Why Reformed Soteriology Matters?

धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान क्यों महत्व रखता है

26 मई 2026
Why Reformed Soteriology Matters?

धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान क्यों महत्व रखता है

26 मई 2026

पहला विवाद: ऑगस्टीन बनाम पेलेजियस

The First Controversy Augustine vs Pelagius

प्रारम्भिक कलीसिया में उद्धार के धर्मसिद्धान्त से सम्बन्धित सबसे महत्वपूर्ण विवाद पेलेजियसवादी विवाद था। पाँचवीं शताब्दी का यह विवाद इतना प्रभावशाली था कि इसके परिणामों ने इसके पश्चात होने वाली प्रत्येक वाद-विवाद को आकार दिया—यहाँ तक कि सोलहवीं शताब्दी के धर्मसुधार (Reformation) के उद्धारविज्ञान सम्बन्धी वाद-विवादों को भी। इस विवाद के एक पक्ष में पेलेजियस, सेलेस्टियस तथा एक्लेनम के जूलियन जैसे व्यक्ति थे। दूसरे पक्ष में ऑगस्टीन और जेरोम जैसे प्रमुख व्यक्ति खड़े थे। विवाद के बाद के चरण में जॉन कैसियन ने एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया  जिसे बाद में “अर्ध-पेलाजियवाद” कहा जाने लगा। किन्तु हमारे उद्देश्य के लिए, हम मुख्य रूप से मूल प्रमुख व्यक्तियों की सबसे महत्वपूर्ण शिक्षाओं पर ध्यान केन्द्रित करेंगे।

पेलेजियस कौन था?

पेलेजियस एक मठवासी था, तथा पेलेजियसवाद विवाद की पृष्ठभूमि को समझने के लिए मठवाद (Monasticism) के विषय में कुछ जानना आवश्यक है। तीसरी शताब्दी में एक मसीही वैरागी आन्दोलन आरम्भ हुआ, जिसने आगे चलकर मठवाद का रूप धारण किया। मठवासी, चाहे अकेले रहते हों या समुदायोंं में, कठोर वैरागी जीवन अपनाते थे, जिसका उद्देश्य उनके उद्धार की प्राप्ति में सहायता करना था। वैराग्यवाद में अनेक प्रकार की ऐसी प्रथाएँ निहित थीं जिनका उद्देश्य मठवासियों को शारीरिक इच्छाओं पर आत्म-नियंत्रण पाने में सहायता करना था, जिससे कि मनुष्य का परमेश्वर के साथ मिलन हो सके। 

ऑगस्टीन ने मठवासी प्रथाओं को पूर्णतः अस्वीकार नहीं किया, किन्तु अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कन्फेशन्स के दसवें भाग में उसने यह प्रसिद्ध प्रार्थना लिखी: “जो तू आज्ञा देता है, उसे पूरा करने की सामर्थ्य भी दे; और फिर जो चाहे आज्ञा दे।” यह परमेश्वर से की गई एक विनती थी कि वह ऑगस्टीन को अपनी आज्ञाओं का पालन करने की सामर्थ्य प्रदान करे। पेलेजियस का मानना था कि इस तरह की प्रार्थना, कठोर आत्म-अनुशासन वाली सम्पूर्ण मठवासी जीवनशैली को ही निर्बल कर देती है, क्योंकि इससे आलसी मठवासियों को परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन न करने का बहाना मिल जाता है: “यह परमेश्वर की त्रुटि है। उसने मुझे वह अनुग्रह ही नहीं दिया, जिससे मैं उसकी आज्ञा का पालन कर पाता।” इसलिए, पेलेजियस ने ऑगस्टीन के इस विचार को अस्वीकार कर दिया।

पेलेजियस द्वारा ‘मूल पाप’ का अस्वीकार

इस विवाद की जड़ को समझने के लिए, पेलेजियस (और सेलेस्टियस) की कुछ मूल शिक्षाओं को समझना भी आवश्यक है। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पेलेजियस ने “मूल पाप” के सभी विचारों को अस्वीकार कर दिया। उसने लम्बे समय तक मैनिकियों के साथ वाद-विवाद करता रहा, जो यह सिखाते थे कि मनुष्य अपने स्वभाव से भृष्ट होते हैं क्योंकि उनके पास भौतिक शरीर है। इसके उत्तर में पेलेजियस ने तर्क दिया कि मनुष्य अपने स्वभाव से अच्छे हैं, क्योंकि उनकी सृष्टि परमेश्वर ने की हैै। 

जब पेलेजियस ने ऑगस्टीन जैसे शिक्षकों को यह कहते सुना कि मनुष्य को अच्छा बनाया गया था, किन्तु आदम के पतन के परिणामस्वरूप उनका स्वभाव भ्रष्ट हो गया, तो उसे यह शिक्षा मैनिकीवाद के बहुत निकट प्रतीत हुआ। इसके प्रत्युत्तर में पेलेजियस ने कहा कि आदम के पाप का प्रभाव केवल तक सीमित था। उसका तर्क था कि हम आदम का अनुकरण करके पाप करते हैं, परन्तु ऐसा इसलिए नहीं कि हमारा स्वभाव भ्रष्ट हो गया है। वरन्, आदम की सन्तान होने के कारण हम पाप करने का व्यसन अनुकरण द्वारा सीख लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे बच्चे स्वाभाविक रूप से अपने माता-पिता की व्यवहार और बोलचाल की रीति को अपना लेते हैं। समय के साथ, पाप करने का व्यसन किसी उच्चारण या लहजे की तरह, गहराई से हमारे जीवन में जड़ पकड़ लेती  है। 

अनुग्रह के विषय में पेलेजियस का अनोखा दृष्टिकोण

पेलेजियस इस बात को नकारता था कि उसके दृष्टिकोण में उद्धार के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का कोई स्थान नहीं है। परन्तु उसका अनुग्रह सम्बन्धी दृष्टिकोण समझना कठिन है, क्योंकि वह अनुग्रह की अन्य सभी शिक्षाओं से चाहे वे रोमन कैथोलिक हों या प्रोटेस्टेन्ट हो, बहुत भिन्न था। 

सबसे पहले, पेलेजियस के अनुसार, पवित्रशास्त्र में परमेश्वर द्वारा दिया गया प्रकाशन स्वयं एक अनुग्रह का वरदान है। परमेश्वर हमारे लिए अपनी व्यवस्था प्रकट करने के लिए बाध्य नहीं था। दूसरा, यीशु का दिया जाना भी अनुग्रह है। अब हमारे पास अनुकरण करने के लिए एक नया आदम है। यदि हम यीशु का अनुकरण करें, तो हम धीरे-धीरे आज्ञाकारिता नई आदत विकसित करते हैं, और क्योंकि ख्रीष्ट निष्पाप था, इसलिए यदि हम सही चुनाव करें, तो हम भी निष्पापता प्राप्त कर सकते हैं।

तीसरी, तथा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारा स्वयं का मानवीय स्वभाव स्वयं एक अनुग्रहपूर्ण वरदान है। हमने अपनी रचना किए जाने की कोई माँग नहीं की थी। हमारे स्वभाव का एक भाग यह क्षमता है कि हम भले और बुरे में से किसी एक को चुन सकें। यह क्षमता परमेश्वर का दिया हुआ ऐसा वरदान है जिसे हमने न तो अर्जित किया है और न ही उसका कोई अधिकार पाया है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक हमें स्वतन्त्र इच्छा दी, जिसके द्वारा हम आदम के स्थान पर यीशु का अनुकरण करने का चुनाव कर सकते हैं। इस प्रकार, पेलेजियस भी यह दावा करता कि वह विश्वास करता है कि उद्धार अनुग्रह के द्वारा ही है।

ऑगस्टीन का प्रतिउत्तर 

ऑगस्टीन ने उत्तर देते हुए कहा कि पेलेजियस मानवजाति की समस्या के वास्तविक स्वरूप को पूरी रीति से समझने में असफल रहा, और परिणामस्वरूप वह समाधान को भी सही प्रकार से नहीं समझ पाया। मूल पाप और आदम के पतन के कारण मानव स्वभाव में आई भ्रष्टता को अस्वीकार करके, पेलेजियस ने अनु्ग्रह का ऐसा धर्मसिद्धान्त निर्मित किया जो वास्तव में अनुग्रह था ही नहीं। ऑगस्टीन ने इस बात पर बल दिया कि आदम के पतन से पहले और उसके बाद की मानव अवस्था में बहुत बड़ा अन्तर है। उसने यह भी सिखाया कि आदम का भ्रष्ट स्वभाव उसकी सारी सन्तानों में चला आता है। ऑगस्टीन के लिए, अनुग्रह एक ऐसा दान है जो उन पापियों को दिया जाता है जो इसके योग्य नहीं हैं। 

यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि ऑगस्टीन ने अनुग्रह के धर्मसिद्धान्त को इस प्रकार विकसित करना आरम्भ किया, जिसने आगे चलकर मध्यकालीन कलीसियाई-याजकीय उद्धारविज्ञान (ecclesio-sacerdotal system of soteriology) के विकास में योगदान दिया, जो आज रोमन कैथोलिक मत की पहचान बन गया है। परन्तु यहाँ हमारे उद्देश्य के लिए, पेलेजियसवादी विवाद का मुख्य बिन्दु मूल पाप के धर्मसिद्धान्त की बाइबलीय सत्यता पर दृढ़ता से बल देना था। इसे 529 ईस्वी में हुई काउन्सल ऑफ ऑरेन्ज (Council of Orange) के नियमों में विस्तारपूर्वक स्पष्ट किया गया।

यदि समस्या का सही निदान नहीं किया जाता, तो समाधान (अर्थात उद्धार के धर्मसिद्धान्त) को सही प्रकार से समझना असम्भव हो जाता है।

 अगले लेख में, हम देखेंगे कि किस प्रकार रोम ने, मूल पाप के धर्मसिद्धान्त को स्वीकार करने बाद भी, मनुष्य की समस्या के एक अन्य दृष्टिकोण को त्रुटिपूर्वक समझने के कारण एक विकृत उद्धारविज्ञान विकसित कर लिया।यता करता है जिन्होंने शताब्दियों से कलीसिया को प्रलोभित किया है। केवल परमेश्वर की महिमा (सोली डिओ ग्लोरिया)!

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

किथ मैथिसन

किथ मैथिसन

डॉ. कीथ ए. मैथिसन, फ्लोरिडा के सैनफोर्ड में स्थित रिफॉर्मेशन बाइबल कॉलेज में व्यवस्थित ईश्वरविज्ञान के प्रोफेसर हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें द लॉर्ड्स सपर: आन्सर्स टू कॉमन क्वेश्चन्स भी सम्मिलित है।