
छुटकारे में पवित्र आत्मा का कार्य
22 जनवरी 2026पवित्र आत्मा का फल
यह सुनने में अच्छा लगता है। “पवित्र आत्मा का फल।” कितना जीवन्त, कितना सकारात्मक। हम इसके विषय में बात कर सकते हैं, इसकी इच्छा कर सकते हैं, यहाँ तक कि इसके लिए प्रार्थना भी कर सकते हैं। परन्तु दुःख की बात यह है कि, हम इसे अनदेखा या नकार भी सकते हैं, सम्भवतः एक उथली मसीहियत के भ्रम में पड़कर हम सच्चे आत्मिक फल को छाया में मुरझाने दें, जबकि हमारी दृष्टि उन तथाकथित अधिक चमत्कारी “आत्मिक वरदानों” पर टिकी रहे, जिन्हें मंच के प्रकाश में आगे बढ़ाया जाता है।
इस प्रश्न का उत्तर कि “पवित्र आत्मा का फल क्या है”, एक अन्य प्रश्न से आरम्भ होना चाहिए, और वह यह है कि “यह आत्मा कौन है”। वह पवित्रता का आत्मा है जिसके द्वारा ख्रीष्ट को मृतकों में से जिलाया गया, और जो उसी दिशा में और उसी सामर्थ्य के साथ हमारे भीतर कार्य करता है (रोमियों 1:4; इफिसियों 1:15–21)। वह हमें धीरे-धीरे परमेश्वर के समान बनाता जाता है, जैसा कि वह ख्रीष्ट में देखा और जाना जाता है। सुसमाचार की बुलाहट यह है कि हम पवित्र हों, क्योंकि परमेश्वर स्वयं पवित्र है, और अब हम उसके हैं: “परन्तु जैसे तुम्हारा बुलाने वाला पवित्र है, वैसे ही तुम भी समस्त आचरण में पवित्र बनों” (1 पतरस 1:15)। वास्तव में, यदि आप प्रभु यीशु को उसके निष्पाप देहधारण में अदृश्य परमेश्वर के प्रतिरूप मानते हैं, तो यह अत्यन्त उल्लेखनीय है किपवित्र आत्मा का फल उद्धारकर्ता के अनुसार ही ढाला गया है, क्योंकि वही परमेश्वर को प्रकट करने वाला है। उसे देखिए, और आप एक ऐसे व्यक्ति को देखेंगे जो वास्तव में पवित्र आत्मा से भरा हुआ है (यूहन्ना 1:32–33)।
यह हमें गलातियों 5 की खूबसूरत और पवित्र सूची पर लाता है। सबसे पहले ध्यान दें कि पवित्र आत्मा का फल शरीर के कार्यों के सर्वथा विपरित है। गलातियों 5 में पौलुस द्वारा दी गई ये दोनों सूचियाँ एक-दूसरे के समानान्तर नहीं हैं। फिर भी, ये दोनों वस्तुएं स्पष्ट रीति से अलग-अलग मिट्टी में उगती हैं, अलग-अलग हवा में पली-बढ़ी होती हैं, और अलग-अलग जड़ों से आती हैं। यह बात तब भी सत्य रहती है जब नया जन्म न पाए हुए लोग किसी सीमा तक ऐसी बाहरी नैतिकता दिखाते हैं जो कुछ अंशों में पवित्र आत्मा के फल के समान प्रतीत होती है।
यह भी ध्यान दें कि पवित्र आत्मा का फल एकवचन है, बहुवचन नहीं। इसे ऐसे नहीं समझना चाहिए मानो यह अलग-अलग तोड़े गए फलों से भरा हुआ एक कटोरा हो, जिनमें से हम अपनी इच्छा के अनुसार रंग या स्वाद देखकर चयन कर लें। इसके स्थान पर इसे एक ही स्वर्गीय दाखलता पर लगे हुए अंगूरों के एक गुच्छे के समान देखना अधिक उचित है–प्रत्येक दाना रसपूर्ण है, परन्तु सभी में एक ही स्वर्गीय स्वाद और एक ही स्वरूप दिखाई देता है। सच तो यह है कि इनमें से किसी एक गुण का वर्णन दूसरे गुणों का सहारा लिए बिना करना भी कठिन है, इतना अधिक वे आपस में जुड़े हुए हैं – हिन्दी अनुवाद भी सूक्ष्म भेदों को व्यक्त करने के प्रयास में एक ही शब्द को अलग-अलग गुणों के लिए प्रयोग करते हैं। जैसा कि प्रायः पवित्रशास्त्र के संदर्भ में होता है, हमें भेद करना चाहिए और हम उन्हें व्यवस्थित भी कर सकते हैं (सम्भव है कि हम इन फलों को तीन-तीन के तीन समूहों में बाँट सकते हैं)। फिर भी हम उन्हें अलग नहीं कर सकते और न ही उन्हें अलग करना चाहिए।
इस एकत्व के कारण, इस फल के अलग-अलग तत्व एक-दूसरे के पूरक हैं। वे एक साथ खाने पर सबसे मीठे लगते हैं, अलग-अलग नहीं। आपको एक भी ऐसा नहीं मिलेगा जहाँ दूसरे न हों, यद्यपि कुछ अत्यधिक भिन्न और पके हुए हो सकते हैं। आप यह दावा नहीं कर सकते कि आपमें पवित्र आत्मा का फल है, यदि आप कभी-कभी इनमें से किसी एक के प्रमाण को दिखाते हैं, परन्तु पवित्र आत्मा की उपस्थिति और सामर्थ्य को दिखाने के लिए इन सबका (किसी न किसी मात्रा में) निरंतर उपस्थित होना आवश्यक है। यदि यह फल हमारे भीतर नहीं पाया जाता है, अलग-अलग मसीहियों में अनुभव और परिपक्वता के अलग-अलग स्तरों को ध्यान में रखते हुए, तो इसका अर्थ यह है कि हमारे भीतर आत्मा नहीं है। यदि हममें आत्मा है, तो हमें आत्मा का फल अवश्य उत्पन्न करना चाहिए। ये गुण उसी से आते हैं और उसके व्यक्ति और उसकी प्रसन्नता को प्रतिबिम्बित करते हैं। ये उन लोगों की पवित्र प्रवृति हैं जिनमें परमेश्वर का आत्मा वास करता है, और जो उसके द्वारा धार्मिकता के मार्गों पर चलाए जाते हैं (पद 18)। परमेश्वर के संतान की पहचान केवल बुराइयों की अनुपस्थिति से नहीं, वरन् गुणों की उपस्थिति से होती है, वही पवित्रता जिसमें परमेश्वर प्रसन्न होता है और जिसे उसके सन्तान उत्सुकता से पाना चाहते हैं: “कोई भी व्यक्ति बिना सहमति, बिना इच्छा और पवित्र होने के लिए संघर्ष किए बिना पवित्र नहीं बना। पाप बिना बोए भी बढ़ जाएगा, परन्तु पवित्रता के लिए खेती की जाने की आवश्यकता होती है” (सी.एच. स्पर्जन)। आत्मा हमें ईश्वरभक्ति के लिए भूख और उस पर निर्भर रहते हुए इसे विकसित करने की क्षमता दोनों देता है (फिलिप्पियों 2:12-13)। आत्मा के बिना, हम केवल शरीर के काम करेंगे, चाहे हम अपनी बुराइयों को नैतिकता या धर्म के रंगों में कितना ही क्यों न सजा लें।
तो यह फल क्या है? “पवित्र आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, दयालुता, भलाई, विश्वास्तता, नम्रता, व संयम है; ऐसे एसे कामों के विरुद्ध कोई व्यवस्था नहीं है” (गलातियों 5:22–23)। एक बार फिर, हमें भेद तो करना है, पर अलग नहीं करना है।
प्रेम इस पूरी सूची का आरम्भ करता है, उसका परिचय कराता है, और उसे स्थिर करता है। यही पहला त्रि-समूह है, जो उन अनुग्रहों का वर्णन करता है जो सच्ची मसीहियत की विशिष्ट पहचान हैं। इसमें उस परमेश्वर से प्रेम सम्मलित है जो स्वयं प्रेम है, एक ऐसा प्रेम जो इस परमेश्वर द्वारा प्रेम किए जाने से जन्म लेता है, एक ऐसा प्रेम जो परमेश्वर के लिए दूसरों के प्रति उमड़ता है, विशेषकर उन लोगों के लिए जो ख्रीष्ट में परमेश्वर के स्वरूप को रखते हैं।
इसके पश्चात आनन्द आता है, वह प्रसन्नता जो एक विश्वासी को परमेश्वर में मिलती है, क्योंकि ख्रीष्ट में उससे मेल-मिलाप हो चुका है, और क्योंकि वह परमेश्वर के उस सम्पूर्ण स्वरूप में आनन्दित होता है जो वह स्वयं में है और जो वह अपने लोगों के लिए है। यह आनन्द निराशा और मन की उदासी को निगल जाता है; यह ऊर्जा देता है और ऊपर उठाता है। यह सच में एक आत्मिक आनन्द है जो सच्चाई पर आधारित है (1 कुरिंथियों 13:6), और जो मसीही दुःखों को पार करता और रूपान्तरित करता है (1 थिस्सलुनीकियों 1:6)। यह उन लोगों का आनन्द है जो परमेश्वर के राज्य के हैं, जो संसारिक सुखों में नहीं वरन् “पवित्र आत्मा में धार्मिकता और शान्ति और आनन्द” में पाई जाती है (रोमियों 14:17)।
आनन्द के साथ शान्ति आती है—सबसे पहले, परमेश्वर के साथ शान्ति (5:1), एक ऐसी शान्ति जो हमारे अपने विवेक में प्रतिबिम्बित होती है, क्योंकि पवित्र आत्मा मेमने के लहू के द्वारा हमरी आत्मा को धो देता है। यह शान्ति वस्तुनिष्ठ और व्यक्तिपरक दोनों है। इसी शान्ति से, जब हमारे हृदय और मन सुरक्षित रखे जाते हैं (फिलिप्पियों 4:7), दूसरों के प्रति शान्तिपूर्ण अभिप्राय प्रवाहित होता है। यह दूसरों के आशीषित और सम्मानित होने की नम्र इच्छा है (फिलिप्पियों 2:1–4), और यह “शान्ति के बन्धन में आत्मा की एकता बनाए रखने” की तत्परता है (इफिसियों 4:3)।
इनके बाद धीरज, दया और भलाई आते हैं । ये विशेष रूप से सम्बन्धात्मक और सामाजिक हैं, जो न केवल परमेश्वर के प्रति हमारे प्रेम को दिखाते हैं, वरन् अपने पड़ोसी से भी स्वयं के जैसा प्रेम करने को भी दिखाते हैं। इनमें पहला ईश्वरीय स्वभाव के समान क्रोध करने में धीमापन है (याकूब 1:19), बदला लेने वाले हृदय के स्थान पर धैर्यवान हृदय है, ऐसा हृदय जो प्रत्युत्तर में प्रहार करने के बजाय अपराध सहने को तत्पर रहता है (1 कुरिंथियों 13:4), जो क्षमा करने में शीघ्र और पापों को ढाँपने में तत्पर होता है (1 पतरस 4:8)।
दयालुता आत्मा का वह मिठास है जो स्वयं परमेश्वर के स्वरूप के अनुसार है (रोमियों 11:22; तीतुस 3:4) और उसके ख्रीष्ट के स्वरूप के अनुसार भी(2 कुरिंथियों 10:1) यह पवित्र आत्मा के द्वारा उत्पन्न शान्तचित्तता और संतुलित स्वभाव है (6:6)। यह घमण्डी और असभ्य नहीं है, वरन् विनम्र और सभ्य है। यह एक ऐसा मिलनसार स्वभाव है जो हमारा दूसरों के साथ रहने को सुखद बनाती है, जो कोमल उत्तर देने में तत्पर रहती है (नीतिवचन 15:1), जो आवश्यकता में पड़े लोगों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण होती है, और जिन्हें सहायता की आवश्यकता है उनके लिए उपयोगी ठहरती है।
फिर है भलाई, शाप देने के स्थान पर आशीष देने की व्यावहारिक तत्परता, हानिकारक प्रवृत्तियों का विरोध करना, परमेश्वर द्वारा अवसर देने पर सभी का भला करने का प्रयास करना, एक ऐसा परोपकारी स्वभाव जो केवल इच्छा करने से संतुष्ट नहीं होता, वरन् उसे करने के लिए अवश्य ही आगे बढ़ता है।
अन्तिम तीन गुणों में ऐसे गुण सम्मलित हो सकते हैं जो गलातिया समाज में विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे होंगे, क्योंकि वे वहाँ की प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों के स्पष्ट विरोध में थे। हमें स्मरण दिलाता है कि पवित्र आत्मा हमारे भीतर जो पवित्रता उत्पन्न करता है, वह केवल सांस्कृतिक विरोध भर नहीं है (मानो युग की आत्मा के विपरीत दिशा में झुक जाना ही अपने आप में गुण हो) वरन् यह वास्तव में अलौकिक पवित्रता है, जो हमें अपने चारों ओर के पाप के अन्धकार से अलग करती है। इसलिए हमारे पास विश्वासयोग्यता, नम्रता और आत्मसंयम है।
इनमें पहला गुण है विश्वासयोग्यता, विशेष रूप उसमें जो हम दूसरों से, चाहे परमेश्वर के सामने या मनुष्यों के सामने, स्वीकार करते और प्रतिज्ञा करते हैं। यह हमारे शब्दों और कामों में, हमारे साथी जीवों के साथ हमारे व्यवहार में भरोसे और खराई को दिखाता है, न कि धोखेबाजी और अविश्वसनीयता को। फिर है नम्रता, एक ऐसा गुण जिसमें हम शीघ्र उत्तेजित नहीं होते, वरन् सरलता से शान्त हो जाते हैं। यह उस रीति को नियंत्रित करता है जिसमें हम परमेश्वर और मनुष्यों के व्यवहार के प्रति अपनी प्रतिक्रिया देते हैं, और सम्भावित कटुता को भी संयम में रखता है।
अन्त में, आत्मसंयम है। यह इस जीवन की प्रत्येक अच्छी वस्तु के प्रति संतुलित मनोवृत्ति है। यह हमें उन्हें कृतज्ञता के साथ ग्रहण करना सिखाता है, पर लोभ के साथ नहीं; उन्हें युक्तिसंगत रूप से आनन्दित होना सिखाता है, पर अतिशयता में नहीं; और उनके साथ मध्यमता से संलग्न होना सिखाता है, न कि उच्छृंखलता से।
ध्यान दें, इन सभी बातों के विषय में, कि इनके विरूद्ध कोई व्यवस्था नहीं है। यदि हम पवित्र आत्मा की अगुवाई में इन बातों को करते हैं, तो हम उन्हें व्यवस्था द्वारा दोषी या दण्ड पाते हुए नहीं पाएँगे। ऐसी पवित्रता वास्तव में हृदय पर लिखी हुई परमेश्वर की आज्ञाओं का प्रतिबिम्ब है: “मैं अपने नियम उनके हृदयों में डालूँगा, और उनके मन पर उन्हें लिखूँगा” (इब्रानियों 10:16)। पवित्र आत्मा की अगुवाई में और परमेश्वर की महिमा का लक्ष्य रखते हुए, हम निश्चिन्त रह सकते हैं कि यही वह आज्ञाकारिता है जिस पर हमारा स्वर्गीय पिता प्रसन्न होता है।
यही ईश्वरीय आज्ञा का परिणाम है, और वही उसका परमेश्वर द्वारा ठहराया गया फल भी है: “आत्मा के अनुसार चलो तो तुम शारीरिक इच्छाओं को किसी रीति से पूर्ण नहीं करोगे” (गलातियों 5:16)। यह ख्रीष्ट के अनुरूप पवित्र आत्मा द्वारा किया गया बढ़ता हुआ बदलाव है, जिसे वह नया जन्म पाया हुआ व्यक्ति अपनाता है जो अपने हृदय में पवित्र आत्मा के सामर्थ्य को जानता है: “प्रभु यीशु ख्रीष्ट को धारण कर लो, और शारीरिक वासनाओं की तृप्ति में मन न लगाओ” (रोमियों 13:14)।
साथ ही, हमें कम से कम दो बातों को स्वीकार करना आवश्यक है। पहला, यह फल प्रतिनिधिक है, सम्पूर्ण सूची नहीं। पौलुस द्वारा दी गई बुराइयों और गुणों की सूचियाँ, वरदानों और अनुग्रहों की सूचियाँ, पापों और मूर्खताओं की सूचियाँ, यह संकेत देने के लिए नहीं हैं कि इन वर्गों में और कोई गुण सम्मिलित नहीं हो सकते। हमें यह नहीं मान नहीं लेना चाहिए कि यदि हमने किसी एक सूची में दिए गए पापों से अपने आप को बचा लिया है, तो हम पापी नहीं रहे; न ही हमें यह सोचना चाहिए कि इन विशेष गुणों के एक या दो उदाहरण दिखा देने से हमारा विश्वास पक्का हो जाता है। एक बार फिर स्मरण रखें कि यह सूची कुल मिलाकर ख्रीष्ट-सदृश चरित्र का संकेत देती है और सम्भव है कि इसमें ऐसे गुण भी सम्मिलित हों जो विशेष रूप से गलातिया की समाज-व्यवस्था में अधिक चमकते हुए दिखाई देते। इसी प्रकार, आपके अपने सन्दर्भ में भी ऐसा हो सकता है कि कोई प्रेरित प्रभु के समानता के किसी विशेष पक्ष की ओर संकेत करता, जो आपको विशेष रूप से मेम्ने के अनुयायी के रूप में चिन्हित करता।
दूसरा, मसीही पहचान और मसीही परिपक्वता में अन्तर होता है। कोई व्यक्ति इस फल के विषय में पढ़कर घबरा सकता है, क्योंकि वह इन सब गुणों को हर समय, हर प्रकार से, सर्वोच्च स्तर पर अपने भीतर नहीं देखता। यह कहे बिना कि हमें वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट हो जाना चाहिए, यह स्मरण रखना अत्यन्त आवश्यक है कि हम ईश्वरभक्ति में बढ़ते हैं; और पवित्रता में प्रगति करते हैं। यहाँ तक कि शारीरिक परिपक्वता के उदाहरण से देखें, तो आप यह अपेक्षा नहीं करेंगे कि ये सभी गुण एक दस वर्ष के बालक में उसी प्रकार दिखें और काम करें जैसे वे साठ वर्ष की स्त्री में दिख सकते हैं। अनुग्रह वही है, पर उसकी अभिव्यक्ति आयु के अनुरूप होती है। इसी प्रकार, परमेश्वर का एक बच्चा जो अपनी आत्मिक बाल्यावस्था में है, उसने सम्भवतः पवित्र आत्मा के फल को उस सीमा तक विकसित नहीं किया होगा जितना किसी ऐसे व्यक्ति ने किया है जो दशकों से इस मार्ग पर चल रहा है। कुछ विश्वासी, अपनी संरचना और स्वभाव के कारण, कुछ क्षेत्रों में संघर्ष कर सकते हैं जबकि अन्य गुण उनमें अधिक सहजता से प्रकट होते हैं। कुछ समय ऐसे भी हो सकते हैं जब आत्मिक गिरावट का अनुभव हो। फिर भी हर स्थिति में, चाहे कली ही क्यों न हो और अभी पुष्प न खिला हो, आत्मिक फल एक जीवित जड़ का संकेत है। हम इस जीवन में कभी भी पूर्णतः ख्रीष्ट के समान नहीं होंगे, परन्तु यदि हमारे भीतर ख्रीष्ट के समानता की कोई वास्तविक और बढ़ती हुई झलक नहीं है, तो हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सम्भवतः वहाँ आत्मिक जीवन नहीं है, और निश्चित रूप से आत्मिक स्वास्थ्य बहुत कम है।
अतः आइए हम परमेश्वर से, उसके पवित्र आत्मा के द्वारा, प्रार्थना करें कि वह इन गुणों को हमारे हृदयों में उत्पन्न करे, हमें जीवन की जड़ और पवित्रता का फल प्रदान करे, और फिर—उसकी समृद्ध और सुनिश्चित प्रतिज्ञाओं को रखते हुए—हम अपने आप को शरीर और आत्मा की सम्पूर्ण गन्दगी से शुद्ध करें, और परमेश्वर के भय में पवित्रता को पूरा करें (2 कुरिंथियों 7:1)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।
