
क्या परमेश्वर वास्तव में चिन्ता करता है?
17 मार्च 2026गम्भीर बिमारी के मध्य आशा प्राप्त करना
अपने बेटे के पाँचवें जन्मदिन पर, मैं छह सौ मील दूर एक कैंसर केन्द्र में बैठी थी, और आई वी (IV) बैग से कीमोथेरेपी को अपने शरीर में जाते हुए देख रही थी। मैं एक दुर्लभ प्रकार के कैंसर से लड़ रही थी, और नैदानिक परीक्षण की आवश्यकता के कारण मुझे कई महीनों तक अपने पति और तीन छोटे बच्चों से दूर रखा गया।
मेरी सांसारिक आशा बुरी रीति से खतरे में थी। मेरा अच्छा स्वास्थ्य चला गया था, और इस बीमारी के कारण मेरी ऊर्जा, मेरे बाल और मेरा सोचा-समझा भविष्य भी चला गया। अपने परिवार की देखभाल करने के के स्थान पर मेरे दिन प्रतीक्षालयों, रक्त चढ़ाने, चिकित्सीय जाँचों और झपकियों से भरे रहते थे। मैंने अपने बच्चों के अनमोल क्षण खो दिए तथा मैं यह भी नहीं जानती थी कि आगे और देख पाऊँगी या नहीं।
कैंसर और उसके बाद के संघर्षों के मध्य मुझे एक ऐसी आशा ही आवश्यकता थी जो मेरे स्वास्थ्य के कठिन उतार-चढ़ाव को सह सके। परमेश्वर की दया और अनुग्रह के कारण, हमारे पास एक उत्तम आशा है, जिससे हम दृढ़ता से लिपटे रह सकते हैं: हमारा प्रभु और उद्धारकर्ता यीशु ख्रीष्ट। प्रेरित पतरस ने अपनी पहली पत्री हम जैसे दुःख उठाने वाले मसीहियों को आश्वस्त करने के लिए लिखी, कि ख्रीष्ट में हमारी जीवित आशा सांसारिक परीक्षाओं से डगमगाएगी नहीं और अपने महिमामय अन्त तक स्थिर बनी रहेगी।
हमारी जीवित आशा
पतरस अपनी पत्री का आरम्भ हमारी जीवित आशा के सुसमाचार से करता है:
हमारे प्रभु यीशु ख्रीष्ट के पिता परमेश्वर की स्तुति हो, जिसने यीशु ख्रीष्ट के मृतकों में से जिला उठाने के द्वारा, अपनी अपार दया के अनुसार, एक जीवित आशा के लिए हमें नया जन्म दिया। (1 पतरस 1:3)
हम ऐसे उद्धारकर्ता के अनुयायी नहीं है जिसका शरीर अभी भी कब्र में पड़ा है। वह मृतकों में से जी उठा तथा पाप और मृत्यु पर विजय की घोषणा की है (1 कुरिन्थियों 15:54-57)। इसके अतिरिक्त, उसका पुनरुत्थान ही पुनरुत्थान की कहानी का आरम्भ है। वह पुनरुत्थान का पहिलौठा फल है, और जो उसके हैं, वे सदा जीवित रहेंगे क्योंकि वही हमारी जीवित आशा है (1 कुरिन्थियों 15:20-23)।
जब हम गम्भीर बीमारी के प्रभावों को सहते हैं, तब थक जाना और निराश होना बहुत सरल होता है। हमें ऐसा लग सकता है कि जीवन कभी फिर सामान्य नहीं होगा। ऐसे अन्धकारमय समयों में, हम उस जीवित आशा को पकड़े रह सकते हैं अर्थात् अपने उद्धारकर्ता को जिसने कब्र पर विजय पाई है। हमारे पास जीवित आशा है क्योंकि हमारे पास जीवित उद्धारकर्ता है।
हमारी अटल/ अडिग आशा
हमारा नया जन्म केवल एक जीवित आशा के लिए ही नहीं परन्तु इसलिए भी हुआ है
“कि उस उत्तराधिकार को प्राप्त करें जो अविनाशी, निष्कलंक और अमिट है और तुम्हारे लिए स्वर्ग में सुरक्षित है। तुम्हारी रक्षा परमेश्वर के सामर्थ्य के द्वारा विश्वास से उस उद्धार के लिए की जाती है जो अन्तिम समय में प्रकट होने पर है।” (1 पतरस 1:4–5)
जो लोग ख्रीष्ट के हैं, वे इस संसार के दु:खों से परे एक सुरक्षित उत्तराधिकार की ओर देख सकते हैं। वे बीमारियाँ जो निर्दयता से हमारे भौतिक देह को नष्ट करती हैं, उस उत्तराधिकार को छू भी नहीं सकतीं। वे परिस्थितियाँ जो हम पर प्रबल हो जाती हैं, उसकी अनन्त सिद्धता और पवित्रता को कम नहीं कर सकतीं। जो कुछ परमेश्वर ने हमारे लिए स्वर्ग में सुरक्षित रखा हुआ है, उसे कोई भी खतरे में नहीं डाल सकता।
हमारी महिमामय आशा
जब पतरस ने इस जीवित, अडिग आशा के विषय में लिखा, तो वह जीवन की परीक्षाओं से अनभिज्ञ नहीं था। फिर भी, पतरस हमें प्रोत्साहित करता है कि जब हम दुःखों से शोकित होते हैं तब भी आनन्दित रहें:
इस से तुम अति आनन्दित होते हो, भले ही तुम्हें अभी कुछ समय के लिए विभिन्न परीक्षाओं के द्वारा दुख उठाना पड़ा हो कि तुम्हारा विश्वास—जो आग में ताए हुए नश्वर सोने से भी अधिक बहुमूल्य है— परखा जाकर यीशु ख्रीष्ट के प्रकट होने पर प्रशंसा, महिमा, और आदर का कारण ठहरे। ( 1 पतरस 1:6-7)
परमेश्वर की प्रतिज्ञाएँ हमारी दृष्टि को अस्थायी क्लेशों से हटाकर अनन्त महिमा की ओर उठाती हैं। परमेश्वर के हमारे भीतर किए गए कार्य के कारण, दुःख के द्वारा होने वाली परीक्षा हमारे विश्वास को सच्चा सिद्ध करती है। जब ख्रीष्ट पुन: लौटेगा, तो इन परीक्षाओं के द्वारा परमेश्वर ने जो विश्वास हम में उत्पन्न किया है, वह “प्रशंसा और महिमा और आदर” का कारण ठहरेगा (1 पतरस 1:7)। यह महिमा संंकेत करती है ख्रीष्ट की महिमा को, या उस महिमा को जो हम उसके साथ पाएँगे, या दोनों की ओर । किन्तु हम जानते हैं कि हमारा भविष्य ख्रीष्ट के साथ महिमामय होगा, और यही कारण है कि हम आज दुःखों के बीच आनन्दित हो सकते हैं।
ख्रीष्ट में हमारी आशा उस समय एक दृढ़ शरण बन जाती है जब पीड़ा हमें घेर लेती है, भय हमें दबा देता है, और हमारे शरीर तथा भविष्य में आने वाले परिवर्तन हमें निरुस्साहित कर देते हैं। हमारी इस जीवित, अडिग तथा महिमामय आशा के कारण हम पतरस के साथ कह सकते हैं: “हमारे प्रभु यीशु ख्रीष्ट के पिता परमेश्वर की स्तुति हो!” (1 पतरस 1:3)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

