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यीशु नया दाऊद है

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क्या यीशु सिद्ध  था?

Was Jesus Perfect?

“कोई भी सिद्ध नहीं होता।” यह आज के समय की एक प्रसिद्ध उक्ति है, और इसमें कुछ सच्चाई भी है। हम सभी अपनी निर्बलताओं और सीमाओं को जानते हैं, इसलिए जब हमसे त्रुटि होती है तो प्राय: अपने बचाव में यही कह देते हैं कि “कोई भी सिद्ध नहीं होता।” 

फिर भी, बाइबल इस नियम का एक अपवाद प्रस्तुत करती है। हम कभी-कभी यह भी सुनते हैं, “इस संसार में केवल एक ही सिद्ध मनुष्य हुआ है।” वह मनुष्य यीशु ख्रीष्ट है।

यह पूर्ण रीति से सत्य है कि यीशु ही एकमात्र सिद्ध मनुष्य है जिसने कभी इस संसार में जीवन बिताया। परन्तु बाइबल यह बात कहाँ और किस प्रकार सिखाती है? रोचक बात यह है कि कुछ बाइबल पद यह भी कहते हैं कि यीशु सिद्ध बना। आइए, हम यीशु की सिद्धता के विषय का अध्ययन करें।

परमेश्वर का ईश्वरीय पुत्र 

इससे पहले कि हम विशेष रूप से यीशु के सिद्ध मानवीय जीवन के विषय में बात करें, हमें यह समझना आवश्यक है कि वह एक अनन्त और ईश्वरीय व्यक्ति है। दूसरे शब्दों में, वह परमेश्वर का शाश्वत पुत्र है (यूहन्ना 1:1)। वह अनादि काल से परमेश्वर के स्वभाव की समस्त सिद्धता के साथ अस्तित्व में है। वह अपने अस्तित्व, बुद्धि, सामर्थ्य, पवित्रता, न्याय, भलाई और सत्य में अनन्त, शाश्वत और अपरिवर्तनशील है (वेस्टमिंस्टर लघु प्रश्नोत्तरी, प्रश्न 4)।

दूसरे शब्दों में, यीशु अपने ईश्वरीय पुत्रत्व के कारण सिद्ध है। वह पूर्णतः पाप से रहित है। 

यीशु की सिद्ध मानवता

उसके ईश्वरीय पुत्रत्व के विपरीत, जब हम यीशु के सिद्ध जीवन की बात करते हैं, तब हम उसके देहधारण के बाद उसकी मानवता के अनुसार उसके जीवन पर विचार करते हैं। अर्थात्, हम उसके मानवीय स्वभाव में उसके पूर्ण और निष्पाप जीवन की बात कर रहे होते हैं। इसे कई दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है।

पहली बात, यीशु आदम के पाप में सहभागी नहीं था। रोमियों 5:12–21 इसी सत्य की ओर संकेत करता है। आदम में “सब ने पाप किया” (रोमियों 5:12), परन्तु यीशु इसका स्पष्ट प्रतिवाद प्रस्तुत करता है। जिस प्रकार एक ही अपराध का प्रतिफल उन सब पर दण्ड आया जो आदम में हैं, उसी प्रकार धार्मिकता के एक ही कार्य द्वारा उन सब पर धर्मीकरण और जीवन आया जो ख्रीष्ट में हैं (रोमियों 5:18–19)।  

यदि सभी मनुष्यों ने आदम के द्वारा पाप किया, और फिर भी ख्रीष्ट धार्मिकता और जीवन प्रदान करता है, तो इसका अर्थ है कि यीशु उन “सब” में सम्मिलित नहीं था जिन्होंने आदम में पाप किया। जो धार्मिकता वह अपने लोगों को प्रदान करता है, वह इस तथ्य पर आधारित है कि वह वाचा का स्वामी और पूर्ण रीति से धर्मी प्रतिनिधि है। यह बात उस सन्देश के साथ भी मेल खाती है जो स्वर्गदूत जिब्राएल ने मरियम को दिया था कि जो बालक उसके गर्भ से जन्म लेगा, वह पवित्र होगा और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा (लूका 1:35)।

इस सब का अर्थ यह है कि यीशु में कोई पतित स्वभाव नहीं था जो पाप की ओर झुकाव रखता हो। यीशु का मानव स्वभाव निष्पाप और पाप रहित था। वह सिद्ध रीति से धर्मी था। 

दूसरा, यीशु ने एक सिद्ध आज्ञाकारी मानवीय जीवन व्यतीत किया। इसे भी आदम के सन्दर्भ में समझना चाहिए। आदम की अनाज्ञाकारिता के कारण दोष और दण्ड संसार में आया, परन्तु नया नियम यीशु को “दूसरा” और “अन्तिम आदम” के रूप में प्रस्तुत करता है, ऐसे प्रतिनिधि के रूप में जिसकी आज्ञाकारिता पहले आदम की अनाज्ञाकारिता के परिणामों को उलट देती है। 

रोमियों 5:12–21 के अतिरिक्त, मरकुस के सुसमाचार में परीक्षा का वर्णन भी यीशु को नए आदम के रूप में प्रस्तुत करता है। वह ऐसा प्रतिनिधि है जो परीक्षा के समय भी आज्ञाकारी बना रहता है। सम्भवतः इसी कारण वहाँ जंगली जन्तुओं का उल्लेख किया गया है, जो अदन की वाटिका की ओर संकेत करता है (मरकुस 1:12–13)।

इसी प्रकार, लूका 3:21–22 में यीशु के बपतिस्मा के बाद, लूका उसकी वंशावली को आदम तक ले जाता है (लूका 3:23–38)। इसके बाद यीशु जंगल में आज्ञा का पालन करता है (लूका 4:1–13)। यह भी दर्शाता है कि यीशु की आज्ञाकारिता उसके “नए आदम” होने की पहचान से गहराई से जुड़ी हुई है। 

पौलुस 1 कुरिन्थियों 15 में भी इसी सत्य पर प्रकाश डालता है। यीशु “अन्तिम आदम” है, जिसके द्वारा मृतकों का पुनरुत्थान आता है (1 कुरिन्थियों 15:21–22, 45)। यीशु का पुनरुत्थान उसकी अन्यायपूर्ण मृत्यु पर परमेश्वर द्वारा उसकी निर्दोषता की पुष्टि था। क्योंकि वह निष्पाप था, इसलिए अपराधी के समान उसकी हत्या किया जाना घोर अन्याय था। उसका मृतकों में से जी उठना इस बात का प्रमाण है कि उसने अपने सम्पूर्ण जीवन में परमेश्वर की पूर्ण आज्ञाकारिता का पालन किया (देखें 1 तीमुथियुस 3:16)। उसका पुनरुत्थान इस बात की पुष्टि करता है कि उसका सम्पूर्ण जीवन निर्दोष और पूर्ण आज्ञाकारिता का जीवन था (इब्रानियों 2:14–18)। 

तीसरा, जब इब्रानियों का पत्री में यह वर्णन है कि यीशु “सिद्ध किया गया” (इब्रानियों 2:10; 5:9; 7:28), तो हमें इस कथन को उद्धार के इतिहास के सन्दर्भ में समझना चाहिए, न कि उसके स्वभाव या चरित्र में किसी कमी के रूप में। परमेश्वर के शाश्वत पुत्र के रूप में यीशु में कोई पाप नहीं था। इसके अतिरिक्त, यीशु ने पृथ्वी पर अपने सम्पूर्ण जीवन में भी कभी पाप नहीं किया। इसलिए जब कहा जाता है कि वह “सिद्ध किया गया”, तो इसका अर्थ यह है कि उसने अन्तिम और पूर्ण महायाजक के रूप में अपने कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया। उसी के द्वारा हमें परमेश्वर तक वह पहुँच प्राप्त होती है जो पुराने नियम के याजकों के द्वारा कभी सम्भव नहीं थी (इब्रानियों 5:7–10; 6:19–20; 9:11–14; 10:5–14)।

यीशु स्वयं को अन्तिम बलिदान के रूप में इसलिए चढ़ा सका क्योंकि वह परमेश्वर का शाश्वत पुत्र है, जो अविनाशी जीवन की सामर्थ्य के अनुसार सदा जीवित रहता है (इब्रानियों 7:15–28)। यीशु का पुनरुत्थान और उसके द्वारा परमेश्वर तक हमारी पहुँच, उसके स्वयं के बलिदान की पूर्णता को दिखाता है, और यदि उसका बलिदान सिद्ध था, तो पृथ्वी पर उसका सम्पूर्ण जीवन भी सिद्ध था। 

निष्कर्ष

चूँकि हम में से कोई भी सिद्ध नहीं है, इसलिए यह हमारे लिए अत्यन्त शुभ सन्देश है कि यीशु सिद्ध है। वही दूसरा और अन्तिम आदम है, जिसकी सिद्ध आज्ञाकारिता हमारे धर्मीकरण का आधार है, और जिसका लाभ हमें विश्वास के द्वारा प्राप्त होता है। अनन्त जीवन उसी में पाया जाता है (यूहन्ना 1:4; 20:31)। वह केवल एक साधारण मनुष्य नहीं है; वह परमेश्वर का अनन्त पुत्र है। फिर भी, वह सच्चा मनुष्य भी है—वह परमेश्वर-मनुष्य, जिसने हमारे लिए वह कार्य पूरा किया जिसे हम अपने लिए कभी पूरा नहीं कर सकते थे।

सिद्ध महायाजक के रूप में, यीशु ही एकमात्र मध्यस्थ है, जो परमेश्वर तक पहुँचने का सिद्ध मार्ग प्रदान करता है (इब्रानियों 10:14)। इसलिए, आओ हम साहस के साथ अनुग्रह के सिंहासन के निकट आएँ कि हम पर दया हो और अनुग्रह पाएँ कि आवश्यकता के समय हमारी सहायता हो (इब्रानियों 4:14–16)

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

ब्रैन्डन डी. क्रो

ब्रैन्डन डी. क्रो

डॉ. ब्रैन्डन डी. क्रो फिलाडेल्फिया में वेस्टमिन्स्टर थियोलॉजिकल सेमिनरी में नए नियम के सहायक प्रोफेसर हैं। वह कई पुस्तकों के लेखक हैं, जिनमें द लास्ट ऐडम और द मेसज ऑफ द जेनेरल एपिस्टल्स इन द हिस्टरी ऑफ रिडेम्प्शन सम्मिलित हैं।