
पवित्रशास्त्र में उद्धार
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28 मई 2026धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान क्यों महत्व रखता है
जैसा कि हमने लेखों की इस संक्षिप्त शृंखला के में देखा है, एक बाइबलीय रूप से विश्वासयोग्य उद्धार-विज्ञान को बनाए रखना कोई ऐसी बात नहीं जिसे स्वतः ही सुरक्षित मान लिया जाए। पुराने नियम में, अनेक इस्राएलियों ने मूसाई वाचा के स्वभाव को गलत समझा और उद्धार के विषय में व्यवस्थावादी समझ में पड़ गए। कुछ लोग तो खुले रूप से मूर्तिपूजा में भी गिर गए। अपनी सेवकाई के समयकाल में पौलुस ने यह देखकर आश्चर्य व्यक्त किया कि जिन लोगों को उसने स्वयं शिक्षा दी थी, वे कितनी शीघ्रता से एक भिन्न सुसमाचार की ओर मुड़ रहे थे (गला. 1:6)।
आरम्भिक कलीसिया में, पेलागियसवाद और अर्ध-पेलागियसवाद एक ऐसी समस्या बन गए जो वास्तव में कभी पूर्णतः समाप्त नहीं हुई। यद्यपि प्रारम्भ में दोनों को अस्वीकार किया गया था, फिर भी चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते, तो अर्ध-पेलागियसवाद प्रमुख विचारधारा बन चुका था, और कुछ लोग पूर्ण पेलागियसवाद की ओर भी झुक रहे थे। विभिन्न अन्यजातीय विचारों के प्रभाव में, उद्धार को मानव स्वभाव की उस उन्नति के रूप में समझा जाने लगा जो रोमन कैथोलिक कलीसिया के नियुक्त याजकवर्ग द्वारा संस्कारों के प्रशासन के माध्यम से सम्पन्न होती थी। मध्यकालीन युग में इस कलीसियाई-याजकीय उद्धारविज्ञानिय प्रणाली ने बाइबलीय उद्धारविज्ञान को पूरी तरह विस्थापित कर दिया। आज भी, धर्मीकरण का बाइबलीय सिद्धान्त निरन्तर आक्रमणों का सामना कर रहा है और उसे या तो अस्वीकार किया जा रहा है या उसमें संशोधन किया जा रहा है।
1. धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान इसलिए महत्व रखता है क्योंकि यह बाइबलीय शिक्षा के प्रति विश्वासयोग्य बना रहता है।
यह शिक्षा कार्यों द्वारा उद्धार और अनुग्रह द्वारा उद्धार के बीच के अंतर पर बल देती है और उसे दृढ़ता से बनाए रखती है। यह पेलागियसवाद और अर्ध-पेलागियसवाद के विचारों की ऑगस्टीनवादी अस्वीकृति को दृढ़ता से थामे रहती है। इसने धर्मीकरण की उस सत्तामूलक अवधारणा को भी अस्वीकार किया जो रोमन कैथोलिक कलीसिया में घुस प्रवेश कर चुकी थी, और परमेश्वर के उद्धारकारी अनुग्रह की बाइबलीय वाचात्मक समझ की ओर लौट आई।
2. धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान इसलिए महत्व रखता है क्योंकि यह सैकड़ों धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञानिकों और सेवकों के दशकों तक चले गहन और व्यापक व्याख्यात्मक परिश्रम में जड़ा हुआ है।
यह कोई ऐसी बात नहीं थी जो किसी एक अनजान प्रभावशाली व्यक्ति ने बिना सोचे-समझे प्रस्तावित कर दी हो। सावधानीपूर्वक किए गए दशकों के व्याख्यात्मक परिश्रम के परिणामस्वरूप एक व्यापक वाचा का ईश्वरविज्ञान सामने आया जिसने पतन-पूर्व अवस्था और पतन-पश्चात अवस्था के बीच के अंतर को अत्यन्त स्पष्ट कर दिया। इसने कलीसिया को कार्य और अनुग्रह के बीच तथा व्यवस्था और सुसमाचार के बीच की बाइबलीय भिन्नता को पुनः स्मरण कराया।
3. धर्मसुधारवादी उद्धार-विज्ञान इसलिए भी महत्व रखता है क्योंकि यह ईश्वरविज्ञान के प्रत्येक विषयों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
यह त्रिएकता के सिद्धान्त, ईश्वरीय आज्ञप्ति, सृष्टि, ईश्वरीय प्रबन्ध, मनुष्य और पतन के सिद्धान्त, ख्रीष्ट के व्यक्ति और कार्य, उद्धार के लागू होने के क्रम, कलीसिया और उसके संस्कारों, तथा अंतिम दिनों के बीच बाइबलीय सम्बन्धों को बनाए रखता है। उदाहरण के लिए, आर्मीनियाई उद्धारविज्ञान के विपरीत, धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान अपनी ईश्वरविज्ञानिक पद्धति में कोई असंगति या आत्म-विरोध उत्पन्न नहीं करता। यह ऐसा नहीं सिखाता कि उद्धार के विषय में पिता की इच्छा कुछ और हो और पुत्र की इच्छा उससे बिल्कुल भिन्न।
4. अंततः, धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान इसलिए महत्व रखता है क्योंकि सुसमाचार महत्व रखता है।
आदम और हव्वा के सभी पुत्र-पुत्रियाँ पाप में मृत जन्म लेते हैं, और जब तक कि परमेश्वर कुछ न करे परमेश्वर के शत्रु, और आशाहीन अवस्था में होते हैं। परन्तु परमेश्वर का धन्यवाद हो, उसने यीशु ख्रीष्ट के व्यक्ति और कार्य में और उसके द्वारा कुछ किया, और अब हम इस सुसमाचार का प्रचार करने के लिए बुलाए गए हैं। पौलुस कुरिन्थियों को लिखी अपनी पहली पत्री में इस सुसमाचार का सार प्रस्तुत करता है। यह वह संदेश है—
कि ख्रीष्ट हमारे पापों के लिए पवित्रशास्त्र के अनुसार मरा, कि वह गाड़ा गया, कि तीसरे दिन पवित्रशास्त्र के अनुसार जी उठा, और कि वह कैफा को, फिर उन बारहों को दिखाई दिया। फिर वह एक साथ पाँच सौ से अधिक भाइयों को दिखाई दिया, जिनमें से अधिकांश अब तक जीवित हैं, यद्यपि कुछ सो गए हैं। फिर वह याकूब को, फिर सब प्रेरितों को दिखाई दिया। (1 कुरि. 15:3–7)
यीशु ही खोई हुई मानवजाति के उद्धार का एकमात्र मार्ग है। उसके बिना कोई भी पिता के पास नहीं आ सकता (यूहन्ना 14:6)।
जैसा कि डॉर्ट के नियम में स्पष्ट किया गया है:
सुसमाचार की प्रतिज्ञा यह है कि जो कोई क्रूस पर चढ़ाए गए ख्रीष्ट पर विश्वास करता है वह नष्ट न होगा, परन्तु अनन्त जीवन पाएगा। इस प्रतिज्ञा को, मन फिराने और विश्वास करने की आज्ञा सहित, उन सभी जातियों और लोगों के बीच घोषित और प्रचारित किया जाना चाहिए जिनके पास परमेश्वर अपनी भली इच्छा से सुसमाचार भेजता है। (सेकंड हेड ऑफ डॉक्ट्रिन, आर्टिकल फाइव )
धर्मसुधारवादी उद्धारविज्ञान इसलिए महत्व रखता है क्योंकि यह हमें इस बाइबलीय सुसमाचार को दृढ़ता से थामे रहने के लिए बाध्य करता है और उन अनेक खतरों से बचने में सहायता करता है जिन्होंने शताब्दियों से कलीसिया को प्रलोभित किया है। केवल परमेश्वर की महिमा (सोली डिओ ग्लोरिया)!
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

