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वेस्टमिन्स्टर सभा (1643–53) इंग्लैण्ड में गहन धार्मिक और राष्ट्रीय उथल-पुथल के समय में बुलाई गई थी और उसने कुछ महत्त्वपूर्ण ईश्वरविज्ञानिय मानक तैयार किए—विशेष रूप से वेस्टमिन्स्टर अंगीकार-वचन और दीर्घ तथा लघु प्रश्नोत्तरी (Catechisms)—जिनका प्रभाव और महत्त्व आज भी विश्वभर में बना हुआ है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
जब इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स प्रथम और संसद के बीच गृहयुद्ध (1642–51) का आरम्भ हुया, तब इंग्लैण्ड की कलीसिया अत्यन्त अव्यवस्थित स्थिति में थी। यद्यपि 1559 ईस्वी में रानी एलिज़ाबेथ प्रथम के शासनकाल में विया मिडिया (“मध्य मार्ग”) स्थापित किया गया था—जो प्रोटेस्टेंट ईश्वरविज्ञान और रोमन कैथोलिक रूप के बीच का एक समझौता था, जिसमें शासन-पद्धति, रूप-रंग और धार्मिक प्रथाएँ रोम से ग्रहण की गई थीं—पर यह समझौता सत्रहवीं शताब्दी तक चलता रहा। इसी कारण, बहुत से लोगों ने इंग्लैण्ड की कलीसिया को उसके रोमन कैथोलिक अवशेषों से शुद्ध करने का प्रयास किया; इन्हें तब भी और आज भी “शुद्धतावादी” (प्यूरिटन) कहा जाता है।
शुद्धतावादीयों की इच्छा थी कि इंग्लैण्ड की कलीसिया को बाइबलिय उपासना और धार्मिक आचरण में सुधार मिले, जिससे कि प्रोटेस्टेंट ईश्वरविज्ञान को मसीही जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में निरन्तरता से लागू किया जा सके। क्योंकि अनेक शुद्धतावादीयों ने इंग्लैण्ड की कलीसिया की बुक ऑफ कॉमन प्रेयर में निर्दिष्ट उपदेशों, प्रार्थनाओं और आराधना-विधियों को अस्वीकार कर दिया, इसलिए वे “असहमति रखने वाले” (dissenters) और “असमरूपी” (nonconformists) कहलाए
सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ तक, कैथोलिक झुकाव वाले पादरियों और शुद्धतावादी समूह के बीच संघर्ष समय-समय पर बढ़ता और घटता रहा, जब तक कि राजा चार्ल्स प्रथम ने अपनी राजसत्ता का अत्यधिक प्रयोग नहीं किया। सन् 1642 में, उसने संसद के विरुद्ध राजसी ध्वज उठाया, और इस प्रकार इंग्लैण्ड के गृहयुद्ध का आरम्भ हुआ। अगले ही वर्ष, संसद ने एक सभा बुलाई जिसे बहुत से लोग कलीसिया के इतिहास में अब तक की सबसे प्रतिभाशाली, ईश्वरीय, और ईश्वरवैज्ञानिक रूप से प्रखर सभा मानते हैं।
वेस्टमिन्स्टर सभा
यह सभा 121 अंग्रेज़ पादरियों, 30 सामान्य सदस्यों, और एक मताधिकार-रहित (पर अत्यंत प्रभावशाली) स्कॉटलैण्ड के प्रेस्बिटेरियन प्रतिनिधिमंड से मिलकर बनी थी, इसमें प्रमुख ईश्वरविज्ञानियों और पास्टरों में थॉमस गुडविन, एडवर्ड कैलमी, विलियम गूज, और जरेमायाह बरोज़ सम्मिलित थे, साथ ही स्कॉटलैण्ड के प्रतिनिधियों में जॉर्ज गिलेस्पी और सैमुअल रदरफोर्ड भी थे। यह सभा लंदन के वेस्टमिन्स्टर ऐबी में 1643 से 1649 तक आयोजित हुई, और इसमें एक हज़ार से अधिक सत्र आयोजित किए गए। और फिर 1653 तक समय-समय पर इसकी बैठकें चलती रहीं।
सन् 1643 में इंग्लैण्ड की संसद और स्कॉटलैण्ड के मध्य हुआ सालम लीग ऐण्ड कवेनेंट (The Solemn League and Covenant) एक सैन्य और कलीसियाई गठबन्धन का मार्ग प्रशस्त करने वाला था। इसने न केवल राजा चार्ल्स के विरुद्ध संसद की सेना को बल प्रदान किया, वरन् वेस्टमिन्स्टर मानकों (Westminster Standards) की विषयवस्तु को भी गहराई से प्रभावित किया। यद्यपि ये आलेख कलीसियाई शासन-पद्धति के दृष्टिकोण से विशेष रूप से प्रेस्बिटेरियन नहीं थे, फिर भी स्कॉटलैण्ड के प्रेस्बिटेरियन लोगों की सहायता से इन मानकों ने प्रेस्बिटेरियन (तथा स्वतंत्र आदि अन्य सुधारवादी समूहों) को धर्मसुधारवादी अंगीकार (Reformed confessionalism) के परिप्रेक्ष्य में अपनी शासन-प्रणाली का पालन करने की स्वतंत्रता दी।
वेस्टमिन्स्टर के ईश्वरविज्ञानी (या आयुक्त) अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। वे पवित्रशास्त्र, ईश्वरविज्ञान, इब्रानी और यूनानी जैसी मूल भाषाओं, तथा लैटिन में प्रवीण थे, और कलीसिया के प्राचीन पिताओं की बड़ी-बड़ी शिक्षाओं के अंशों को स्मृति से उद्धृत कर सकते थे। उन्होंने प्रारंभिक धर्मसुधारकों (जैसे लूथर, कैल्विन, ज्विंगली, नॉक्स आदि) से बहुत कुछ सीखा था, और वे धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान को चरवाही और व्यावहारिक प्रयोग में लागू करना चाहते थे। वे व्यक्तिगत और पारिवारिक आराधना के अनुशासन में सावधान रहते थे; परिवार को बाइबल के निर्देशों के अनुसार व्यवस्थित करते थे; और प्रभु के दिन (Lord’s Day) को मसीही सब्त के रूप में आदरपूर्वक मानते थे। वेस्टमिन्स्टर के ये ईश्वरविज्ञानी अनुभवात्मक मसीही जीवन और सहानुभूतिपूर्ण चरवाही भावना के लिए जाने जाते थे, परन्तु साथ ही वे विधर्मता, रोमन कैथोलिकवाद, झूठी शिक्षाओं, और पश्चातापहीन पाप के विरुद्ध अपने अडिग और समझौता न करनेवाले विश्वास में दृढ़ थे।
इस सभा की उपलब्धियाँ और महत्व
मसीही कलीसिया ने सदैव विश्वास की अंगीकार-परम्परा को आदरपूर्वक सँजोए रखा है, जिससे कि उस विश्वास को, जो एक बार पवित्र जनों को सौंपा गया था (यहूदा 3), परिभाषित किया जा सके, एकता में बाँधा जा सके, स्पष्ट किया जा सके, अन्य मतों से पृथक दिखाया जा सके, उसकी रक्षा की जा सके, और उसके लिए संघर्ष किया जा सके। ईश्वरविज्ञानिक भ्रम और असंगत उपासना के वातावरण में, वेस्टमिन्स्टर के ईश्वरविज्ञानियों ने — इंग्लैण्ड की कलीसिया के थर्टी-नाइन आर्टिकल्स तथा जेम्स अषर के आयरिश आर्टिकल्स (1615) को आधार बनाते हुए एक नवीन विश्वास-अंगीकार वचन (Confession of Faith, 1646), दीर्घ और लघु प्रश्नोत्तरी (Larger and Shorter Catechisms, 1647), और सार्वजनिक आराधना की निर्देशिका (Directory of Public Worship, 1644) तैयार किया। संसद ने यह भी आग्रह किया कि इन आलेखों के प्रत्येक कथन के लिए बाइबल से प्रमाण-पद (prooftexts) जोड़े जाएँ, जिससे सब बातें शास्त्र में दृढ़ता से आधारित रहें।
वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन को निःसंदेह इस सभा की सबसे स्थायी और महत्त्वपूर्ण उपलब्धि मानी जाती है। इसमें पवित्र शास्त्र, परमेश्वर, सृष्टि, मनुष्य-तत्व, पाप, मसीह में छुटकारा, पवित्रीकरण, कलीसिया, उपासना, विवाह, संस्कारों, और अन्तिम न्याय जैसे विषयों पर संक्षिप्त किन्तु गूढ़ ईश्वरविज्ञानिक अध्याय हैं
दीर्घ और लघु प्रश्नोत्तरी सामान्यतः उसी विश्वास-अंगीकार वचन की रूपरेखा का अनुसरण करती हैं, परन्तु इनमें दस आज्ञाओं और प्रभु की प्रार्थना पर अधिक विस्तार से शिक्षा दी गई है। इसके अतिरिक्त, जहाँ दीर्घ प्रश्नोत्तरी कलीसिया पर विशेष बल देती है, वहीं लघु प्रश्नोत्तरी काव्यक्तिगत मसीही पर ध्यान केन्द्रित करता है। दोनों को इस उद्देश्य से तैयार किया गया था कि वे ईश्वरविज्ञान की शिक्षा देने के लिए शैक्षिक उपकरण के रूप में प्रयोग हों — चाहे वह पादरी वर्ग हो या सामान्य विश्वासी, और इनमें ईश्वरीय समझ में स्पष्टता और सटीकता पर विशेष बल दिया गया है।
सार्वजनिक आराधना की निर्देशिका को आंशिक रूप से बुक ऑफ कॉमन प्रेयर में दी गई अनिवार्य आराधना-विधि के स्थान पर तैयार किया गया था, और यह पूर्णतः प्रोटेस्टेंट और धर्मसुधारवादी आराधना के सिद्धांतों पर आधारित एक व्यवस्थित मार्गदर्शिका बन गई। इस निर्देशिका में आराधना के नियमात्मक सिद्धांत, बाइबल की केंद्रीयता, बपतिस्मा और प्रभु भोज जैसे संस्कारों के उचित संचालन, और बीमारों से मिलने, उपवास रखने, तथा मृतकों के अंतिम संस्कार से संबंधित चरवाही विचारों पर विशेष बल दिया गया है।
वेस्टमिन्स्टर सभा धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान के इतिहास और प्रोटेस्टेंट मसीही धर्म के विकास में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में खड़ी है। इसकी स्थायी विरासत केवल इसकी सिद्धान्तगत शिक्षाओं में ही नहीं, वरन् इसकी कलीसियाविज्ञान और मसीही चिन्तन पर पड़े गहरे प्रभाव में भी दिखाई देती है। इस सभा का कार्य आज भी सम्पूर्ण विश्व की धर्मसुधारवादी कलीसियाओं के विश्वास और आचरण को निर्देशित करता है, जो पवित्रशास्त्र और ईश्वरविज्ञान के साथ गहन निष्ठा और सहभागिता का मूर्त प्रमाण है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

