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19 मार्च 2026क्या परमेश्वर वास्तव में चिन्ता करता है?
निराशा की गहराइयों में या अत्याधिक चिन्ता के क्षणों में, विश्वासियों के मन में प्रायः यह प्रश्न उठता है—भले ही उनके स्वयं के हृदय में ही क्यों न हो—कि क्या परमेश्वर सच में उनकी चिन्ता करता है। यदि आप भी यह विचार कर रहे हैं, तो मेरे पास आपके लिए शुभ समाचार है।
एक समान्य प्रश्न
पहली बात, आप अकेले नहीं हैं। सम्पूर्ण इतिहास में विश्वासियों ने यह प्रश्न पूछा है। हबक्कूक नबी ने परमेश्वर की प्रजा की स्थिति—अधर्मियों द्वारा रौंदी और सताई हुई—देखा, और उसने पुकारा:
“हे यहोवा, कब तक मैं तुझे सहायता के लिए पुकारूँ और तू न सुनें? (हबक्कूक 1:2; साथ ही 1:3, 13 देखें)।
जब उन्हें ऐसे प्रतीत हुआ कि उन्हें उनकी पीड़ा का उत्तर मिलने वाला नहीं है तो भजनकारों ने परमेश्वर की चिन्ता पर प्रश्न उठाते हुए प्रायः परमेश्वर से विनती की वह “जाग उठे” (भजन 35:23, 44:23)। यद्यपि वे जानते थे कि परमेश्वर कभी सोता नहीं है (भजन 121:4), फिर भी उनके दुःख के मध्य उसकी प्रतीत होने वाली निष्क्रियता ने उन्हें यह विचार करने पर विवश कर दिया कि क्या वह सच में चिन्ता करता है।
यह संघर्ष केवल पुराने नियम तक सीमित नहीं है। निराशा के एक क्षण में, चेलों ने यीशु से पुकारकर कहा, “हे गुरु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हुए जाते हैं?” (मरकुस 4:38)। यहाँ तक कि साधारण जीवन की परिस्थितियों में भी, विश्वासी इस प्रश्न से जूझते हैं। मार्था, अपने कार्य से व्याकुल होकर, यह प्रश्न करने लगी कि क्या यीशु को इसकी चिन्ता नहीं कि वह अकेली सेवा कर रही है (लूका 10:40)। विभिन्न समयों और परिस्थितियों में, जब परमेश्वर हमारे दुःख में उतनी शीघ्रता से हस्तक्षेप नहीं करता जितनी हम आशा करते हैं (या उस दुःख को रोक नहीं देता), तब सब युगों के विश्वासियों ने उसकी चिन्ता पर प्रश्न उठाया है।
एक अद्भुत उत्तर
दूसरी बात, परमेश्वर आपको इस बात पर विचार करने के लिए अकेला नहीं छोड़ देता है कि क्या वह आपकी चिन्ता करता है। उसने अपनी चिन्ता को सबसे गहन और अद्धभुत रीति से प्रकट किया है: अपने प्रिय पुत्र को भेजकर। यहून्ना हमें यही बात बताता है जब वह लिखता है: “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया” (यूहन्ना 3:16)। इसका अर्थ है कि ख्रीष्ट इस पाप-ग्रस्त संसार में जीने की निराशा, पीड़ा और भय को पूरी रीति से समझता है और आप के साथ सहानुभूति रखने में सक्षम है (इब्रानियों 4:15)।
इससे बढ़कर, परमेश्वर की चिन्ता पवित्र आत्मा की क्रियाशीलता के द्वारा हमारे मध्य उपस्थित होती है। जब यीशु ने पवित्र आत्मा के विषय में प्रतिज्ञा की, तो उसने उसे “एक और सहायक” कहा, जो सदा तुम्हारे साथ रहेगा (यूहन्ना 14:6)। मानवीय मित्रों के विपरीत, जो थक सकते हैं या जिनका ध्यान भटक सकता है, पवित्र आत्मा सदा आपके साथ बना रहता है। वह कभी विश्राम नहीं लेता, कभी दूर नहीं हटता, और कभी आपको त्यागता नहीं। यह आपके लिए परमेश्वर की मूल वाचा की प्रतिज्ञा की पूर्ति है: “मैं तुझे कभी न छोड़ूँगा और न कभी त्यागूँगा” (व्यवस्थाविवरण 31:8; इब्रानियों 13:5)। यह तब भी सत्य है जब आपकी भावनाएँ आपको यह कहें कि आप अकेले, त्यागे हुए और परमेश्वर की देखभाल से बाहर हैं।
दुःख परमेश्वर की चिन्ता की ओर इंगित करता है
अन्तत: में, आपको यह अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर की चिन्ता का अर्थ यह नहीं है कि आप दुःख और निराशा से बच जाएँगे। किन्तु उसकी चिन्ता का अर्थ यह है कि आप उन दुःखों को सहेंगे और उनके द्वारा बढ़ेंगे भी। यह बात हमारी अपेक्षाओं से विपरीत प्रतीत हो सकती है। फिर भी परमेश्वर हमें बताता है कि दु:ख हमें नष्ट नहीं करता है किन्तु यह धैर्य, खरा चरित्र और आशा उत्पन्न करता है (रोमियों 5:3-5)।
कुछ दु:ख हमारे पिता की प्रेमपूर्ण अनुशासन के रूप में आते हैं, जो हमारे भले के लिए होते हैं (इब्रानियों 12:7-11)। इसका अर्थ है कि हमारा दुःख—भले ही वह अनुशासन के रूप में क्यों न हो—परमेश्वर द्वारा त्यागे जाने का चिन्ह नहीं है, वरन् उसकी चिन्ता का प्रमाण है।
अन्य दुःख हमें ख्रीष्ट के जीवन में सहभागी होने का अवसर देता है। पौलुस साहसपूर्वक घोषणा करता है कि हम “ख्रीष्ट के साथ सह-उत्तराधिकारी हैं, जबकि वास्तव में हम उसके साथ दु:ख उठाते हैं कि उसके साथ महिमा भी पाएँ” (रोमियों 8:17)। स्वयं ख्रीष्ट ने भी दुःख के द्वारा आज्ञाकारिता सीखी (इब्रानियों 5:8)। यदि हमें उसके समान बनना है, तो हमें भी उसी हाथ से सीखना होगा। यह कोई बोझ नहीं, किन्तु एक वरदान है—अपने उद्धारकर्ता के अनुभवों में सहभागी होने का एक विशेष सौभाग्य।
निष्कर्ष
जब आप यह सन्देह करने करने के लिए प्रलोभित होते हैं कि क्या परमेश्वर वास्तव में चिन्ता करता है, तो क्रूस की ओर देखें। वहीं परमेश्वर का प्रेम पूर्ण रूप से प्रकट हुआ है। इतना बड़ा मूल्य चुकाने के पश्चात् वह अपने लोगों को कभी नहीं त्यागना चाहेगा—वास्तव में वह उन्हें कभी नहीं त्याग सकता है। और वह इतना बड़ा मूल्य नहीं चुकाता यदि वह अपने लोगों की—आपकी—अत्यधिक चिन्ता नहीं करता। आपका दुःख इस बात का संकेत नहीं है कि परमेश्वर ने अपना अनुग्रह आपसे हटा लिया है; किन्तु यह वर्तमान में आप के भीतार उसके कार्य का प्रमाण हो सकता है।
साहस रखिए। जब सन्देह आएँ और आपका विश्वास निर्बल प्रतीत हो, तब भी वह आपको नहीं छोड़ेगा। एक दिन, जब आप शान्ति के स्थान से पीछे मुड़कर इस कठिन परीक्षा को देखेंगे, तब आप समझेंगे कि यह क्रूस पर आपकी पकड़ की दृढ़़ता नहीं थी, किन्तु कीलों से घायल ख्रीष्ट के हाथों की दृढ़का थी जो आपको उठाए हुई थी, आपको सम्भाले हुई थी, आपको दृढ़ कर रही थी, आपको कभी नहीं छोड़ रही थी और न ही त्याग रही थी।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

