What Is Monotheism?

एकेश्वरवाद क्या है?

11 अगस्त 2026
What Is Monotheism?

एकेश्वरवाद क्या है?

11 अगस्त 2026

आत्म-अनुशासन क्या है?

What Is Self-Discipline?

आप आत्म-अनुशासन का पालन कितनी अच्छी रीति से करते हैं? सम्भावना है कि आप यह लेख किसी मोबाइल उपकरण पर पढ़ रहे हों, और आज के समय में मोबाइल उपकरणों से बढ़कर आत्म-अनुशासन को हतोत्साहित करने वाली वस्तुएँ बहुत कम हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना  रुके बार-बार स्क्रीन देखते रहना हमें डोपामीन का आदी बना देता है। इससे ऐसी आदतें विकसित होती हैं जो आलस्य और काम को टालने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देती हैं। 

परन्तु थोड़ा-सा विचार करने पर हमें स्पष्ट हो जाता है कि आत्म-अनुशासन के अभाव के लिए हम अपने मोबाइल फ़ोन या संसार की किसी अन्य भौतिक वस्तुओं को दोष नहीं दे सकते। इसका उत्तरदायित्व पूर्णतः हम पर ही है; क्या इसका संकेत स्वयं आत्म-अनुशासन शब्द में नहीं निहित है?

आधुनिक बाइबिल अनुवादों में आत्म-अनुशासन शब्द दिखाई नहीं देता, परन्तु उससे अत्यन्त निकट सम्बन्ध रखने वाला शब्द आत्म-संयम अवश्य मिलता है। आत्म-संयम, अर्थात् स्वयं पर शासन करना, ईश्वर-भक्त का एक गुण है; वास्तव में, यह परमेश्वर-सदृश गुण है। जब परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि आरम्भ की, तब उसने एक निश्चित उद्देश्य और निश्चित समय-क्रम के अनुसार कार्य किया (उत्पत्ति 1)। उसने अपना कार्य अव्यवस्थित रीति से, यह जाने बिना कि अगले दिन क्या करेगा, नहीं किया और न ही चलते-चलते योजना बनाता गया। और आज भी वह उसी रीति से कार्य करता रहता है  (यूहन्ना 5:17)।

परमेश्वर अव्यवस्था का नहीं, वरन् व्यवस्था का परमेश्वर है (1 कुरिन्थियों 14:33)। हमारी संस्कृति में तत्काल प्रेरणा के अनुसार कार्य करना प्रायः अत्यन्त मूल्यवान समझा जाता है, और निश्चय ही उसके लिए उचित स्थान है; परन्तु वह सहज ही उतावलेपन और आवेगपूर्ण व्यवहार में परिवर्तित हो सकता है, जो आत्म-संयम के सर्वथा विपरीत है। इसलिए, जब आप या मैं आत्म-संयम का पालन करते हैं, तब हम अपने सृष्टिकर्ता का अनुकरण करते हैं। वास्तव में, यद्यपि यह विरोधाभासी प्रतीत हो सकता है, फिर भी हम कह सकते हैं कि जो व्यक्ति सबसे अधिक आत्म-संयमी है, वही सबसे अधिक परमेश्वर के अधीन रहने वाला व्यक्ति है। 

नए नियम में तीन ऐसे खण्ड हैं जो विशेष रूप से आत्म-संयम के महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं। 

1. 1 कुरिन्थियों 9:24–27  

पहला खण्ड 1 कुरिन्थियों 9:24–27 है। यहाँ पौलुस मसीही जीवन की तुलना मैराथन दौड़ तथा मुक्केबाज़ी की प्रतियोगिता से करता है। वह उस आत्म-संयम का वर्णन करता है जिसका पालन प्रत्येक खिलाड़ी को करना पड़ता है। हममें से बहुत-से लोग ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ खेलों को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है; इसलिए हम समझते हैं कि श्रेष्ठ खिलाड़ियों को केवल प्रतियोगिता के दिन ही नहीं, वरन् प्रत्येक दिन भोजन, व्यायाम, प्रशिक्षण और विश्राम के लिए एक कठोर नियम का पालन करना पड़ता है। 

पौलुस इस सिद्धान्त को सम्पूर्ण मसीही जीवन पर लागू करते हुए कहता है, “मैं अपनी देह को कठोर अनुशासन में रखता हूँ और उसे अपने वश में रखता हूँ, कहीं ऐसा न हो कि दूसरों को प्रचार करने के पश्चात् मैं स्वयं ही अयोग्य ठहरूँ” (1 कुरिन्थियों 9:27)। मैराथन दौड़ में भाग लेने वाले धावक के जीवन में न तो उद्देश्य का अभाव होता है और न ही प्रेरणा का। मसीही के जीवन में भी ऐसा नहीं होना चाहिए। जीवनपर्यन्त का आत्म-अनुशासन तब आरम्भ होता है जब हम ऐसे प्रश्न पूछते हैं: मैं कौन हूँ? मैं यहाँ किस उद्देश्य से हूँ? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या हैं, और उन्हें प्राप्त करने के लिए मुझे किस प्रकार प्रयास करना चाहिए? वेस्टमिन्स्टर लघु प्रश्नोत्तर का प्रथम उत्तर सीधे इसी विषय पर प्रकाश डालता है: “मनुष्य का मुख्य उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना और सदा उसके आनन्द में मग्न रहना है।” मेरे जीवन की प्रत्येक बात को इसी सर्वोच्च लक्ष्य के अधीन होना चाहिए। 

2. गलातियों 5:22–23

दूसरा खण्ड गलातियों 5:22–23 है, जहाँ पौलुस आत्मा का फल का उल्लेख करता है: “प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वासयोग्यता, नम्रता, आत्म-संयम।” ध्यान दीजिए कि फल की यह सूची ठीक उसके पहले दी गई “शरीर के कामों” (गल. 5:19–21) की सूची के तुरन्त बाद आती है। अपने स्वभाव के अनुसार ये “शरीर के काम” अनियन्त्रित अभिलाषाओं और वासनाओं की अभिव्यक्ति हैं। मनुष्य की सामान्य और स्वाभाविक इच्छाएँ नियन्त्रण से बाहर हो गई हैं; वे उस नदी के समान हैं जो अपने तटों को तोड़कर बह निकलती है और व्यापक हानि तथा विनाश का कारण बनती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि पवित्र आत्मा का फल की इस सूची का आरम्भ “प्रेम” से होता है और समापन “आत्म-संयम” पर होता है। हम जानते हैं कि नए नियम में प्रेम को प्रायः सर्वोच्च सद्गुण माना गया है—“इनमें सबसे बड़ा प्रेम है” (1 कुरिन्थियों 13:13)। परन्तु प्रेम का भी उचित दिशा और माध्यम में रहना आवश्यक है। आत्म-संयम, अथवा आत्म-अनुशासन, यह स्वीकार करता है कि मनुष्य में भोजन, पेय, विश्राम, यौन-सम्बन्ध, आनन्द, मनोरंजन तथा अन्य अनेक बातों की स्वाभाविक इच्छाएँ होती हैं; परन्तु वह उनके लिए उचित माध्यम निर्धारित करता है, जिससे वे नियन्त्रण में रहें और अपनी सीमाओं का उल्लंघन करके अनियन्त्रित अभिलाषाओं तथा वासनाओं का रूप न ले लें। यह कोई संयोग नहीं है कि जब पौलुस तीतुस को लिखता है, जो क्रेते में सेवा कर रहा था—एक ऐसा द्वीप जिसकी पहचान अनुशासनहीनता के कारण थी—तब वह समाज के विभिन्न वर्गों को शिक्षा देते हुए बार-बार “संयमी” होने की आवश्यकता पर बल देता है। वह “वृद्ध पुरुषों,” “युवा स्त्रियों,” “युवा पुरुषों,” और वास्तव में सब लोगों को संयम का जीवन जीने की शिक्षा देता है (तीतु. 2:1–12)। 

3. 2 तीमुथियुस 1:7

अन्त में, 2 तीमुथियुस 1:7 पर विचार कीजिए: “क्योंकि परमेश्वर ने हमें भय का नहीं, परन्तु सामर्थ्य, प्रेम और आत्म-संयम का आत्मा दिया है।” मेरा विचार है कि इक्कीसवीं शताब्दी में विश्वासयोग्य मसीहियों के लिए यह वचन विशेष रूप से प्रासंगिक है। हमारे चारों ओर की संस्कृति दिन-प्रतिदिन अधिक विरोधी, क्रोधपूर्ण और असहिष्णु होती जा रही है, जिसके कारण विश्वासी विरोध और उत्पीड़न से सहज ही भयभीत हो सकते हैं। नए नियम से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि तीमुथियुस कुछ संकोची और लज्जाशील स्वभाव का व्यक्ति था, जिसको “समय और असमय” भी सेवकाई करते रहने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता थी (2 तीमुथियुस 4:2)।

इस खण्ड से हम जो एक शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, वह सम्भवतः कुछ अप्रत्याशित प्रतीत हो, परन्तु वह अत्यन्त मूल्यवान है। आत्म-संयम, अथवा आत्म-अनुशासन, उस भय और चिन्ता का प्रतिकार है जो बड़ी सहजता से हमें घेर लेते हैं। इसका कारण यह है कि आत्म-अनुशासन का वास्तविक रहस्य यह है कि परमेश्वर अपनी प्रजा के साथ उपस्थित है और अपनी सामर्थ्य से कार्य करता है। इसलिए यह वास्तव में परमेश्वर के अधीन अनुशासन है—अर्थात् परमेश्वर का वचन और परमेश्वर का आत्मा, यीशु ख्रीष्ट के साथ एकीकृत परमेश्वर की सन्तान होने के कारण, मेरे प्रत्येक कार्य और प्रत्येक वचन का निर्देशन तथा नियन्त्रण करते हैं, क्योंकि मैं ख्रीष्ट की मनोवृत्ति में भी सहभागी हूँ (फिलिप्पियों 2:5)।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

पॉल यूलिट

पॉल यूलिट

रेव. पॉल यूलिट लन्दन के कैम्बरवेल स्थित ग्रोव चैपल के पास्टर हैं। वे यूनाइटेड किंगडम में एफिनिटी धर्मवैज्ञानिक अध्ययन सम्मेलन के अध्यक्ष तथा वेस्टमिन्स्टर सेमिनरी यू.के. के न्यासी हैं। वे अनेक पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें टाइम फ़ॉर जजमेंट भी सम्मिलित है।