदर्शों से परिपूर्ण हैं जिनका अनुकरण किया जा सकता है। हमारी ही तरह वह भी पूर्णतः मनुष्य था। उसने मानवीय शरीर में रहते हुए, पापियों के विरोध और इस पतित संसार की प्रवृत्तियों के बीच अपने पिता की महिमा करने का प्रयत्न किया। यीशु हमारे पापों के लिए अद्वितीय प्रायश्चित्त भी है और मसीही जीवन का सार्वभौमिक आदर्श भी। 

स्वयं यीशु ने अपने चेलों को बुलाया कि वे उससे सीखें और उसके जीवन के पदचिन्हों चलें। “मेरा (सहज और हल्का) जुआ अपने ऊपर उठा लो।” मत्ती 11:29  में कहता है, “मुझ से सीखो।”  वास्तव में यही तो यीशु के “चेले” होने का अर्थ है– चेला का अर्थ है सीखने वाला। उसके चेले वे हैं जो उससे सीखते है और उसके जीवन और शिक्षा के  उदाहरण का अनुसरण करते हैं। इसीलिए, जब यीशु ने अपनी मृत्यु से एक रात पहले अपने चेलों के पैर धोए, उसने कहा “यदि मैं प्रभु और गुरु होते हुए तुम्हारे पैर धोए, तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोने चाहिए। क्योंकि मैंने तुम्हें नमूना दिया है कि तुम भी वैसा ही करो जैसा मैंने तुम्हारे साथ किया” (यूहन्ना 13:14-15)। 

यद्यपि हम मसीह के जीवन और मृत्यु के उद्धारकारी गुण का पुनरावर्तन नहीं कर सकते, फिर भी हम—और वास्तव में करेंगे भी—उस आत्म-दीनता और आत्म-समर्पित प्रेम का अनुकरण करेंगे जिसे उसने अपनी कमर में अँगोछा बाँधकर सेवा करते समय और अपने शरीर को क्रूस पर कीलों से जड़वाकर प्रकट किया। 

प्रेरित भी हमें यीशु को अपना आदर्श मानने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। पौलुस कहता है, “अपने में वही स्वभाव रखो जो मसीह यीशु में था, जो…”–फिर वह ख्रीष्ट की दीनता तथा क्रूस और पुनरुत्थान की महिमा के क्रम का वर्णन करता है (फिलिप्पियों 2:5-8)। ठीक इसी प्रकार, यूहन्ना अपनी पहली पत्र में लिखता है, “जो कहता है कि मैं उस में बना रहता हूँ तो वह स्वयं भी वैसा ही चले जैसा कि वह चलता था–अर्थात् आत्म-समर्पित और परमेश्वर की महिमा करने वाले प्रेम के मार्ग में (1 यूहन्ना 2:6)। 

ख्रीष्ट के आत्मा की सामर्थ्य

तो मसीही होने के नाते हमारे लिए “भक्तिपूर्ण जीवन” जीने का क्या अर्थ है? पौलुस इसे अविस्मणीय ढ़ंग से 1 तीमुथियुस 3:16 वर्णित किया है, जहाँ वह लिखता है, “और निस्सन्देह भक्ति का भेद बड़ा गम्भीर है।” हाँ ईश्वरभक्ति। इसमें क्या-क्या सम्मिलित हो सकता है? हम सम्भवतः यह अपेक्षा करेंगे कि इसके बाद सद्गुणों या धर्मी कर्मों की एक संक्षिप्त सूची दी जाएगी। परन्तु इसके स्थान पर पौलुस भक्तिपूर्ण मसीही जीवन के लिए परमेश्वर-मनुष्य के आदर्श को केन्द्र में रखता है। वह हमारे सामने यीशु के विषय में एक स्तुतिगान प्रस्तुत करता है:

वह शरीर में प्रकट हुआ,
आत्मा के द्वारा धर्मी ठहराया गया,
स्वर्गदूतों को दिखाई दिया,
जातियों के बीच प्रचार किया गया,
संसार में उस पर विश्वास किया गया,
महिमा में उठा लिया गया।

क्या आप जानना चाहते हैं ईश्वरभक्ति क्या है? यीशु की ओर देखिए। वह देह में प्रकट “भक्ति” है। इसलिए, 

मसीही प्रायः ईश्वरीय भावनाओं और कार्यों को “ख्रीष्ट के सदृश होना” कहते हैं। हमारे विश्वास का केंद्र उसका अद्वितीय उद्धारकारी कार्य है जिसका कोई अनुकरण नहीं कर सकता, और मसीही जीवन का सर्वोच्च आदर्श उसका वह अद्भुत मानवीय जीवन है जिसका अनुकरण किया जा सकता है।

हम सुसमाचारों को पढ़ते हैं और उसके जीवन की प्रत्येक गतिविधि पर विस्मित होते हैं। पापियों के लिए उसके अतुलनीय कार्य को देखकर हम श्रद्धा से भर जाते हैं। हम देखते हैं कि वह लोगों के साथ कैसे व्यवहार करता है, कैसे प्रार्थना करता है, कैसे प्रचार करता है और कैसे करुणा दिखाता है; कैसे विश्राम के लिए एकान्त में चला जाता है और फिर अनुग्रह की सेवा करने के लिए लौट आता है। हम उसके प्रेम, उसके धैर्य और उसकी बुद्धि को देखते हैं, और उसके पवित्र आत्मा की सामर्थ्य के द्वारा उसके पदचिह्नों पर चलने का प्रयत्न करते हैं।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

डेविड मैथिस

डेविड मैथिस

रेव. डेविड मैथिस मिनियापोलिस–सेंट पॉल, मिनेसोटा स्थित सिटीज़ चर्च में वरिष्ठ शिक्षक हैं तथा DesiringGod.org के कार्यकारी संपादक (Executive Editor) हैं। वे "Habits of Grace: Enjoying Jesus Through the Spiritual Disciplines" पुस्तक के लेखक हैं।