
पवित्र आत्मा का फल
27 जनवरी 2026
पवित्र आत्मा के वरदान
3 फ़रवरी 2026जोनाथन एडवर्ड्स के संकल्प
वह एक युवा पुरुष थे जो अपने भविष्य के विषय में अनभिज्ञ थे। उनके पास बहुत सारे वरदान थे और बहुत से विकल्प भी थे। उनके पिता और दादा सेवक थे, साथ ही उनके चाचा और परिवार के अन्य लोग भी। उनने बहुत अच्छी पढ़ाई की थी, उस समय की सबसे अच्छी पढ़ाई में से एक, इसलिए यदि वह चाहते तो अकादमी में अपना भविष्य बनाने के लिए पूरी रीति से तैयार थे। उन्हें विज्ञान में भी लगन थी और सम्भवतः वह उस दिशा में भी जा सकते थे। परन्तु अभी के लिए वह एक पास्टर थे, वह भी एक युवा पास्टर। अठारह वर्ष की उम्र में, उन्होंने कनेक्टिकट नदी की घाटी में अपने घर से बहुत दूर, स्वयं को न्यू यॉर्क नगर में एक प्रेस्बिटेरियन कलीसिया में कलीसिया में फूट के मध्य पाया। उन्हें नगर के बन्दरगाह के पास फूट के पश्चात् बने छोटे समूह का पास्टर बनने के लिए बुलाया गया था। 1722 में, जिस वर्ष की बात हो रही है, न्यू यॉर्क नगर उतना व्यस्त नहीं था जितना कि अब है। जनसंख्या लगभग दस हज़ार से थोड़ी कम थी। परन्तु न्यू इंग्लैंड के छोटे नगर के शान्त वातावरण से आए इस नौजवान के लिए, यह एक ऐसा स्थान था जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था।
इस सारी अनिश्चितता और परिर्वतन के मध्य में, इस युवा पुरुष, जोनाथन एडवर्ड्स को खड़े होने के लिए एक स्थान और दिशा के लिए एक कम्पास की आवश्कता थी। इसलिए उन्होंने लिखना आरम्भ किया। उन्होंने एक डॉयरी रखी और कुछ दिशा निर्देश लिखें, जिन्हें बाद में उसने अपने “संकल्प” कहें। ये संकल्प उन्हें खड़े होने का स्थान और आगे बढ़ने के मार्ग में दिशा के लिए एक कम्पास का कार्य करेंगें।
कलीसियाई इतिहासकार शॉन लुकास ने एक बार कहा कि एक ऐसा समय था जब जोनाथन एडवर्ड्स, जोनाथन एडवर्ड्स नहीं थे। कहने का अर्थ है कि एक ऐसा समय था जब एडवर्ड्स एक महान ईश्वरविज्ञानी और पास्टर नहीं थे जिसके रूप में उन्हें अब जाना जाता है। 1722 और 1723 में, अपने उन्नीसवे वर्ष में, वह मात्र जोनाथन एडवर्ड्स ही थे । उस समय महान जागृति (The Great Awakening) और उसमें उनकी भागीदारी, धार्मिक स्नेह (Religious Affections), ब्रेनर्ड का जीवन (Life of Brainerd), और इच्छाशक्ति की स्वतन्त्रका (Freedom of the Will) —और साथ में अन्य पुस्तकों, उपदेश और लेख का प्रकाशन, जो कई अलमारियों को भरने के लिए पर्याप्त थे—स्टॉकब्रिज में मिशनरी का कार्य, और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी (जिसे तब कॉलेज ऑफ न्यू जर्सी के नाम से जाना जाता था) का अध्यक्ष होना, ये सब अभी बहुत दूर की बातें थीं। वह जोनाथन एडवर्ड्स, जो कई पुस्तकों, शोधपत्रों, सम्मेलनों और यहाँ तक कि वेबसाइटों का विषय हैं, अभी तक नहीं बने थे। उन्नीस वर्ष की उम्र में, जोनाथन एडवर्ड्स, सम्भावित जोनाथन एडवर्ड्स थे।
अरस्तू ने वास्तविकता और सम्भावना के बीच के अन्तर के विषय में बात की है, अर्थात् वह जो है और वह जो हो सकता है, उसके बीच का अन्तर। अरस्तू ने आगे यथार्थ् अस्तित्व को वास्तविक अस्तित्व बताया, जबकि सम्भावित अस्तित्व को कुछ कम माना। इसी स्थान पर स्व-सहायता गुरु आते हैं, जो आपको आपके उत्तम से उत्तम होने के लिए जो आप हो सकते हैं सात रहस्यों को बाताते हैं, यदि आप उनके सम्मेलन में भाग लें और कार्यपुस्तिका लें और सात और लोगों को लाएँ। परन्तु एडवर्ड्स स्व-सहायता गुरु से पूर्णतः भिन्न हैं। उनके संकल्प भी सम्मेलन के पश्चात घर ले जाई गई कार्यपुस्तिका से उतने ही भिन्न हैं। एडवर्ड्स के संकल्प वह करते हैं जो सभी स्व-सहायता और “कैसे-करें” पुस्तके नहीं कर सकतीं। वे वह प्राप्त करते हैं जो दूसरे प्राप्त नहीं कर सकते क्योंकि आरम्भ से अन्त तक, वे पुस्तक भण्डार की स्व-सहायता, और “कैसे-करें,” आलमारी में भीड़ लगाने वाली पुस्तकों से पूर्ण रीति भिन्न हैं।
प्रथम, “संकल्पों” के आरम्भिक बिन्दु पर विचार करें। एडवर्ड्स ने 1722 में जब पतझड़ समाप्त होकर सर्दी आरम्भ होती है, तब अपने संकल्प लिखना आरम्भ किया। एडवर्ड्स ने संकल्प संख्या पैंतीस दिनॉक 18 दिसम्बर, 1722 में लिखी, और अन्तिम, संख्या सत्तर को दिनॉक 17 अगस्त, 1723 में लिखी। यह सम्भावना है कि उन्होंने पैंतीसवीं संख्या की दिनाँक से कुछ समय पहले ही अपने संकल्प लिखना आरम्भ किया था, क्योंकि वह 1722 के अगस्त में अठारह वर्ष की उम्र में न्यूयॉर्क नगर आए थे। इन संकल्पों ने उन्हें अपने जीवन के इस तनावपूर्ण छण, एक नयी परिस्थिति के कारण आई अनिश्चितता और परिवर्तन के इस क्षण का सामना करने में सहायता की। परन्तु, क्रम-संख्या एक पर पहुँचने से पहले एडवर्ड्स ने एक आरम्भिक बात कही:
यह जानते हुए कि मैं परमेश्वर की सहायता के बिना कुछ नहीं कर सकता, मैं उससे विनम्रतापूर्वक प्रार्थना करता हूँ कि वह अपने अनुग्रह से मुझे इन संकल्पों को पूरा करने में सक्षम बनाएँ, जहाँ तक वे ख्रीष्ट के लिए उसकी इच्छा के अनुसार हों।
यह प्रस्तावना आगे आने वाले सत्तर संकल्पों का आधार है, जिसे ध्यान में रखना बहुत आवश्यक है। संकल्पों को प्रस्तावना के आधार से अलग करने पर उन्हें स्वयं को सुधारने के लिए व्यक्तिगत साहस और दृढ़ निश्चय की बातें समझी जाती हैं। यह न केवल एक त्रुटिपूर्ण समझ है, वरन् दुःखद भी है। स्व-निर्मित व्यक्ति एक आधुनिक आदर्श है, बाइबलीय नहीं है। परन्तु प्रस्तावना को ध्यान में रखने पर, कोई भी देख सकता है कि एडवर्ड्स स्वयं को ऊँचे स्तर और महान अपेक्षाओं वाला जीवन जीने के लिए बुलाते हैं। उन्होंने ऐसा जीवन जीने का संकल्प लिया है जो अर्थपूर्ण है, न कि केवल समय बिताने वाला जीवन। संकल्प संख्या छह में, एडवर्ड्स कहते हैं, “संकल्प लिया, जब तक मैं जीवित रहूँ, अपनी पूरी सामर्थ से जीऊँगा।”
एडवर्ड्स का सम्पूर्ण जीवन जीने की मनसा वाले इन सत्तर संकल्पों की सूची से कुछ विशेष श्रेणियाँ और विषय सामने आते हैं। कुछ संकल्प अन्तर व्यक्तिगत सम्बन्धों और बातचीत के विषय में ध्यान देते हैं। कुछ संकल्प ऐसी सूचियों में सर्वदा रहने वाले विषय से जुड़ी हैं: खाना-पीना। कुछ संकल्प उनकी आत्मिक और भक्तिमय जीवन के विषय में हैं। कुछ संकल्प पृथ्वी पर अपने समय का समझदारी से उपयोग करने की उनकी इच्छा के विषय में हैं। इस प्रकार के संकल्प लगभग प्रत्येक संकल्पों की सूची में होते हैं। वास्तव में, इक्कीसवीं सदी और अठारहवीं सदी के बीच सभी अन्तरों के पश्चात भी, मनुष्य बहुत से प्रकार से एक जैसे ही हैं। यद्यपि, एडवर्ड्स की सूची में कुछ अनूठे विषय भी हैं।
इन अनूठें विषयों में से एक कष्ट और पीड़ा के विषय में है। सूची के अन्तिम भाग में, एडवर्ड्स लिखते हैं, “संकल्प लिया कि कष्टों के पश्चात यह पता लगाऊँगा कि उनसे मुझे क्या लाभ हुआ, उनसे मुझे क्या अच्छा मिला, और उनसे मुझे क्या मिल सकता था।” परमेश्वर के विषय में एडवर्ड्स की बड़ी के अन्तर्गत उनके जीवन में भला और बुरा दोनों परमेश्वर के हाथ से ही आता है, यह बात तो बहुत अधिक परिपक्व मसीहीओं के लिए भी कठिन होती है, तो उन्नीस वर्ष वाले के लिए और भी। यह मानते हुए कि ईश्वरीय प्रवाधान का वह पक्ष भी जो भौंहें चढ़ाए हुए प्रतीत होता है, जिसे प्यूरिटन लोग कभी-कभी कष्ट और पीड़ा कहते थे, वह उसके भले के लिए ही था, एडवर्ड्स ने स्वयं को परमेश्वर की इच्छा और उसके मार्गों के अधीन समर्पित कर दिया।
एक और अनूठा विषय उनकी नश्वरता और मनुष्य अस्थिता की गहरी समझ से पर ध्यान देती है। कुछ लोग शुद्धतावादीयों (Puritans) को मृत्यु के प्रति आसक्त मानते हैं। नये इंग्लैंड प्राइमर में “Y” अक्षर के साथ यह वाक्य है: “जबकि युवक आनन्द मनाये, मृत्यु निकट हो सकती है।” फिर भी शुद्धतावादियों और एडवर्ड्स को ठीक से समझने के लिए थोड़ा गहराई से देखने की आवश्यकता है। अठारहवीं शताब्दी में जीवन दुर्बल और भंगूर था। सच्चाई यह है कि आज भी जीवन दुर्बल और भंगूर बना हुआ है; हम बस इसे अपनी औषधि और तकनीकी सफलताओं से छिपाने का प्रयास करते हैं। हम अपनी दुर्बलतता के प्रति बहुत सरलता से स्तब्ध हो सकते हैं। एडवर्ड्स यह सब बहुत अच्छी रीति से जानते थे। परिणामस्वरूप, बहुत सारे संकल्पों में एडवर्ड्स इस जीवन से पश्चात आने वाले जीवन को देखते हैं। वह अपने जीवन को समाप्त होने पर आँकलन करने को विषय को गम्भीरता से लेते हैं, क्योंकि वे इतने भोले-भाले नहीं थे कि यह सोचें कि ऐसा कभी नहीं होगा। उनके संकल्प जो उनकी मृत्यु और मरने के पश्चात के जीवन के विषय में बात करते हैं, वे हम इक्कीसवीं शताब्दी में रहने वालों को जीवन की छोटी अवधि को स्मरण दिलाते हैं, जिसे हम शीघ्र ही भूल जाना या अनदेखा करना चाहते हैं।
नश्वरता की इस समझ ने एडवर्ड्स को जीवन के विषय में एक अनूठा दृष्टिकोण दिया। उसने लम्बे दृष्टिकोण को लिया, छोटे को नहीं। संकल्प संख्या बावन में उन्होंने स्वयं को एक समझदारी भरी सलाह दी: “मैं प्रायः बूढ़े लोगों को यह कहते सुनता हूँ कि यदि उन्हें जीवन दोबारा जीने का अवसर मिले तो वे कैसे जिऐंगे। मैं संकल्प करता हूँ कि मैं वैसे ही जिऊँगा जैसा मैं सोचता हूँ कि यदि मैं बूढ़ा हो जाऊँ तो मैं चाहूँगा कि मैंने ऐसा किया होता।”
तत्कालिकता, या फिर जैसा कि कुछ लोगों ने कहा है, वर्तमान का अत्याचार हमें इतना लम्बा दृष्टिकोण लेने से रोकता है। परिणामस्वरूप, हम पाते हैं कि हमारे जीवन कुछ सीमा तक ग्राउंडहॉग डे फ़िल्म में बिल मुरे के पात्र जैसे हैं। हम एक ऐसे अर्थहीन लगने वाले चक्र में फँस गए हैं। हम स्वयं से कहते हैं कि यदि हम केवल आज का दिन निकाल लें, तो फिर कल का दिन भिन्न होगा। फिर कल का दिन आता है और कुछ भी नहीं बदला है। इस अर्थहीन चक्र से बाहर निकलने का एक मार्ग है, स्वतन्त्रता का एक मार्ग। हमारे जीवन का लम्बा दृष्टिकोण वरन् बहुत लम्बा अनन्त दृष्टिकोण एक ऐसे मार्ग मार्ग को उपलब्ध करवाता है। “संकल्प लिया”, संख्या पचपन में एडवर्ड्स लिखते हैं, “कि मैं सम्पूर्ण प्रयास करूँगा कि मैं वैसा ही कार्य करूँ जैसा मुझे लगता है कि मुझे करना चाहिए, यदि मैंने स्वर्ग की खुशी और नरक की यातनाएँ पहले ही देख ली होतीं।”
एडवर्ड्स न केवल अपने संकल्प स्व-सहायता वाले गुरुओं से भिन्न रीति से आरम्भ करते हैं, किन्तु वह उन्हें समाप्त भी भिन्न रीति से करते हैं। संकल्प लेने और उन्हें निभाने में उनका लक्ष्य स्वयं की सन्तुष्टि नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा है। विडम्बना यह है कि आत्म-सन्तुष्टि प्राप्त करने के प्रयास में, व्यक्ति वास्तव में, ख्रीष्ट के शब्दों में, अपना प्राण खो देता है (मत्ती 10:39)। फिर भी, परमेश्वर की महिमा की खोज में, कोई भरपूरता से जीवन पाता है। एडवर्ड्स इसे अपने पहले ही संकल्प में, प्रस्तावना के ठीक पश्चात व्यक्त करते हैं: “संकल्प लिया, कि मैं अपनी सम्पूर्ण जीवन में वही करूँगा जो मुझे परमेश्वर की महिमा और मेरे अपने भले, लाभ और खुशी के लिए सबसे उचित लगेगा।” वेस्टमिंस्टर लघु प्रश्नोत्तरी ने यह बात सदैव सही ही कही थी। परमेश्वर की महिमा करने और उनका आनन्द लेने के मध्य एक स्वभाविक सम्भन्ध है। एडवर्ड्स इसे केवल और आगे बढ़ाते हैं। परमेश्वर की महिमा के लिए जिया गया जीवन ही आनन्द का जीवन है, यह एक अच्छा जीवन है। जॉर्ज मार्सडेन, एडवर्ड्स की अपनी प्रतिष्ठित जीवनी में कहते हैं, “जोनाथन ने अपने ‘संकल्पों’ को प्रत्येक उस कमी को भरने की ओर निर्देशित किया जो उन्हें उस एकमात्र योग्य कार्य से भटका सकती थी, जिसे वे परमेश्वर की महिमा करना चाहते थे” (जोनाथन एडवर्ड्स: ए लाइफ, न्यू हेवन: येल यूनिवर्सिटी प्रेस, 50, 2003)। एडवर्ड्स की जीवन में सब कुछ, उनकी सभी गतिविधियाँ और प्रयास, इसी प्रमुख्य लक्ष्य की ओर वापस जाना था।
केवल यही बात एडवर्ड्स के संकल्पों को विशेष बनाती है। उनके साथी उपनिवेशवादी बेंजामिन फ्रैंकलिन ने भी संकल्प लिखने आरम्भ किए। 1726 में फ्रांस की अपनी प्रथम यात्रा के पश्चात फिलाडेल्फिया वापस आते समय अपनी लम्बी समुद्री यात्रा में, उन्होंने “कुछ संकल्प लेने और कार्य करने की कुछ योजना बनाने” का निर्णय किया। फ्रैंकलिन जीवन भर उन्हें बनाते और बदलते रहे। उस प्रथम सूची में, उनका तीसरा संकल्प उनके लक्ष्य से सम्बन्धित था: “मैं जो भी कार्य हाथ में लूँ, उसे लगन से करूँ, और शीघ्रता से धनी बनने के किसी मूर्खतापूर्ण युक्ति से अपने मन को अपने कार्य से भटकने न दूँगा; क्योंकि परिश्रम और धैर्य ही बहुतायत के सबसे पक्के साधन हैं।” उनकी एकाग्रता और धैर्य सराहनीय हैं, किन्तु अन्त में फ्रैंकलिन का लक्ष्य “बहुताया” पाना था, समृद्ध होना था। एडवर्ड्स ने अपनी दृष्टि उससे अधिक ऊँचे पर लगाई।
जिस प्रकार से एडवर्ड्स अपने संकल्पों को आरम्भ और समाप्त करते हैं, वह उन्हें स्व-सहायता और कैसे-करें सुझाव के बाढ़ से भिन्न करता है। एडवर्ड्स के पास एक भिन्न और अनोखी नींव और लक्ष्य थे। उनके मध्य में उनके पास कुछ अनुठी बातें कहने को हैं। इनमें से एक चिन्ता पवित्रशास्त्र को पढ़ने से जुड़ी है, जिसे आधुनिक और अब उत्तर-आधुनिक संसार में बहुत से लोगों ने एक पुरानी पुस्तक मानकर छोड़ दिया है, जो अब भरोसेमन्द या सार्थक नहीं रही। ऐसी सोच के विरुद्ध, एडवर्ड्स ने स्वय को पवित्रशास्त्र के प्रति समर्पित किया, जैसा कि संकल्प संख्या अट्ठाईस में देखा जा सकता है: “संकल्प लिया कि मैं पवित्रशास्त्र का इतनी लगन, नियमितता और बार-बार अध्ययन करूँगा, कि मैं स्वयं को उसके ज्ञान में बढ़ते हुए पा सकूँ और स्पष्ट समझ पा सकूँ।”
एडवर्ड्स ने संकल्प संख्या उनतीस में प्रार्थना के विषय में भी कुछ कहा है: “ संकल्प लिया कि मैं उसे कभी प्रार्थना नहीं मानूँगा, और न ही उसे प्रार्थना या प्रार्थना की विनती के रीति से स्वीकार करूँगा, जो इस प्रकार से की गई हो कि मुझे आशा न हो कि परमेश्वर उसका उत्तर देगा; और न ही उसे अंगीकार मानूँगा, जिसके विषय में मुझे आशा न हो कि परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा।” हो सकता है इसलिए कि एडवर्ड्स शब्दों का उपयोग बहुत अच्छे से करते थे, इसलिए उनके मन में शब्दों के लिए बहुत अधिक और सच्चा सम्मान था। केवल शब्दों को बोलने में रुचि न रखते हुए, एडवर्ड्स चाहते थे कि प्रार्थना के समय उनके शब्द अर्थपूर्ण हों, ऐसे शब्द जो बिना सोचे-समझे न बोले गए हों, किन्तु सच्चे विश्वास के साथ बोले गए हों। इसके अतिरिक्त, हमें एडवर्ड्स के अंगीकार की प्रार्थनाओं को भी ध्यान देना चाहिए।
“संकल्पों” में एडवर्ड्स ने पवित्रशास्त्र को पढ़ने और प्रार्थना करने के आत्मिक अनुशासन में विश्वास रहने की अपनी सच्ची इच्छा व्यक्त की है। न्यू यॉर्क छोड़ने के कई वर्षों पश्चात, जब वह धर्मिक स्नेह पुस्तक लिख रहे थे, तब एडवर्ड्स ने अपने यहूदी पड़ोसी को स्मरण किया। एडवर्ड्स को वह व्यक्ति अच्छी रीति से स्मरण था, “जो मैने अपने जीवन में देखा वह सबसे अधिक धार्मिक व्यक्ति लगा; उसका अधिकाँश समय परमेश्वर की आराधना में समर्पित कार्यों में बाीतता था।” एडवर्ड्स ने इस व्यक्ति की भक्ति का उपयोग धर्मिक स्नेह (1746) में मसीहीओं को और गहरी भक्ति के लिए चुनौती देने के लिए किया। 1722 में, जब वह “संकल्प” लिख रहे थे, तो इस व्यक्ति ने एडवर्ड्स की स्वयं की भक्ति को चुनौती दिया था।
पवित्रशास्त्र को पढ़ने और प्रार्थना करने के अतिरिक्त, एडवर्ड्स ने समुदाय के विषय में भी स्वयं से बहुत कुछ कहा, यद्यपि उन्होंने इस शब्द का उपयोग नहीं किया। अधिकतर, यदि सभी नहीं, तो अधिकाँश संकल्प अन्तर व्यक्तिगत सम्बन्धों से जुड़े थे। और इनमें से अधिकाँश का सम्बन्ध उनकी बातचीत करने से था। “संकल्प लिया कि कहानियों में कभी भी शुद्ध और सरल सच्चाई के अतिरिक्त कुछ नहीं बोलूँगा,” उन्होंने संकल्प संख्या चौंतीस में स्वयं से यह प्रतिज्ञा की। वह केवल सच बोलने के पीछे नहीं थे, वह प्रम से भी बोलना चाहते थे। संकल्प संख्या इकत्तीस में, वह लिखते हैं, “संकल्प लिया कि कभी भी किसी के विरोध कुछ नहीं कहूँगा, सिवाय इसके कि जब यह मसीही सम्मान और मानवता के प्रति प्रेम के उच्चतम स्तर के पूरी रीति से अनुकूल हो;” इसके पश्चात वह जोड़ते हैं, “सबसे विनम्रता और अपनी त्रुटियों और कमियों की समझ के अनुकूल।” एडवर्ड्स को अनुभूति हुई कि वह दूसरों की उन्हीं त्रुटियों के लिए कितनी आलोचना कर सकते हैं जो उनके अपने जीवन में थीं। यह जागरुकता हमारे जीवनसाथी, बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों, ख्रीष्ट में हमारे भाइयों और बहनों, हमारे सहकर्मियों और मालिकों और हमारे पड़ोसियों के साथ बातचीत करने में बहुत उपयोगी है।
एडवर्ड्स ने अन्तर व्यक्तिगत सम्बन्धों के विषय में साधारण सोच को भी अनदेखा किया। संकल्प संख्या तैंतीस से यह स्पष्ट हो जाता है। इसमें वह लिखते हैं, “संकल्प लिया कि मैं सदैव शान्ति बनाने, बनाए रखने और बचाने के लिए वह सब करूँगा जो मैं कर सकता हूँ, जब तक कि इससे दूसरे विषयों में अधिक हानि न हो।” स्मरण रखें, जब एडवर्ड्स ने यह लिखा था, तब वह कलीसिया में विघटन के पश्चात बने एक अलग समूह के पास्टर थे। उन्होंने आपसी बातचीत में आने वाली समस्याओं को पहचाना था।
इन संख्या वाले संकल्पों में से अन्तिम, सत्तरवें संकल्प में कहा गया है, “मैं जो कुछ भी बोलूँ, उसमें कुछ उदारता हो।” केवल यही एक संकल्प किसी भी व्यक्ति के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन कार्य करने के लिए पर्याप्त होगा। एडवर्ड्स के पास ऐसे ही 69 और चुनौतीपूर्ण संकल्प थे।
इनमें से कुछ संकल्पों को पढ़ने से एडवर्ड्स एक शक्तिमान (सुपरमैन) जैसे लगते हैं, परन्तु संकल्प संख्या छत्तीस में उनकी नम्रता सामने आती है। इसके पहले भाग में एडवर्ड्स लिखते हैं, “कभी किसी के विषय में बुरा नहीं बोलूँगा,” और इसके पश्चात जोड़ते हैं, “जब तक कि इसके लिए कोई विशेष अच्छा कारण न हो।” एडवर्ड्स को सच्चा मनुष्य की रीति से देखकर मन उत्साहित होता है। हम यह संकल्प संख्या छप्पन में भी देखते हैं, जिसमें वह अपने पाप, अपनी “बुराइयों” से विश्वासयोग्यता से व्यवहार करते हैं। यहाँ वह लिखते हैं, “संकल्प लिया कि कभी हार नहीं मानूँगा, और न ही अपनी बुराइयों से लड़ाई में तोड़ा भी ढीला पड़ूँगा, भले ही मैं कितना भी असफल क्यों न रहूँ।”
अपने नायक को मनुष्य के समान देखना उत्साहित कर देने वाला है। वास्तव में, हमें उन्हें ऐसे ही देखना चाहिए। विनम्रता की एक दृढ़ भावना और अपनी मानवता, दुर्बलताओं और कमियों का दृढ़ अनुभित, हमें एडवर्ड्स के संकल्पों को पढ़ने, साथ ही अपने संकल्प बनाने और उन्हें पूरा करने को एक सही दृष्टिकोण देखने में सहायता करता है। हमें स्मरण रखना चाहिए कि एक समय था जब जोनाथन एडवर्ड्स, जोनाथन एडवर्ड्स नहीं थे। इससे भी आवश्यक बात, हमें स्मरण रखना चाहिए कि जोनाथन एडवर्ड्स ने स्वयं को जोनाथन एडवर्ड्स नहीं बनाया—भले ही वह संकल्प बनाने और उन्हें पूरा करने में कितने भी अच्छे क्यों न हों। परमेश्वर ने ईश्वर-मनुष्य यीशु ख्रीष्ट के कार्य से जोनाथन एडवर्ड्स को जोनाथन एडवर्ड्स बनाया। ख्रीष्ट ने सबसे बड़ा संकल्प लिया, और उन्होंने इसे पूरी रीति और एकदम सिद्ध रीति से पूरा किया। ख्रीष्ट ने अपने पतित और पापी लोगों को बचाने का संकल्प लिया जिससे कि यह नया समुदाय पिता के साथ मेल-मिलाप कर सके और पवित्रता का जीवन जी सके।
कई वर्षों के पश्चात, महान जागृति के समय, डेबोरा हैथवे नाम की एक युवती ने एडवर्ड्स को चिट्ठी लिखकर पूछा कि मसीही जीवन कैसे जिया जाए। वह उस समय सफ़ील्ड, कनेक्टिकट में रहती थी, जो उस समय बिना पास्टर वाला नगर था। क्योंकि सफ़ील्ड नॉर्थम्प्टन से थोड़ी ही दूरी पर था, इसलिए एडवर्ड्स समय-समय पर वहाँ उपदेश देते थे। एडवर्ड्स ने उन्नीस बातों वाली चिट्ठी लिखकर उत्तर दिया, जबकि यह सम्भवतः उनके जीवन का सबसे व्यस्त समय था। यह चिट्ठी सच्च में उसके और उसकी सहेलियों के लिए कुछ संकल्पों की सूची थी, जिनके साथ एडवर्ड्स ने उसे यह चिट्ठी साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया। वह आत्मिक अनुशासन, पाप की अनुभूति होने, और परमेश्वर की अनुग्रह का और भी अधिक अनूभूति होने के विषय में बात करते हैं। परन्तु सम्भवतः उनकी सबसे अच्छा सुझाव अन्त में आता है, जब वह लिखते हैं, “अपने सम्पूर्ण जीवन में, परमेश्वर के साथ चलो और एक छोटे, निर्धन, लाचार बच्चे के समान ख्रीष्ट का अनुसरण करो, ख्रीष्ट का हाथ पकड़ो, और अपनी दृष्टि को उसके हाथ और पंजर पर लगे चोट के निशान पर रखो।”
जोनाथन एडवर्ड्स की इस स्मरण दिलाने के लिए धन्यवाद, हमने संकल्प किया है कि हम अपनी दृष्टि ख्रीष्ट पर रखेंगे।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

