
हम ख्रीष्टजन्मोत्सव (क्रिसमस) पर गीत क्यों गाते हैं?
21 जुलाई 2026हम अपने “बपतिस्मे को कैसे और अच्छा ” बना सकते हैं?
एक बार रानी ने अपने बेटे को एक जन्मदिन के समारोह में में छोड़ने गई और जाते समय उसने उसे स्मरण कराया, : “याद रखना, राजकुमार: राजघराने के पुत्रों का आचरण भी राजसी होते हैं।”
मसीहियों के रूप में हमारा भी यह कर्तव्य है कि हम अपने उस नाम के अनुरूप जीवन बिताएँ जो हमें राजकीय याजकसमूह के सदस्य और स्वर्गीय राजा के पवित्र राष्ट्र के नागरिक होने के कारण प्राप्त हुआ है (1 पतरस 2:9)। बपतिस्मा को एक रीति से “नया जन्म-प्रमाण पत्र”, माना जा सकता है; क्योंकि यह इस बात का पक्का प्रमाण कि हम पर त्रिएक परमेश्वर का प्रत्येक नाम का छाप लगा है (मत्ती 28:19)।
वेस्टमिंस्टर दीर्घ प्रश्नोत्तरी पूछता है, “हम अपने बपतिस्मा को कैसे और अच्छा बना सकते हैं?” (प्रश्न-उत्तर 167)। स्पष्ट रूप से कहें तो, बपतिस्मा में हमें जो नाम मिला है, उसमें किसी सुधार की आवश्यक्ता नहीं है, क्योंकि यह पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का एकदम सही और संपूर्ण नाम है। परन्तु इस ईश्वरीय नाम की उद्धार करने वाली सामर्थ के प्रति विश्वासियों की समझ और उसे अपनाने की भावना जीवन भर बढ़ती रह सकती है और बढ़नी भी चाहिए।
तो फिर, हम अपने बपतिस्मा को कैसे और अच्छा बना सकते हैं?
1. स्मरण रखें कि बपतिस्मा एक वरदान है।
बपतिस्मा उस अनुग्रह का चिन्ह और छाप है जिसे पुनरुत्थित प्रभु ने अपनी कलीसिया को दिया है। जो लोग इसे ग्रहण करते हैं, उनके जीवन में बपतिस्मा वास्तव में एक निर्णायक मोड़ का कार्य करता है। इस दृष्टि से यह उस घटना के समान है जब इस्राएल मिस्र से निर्गमन के समय सूखी भूमि पर होकर लाल समुद्र पार कर गया था (देखिए 1 कुरिन्थियों 10:1–2)। वाचा के लोगों का ऐसी जानलेवा विपत्ती से छुटकारा पाने को भूल जाना अकल्पनीय होना चाहिए। उसी प्रकार, अपने बपतिस्मा को स्मरण करने का अर्थ है उसके गहरे महत्व को समझना: विश्वास के द्वारा हम ख्रीष्ट की मृत्यु और उनके जी उठने में उसके साथ जुड़ जाते हैं (रोमियों 6:1–4)। इसलिए, अपने बपतिस्मा को स्मरण करना उस भरोसे से प्रेरित होने का एक माध्यम है:
मैं अपना नहीं हूँ,
परन्तु शरीर और आत्मा सहित, जीवन में और मृत्यु में भी,—
अपने विश्वासयोग्य उद्धारकर्ता, यीशु ख्रीष्ट का हूँ। (हाइडेलबर्ग प्रश्नोत्तरी 1)
2. हम निरन्तर प्रभु के सम्मुख अपने पापों का अंगीकार करते हैं।
ऑगस्टीन ने लिखा, “परमेश्वर के सम्पूर्ण नगर की, जो इस संसार में परदेशी के समान यात्रा कर रहा है, प्रार्थना इसका प्रमाण है; क्योंकि उसके सभी सदस्य एक स्वर से परमेश्वर से पुकारते हैं, ‘हमारे अपराध क्षमा कर, जैसे हम भी अपने अपराधियों को क्षमा करते हैं।’” जो लोग बपतिस्मा प्राप्त कर चुके हैं, उन्हें इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि वे पापरहित हैं; इसके विपरीत, हमें अपने पापों को स्वीकार करते हुए पश्चात्ताप के साथ पिता के सामने अंगीकार करना चाहिए (1 यूहन्ना 1:8–9)।
प्रायः ऐसा होता है कि घर के सामान्य काम करते समय हमें किसी वस्तु की गन्दगी का पूरा पता तब तक नहीं चलता, जब तक उसे साफ़ करने का समय नहीं आता। हमारे मसीही जीवन में भी यही बात लागू होती है : जब परमेश्वर के वचन का प्रकाश हमारे हृदय के एक-एक कोने पर पड़ता है, तभी हमें ज्ञात होता है कि हमारा भ्रष्टाचार कितना गहरा है। और जब हम अपने बपतिस्मे का स्मरण करते हैं, तो अपने पापों की गहराई का सामना करते हुए भी परमेश्वर की यह प्रतिज्ञा हमें सान्त्वना देती है: “पर वह और भी अधीक अनुग्रह देता है” (याकूब 4:6)।
3. हम अपने भीतर कार्यरत परमेश्वर की पवित्रीकरण करने वाली सामर्थ्य को ग्रहण करें।
आजकल हमारी संस्कृति में ऊर्जा की संभावित कमी और हमारी तकनीकी व परिवहन सम्बन्धी आवश्यकताओं के लिए ऊर्जा के विश्वसनीय स्रोतों की खोज के विषय में बहुत चर्चा हो रही है। परन्तु मसीही जीवन के संदर्भ में, हम पवित्र लोगों के भीतर स्वयं ख्रीष्ट की कभी न खत्म होने वाली पुनरुत्थान की शक्ति और सामर्थ्य काम कर रही है (इफिसियों 1:19–20)। सचमुच, अपने बपतिस्मा को याद करने से हमें “विश्वास की अच्छी कुश्ती” लड़ने में साहस और निडरता मिलनी चाहिए (1 तीमुथियुस 6:12)। ऐसा कोई शत्रु नहीं है जिसका सामना करते समय हम दुर्बल पड़ जाएँ। यह बात दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले, अर्थात् पृथ्वी और आकाश, दोनों प्रकार के शत्रुओं पर लागू होती है। ऐसा नहीं है कि हम अखाड़े में अपनी मज़बूत मांसपेशियों और मार्शल आर्ट्स का प्रदर्शन करते हैं, वरन् ख्रीष्ट अपने वचन (जिसमें हमारा बपतिस्मा भी शामिल है) के द्वारा हमें भरोसा दिलाते हैं: “क्योंकि उसने कहा है, ‘मैं तुझे कभी नहीं छोडूँगा और न ही कभी त्यागूँगा’” (इब्रानियों 13:5)।
4. हम स्मरण रखें कि हममें से कोई भी अकेला न तो खड़ा है और न ही चलता है।
बपतिस्मा परमेश्वर का एकीकृत करने वाला कार्य है। इसके द्वारा वह हम अनेक सदस्यों को एक ही देह में बाँध देता है (1 कुरि. 12:13)। इसलिए बपतिस्मा हमें यह सिखाता है कि हम कलीसिया में दूसरों के विविध वरदानों और सेवाओं का आदर करें, क्योंकि प्रत्येक सदस्य सम्पूर्ण देह की भलाई और उन्नति में अपना योगदान देता है (1 कुरि. 12:14–31)। शेक्सपीयर की प्रसिद्ध कविता “ऑल द वर्ल्ड्स अ स्टेज” में मानव-जीवन को एक नाटक के रूप में चित्रित किया गया है, जो सात अंकों में विभाजित है, और प्रत्येक अवस्था तथा समय में “मनुष्य अपनी भूमिका निभाता है।” परन्तु बपतिस्मा हमें ऐसी भूमिका नहीं देता जिसमें हम मुख्य पात्र बनें, वरन् ऐसी भूमिका देता है जिसमें हम सेवा करें। हमें अपनी भूमिका को इस प्रकार निभाने के लिए तत्पर रहना चाहिए कि हम एक-दूसरे को सहारा दें, आत्मिक उन्नति पहुँचाएँ, और अपनी व्यक्तिगत रुचियों से बढ़कर कलीसिया की सामूहिक भलाई को प्राथमिकता दें। यही उस आज्ञा का एक आवश्यक अंग है कि हम “पहिले परमेश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करें” (मत्ती 6:33)।
हमारी शिष्यता में बपतिस्मा का एक बुलाहट-सम्बन्धी उद्देश्य भी है, क्योंकि इसके द्वारा ख्रीष्ट हमें यह पुकार देता है: “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो वह अपने आप का इन्कार करे और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाकर मेरे पीछे हो ले।” (लूका 9:23)
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।


