क्या त्रिएकता बाइबलीय है?- लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़
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क्या त्रिएकता बाइबलीय है?

सम्पादक की टिप्पणी: यह टेबलटॉक पत्रिका श्रंखला का दूसराअध्याय है: त्रिएकता

क्या त्रिएकता का सिद्धान्त बाइबलीय है? यह निर्भर करता है कि जब आप “बाइबलीय” कहते हैं, तो आप का अर्थ क्या है। क्या बाइबल में कहीं भी नीकया के विश्वास वचन के जैसा कुछ है? नहीं। क्या बाइबल कहीं भी त्रिएकता का विधिवत कथन प्रस्तुत करती है जिसमें तकनीकी ईश्वरविज्ञानीय शब्द जैसे होमोऊसियोस  या हायपोस्टैसिस  उपयोग किए गए हैं? नहीं। तो, यदि त्रिएकता के सिद्धान्त को बाइबलीय होने के लिए यह आवश्यक है, तो फिर नहीं, यह सिद्धान्त बाइबलीय नहीं है। परन्तु किसी सिद्धान्त को बाइबलीय होने के लिए इसकी आवश्यकता नहीं है।

वेस्टमिन्सटर विश्वास का लघु अंगीकार समझाता है, “परमेश्वर की स्वयं की महिमा के लिए, मनुष्य के उद्धार, विश्वास और जीवन के लिए, परमेश्वर की सम्पूर्ण इच्छा या तो पवित्रशास्त्र में स्पष्टता से व्यक्त किया गया है, या फिर पवित्रशास्त्र से भला तथा आवश्यक परिणाम के रूप में तर्क से निकाला जा सकता है” (1.6)। त्रिएकता का सिद्धान्त ऊपर व्यक्त किए गए तकनीकी अर्थ में पवित्रशास्त्र में स्पष्टता से व्यक्त नहीं किया गया है, पर यह निस्सन्देह पवित्रशास्त्र में स्पष्टता से व्यक्त बातों का एक “भला तथा आवश्यक परिणाम” है। तो, पवित्रशास्त्र स्पष्टता से क्या सिखाता है?

पहला, पवित्रशास्त्र स्पष्टता से सिखाता है कि एक ही परमेश्वर है। उन लोगों में जो पवित्रशास्त्र के अधिकार को स्वीकार करते हैं, इस कथन के विषय में बहुत कम विवाद है। लगभग पवित्रशास्त्र का प्रत्येक पृष्ठ इस तथ्य की साक्षी देता है कि एक और केवल एक ही परमेश्वर है। व्यवस्थाविवरण 4:35 शेष बाइबल का प्रतिनिधित्व करता है जब वह कहता है, “तुझ को यह सब इसलिए दिखाया गया कि तू जाने कि यहोवा ही परमेश्वर है, उसको छोड़ और कोई है ही नहीं” (व्यवस्थाविवरण 4:39; 32:39; यशायाह 43:10; 44:6-8 भी देखिए)। आसपास के देशों के बहु-ईश्वरवाद और मूर्तिपूजा का इस आधार पर दृढ़ता से खण्डन किया गया कि यहोवा परमेश्वर है और अन्य कोई है ही नहीं (यशायाह 44:6-20)।

दूसरा, पवित्रशास्त्र स्पष्टता से सिखाता है कि पिता परमेश्वर है। यह कथन कलीसियाई इतिहास में अपेक्षाकृत रीति से अविवाद्य है। यीशु “परमेश्वर पिता” की बात करता है (उदाहरण के लिए, यूहन्ना 6:27)। पौलुस अनेक बार “हमारे पिता परमेश्वर” और “पिता परमेश्वर” की बात करता है (उदाहरण के लिए, रोमियों 1:7; 1 कुरिन्थियों 1:3; 8:6; 15:24; 2 कुरिन्थियों 1:2; गलातियों 1:1, 3; इफिसियों 1:2; 5:20; 6:23; फिलिप्पियों 1:2; 2:11; कुलुस्सियों 1:2; 3:17; 1 थिस्सलुनीकियों 1:1; 2 थिस्सलुनीकियों 1:1, 2; 2:16; 1 तीमुथियुस 1:2; 2 तीमुथियुस 1:2; तीतुस 1:4; फिलेमोन 3)। इस प्रकार से, पवित्रशास्त्र स्पष्ट है कि एक ही परमेश्वर है और कि पिता परमेश्वर है।

तीसरा, पवित्रशास्त्र स्पष्टता से सिखाता है कि पुत्र परमेश्वर है। यदि पवित्रशास्त्र केवल यही सिखाता है कि एक परमेश्वर है और कि पिता परमेश्वर है, तो कोई समस्या नहीं होती। कोई भी ख्रीष्टीय सरलता से निष्कर्ष निकाल पाता कि पुराने नियम में इस एक परमेश्वर को यहोवा कहा जाता था और नए नियम में उसको पिता के रूप में प्रकट किया गया है। किन्तु बातें जटिल हो जाती हैं, उन बातों के कारण जो पवित्रशास्त्र पुत्र के विषय में, मसीहा यीशु के विषय में, स्पष्टता से सिखाता है।     

पवित्रशास्त्र स्पष्टता से पुत्र को परमेश्वर के रूप में पहचानता है। यूहन्ना के सुसमाचार के प्रस्तावना में, उदाहरण के लिए, हम पढ़ते हैं, “आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था” (यूहन्ना 1:1)। यहाँ, “वचन” शब्द को परमेश्वर के रूप में पहचाना गया है (“परमेश्वर था”) और एक ही समय परमेश्वर से भिन्न भी दिखाया गया है (“परमेश्वर के साथ था”)। यह “वचन” कौन है? 14 पद उत्तर को प्रकट करता है “वचन, जो अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण था, देहधारी हुआ, और हमारे बीच में निवास किया, और हमने उसकी ऐसी महिमा देखी जैसी पिता के एकलौते की महिमा।” वचन यीशु है, जो पुत्र है।

पवित्रशास्त्र के लेखकों के द्वारा कई और प्रकारों से यीशु को परमेश्वर के रूप में पहचाना जाता है। उदाहरण के लिए, वह पुराने नियम में यहोवा कहे जाने वाले व्यक्ति के रूप में पहचाना जाता है। मरकुस का सुसमाचार आरम्भ होता है यशायाह 40:3 के उद्धरण के साथ। मूल नबूबत में, यशाया लोगों को सान्त्वना दे रहा है इस प्रतिज्ञा के साथ कि एक दिन यहोवा इस्राएल में आएगा। उनको “प्रभु के मार्ग तैयार” करने के लिए कहा जाता है। यहाँ “प्रभु” शब्द यहोवा के लिए इब्रानी का अनुवाद है। मरकुस के सुसमाचार में, केवल यीशु वह व्यक्ति है जो इस नबूबत को पूरा करता है। यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला मार्ग तैयार करता है प्रभु यीशु के लिए, जो इस्राएल में आता है। इस प्रकार से यीशु को यहोवा के रूप में पहचाना जाता है, जो अब इस्राएल में आया जैसे उसने प्रतिज्ञा की।

यह भी महत्वपूर्ण है कि पूरे नए नियम में यीशु के लिए ऐसे शब्द, कार्य, और गुण प्रयोग किए जाते हैं जो उचित रीति से केवल परमेश्वर के लिए किए जाने चाहिए। उसकी आराधना की जाती है (मत्ती 2:2)। वह अपने शिष्यों को स्वयं से प्रार्थना करने के लिए प्रोत्साहित करता है (यूहन्ना 14:14)। वह पाप क्षमा करता है (मत्ती 9:1-8; मरकुस 2:1-12; लूका 5:17-26)। वह सृष्टिकर्ता है (यूहन्ना 1:3; कुलुस्सियों 1:16)। वह सब सृजे गए वस्तुओं को सम्भालता है (कुलुस्सियों 1:17)। वह प्रकृति पर सम्प्रभुता रखता है (मत्ती 8:23-27)। वह अन्तिम दिन को न्याय करेगा (यूहन्ना 5:22; प्रेरितों के काम 10:42)। पवित्रशास्त्र पुत्र के विषय में इन बातों की पुष्टि सत्य के रूप में नहीं कर पाता यदि पुत्र परमेश्वर नहीं होता।

चौथा, पवित्रशास्त्र स्पष्टता से सिखाता है कि पवित्र आत्मा परमेश्वर है। इस कथन के प्रति विधर्मियों ने उतना ही आपत्ति जताया जितना पुत्र के परमेश्वर होने के कथन के प्रति जताया गया, परन्तु पवित्रशास्त्र का आधिकारिक वचन हमारा मापदण्ड है, और उसमें जो सिखाया जाता है हमारे विश्वास का आधार है। बहुत सारे ख्रीष्टीय लोग जानते हैं कि प्रेरितों के काम 5:3-4 में पवित्र आत्मा को किस प्रकार परमेश्वर के रूप में पहचाना जाता है, जहाँ पवित्र आत्मा से झूठ बोलने को परमेश्वर से झूठ बोलने के एक समान प्रस्तुत किया जाता है, पर कुछ ख्रीष्टीय लोग त्रुटिपूर्वक रीति से विश्वास करते हैं कि पवित्र आत्मा के परमेश्वरत्व के प्रमाण के रूप में यह एकमात्र खण्ड है। ऐसा नहीं है। स्थान की कमी के कारण प्रत्येक प्रासंगिक खण्ड पर पूरी चर्चा नहीं की जा सकती है, पर कुछ को ध्यान दिया जा सकता है।

उदाहरण के लिए यशायाह 6:8-10 को प्रेरितों के काम 28:25-27 के साथ तुलना कीजिए। यशायाह अपने नबूबत में यहोवा का एक कथन प्रस्तुत करता है। प्रेरितों के काम में, पौलुस इस कथन का श्रेय पवित्र आत्मा को देता है। दूसरे शब्दों में, यहोवा द्वारा कही गई बात वही है जिसे पवित्र आत्मा ने कहा। हम इस प्रकार की बात को भजन 95:7-11 को इब्रानियों 3:7-11 के साथ तुलना करके देखते हैं। भजन 95 में जो यहोवा कहता है, इब्रानियों का लेखक कहता है कि पवित्र आत्मा कहता है।

पाँचवा, पवित्रशास्त्र स्पष्टता से सिखाता है कि पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा भिन्न हैं। यदि पवित्रशास्त्र में हमारे पास केवल पहली चार शिक्षाएं होती, हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते थे कि उनको यह सिखाते हुए समझा जा सकता था कि एक परमेश्वर है और कि यह एक परमेश्वर कभी अपने आप को पिता के रूप में प्रकट करता है, कभी पुत्र के रूप में, और कभी पवित्र आत्मा के रूप में। परन्तु यह निष्कर्ष अमान्य है, क्योंकि पिछली चार शिक्षाओं को देने के साथ, पवित्रशास्त्र तीनों में इस रीति से भिन्नता करता है कि प्रत्येक व्यक्ति अन्य व्यक्ति नहीं है यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर है।

पवित्रशास्त्र स्पष्टता से पिता को पुत्र से भिन्न दिखाता है। पिता ने पुत्र को भेजा (यूहन्ना 3:16-17; गलातियों 4:4)। पिता और पुत्र एक दूसरे से प्रेम करते हैं (यूहन्ना 3:35; 5:20; 14:31)। वे एक दूसरे से बात करते हैं (यूहन्ना 11:41-42)। वे एक दूसरे को जानते हैं (मत्ती 11:27)। पुत्र पिता के समक्ष हमारा सहायक है (1 यूहन्ना 2:1)। इनमें से किसी भी खण्ड अर्थपूर्ण नहीं है जब तक पिता पुत्र से भिन्न नहीं है।

पवित्रशास्त्र पुत्र और पवित्र आत्मा को भी स्पष्टता से भिन्न दिखाता है। पवित्र आत्मा उसके बपतिस्मा के समय पुत्र पर उतरता है (लूका 3:22)। पवित्र आत्मा एक और सहायक है (यूहन्ना 14:16)। पुत्र पवित्र आत्मा को भेजता है (15:26;16:7)। पवित्र आत्मा पुत्र की महिमा करता है (16:13-14)। अन्ततः पवित्रशास्त्र पिता और पवित्र आत्मा को भिन्न दिखाता है। पिता पवित्र आत्मा को भेजता है (14:15; 15:26)। पवित्र आत्मा पिता से विनती करता है। तीनों को कई खण्डों में भिन्न दिखाया जाता है, पर सबसे प्रसिद्ध यीशु के महान आदेश में है जब वह शिष्यों को आज्ञा देता है कि “पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के नाम से” सब जातियों को बपतिस्मा दें (मत्ती 28:19)।

तो फिर, ईश्वरविज्ञानीय प्रश्न यह है: हमें परमेश्वर को कैसे समझना चाहिए जिससे कि सब कुछ जिसे पवित्रशास्त्र द्वारा स्पष्ट रीति से सिखाता जाता है सच ठहरे? दूसरे शब्दों में, इन स्पष्ट शिक्षाओं का भला तथा आवश्यक परिणाम क्या है? प्रत्येक आरम्भिक त्रिएकता सम्बन्धी विधर्मता ने इन में से एक या अधिक के साथ न्यायसंगत व्यवहार नहीं किया। त्रि-ईश्वरवाद इस स्पष्ट शिक्षा को साथ में रखने में असफल हुआ कि एक ही परमेश्वर है। रूपात्मकता इस बात को साथ में रखने में असफल हुआ कि तीन व्यक्ति भिन्न हैं। एरियसवाद इस बात को साथ में रखने में असफल हुआ कि पुत्र परमेश्वर है न कि केवल एक देवता। और ऐसे ही और विधर्मताएं भी। उन झूठे सिद्धान्तों को उत्तर देने के लिए और सत्य को समझने के लिए, कलीसिया ने पवित्रशास्त्र की स्पष्ट शिक्षाओं के भले और आवश्यक परिणाम निकाले जिसमें पवित्रशास्त्र में सिखाए गए सब कुछ को साथ में लिया गया। कलीसिया ने यह करने के लिए तकनीकी शब्दों का भी उपयोग किया। उसके पास और कोई विकल्प नहीं था क्योंकि विधर्मियों ने प्रायः मांग की कि केवल बाइबलीय शब्दों का उपयोग किया जाए ताकि वे अपने झूठे सिद्धान्त को सरलता से छिपा सकें।
आरम्भिक कलीसिया के प्रयासों का परिणाम त्रिएकता का सिद्धान्त था और है। इस सिद्धान्त को संक्षिप्त रीति से नीकिया-कॉन्स्टैन्टिनोपल के विश्वास वचन में कहा गया है (जिसे सामान्य रीति से नीकिया का विश्वास वचन कहा जाता है), परन्तु, कलीसिया के ईश्वरविज्ञानियों ने इसे कई ईश्वरविज्ञानीय लेखों में भी विस्तृत रीति से समझाया है, जिनमें ऑगस्टीन का डे ट्रिनिटाटे, थॉमस अक्वेनस का सुम्मा थियोलोजिए  और जॉन कैल्विन का इन्स्टिट्यूट्स ऑफ द क्रिस्चियन रिलिजियन  सम्मिलित हैं। इन सब ने पवित्रशास्त्र की शिक्षाओं के भले तथा आवश्यक परिणामों को समझाया है।


  1. त्रि-ईश्वरवाद एक त्रिएकता सम्बन्धित विधर्मता है जो परमेश्वर का एक तत्व होने का खण्डन करता है, इसके विपरीत यह तर्क करते हुए कि तीन परमेश्वरीय तत्व हैं—तीन भिन्न ईश्वर—न कि एक परमेश्वर में तीन व्यक्ति।

2. नीकिया का विश्वास वचन के रूप में प्रसिद्ध, नीकिया-कॉन्स्टैन्टिनोपल के विश्वास वचन पिता, पुत्र, और पवित्र आत्मा के पूर्ण परमेश्वरत्व का अंगीकार करता है। यह कॉन्स्टैन्टिनोपल की सभा (381 ईसवी) के द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसने नीकिया की सभा (325 ईसवी) के कार्य के आधार पर कार्य किया, और सभी ईश्वरविज्ञानी परम्पराओं से शास्त्रसंगत ख्रीष्टियों के द्वारा सामान्य रीति से अंगीकार किया जाता है।

तो फिर, क्या त्रिएकता का सिद्धान्त बाइबलीय है? निस्सन्देह।

यह लेख मूलतः टेबलटॉक पत्रिका में प्रकाशित किया गया।
कीथ ए. मैथिसन
कीथ ए. मैथिसन
डॉ. कीथ ए. मैथिसन सैनफर्ड, फ्लॉरिडा के रेफर्मेशन बाइबल कॉलेज में विधिवत ईश्वरविज्ञान के प्रोफेसर हैं। वे कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें द लॉर्ड्स सप्पर और फ्रम एज टु एज समिमिलित हैं।