The Resolutions of Jonathan Edwards
जोनाथन एडवर्ड्स के संकल्प
29 जनवरी 2026
The Resolutions of Jonathan Edwards
जोनाथन एडवर्ड्स के संकल्प
29 जनवरी 2026

पवित्र आत्मा के वरदान

The Gifts of the Holy Spirit

जब हमारे पुत्र छोटे थे, तो वे उत्साहपूर्वक उन उपहारों को खोलते थे जो उनकी माँ और मैं उन्हें क्रिसमस पर देते थे। जब वे पैकेट को खोलते थे, और यदि खिलौना या खेल मिलता, तो वे अत्यंत प्रसन्न होते थे। यदि ये मोज़े या कमीज़ निकलती, तो उनका उत्साह स्पष्ट रूप से कम हो जाता था। उनकी प्रतिक्रियाएँ यह दिखाती थीं कि वे रोमांचक उपहारों को अधिक महत्व देते थे और व्यवहारिक उपहारों को कम आँकते थे। 

दुःखद रुप से, कई अपने आप को विश्वासी कहने वाले लोग पवित्र आत्मा के वरदानों के विषय में भी इसी प्रकार का दृष्टिकोण रखते हैं। वे चमत्कारिक आत्मिक वरदानों (जैसे, अन्य भाषा, भविष्यवाणी, चंगाई) के विचार को अत्यधिक महत्व देते हैं और सामान्य आत्मिक वरदानों (जैसे, उद्धार और पवित्रीकरण के फल) को कम महत्व देते हैं। चमत्कारिक आत्मिक वरदानों के विषय में त्रुटिपूर्ण धारणाएँ  प्रायःइस कारण उत्पन्न होती हैं कि लोग इन वरदानों के उद्धार-इतिहासगत उद्देश्य को समझने में असफल रहते हैं। जब हम आत्मा के असाधारण वरदानों और आत्मा के साधारण वरदानों के विषय में बाइबल की शिक्षा को समझने लगते हैं, तब हम कलीसिया के जीवन में आज भी विद्यमान महान् और निरन्तर बने रहने वाले वरदानों का उचित मूल्यांकन कर पाएँगे। 

नया नियम उन विविध आत्मिक वरदानों का उल्लेख करता है जिन्हें परमेश्वर ने अनुग्रहपूर्वक अपने लोगों को दिया है। विशेष रुप से, वचन उद्धार को “परमेश्वर का दान” के रुप में बताता है (रोमि. 6:23; इफि. 2:8)। उद्धार परमेश्वर का दान है क्योंकि हम स्वभाव से अपने पापों में मरे हुए हैं (इफि. 2:1-3) और अनन्त जीवन कमाने के लिए स्वयं कुछ भी नहीं कर सकते थे। इसी सन्दर्भ में, ख्रीष्ट स्वयं को “परमेश्वर का दान” के रुप में बताता है। उसने कुएँ के पास स्त्री से कहा, “यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती और यह भी कि वह कौन है जो तुझ से कहता है, ‘मुझे पानी पिला,’ तो तू उस से माँगती, और वह तुझे जीवन का जल देता” (यूहन्ना 4:10)। यीशु स्वयं को “परमेश्वर का दान” के रुप में बताता है क्योंकि वह परमेश्वर का देहधारित पुत्र है, जो पापियों के अनुपयुक्त और अयोग्य छुटकारे को पूरा करने के लिए इस संसार में आया। 

ख्रीष्ट के स्वर्गारोहण और पिन्तेकुस्त के दिन आत्मा के भेजे जाने के बाद, प्रेरितों ने बार-बार आत्मा को “ परमेश्वर का वरदान” कहा (प्रेरितों. 8:20; 3:38, 10:45 भी देखे)। पवित्र आत्मा ख्रीष्ट का वह दान है जो उसने अपने लहू के द्वारा खरीदे गए लोगों को दिया है (यूहन्ना 7:37)। आत्मा उस उद्धार को लागू करता है जिसे ख्रीष्ट ने चुने हुओं के लिए सुरक्षित किया है। ख्रीष्ट और विश्वासियों के बीच एक सच्ची आत्मिक एकता को स्थापित करके, आत्मा यह सम्भव बनाता है कि यीशु उनके लिए पुनरूजीवन, धर्मीकरण, लेपालकपन, पवित्रीकरण और महिमाकरण का स्रोत ठहरे  (1 कुरि. 1:30)। आत्मा पुत्र के साथ मिलकर कार्य करता है। आत्मा कायल करता है, हृदय बदलता है, निवास करता है, धर्मी ठहराता है, पवित्र करता है, लेपालक बनाता है, छाप लगाता है, और अन्तत: उन सब को महिमान्वित करता है जिसके लिए ख्रीष्ट मरा। आत्मा उन लोगों के जीवन में फल उत्पन्न करता है जो ख्रीष्ट के साथ एक किए गए हैं (गलातियों 5:22)। आत्मा के द्वारा, ख्रीष्ट अपना प्रेम (यूहन्ना 15:9-10), अपना आनन्द (पद 11; 17:13), और अपनी शान्ति (14:27) अपने लोगों को प्रदान करता है।

नये नियम में पवित्र आत्मा के दान की शिक्षा के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ विषय है पवित्र आत्मा के वरदानों का उल्लेख (इब्रानियों 2:4)—जिन्हें पौलुस “आत्मिक वरदान” कहता है (रोमियों 1:11; 1 कुरिन्थियों 12:1; 14:1; इफिसियों 4:8)। स्वर्गारोहित ख्रीष्ट आत्मा के द्वारा इन वरदानों को अपने लोगों तक पहुँचाता है। यीशु ने अपने भीतर पवित्र आत्मा की सामर्थ्य को प्रकट किया, जिसके द्वारा वह ऐसे चमत्कारिक कार्य कर सका जो उसकी मसीहाई सेवकाई की सच्चाई की साक्षी थे। अपने स्वर्गारोहण के पश्चात्, ख्रीष्ट ने उसी आत्मा को भेजा जिसके द्वारा उसने वे महान् कार्य और आश्चर्यकर्म किए थे, जिससे कि उनकी प्रेरितिक कलीसिया सुसमाचार के मसीहाई सन्देश को राष्ट्रों तक पहुँचा सके। इस प्रकार, असाधारण वरदान विजयी, स्वर्गारोहित ख्रीष्ट से घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं। जैसे सिंक्लेयर फर्ग्यूसन स्पष्ट करते हैं, “ख्रीष्ट के स्वर्गारोहण और पवित्र आत्मा के उण्डेले जाने के बीच का सम्बन्ध यह संकेत देता है कि वरदान तथा पवित्र आत्मा के वरदान ख्रीष्ट की विजय और राज्याभिषेक की बाहरी अभिव्यक्ति के रुप में कार्य करते हैं।”

नये- नियम के वे मुख्य खण्ड जिनमें इन वरदानों के विषय में प्रेरितिक शिक्षा पाई जाती है, वे हैं रोमियों 12:6-8; 1 कुरिन्थियों 12:8-11, 28; इफिसियों 4:11; और 1 पतरस 4:10-11। वरदानों की इन सूचियों की संक्षिप्त तुलना से यह निष्कर्ष निकलता है कि ये सभी वरदान प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की आधारभूत सेवकाई से घनिष्ठता से जुड़े हुए थे (2 कुरिन्थियों 12:11-13; इफिसियों 2:20; 3:5)। डॉ. फर्ग्यूसन फिर से टिप्पणी करते हैं:

यद्यपि इन विभिन्न वरदानों का एक सुव्यवस्थित समूहीकरण कठिन है, और हो सकता है कि ऐसा करने का प्रयास ही त्रुटिपूर्ण हो, फिर भी एक मूलभूत संरचना स्पष्ट रूप से उपस्थित है: प्रेरित और भविष्यद्वक्ता के माध्यम से प्रकट किया गया प्रकाशनात्मक वचन आधारभूत है (इफिसियों 2:20), और शेष सभी उसी से निर्देशित होते है और उसी से प्रवाहित होते हैं।

इफिसियों की पत्री में दी गई वरदानों की पहली सूची उन “वचन-सम्बन्धी वरदान” वाले कार्यालय की है जिन्हें ख्रीष्ट ने स्थापित किया। पौलुस ख्रीष्ट के “प्रेरितों,.. भविष्यद्वक्ताओं,.. सुसमाचार प्रचारकों,… चरवाहों और शिक्षकों” के वरदान की बात करता है (इफिसियों 4:11)। क्योंकि वचन की सेवकाई ही वह मुख्य साधन है जिससे परमेश्वर अपने राज्य को बढ़ाता है और अपने लोगों की उन्नति करता है, पौलुस कई “वचन- सम्बन्धी वरदान” वाले कार्यालय की सूची देता है। संक्षिप्त में, जिन्हें परमेश्वर ने अपने वचन के सेवक होने के लिए बुलाया है, उन्हें कलीसिया को ख्रीष्ट के दान के रूप में ग्रहण करना चाहिए। प्रेरित और भविष्यद्वक्ता के कार्यालय इस सूची में सबसे ऊपर हैं क्योंकि उनका कार्य आधारभूत है। परमेश्वर ने इन पदाधिकारियों को नई वाचा की कलीसिया की नींव रखने और राष्ट्रों तक सुसमाचार पहुँचाने के लिए नियुक्त किया (इफिसियों 2:20; 1 थिस्सलुनीकियों 2:13; 2 पतरस 3:15-16)। इसके अनुसार, उसने उन्हें ख्रीष्ट के रहस्य के पूर्ण प्रकटीकरण को प्रकट करने के लिए नियुक्त किया (इफिसियों 3:4-6)। ये कार्यालय केवल पवित्रशास्त्र के सम्पूर्णता से लिखे जाने तक ही आवश्यक थे (2:20; 3:5)। अब कलीसिया के पास पुराने और नए नियम के पन्नों में परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रकट वचन ( अर्थात्., सम्पूर्ण प्रेरितिक सिद्धांत) है।

प्रेरितिक युग के समय, परमेश्वर ने साधारण और असाधारण दोनों प्रकार के आत्मिक वरदान प्रदान किए। साधारण वरदान वे थे जो सभी विश्वासियों के लिए समान थे। इनमें पाप का बोध, हृदय परिवर्तन, पवित्रीकरण और उद्धार का आश्वासन सम्मिलित हैं। असाधारण वरदान वे अलौकिक वरदान थे जो परमेश्वर ने उद्धार के इतिहास में विशेष उद्देश्यों के लिए कुछ निश्चित समयों पर कुछ व्यक्तियों को प्रदान किए। जोनाथन एडवर्ड्स ने इस अंतर को इस प्रकार स्पष्ट किया है:

पवित्र आत्मा के असाधारण वरदान आश्चर्यकारी वरदानों के समान हैं; जैसे भविष्यवाणी और आश्चर्यकर्म करने की सामर्थ्य, तथा अन्य वे वरदान जिनका उल्लेख प्रेरित ने किया है… इनको पवित्र आत्मा के असाधारण वरदान इसलिए कहा जाता है क्योंकि … ये केवल असाधारण अवसरों पर ही प्रदान किए जाते थे, जैसे ये नबियों और प्रेरितों को दिए गए थे जिससे वे पवित्रशास्त्र के पूर्णत: से लिखे जाने से पहले परमेश्वर के मन और इच्छा को प्रकट करें। … परन्तु क्योंकि पवित्रशास्त्र पूर्ण हो चुका है, और मसीही कलीसिया पूरी तरह से स्थापित और दृढ़ हो गई, तब ये असाधारण वरदान समाप्त हो गए। पवित्र आत्मा के साधारण वरदान वे हैं जो परमेश्वर की कलीसिया में सभी युगों में निरंतर बने रहते हैं; जैसे वे वरदान जो पाप-बोध और हृदय परिवर्तन में प्रदान किए जाते हैं, और वे भी जो सन्तों को पवित्रता और सांत्वना में बनाये रखने से सम्बन्धित हैं।

भविष्यवाणी के असाधारण वरदान (अर्थात् आश्चर्यकर्म), अन्य भाषा में बोलना, और चंगाई प्रेरितों द्वारा राष्ट्रों के बीच प्रचारित की गई ईश्वरीय सन्देश की प्रामाणिकता को प्रमाणित किया (प्रेरितों के काम 1:8)। इन वरदानों ने ख्रीष्ट के प्रेरितिक प्रकाशन की पुष्टि की। अन्य भाषाओं में बोलना “चिह्न-वरदान” थे जो इस तथ्य की साक्षी थीं कि परमेश्वर अपने राज्य को पुराने नियम के इस्राएल से राष्ट्रों की ओर ले जा रहा था। इस प्रकार, अन्य भाषाओं में बोलना ने इस बात को प्रमाणित किया कि सुसमाचार की आशीष संसार के सभी राष्ट्रों तक पहुँच चुकी हैं। जैसे ओ. पामर रॉबर्ट्सन बताते हैं:

पिन्तेकुस्त के दिन बोली गई विदेशी भाषाएँ इस्राएल के लिए वाचा-सम्बन्धी शाप का चिन्ह थीं। अब  परमेश्वर केवल उनसे ही नहीं, वरन् संसार के सभी राष्ट्रों से बात करेगा। परन्तु साथ ही, पिन्तेकुस्त के दिन बोली गई अन्य भाषाएँ इस्राएल सहित संसार के सभी राष्ट्रों के लिए परमेश्वर की महान् आशीष का भी चिन्ह थीं। अन्य भाषाएँ इस बात की साक्षी थीं कि वाचा की आशीष संसार के सभी राष्ट्रों तक विस्तारित हो चुकी है।

चमत्कारिक चंगाई एक अन्य प्रमाणित करने वाला चिन्ह-वरदान था। चमत्कारिक चंगाई सुसमाचार की पुनरुत्थान-सम्बन्धी सामर्थ्य को प्रमाणित किया। ये असाधारण चिन्ह-वरदान तब समाप्त हो गए जब सुसमाचार पृथ्वी की छोर तक फैल गया और कलीसिया पुराने और नये नियम के पूर्ण प्रकाशन की नींव पर स्थापित हो गई। इसी प्रकार, जब प्रेरितों ने ख्रीष्ट के लिखित प्रकाशन को पूरा कर दिया और पवित्रशास्त्र का संग्रह पूरा हो गया, तब भविष्यवाणी की भी कोई आवश्यकता नहीं रह गई।

नए नियम में आत्मिक वरदानों पर सबसे विस्तृत चर्चा पहले कुरिन्थियों 12-14 में मिलती है। यहाँ प्रेरित पौलुस कलीसिया में उत्पन्न हो चुकी वरदानों की व्यापक दुरुपयोग की समस्या को सम्बोधित करता है। कलीसिया के कुछ सदस्य बड़े वरदानों की तुलना में छोटे वरदानों को अधिक महत्व दे रहे थे, जबकि अन्य लोग इनका उपयोग अव्यवस्थित और आत्म-प्रशंसा की रीति से कर रहे थे। कलीसिया के सदस्य उस उद्देश्य को सही ढंग से नहीं समझ पा रहे थे जिसके लिए परमेश्वर ने वरदान दिए थे। अन्य भाषाओं में बोलने और भविष्यवाणी करने के वरदानों के महत्व की तुलना करने के बाद, पौलुस असाधारण वरदानों के अस्थायी कार्य और साधारण वरदानों की निरन्तर क्रियाशीलता के बीच अन्तर स्पष्ट करता है। वह ऐसा इसलिए करता है जिससे उसके पाठक यह समझ सकें कि आत्मा के साधारण वरदानों को असाधारण वरदानों से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए (1 कुरिन्थियों 12:31)।

1 कुरिन्थियों 13:8-13 में, पौलुस तीन असाधारण वरदानों की तुलना तीन साधारण वरदानों (विश्वास, आशा और प्रेम) से करता है। वह यह स्पष्ट करता है कि आत्मा के असाधारण वरदान अन्ततः समाप्त हो जाएँगे, जबकि साधारण वरदान बने रहेंगे (पद 8, 13)। पौलुस कहता है कि असाधारण वरदान तो समाप्त हो जाएँगे, लेकिन साधारण वरदान अनन्त काल तक बने रहेंगे। परमेश्वर के लिखित प्रकाशन के पूर्ण होने के साथ ही असाधारण वरदानों की आवश्यकता समाप्त हो गई, परन्तु साधारण वरदानों की आवश्यकता सुसमाचार के सम्पूर्ण युग में बनी रहेगी (पद 13)। यद्यपि विश्वास और आशा समय के साथ असाधारण वरदानों से अधिक समय तक बने रहेंगे, फिर भी वे अनन्तकाल में प्रेम से अधिक स्थायी नहीं होंगे। विश्वास और आशा विश्वासियों के जीवन में पूर्णता तक, अर्थाट अन्त तक, सक्रिय रहेंगे। प्रेम सबसे महान् वरदान है क्योंकि यह अनन्तकाल तक निरन्तर बना रहता है: “प्रेम कभी समाप्त नहीं होता” (पद 8)। जब ख्रीष्ट लौटेगा, तो विश्वास प्रत्यक्ष सत्य में परिवर्तित हो जाएगा और आशा की पूर्ति हो जाएगी (रोमियों 8:24), परन्तु प्रेम ही वह प्रधान अनुग्रह होगा जो विश्वासियों के के परमेश्वर के साथ और एक-दूसरे के साथ अनन्तकालीन संगति में बना रहेगा। जॉन कैल्विन ने इस खण्ड में पौलुस की शिक्षा से यह निष्कर्ष निकाला:

हमें उस उत्कृष्टता की प्रबल इच्छा रखनी चाहिए जो कभी समाप्त न हो। इसलिए प्रेम को अस्थायी और नश्वर वरदानों से श्रेष्ठ ठहराया जाना ​​चाहिए। भविष्यवाणियाँ समाप्त हो जाती हैं, भाषाएँ क्षीण हो जाती हैं, ज्ञान समाप्त हो जाएगा। इस कारण प्रेम इन सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि ये सब क्षीण हो जाते हैं, परन्तु प्रेम बना रहता है।

यहाँ तक कि जब प्रेरितों के समय में पवित्र आत्मा के असाधारण वरदान अभी भी सक्रिय थे, तब भी पौलुस का सन्देश सरल और स्पष्ट था: प्रेम के साथ अभ्यास किए बिना, अन्य आत्मिक वरदानों का उपयोग व्यर्थ है (1 कुरिन्थियों 13:1-4)। यह सिद्धान्त हम इक्कीसवीं शताब्दी में रहने वालों के लिए भी उतना ही सत्य है जितना प्रेरितों के समय के विश्वासियों के लिए था। जो भी वरदान परमेश्वर ने हमें दिए हैं, उनके उपयोग के पीछे प्रेम ही मार्गदर्शक होना चाहिए।

यद्यपि उद्धार के इतिहास में पवित्र आत्मा के असाधारण वरदान समाप्त हो गए हैं, फिर भी परमेश्वर आज भी अपने लोगों को कलीसिया में सेवा के लिए विभिन्न प्रकार के वरदान देता है, जैसे कि शिक्षा देना और प्रचार करना, दया, अतिथि-सत्कार, उदारता और प्रबन्धन।

 वह इन्हें अपने शरीर के सदस्यों में अलग-अलग रूप से वितरित करता है जिससे कि वे इनका उपयोग अपने ही शरीर के अन्य सदस्यों को प्रेम में दृढ़ करने के लिए करें (रोमियों 12:6-8; इफिसियों 4:11-16)। जब वरदानों का उपयोग प्रेम से किए जाते हैं, तब ख्रीष्ट के शरीर के सदस्य एकजुट और उन्नति करते हैं। 

स्वर्गारोहित ख्रीष्ट ने अपने लोगों को आत्मा का दान भी दिया है और आत्मा के वरदान भी। आत्मा के असाधारण वरदानों ने प्रेरितों के सन्देश के ईश्वरीय उत्पत्ति को प्रमाणित करने के उद्देश्य को पूरा किया है। वे पवित्रशास्त्र में प्रकाशन की प्रगति और नई वाचा की कलीसिया की नींव रखने के साथ जुड़े हुए थे, और उसी की सेवा करते थे। इसी कारण, पवित्रशास्त्र के संग्रहण के पूर्ण होने के साथ ही उनका प्रभाव समाप्त हो गया। आत्मा के साधारण वरदान वे क्रियाएँ हैं जो उद्धार पाए हुए लोगों में उसके उद्धारक कार्य से सामान्य रूप से जुड़े हुए हैं। आत्मा विश्वासियों के जीवन में पवित्रता और फल उत्पन्न करता है। जबकि असाधारण वरदान केवल प्रेरितों के युग में ही प्रभावी थे, साधारण वरदान युग के अन्त तक बने रहते हैं। जैसे प्रेरितिक युग में प्रेम ही वह मार्गदर्शक सिद्धान्त था जिसके द्वारा विश्वासियों ने अपने आत्मिक वरदानों का उपयोग किया, वैसे ही आज भी जब हम परमेश्वर के लोगों की उन्नति के लिए किसी वरदान का उपयोग करें, तो प्रेम ही हमारा मार्गदर्शक होना चाहिए।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

निक बैट्ज़िग
निक बैट्ज़िग
रेव. निक बैट्ज़िग चार्ल्सटन, साउथ कैरोलायना में चर्च क्रीक पीसीए में वरिष्ट पास्टर, और लिग्मिएर मिनिस्ट्रीज़ के एक सहायक सम्पादक हैं।