Is Jesus Our Example?

क्या यीशु हमारा आदर्श है?

28 जुलाई 2026
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मूर्तिपूजा क्या है ?

What Is Idolatry?

जब लोग “मूर्तिपूजा” शब्द सुनते हैं, तो उनके मन में अलग-अलग प्रकार की धारणाएँ आती हैं। कुछ लोग प्राचीन धार्मिक अनुष्ठानों की कल्पना करते हैं, जहाँ उपासक तराशी हुई मूर्तियों के सामने झुककर आराधना करते थे। कुछ लोग उन प्रशंसकों के विषय में सोचते हैं जो अपने प्रिय अभिनेताओं, खिलाड़ियों या संगीतकारों को “पूजते”  या “अपना आदर्श बना लेते” हैं। और कुछ लोग इस शब्द का प्रयोग किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक आसक्ति के के रूपक के रूप में करते हैं।
तो, मूर्तिपूजा क्या है? मूल रूप से, मूर्तिपूजा का अर्थ है सृष्टिकर्ता के स्थान पर सृष्ट वस्तु की आराधना करना। 

परमेश्वर इसके विषय में इतना गम्भीर क्यों है? इसका उत्तर सरल है: परमेश्वर मूर्तिपूजा के विषय में गम्भीर है क्योंकि वह आराधना के विषय में गम्भीर है। 

कभी-कभी यह विचार आधुनिक पाठकों को असहज कर देता है, क्योंकि वे यह समझ सकते हैं कि परमेश्वर एक आत्ममुग्ध व्यक्ति के समान है, जो अस्वस्थ रूप से अपनी उपासना का अभिलाषी है। यदि परमेश्वर भी कोई सृष्ट प्राणी होता, न कि सृष्टिकर्ता, तो यह बात सत्य होती। परन्तु वास्तविकता यह है कि परमेश्वर ने हमें अपनी उपासना करने के लिए बनाया है। यही उचित है। और यही भला भी  है, क्योंकि केवल परमेश्वर ही आराधना के योग्य है। परन्तु यदि हम इस बात को उलट दें और स्वीकार करें कि यदि परमेश्वर अपनी महिमा और आदर की रक्षा या घोषणा न करे, तो वह परमेश्वर के समान कार्य नहीं कर रहा होगा। कई बार लोग परमेश्वर के विषय में ऐसा विचार रखते हैं कि मानो वह केवल एक मनुष्य हो (अर्थात् सृष्टि का एक भाग) और उसी समय वे सृष्टि के विषय में ऐसे सोचते हैं मानो वह परमेश्वर हो और उपासना के योग्य हो। वास्तव में, सृष्टि को ऊँचा उठाना और सृष्टिकर्ता को नीचे गिराना—दोनों ही अनुचित हैं। यही मूर्तिपूजा है। 

प्रेरित पौलुस मूर्तिपूजा को एक अदला-बदली के रूप में वर्णित करता है। परमेश्वर को महिमा देने के स्थान पर, उसकी महिमा को सृष्टि की वस्तुओं की प्रतिमाओं और रूपों की महिमा के साथ परिवर्तित कर दिया जाता है। ऐसा करने वाला व्यक्ति “परमेश्वर की सच्चाई के बदले झूठ को अपनाया और सृष्टि की आराधना और सेवा की- न कि उस सृष्टिकर्ता की जो सर्वदा धन्य है, आमीन।” (रोमियों 1:25)

परमेश्वर की महिमा को मूर्तियों के साथ बदल देना ऐसा है मानो किसी तराजू पर परमेश्वर का मूल्य आँका जा रहा हो। परमेश्वर की महिमा (उसका अनन्त महत्व, मूल्य और सत्त्व) को देखने के स्थान पर उपासक यह ठहराता है कि वह किसी सृष्ट वस्तु से भी कम मूल्यवान है, जबकि सृजित वस्तुएँ उसकी तुलना में हल्की और खोखली हैं। ऐसी अदला-बदली मूर्खता की पराकाष्ठा है। कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति तराजू पर एक हाथी और एक पंख को देखकर यह निष्कर्ष निकाले कि पंख का वजन हाथी से अधिक है। स्पष्ट है कि ऐसा व्यक्ति वास्तविकता से पूरी रीति से दूर है। कोई ऐसा कैसे सोच सकता है? हम परमेश्वर के स्थान पर किसी मूर्ति को कैसे रख सकते हैं? केवल तभी, जब हम परमेश्वर के विषय में सत्य को झूठ से परिवर्तित कर दें। जब हम परमेश्वर के उस प्रकाशन को दबा देते हैं जिसमें उसने स्वयं को हमारे सामने प्रकट किया है, तब हम त्रुटिपूर्ण निष्कर्षों पर पहुँचते हैं (रोमियों 1:18)। 

मूर्तिपूजा से बचने और परमेश्वर की सच्ची आराधना को बढ़ावा देने के लिए, प्रभु हमें अपने वचन में यह आज्ञा देता है:

“मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूं, जो तुझे मिस्र देश अर्थात् दासत्व के घर से निकाल ले आया।
तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना। (निर्गमन 20:2–3) 

यह चिर-परिचित वचन जानबूझकर दस आज्ञाओं के आरम्भ में रखा गया है। हमें किसी भी व्यक्ति या वस्तु को परमेश्वर के उस सर्वोच्च स्थान पर अधिकार करने नहीं देना चाहिए, जो केवल उसी का है। 

परन्तु बाइबल में हमें बार-बार क्या देखने को मिलता है? निर्गमन की पुस्तक में भी, जिन लोगों को परमेश्वर ने मिस्र की दासता से छुड़ाया था, उन्हीं लोगों ने अपने सोने से एक बछड़ा बनाकर उसकी आराधना की (निर्गमन 32)। बाद में, राजा यारोबाम ने यह डरते हुए कि कहीं उसका राज्य उससे न छिन जाए, उसी प्रकार की मूर्तिपूजा को दोहराया और अपनी ओर से आराधना की एक नई व्यवस्था बना ली। परमेश्वर का सम्मान छोड़कर  उन्होंने अपनी ही बनाई हुई वस्तुओं की आराधना की: “हे इस्राएल के लोगों, अपने देवताओं को देखो जो तुम्हें मिस्र देश से निकाल लाए हैं।” (1 राजा 12:28) ये प्रसिद्ध घटनाएँ हमारे लिए चमकती हुई चेतावनी हैं, जो हमें मूर्तिपूजा से दूर रहने के लिए सचेत करती हैं। परमेश्वर मूर्तिपूजा से घृणा करता है क्योंकि वह अपनी महिमा से प्रेम रखता है। और परमेश्वर अपनी महिमा से प्रेम रखता है। और वह अपनी महिमा से इसलिए प्रेम करता है, क्योंकि वही उत्तम और उचित है।  

बहुतों ने देखा है कि पहली आज्ञा शेष नौ आज्ञाओं की नींव है। अन्य आज्ञाओं की अवज्ञा करना वास्तव में सच्चे परमेश्वर से फिरकर किसी मूर्ति की आराधना करना है। यह दिखाता है कि मूर्तिपूजा वास्तव में कितने विविध रूप धारण कर सकती है। हम सम्भवत: यह विचार कर सकते हैं कि मूर्तिपूजा का अर्थ केवल किसी वास्तविक मूर्ति के समाने झुकना है, परन्तु इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि आप किसी ऐसे वस्तु की लालसा करते हैं जो आपके पास नहीं है, परन्तु किसी दूसरे के पास है (देखें, निर्गमन 20:17)।

जब हम मसीही बनते हैं, तब हम मूर्तियों को छोड़कर जीवित परमेश्वर की सेवा करने लगते हैं (1 थिस्सलुनीकियों 1:9)। परन्तु संघर्ष वहीं समाप्त नहीं हो जाता है। हमें निरन्तर मूर्तियों से दूर फिरते रहना है (1 कुरिन्थियों 10:14) और सावधान रहना है कि न हम स्वयं मूर्तिपूजा में पड़ें और न दूसरों को उसमें पड़ने दें (1 यूहन्ना 5:21)।

प्रेरित पौलुस हमारे सामने इसका एक उपयुक्त और चुनौतीपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। जब वह अपने सेवक-साथियों की प्रतीक्षा करते हुए एथेंस नगर में घूम रहा था, तब उसने वहाँ के अनेक धार्मिक स्थलों को देखा। परन्तु वह उनकी भव्य वास्तुकला से प्रभावित नहीं हुआ। इसके विपरीत, नगर को मूर्तियों से भरा हुआ देख कर वह अपनी आत्मा में जल उठा (प्रेरितों के काम 17:16)। पौलुस परमेश्वर की महिमा के लिए इतना उत्साही था कि यह देखकर उसके भीतर धर्मी क्रोध उत्पन्न हुआ कि परमेश्वर को वह सम्मान नहीं दिया जा रहा था जिसका वह अधिकारी है। परिणामस्वरूप, वह लोगों के बीच गया और उन्हें सुसमाचार सुनाने लगा।

परमेश्वर के सम्मान के प्रति ऐसा प्रेम मूर्तिपूजा के विरुद्ध एक प्रभावशाली सुरक्षा है। इसलिए परमेश्वर के सर्वोच्च मूल्य पर बार-बार मनन कीजिए। उसकी अटल विश्वासयोग्यता, निष्कपट प्रेम, असीम अनुग्रह, अटल धार्मिकता, निष्कलंक भलाई, त्रुटिरहित बुद्धि तथा उसके अपरिवर्तनशील स्वभाव पर ध्यान लगाइए। सोचिए, उसके समान कौन है? फिर इस सत्य पर भी मनन कीजिए कि यीशु ख्रीष्ट में यही परमेश्वर आपको जानता है और आपसे प्रेम करता है।

हम प्रार्थना कर सकते हैं कि परमेश्वर हमारी सहायता करे, जिससे कि हम यह दृढ़ निश्चय करें कि हम उसे वही आदर और महिमा दें जिसका वह अधिकारी है, और ऐसी किसी भी बात से हमारे मन को बेचैनी हो जो उसकी महिमा को कम करती हो।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

एरिक रेयमण्ड

एरिक रेयमण्ड

रेव. एरिक रेयमण्ड वॉटरटाउन, मैस्सशूसेट्स में रिडीमर फेलोशिप चर्च के वरिष्ठ पास्टर हैं। वे सन्तुष्टि का पीछा करना (Chasing Contentment) के लेखक हैं।