How to Read the Psalms of Ascents?

यात्रा के (भजनों) गीतों को कैसे पढ़ें

11 जून 2026
How to Read the Psalms of Ascents?

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11 जून 2026

कार्यों की वाचा क्या है?

What Is the Covenant of Works?

कार्यों की वाचा में, जिसे कभी-कभी सृष्टि की वाचा या जीवन की वाचा भी कहा जाता है, परमेश्वर ने आदम और हव्वा को भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खाने से मना किया था (उत्पत्ति 2:15–17)। इस वाचा के प्रति पूर्ण आज्ञाकारिता आदम और हव्वा को जीवन में स्थिर करती; वे प्रभु की दृष्टि में धर्मी गिने जाते और अनन्त जीवन के उत्तराधिकारी बनते।

हम आदम के साथ की गई इस वाचा को “कार्यों की वाचा” कहते हैं, क्योंकि आशीष प्राप्त करने का साधन मानवीय प्रयास था। फलवन्त होने, पृथ्वी पर अधिकार करने, और वर्जित वृक्ष से दूर रहने की आज्ञा का पालन करने के अच्छे कार्य आदम और उसके वंश के लिए अनन्त जीवन का अधिकार प्राप्त करते (उत्पत्ति 1:28; 2:15–17)।

जैसा कि हम जानते हैं, आदम और हव्वा ने कार्यों की वाचा को तोड़ दिया, जिसके परिणामस्वरूप स्वयं को और अपनी समस्त सन्तान को—एक को छोड़कर, अर्थात् यीशु को—पाप में गिर दिया। आदम में हमने कार्यों की वाचा को पूरा करने की अपनी सामर्थ्य खो दी (रोमियों 3:9–20), परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह वाचा समाप्त कर दी गई। हम आज भी उसकी शर्तों के अधीन हैं, किन्तु अपनी अक्षमता के कारण हमारी एकमात्र आशा यह है कि कोई और हमारे स्थान पर उसे पूरा करे (गलातियों 3:10–14)।

अपने लोगों के लिए फिर से स्वर्ग प्राप्त करने हेतु, यीशु को दूसरा आदम बनना आवश्यक था। अर्थात्, उसे हमारे समान मनुष्य बनकर आना था जिससे कि वह परमेश्वर की पूर्ण आज्ञाकारिता कर सकें और हमारे प्रतिनिधि के रूप में वहाँ सफल हों जहाँ आदम असफल हुआ था। पौलुस इस शिक्षा को स्पष्ट रूप से सिखाता है (1 कुरिन्थियों 15:45), परन्तु यह शिक्षा समदर्शी सुसमाचारों (synoptic Gospels) में वर्णित यीशु की परीक्षा की घटनाओं में भी निहित है।

अपने बपतिस्मा के पश्चात्, यीशु जंगल में ले जाया गया, जहाँ उसका सामना उससे हुआ जिसने सर्प के द्वारा आदम को प्रलोभन में डाला था। पहले आदम को यह प्रलोभन दिया गया कि वह प्रभु की प्रकट की हुई इच्छा पर निर्भर रहने के स्थान पर अपनी बुद्धि पर भरोसा करे। उसी प्रकार दूसरे आदम को भी परमेश्वर की इच्छा को छोड़ने के लिए प्रलोभित किया गया—अर्थात् यह कि वह दुःख सहकर सर्प को पराजित करे—जब शैतान ने यीशु को गलत समय पर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करने या बिना दुःख उठाए तुरन्त अपने राज्य में प्रवेश करने के लिए उकसाया (मत्ती 4:1–11)। किन्तु पहले आदम के विपरीत, यीशु ने शैतान की परीक्षा पर विजय पाई, और इस प्रकार क्रूस पर उसकी अन्तिम पराजय की नींव रखी (कुलुस्सियों 2:13–15)।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

लिग्निएर संपादकीय

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हम डॉ. आर. सी. स्प्रोल का शिक्षण संघ हैं। हम इसलिए अस्तित्व में हैं ताकि हम जितने अधिक लोगों तक सम्भव हो परमेश्वर की पवित्रता को उसकी सम्पूर्णता में घोषित करें, सिखाएं और रक्षा करें। हमारा कार्य, उत्साह, और उद्देश्य है कि हम लोगों को परमेश्वर के ज्ञान और उसकी पवित्रता में बढ़ने में सहायता करें।