
यीशु ही नया मन्दिर है
1 अक्टूबर 2026परमेश्वर के वचन को सुनने वालों के छह प्रकार
हम ऐसे संसार में रहते हैं जो सूचनाओं से भरा हुआ है। असंख्य आवाज़ें हमारा ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करती हैं। परन्तु इस कोलाहल के बीच कोई भी वचन परमेश्वर के वचन से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है—जिसे भजनकार “मधु से भी मीठा” कहता है (भजन 119:103)। इसे ध्यान में रखते हुए, याकूब 1:22–25 हमारे सामने एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न रखता है: हम परमेश्वर के वचन का कैसा प्रतिउत्तर देते हैं? क्या हम केवल सुनते हैं, या उसे अपने जीवन में लागू भी करते हैं?
याकूब निर्देश देता है, “वचन के केवल सुनने वाले ही नहीं, परन्तु उसके अनुसार चलने वाले भी बनो; नहीं तो अपने आप को धोखा दोगे” (याकूब 1:22)। वह सुनने के महत्व को कम नहीं आँकता; वास्तव में, वह अपने पाठकों को “सुनने में तत्पर” होने की शिक्षा देता है (याकूब 1:19)। परन्तु वह उन लोगों के घातक आत्म-छल को उजागर करता है जो यह समझते हैं कि केवल परमेश्वर के वचन को सुन लेना ही वास्तविक आत्मिकता है। उसके अनुसार सच्चा विश्वास अपने आप को कार्यों में प्रकट होता है—ऐसे जीवन में जो उस सत्य के अनुसार ढलता है जिसे हम सुनते हैं (याकूब 2:14–17)।
याकूब केवल सुनने वाले व्यक्ति की तुलना ऐसे मनुष्य से करता है जो दर्पण में अपने चेहरे के दोषों को देखने के बाद वहाँ से चला जाता है और भूल जाता है कि उसने क्या देखा था (याकूब 1:23–24)। यह उदाहरण परमेश्वर के वचन को सुनने, परन्तु उसे अपने जीवन में लागू न करने की दुःखद मूर्खता को प्रभावशाली ढंग से स्पष्ट करता है। इस उदाहरण में दर्पण स्वयं परमेश्वर का वचन है। वह हमारे पाप को प्रकट करता है, हमारी वास्तविक आत्मिक दशा को दिखाता है, और हमें ख्रीष्ट की ओर ले जाता है— वही एकमात्र जो हमें क्षमा कर सकता है और हमारे सभी पापों से शुद्ध कर सकता है। वचन को सुनकर भी उसके पश्चाताप और विश्वास की बुलाहट की उपेक्षा करना, उसके द्वारा प्रदान किए जाने वाले अनुग्रह की अवहेलना करना है और अपने पाप में अपरिवर्तित बने रहना है।
याकूब की यह चेतावनी हमें अपने आप को जाँचने के लिए बुलाती है। हम किस प्रकार के सुनने वाले हैं।? नीचे सुनने वालों के छह प्रकार का वर्णन किया गया है, जो परमेश्वर के वचन के प्रति भिन्न-भिन्न प्रतिउत्तरों को प्रकट करते हैं।
1. श्रीमान अन्धे
यह सुनने वाला व्यक्ति दर्पण में तो देखता है परन्तु आत्मिक अन्धेपन के कारण स्पष्ट नहीं देख पाता। यद्यपि वह पवित्रशास्त्र पढ़ता या उसका अध्ययन करता है, फिर भी वह पाप को उसी प्रकार नहीं पहचानता जैसा परमेश्वर उसे परिभाषित करता है। वह बुराई को भलाई और भलाई को बुराई कहता है (यशायाह 5:20)। उसका जीवन निरन्तर पाप से चिह्नित रहता है, परन्तु उसके जीवन पर प्रभुत्व रखने वाले व्यवहार से वह तनिक भी विचलित नहीं होता। उसे आवश्यकता है कि पवित्र आत्मा उसके भीतर नया जीवन उत्पन्न करे और उसकी आँखें सत्य के प्रति खोल दे।
2. श्रीमती भयभीत
वह जानती है कि उसमें दोष हैं, परन्तु उसका सामना करने से डरती है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति बुरी जाँच-रिपोर्ट के भय से चिकित्सक (डॉक्टर) के पास जाने से बचता है उसी प्रकार श्रीमती भयभीत भी वचन द्वारा अपने पाप के दोषबोध का विरोध करती है। वह पश्चाताप की कीमत चुकाना नहीं चाहती। परन्तु वास्तविक स्वतन्त्रता दोषों से मुँह मोड़ने में नहीं, किन्तु अपने पाप को प्रकाश में लाने में, पश्चाताप करने और विश्वास के साथ ख्रीष्ट की ओर लौटने में मिलती है।
3. श्रीमान आत्म-धर्मी
वह अपने दोषों को देखता तो है, परन्तु उनके लिए बहाने बना लेता है। अपने नैतिक आचरण के विषय में स्वयं पर भरोसा रखते हुए वह सुधार स्वीकार करने को नकारता है। जब उसे समझाया जाता है, तो वह उत्तरदायित्व से बचते हुए कहता है, “मुझे बदलने की आवश्यकता नहीं है—दूसरों को बदलना चाहिए।” उसकी आत्म-धार्मिकता उसे इस बात से अन्धा बना देती है कि उसे परमेश्वर की दया की कितनी गहरी आवश्यकता है। वह यीशु के दृष्टान्त में बताए गए उस फरीसी के समान है जिसने प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि मैं अन्य लोगों के समान ठग अन्यायी व व्याभिचारी नहीं हूँ, न इस चुंगी लेने वाले के समान ही हूँ।” (लूका 18:11–12)। बाहर से वह बड़ा भक्त दिखाई देता था, परन्तु उसका हृदय घमण्डी और अपश्चातापी था। यीशु हमें स्मरण दिलाता है कि वह धर्मियों को नहीं, वरन् पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया है (लूका 5:32)।
4. कुमारी निराशावादी
वह दर्पण में देखकर अपने दोषों को स्वीकार तो करती है, परन्तु मानती है कि वे शुद्ध किए जाने से परे हैं। दया के लिए परमेश्वर की ओर फिरने के स्थान पर, वह अपने दुःख में डूबी रहती है और निराश होकर कहती है, “मैं इतनी पापी हूँ कि मुझे क्षमा नहीं मिल सकती।” कुमारी निराशावादी को सुसमाचार को जिस बात की आवश्यकता है, वह सुसमाचार की आशा है। जैसा कि रॉबर्ट मरे मैकशेन ने बुद्धिमानी से कहा था, “जितनी बार तुम अपने ऊपर दृष्टि डालो, उससे दस गुना अधिक बार ख्रीष्ट की ओर देखो।” ख्रीष्ट में उस सबसे बड़े पापी के लिए भी पूर्ण क्षमा है जो पश्चाताप करता और विश्वास करता है।
5. श्रीमान आंशिक
यह व्यक्ति 1 शमूएल 15 में राजा शाऊल के समान चुनिंदा आज्ञाकारिता का पालन करता है। शाऊल को आज्ञा दी गई थी कि वह अमालेकियों का पूर्णतः विनाश कर दे परन्तु उसने उत्तम पशुओं और राजा अगाग को जीवित छोड़ दिया। उसने अपने बचाव में अपने बलिदानों का उल्लेख किया। परन्तु भविष्यद्वक्ता शमूएल ने उत्तर दिया, “आज्ञा मानना बलिदान से बढ़कर है” (1 शमूएल 15:22)। श्रीमान आंशिक परमेश्वर की कुछ आज्ञाओं का पालन करता है, परन्तु सबका नहीं। किन्तु आंशिक आज्ञाकारिता भी अन्ततः अनाज्ञाकारिता ही है। सच्चा सुनने वाला परमेश्वर के सम्पूर्ण वचन के अधीन पूरी तरह समर्पित होता है, केवल उन बातों के नहीं जो उसके लिए सुविधाजनक हों।
6. सुश्री बुद्धिमती
यही सच्ची सुनने वाली है। पवित्रशास्त्र के दर्पण में प्रतिबिम्बित अपने दोषों को देखकर, वह पश्चात्ताप में परमेश्वर की ओर फिरती है और ख्रीष्ट के द्वारा शुद्ध किए जाने की खोज करती है। वह यीशु के दृष्टान्त में बताए गए चुंगी लेने वाले के समान प्रार्थना करती है, “हे परमेश्वर, मुझ पापी पर दया कर” (लूका 18:13)। याकूब कहता है कि ऐसा व्यक्ति “अपने कार्य में धन्य होगा” (याकूब 1:25)। उसका जीवन भजन संहिता 1 में वर्णित उस वृक्ष के समान होता है जो जल की धाराओं के किनारे लगाया गया है—फलवन्त और स्थायी।
अपने विषय में विचार कीजिए
तो आप किस प्रकार के सुनने वाले हैं? स्मरण रखिए, परमेश्वर की आशीष उन लोगों पर बनी रहती है जो सुनते भी हैं और आज्ञा भी मानते हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि आज्ञाकारिता उद्धार अर्जित करती है, वरन् इसलिए कि वह उस हृदय से प्रवाहित होती है जिसे परमेश्वर के अनुग्रह ने वास्तव में परिवर्तित कर दिया है। इसलिए परमेश्वर के वचन का सच्चा सुनने वाला होना केवल ध्यानपूर्वक सुनना या बाइबल की सच्चाइयों को बौद्धिक रूप से स्वीकार कर लेना नहीं है। इसका अर्थ है नम्रता के साथ वचन को ग्रहण करना, उसे अपने हृदय की जाँच करने देना, और विश्वास के साथ उसके अधीन हो जाना। इसका अर्थ है उसके वचन के प्रकाश में प्रभु के साथ चलते रहना।
जैसा कि एक पुराने भजन के शब्द कहते हैं—
भरोसा रखो और आज्ञा मानो, क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं,
यीशु में आनन्दित होने का—सिवाय इसके कि भरोसा रखो और आज्ञा मानो।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

