What Is Idolatry?

मूर्तिपूजा क्या है ?

30 जुलाई 2026
How to Pursue Holiness Without Becoming Legalistic

विधिवादी बने बिना पवित्रता का अनुसरण कैसे करें 

6 अगस्त 2026
What Is Idolatry?

मूर्तिपूजा क्या है ?

30 जुलाई 2026
How to Pursue Holiness Without Becoming Legalistic

विधिवादी बने बिना पवित्रता का अनुसरण कैसे करें 

6 अगस्त 2026

प्रार्थना सभाओं की सामर्थ्य

The Power of Prayer Meetings

2 कुरिन्थियों 1:11 में एक अत्यन्त सुन्दर छोटा-सा वाक्यांश है: “तुम भी इसमें अपनी प्रार्थनाओं के द्वारा मिलकर हमारी सहायता करोगे।” एक अन्य अनुवाद इस प्रकार कहता है: “तुम तुम्हारी प्रार्थनाओं से हमारी सहायता करते हो।”

2 कुरिन्थियों 1 में इस पद का सन्दर्भ मसीही जीवन और सेवकाई में होने वाले दुःखों से सम्बन्धित है। इस पत्र में पौलुस ने अपने पाठकों के सामने जितना खुलकर अपना हृदय प्रकट किया है, उतना उसने अपनी किसी अन्य पत्री में नहीं किया। वह उस सान्त्वना का उल्लेख करता है जो उसे “दयालू पिता” और “समस्त शान्ति के परमेश्वर” से प्राप्त हुई है (2 कुरिन्थियों 1:3)।

जब वह ऐसे असहनीय दबाव में था जो उसकी सामर्थ्य से कहीं अधिक था, तब परमेश्वर ने उसे सामर्थ्य प्रदान की। वह अपनी सामर्थ्य की अन्तिम सीमा तक पहुँच चुका था; उसके धैर्य की सीमा समाप्त हो चुकी थी। वह यहाँ तक कहता है कि उसे जीवन से ही निराशा हो गई थी। कुछ लोग सोच सकते हैं कि किसी मसीही के लिए इस प्रकार बोलना उचित नहीं है, परन्तु प्रेरित पौलुस कहीं अधिक यथार्थवादी था। 

प्रत्येक मसीही के जीवन में ऐसी कठिनाइयाँ आती हैं जो हमें यह कहने के लिए विवश कर सकती हैं, “मुझे समझ नहीं आ रहा कि क्या करूँ, और मुझे नहीं पता नहीं कि मैं आगे बढ़ भी पाऊँगा या नहीं।” उस स्त्री के बारे में सोचिए जिससे यीशु मिला था और जिसे खून बहने की बीमारी थी: उसने वर्षों तक संघर्ष किया था और वैद्यों पर बहुत सारा पैसा खर्च किया था, परन्तु लाभ होने के स्थान पर उसकी दशा और भी बिगड़ती गई। क्या ऐसा नहीं हुआ होगा कि कभी-कभी उसने भी जीवन से निराशा का अनुभव किया हो?

अपने उन मसीही भाई-बहनों के संघर्षों पर भी विचार कीजिए जो असहनीय शोक से जूझ रहे हैं; जिनकी विवाह की आशाएँ कभी पूरी नहीं हुईं; जिनके परिजन गम्भीर रूप से अस्वस्थ हैं और जिनके स्वस्थ होने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती; जिन्होंने सन्तान के लिए वर्षों तक परमेश्वर से प्रार्थना की, परन्तु अभी तक उन्हें उत्तर नहीं मिला। प्रेरित पौलुस ने ऐसा गहरा क्लेश अनुभव किया कि उसके हृदय में मानो मृत्यु का दण्ड सुनाया जा चुका था।

अपने जीवन और उन क्लेशों पर विचार करते हुए जिनका वह सामना कर रहा था, पौलुस कहता है कि ये सब बातें परमेश्वर के सम्प्रभुता से बाहर नहीं थीं। वे किसी आकस्मिक घटना का परिणाम नहीं थीं। वरन् वे इसलिए हुईं कि हम अपना भरोसा स्वयं पर नहीं, अपितु उस परमेश्वर पर रखें जो मरे हुओं को भी जीवित करता है।

पौलुस के जीवन में मसीही सेवकाई के तनाव और संघर्ष ही उसे उसकी सामर्थ्य की अन्तिम सीमा तक ले आए थे। और ठीक उसी सीमा पर पहुँचकर उसने जाना कि अपने-आप वह इन सबका सामना नहीं कर सकता। इसके विपरीत, परमेश्वर की सामर्थ्य पर निर्भर रहकर वह इन सबका सामना कर पाया।

मुझे नहीं लगता कि हम पूरी तरह से इस बात से अवगत हैं कि स्वंय पर निर्भर रहने का प्रलोभन कितना निरन्तर हमारे सामने बना रहता है। अनेक दृष्टियों से यही मसीही जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष है। प्रतिदिन स्वयं को स्मरण दिलाना कि हम अपने सम्पूर्ण हृदय से प्रभु पर भरोसा रखें और अपनी समझ का सहारा न लें (नीतिवचन 3:5), एक सतत संघर्ष है। मैं स्वयं भी कई बार इस झूठ पर विश्वास करने लगता हूँ कि यदि मैं पर्याप्त प्रयास करूँ या अपने भीतर पर्याप्त इच्छाशक्ति उत्पन्न कर लूँ, तो मैं सब कुछ कर सकता हूँ।

मसीही जीवन का सबसे बड़ी रुकावट सन्देह नहीं है। कभी-कभी सन्देह करना काफी लाभदायक भी हो सकता है। यदि हम अपने सन्देहों का उचित रीति से सामना करें, तो वे हमारे विश्वास को और दृढ़ कर सकते हैं। परन्तु जो बात हमारे विश्वास को नष्ट कर देती है, वह है आत्मनिर्भरता।

परिक्षाओं, प्रलोभनों और संघर्षों का एक उदेश्य यह भी है कि वे हमें स्मरण दिलाएँ कि हमे स्वयं पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। एक ऐसा परमेश्वर है जो सामर्थी है, जिसकी सर्वसामर्थी सामर्थ्य  कब्र तक पहुँचकर मरे हुओं को भी जीवित कर सकती है। परीक्षाएँ हमारे जीवन में आकर हमारी आत्मनिर्भरता के भ्रम को तोड़ देती हैं। मसीही जीवन में बार-बार हम ऐसी स्थिति में पहँच जाते हैं जहाँ हमें स्वीकार करना पड़ता है कि केवल प्रभु ही यह कार्य कर सकता है।

2 कुरिन्थियों 1 में पौलुस पहले ही अपनी पत्री के मुख्य विषय की भूमिका बाँध रहा है कि परमेश्वर की सामर्थ्य दुर्बलता में दिखाई देती है। इसी सन्दर्भ में वह यह भी कहता है कि इस कलीसिया की प्रार्थनाओं ने उसकी सहायता की है। परमेश्वर की सार्वभौमिक योजना में , परमेश्वर के लोगों की प्रार्थनाओं ने उसे दृढ़ बने रहने में समर्थ बनाया।

प्रायः जब हम प्रार्थना के विषय में सोचते हैं, तो उसे केवल व्यक्तिगत दुष्टि से देखते हैं। परन्तु यहाँ पौलुस कहता है कि परमेश्वर के लोगों की सामूहिक प्रार्थनाओं ने उसकी सहायता की है। जैसे कुरिन्थुस की कलीसिया ने मिलकर प्रार्थना की (मूल भाषा स्पष्ट करती है कि यहाँ बहुवचन का प्रयोग हुआ है, एकवचन का नहीं), तब उनकी प्रार्थनाएँ उसके लिए आशीष का कारण बनीं। परिणामस्वरूप,बहुत  से लोग पौलुस और उसके सहकर्मी सेवकों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद देंगे।

एक कलीसिया के रूप में एक साथ प्रार्थना करना अत्यन्त उत्साहवर्धक है। मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरियों में से एक यह है कि जब मैं किसी परिस्थिति के सामने स्वयं को असहाय अनुभव करता हूँ, तो सोचने लगता हूँ, “मैं तो केवल प्रार्थना ही कर सकता हूँ,” मानो प्रार्थना करना कोई दूसरा या कम महत्वपूर्ण उपाय हो। हम प्रायः प्रत्यक्ष रूप से सहायता करना चाहते हैं, और अनेक अवसरों पर हम ऐसा कर भी सकते हैं। परन्तु कई बार मैं स्वयं को यही सोचते हुए पाता हूँ,“मैं तो केवल प्रार्थना ही कर सकता हूँ।” हमें यह समझने की आवश्यक्ता है कि हमारी प्रार्थनाएँ वास्तव में सहायता करती हैं। परमेश्वर की सम्प्रभुता में हमारे भाई-बहन हमारी प्रार्थनाओं के कारण दृढ़ बने रहते हैं।

यदि हम कलीसिया के रुप में अपनी प्रार्थनाओं की सामर्थ्य को देख पाते—कि हमारी प्रार्थनाएँ एक-दूसरे को सम्भालती हैं, एक दूसरे की सहायता करती हैं और एक-दूसरे को दृढ़ बनाए रखती हैं—तो इससे हमें संघर्ष कर रहे मसीहियों के लिए और अधिक प्रार्थना करने का प्रोत्साहन मिलता जो समस्याओं से जूझ रहे हैं। पास्टर और लेखक जेफ्री विल्सन इस पद के विषय में कहते हैं, “हम किसी ऐसे नाटक के निष्क्रिय दर्शक नहीं हैं जिसमें हमारी कोई भूमिका न हो।”

जब हम प्रार्थना सभा में एकत्र होते हैं, तब हम परमेश्वर की योजनाओं में सहभागी होते हैं। इसमें एक गहन रहस्य निहित है, परन्तु यह सत्य है कि हमारी प्रार्थनाएँ ख्रीष्ट में हमारे भाई-बहनों की सहायता करती हैं और परमेश्वर के अनन्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसके द्वारा उपयोग की जाती हैं।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

पॉल लेवी

पॉल लेवी

रेव पॉल लेवी पश्चिम लंदन में इन्टर्नैश्नल प्रेस्बिटेरियन चर्च में सेवक हैं।