Covenant Theology for Kids A Beginner’s Guide

बच्चों के लिए वाचाई ईश्वरविज्ञान: एक आरम्भिक मार्गदर्शिका 

8 अक्टूबर 2026
Covenant Theology for Kids A Beginner’s Guide

बच्चों के लिए वाचाई ईश्वरविज्ञान: एक आरम्भिक मार्गदर्शिका 

8 अक्टूबर 2026

चुनौतियों के समय में एक पिता की भूमिका 

The Ways of a Father in Challenging Times

पितृत्व अनेक चुनौतियों से भरा होता है। इनमें से सबसे कठिन चुनौतियों में एक अपने पुत्र या पुत्री को भटकते हुए देखना—जिनका पालन-पोषण ख्रीष्ट-केन्द्रित परिवार में हुआ हो— इसके पश्चात भी विश्वास से दूर जाते हुए देखना। ऐसे समय में हम किसकी ओर देखें?

नीतिवचन की पुस्तक हमें ऐसी संकटमय परिस्थितियों में मार्गदर्शन और प्रोत्साहन प्रदान करती है। यह पवित्र आत्मा की प्रेरणा से लिखी गई है,

“और भोले-भालों को समझ,
तथा युवकों को ज्ञान और विवेक प्राप्त हो।
बुद्धिमान इन्हे सुनकर अपनी विद्या बढ़ाए,
और समझदार व्यक्ति बृद्धिमानी का परामर्श प्राप्त करे।”   (नीतिवचन 1:4–5)

अपने बच्चे की भलाई के लिए पिता की आशा सबसे पहले ईश्वरभक्तिपूर्ण शिक्षा के माध्यम से व्यक्त होती है। नीतिवचन के आरम्भिक अध्याय पुत्रों और पुत्रियों को यह प्रोत्साहित करते हैं कि वे “अपने पिता की शिक्षा को सुनें” (नीतिवचन 1:8), “मेरी बातों को ग्रहण करे” (2:1), “मेरी शिक्षा को न भूलना” (3:1), “हे पुत्रों, पिता की शिक्षा सुनो” (4:1), “मेरी बुद्धि पर ध्यान दो” (5:1), “हे मेरे पुत्र, ऐसा कर कि अपने आप को बचा ले” (6:3), तथा “मेरे वचनों को मान और मेरी आज्ञाओं को अपने हृदय में रख ले” (7:1)। क्या हमने उनके हृदयों और मनों में बाइबलीय सत्यों को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए वह सब किया है जो हम कर सकते थे?  

पिताओं को अपने भटके हुए पुत्र या पुत्री के मार्गों का भी सावधानीपूर्वक विश्लेषण करना चाहिए। नीतिवचन हृदय की तीन ख़तरनाक दशाओं को प्रकट करता है—भोला-भाला, जो परमेश्वर को भूल जाता है; ठट्ठा करने वाला जो परमेश्वर को अनदेखा करता है; और मूर्ख, जो परमेश्वर को अस्वीकार करता है (नीतिवचन 1:22)। इन तीनों में क्रमशः हृदय और अधिक कठोर होता जाता है, वे आत्मिक सत्य के प्रति और अधिक असंवेदनशील होते जाते हैं, और विनाश के और अधिक निकट पहुँचते जाते हैं। मुख्य बात यह पहचानना है कि वे किन आवाज़ों को सबसे अधिक ध्यानपूर्वक सुनते हैं। वे किन लोगों के साथ चलते, खड़े होते या बैठते हैं?

भोले-भाले लोग अनुभवहीन होते हैं, वे प्रलोभन की आवाज़ों को सुनते हैं और सरलता से बुरी संगति द्वारा प्रभावित हो जाते हैं। बुद्धि पुकारकर भोले-भालों को उनके चुनावों के परिणाम दिखाती है और उन्हें उन आदतों तथा मित्रों को छोड़ देने के लिए कहती है (नीतिवचन 7:6–27)। ठट्ठा करने वाला अधिक अंहकारी  होता है, वह पाप का उपहास करता है और सारी ईश्वरभक्तिपूर्ण परामर्श की उपेक्षा करता है। बुद्धि उसे चुनौती देती है कि वह अपने पिता की डाँट सुने, कहीं ऐसा न हो कि अन्त में वह विनाश, लज्जा और अपमान का भागी बने (नीतिवचन 13:1)। मूर्ख दृढ़तापूर्वक परमेश्वर को अस्वीकार करता है और उसके वचन का अनादर करता है। बुद्धि ऐसे व्यक्ति को चेतावनी देती है कि वह अनसुना करके वह स्वयं पर विनाश ले आता है, और उसका अन्त मृत्यु का मार्ग है । प्रेमपूर्वक सत्य कैसे और कितनी बार बोलना चाहिए, यह जानने के लिए परमेश्वर से बुद्धि माँगें।

पिताओं को और किन व्यवहारिक प्रयासों को करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है?  

प्रार्थना

एक पिता का सबसे पहला और सबसे बड़ा साधन यह है कि वह निरन्तर अपने बच्चे को अनुग्रह के सिंहासन के सामने लाता रहे। बहुत वर्षों की सेवकाई का अनुभव रखने वाले पास्टर और अनेक बच्चों तथा पोते-पोतियों के पिता जॉन येट्स लिखते हैं:

“बहुत शीघ्र बच्चे एक व्यक्ति को उसकी अपनी सीमाओं का बोध कराने लगते हैं। वह समझने लगता है कि उसके पास हर प्रश्न का उत्तर नहीं है, और यह कि वह पति तथा पिता के रूप में अनेक बार असफल होता है… यहीं से जीवन की एक नई रीति आरम्भ होती है, जिसे प्रार्थना कहते हैं।”

येट्स एक अत्यन्त उपयोगी उपाय भी बताते हैं—प्रार्थना की एक पुस्तिका, जिसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य की विशेष आवश्यकताओं और उनके उत्तरों को लिखा जाए। एक पिता की निरन्तर की गई प्रार्थनाएँ बहुत प्रभावशाली  होती हैं।

पश्चात्ताप

कभी-कभी किसी खोए हुए या विश्वास से भटक गए बच्चे के आत्मिक जीवन में आई टूटन के लिए पिता स्वयं भी कुछ सीमा तक उत्तरदायी हो सकता है। क्या हमने हाल ही में अपने बच्चों से कहा है कि हम उनसे कितना प्रेम करते हैं? क्या हमने नम्रता के साथ पिता के रूप में अपनी असफलताओं और पापों को उनके सामने स्वीकार किया है? क्रोध में कहे गए शब्दों, चोट पहुँचाने वाले व्यवहार, या ऐसे अनुशासन के लिए—जो ढीला, असंगत या अत्यधिक कठोर रहा हो—सच्चे मन से क्षमा माँगने में कभी देर नहीं होती। सच्चे पुरुष क्षमा माँगने की पहल स्वयं करते हैं।

कभी हार न मानें। बुद्धिमान पिता दृढ़तापूर्वक एक वास्तविक सम्बन्ध बनाए रखने का प्रयास करता है, जहाँ तक उसका भटका हुआ बच्चा इसकी अनुमति देता है। 

यदि सम्भव हो, तो अपने पापों की स्वीकारोक्ति आमने-सामने करनी चाहिए। यदि यह सम्भव न हो, तो वीडियो कॉल, फ़ोन पर बातचीत, या अन्त में लिखित पत्र का सहारा लिया जा सकता है। लिखित पत्र हाथ से लिखा हुआ होना चाहिए, क्योंकि आपके अपने हाथों से लिखा गया पत्र ईमेल या सन्देश की अपेक्षा कहीं अधिक प्रभाव डालता है।

धैर्य

एक पास्टर ने 1876 में मसीही परिवार पर एक अत्यन्त विचारोत्तेजक पुस्तक लिखी। उसमें वह पिताओं को यह शिक्षा देता है कि वे धैर्य के साथ अपने परिवार का मार्गदर्शन करें: “उद्देश्य बच्चे की इच्छा को तोड़ना नहीं, वरन उसे शिक्षित करना है; उसकी स्वतन्त्रता को बाहरी बल से बाँधना नहीं, वरन् उसे स्वयं पर नियन्त्रण करना सिखाना है।” परमेश्वर के अनुग्रह का कार्य प्रायः धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। इसलिए धैर्य रखिए। अनुग्रह को समय दीजिए कि वह बच्चे के अनियंत्रित स्वभाव को वश में करे। उसके हृदय को बलपूर्वक जीतने का प्रयास न कीजिए, वरन् कोमलता और धैर्य के साथ उसे जीतने का प्रयत्न करें।

मधुर व्यवहार

इस बीच, अपने बच्चे के पीछे निरन्तर पड़े रहने वाले या भय उत्पन्न करने वाले पिता मत बनिए। सत्य स्पष्ट रूप से कहिए, परन्तु हर बातचीत का विषय वही न बनाइए। पहले से सोच-विचार करके ऐसे शब्दों का प्रयोग कीजिए जो क्रोध नहीं, प्रेम प्रकट करें; निराशा नहीं, धैर्य प्रकट करें। “पिताओ, अपने बच्चों को क्रोध न दिलाओ, वरन् प्रभु की शिक्षा और अनुशासन में उनका पालन -पोषण करो।” (इफिसियों 6:4)। जहाँ तक सम्भव हो, साथ समय बिताइए और ऐसे कार्य कीजिए जिनमें आप दोनों आनन्द ले सकें। प्रभु से प्रार्थना कीजिए कि वह आपको ऐसा स्वागतपूर्ण स्वभाव दे, जिससे आपका बच्चा आपके पास आने में सहज अनुभव करे। उससे नए सम्बन्ध बनाने के सृजनात्मक उपाय माँगिए और साथ बिताए गए समय में आनन्द खोजिए।

दृढ़ता

कभी आशा मत छोड़िए। बुद्धिमान पिता अपने पथभ्रष्ट पुत्र या पुत्री के साथ वास्तविक सम्बन्ध बनाए रखने का निरन्तर प्रयास करता है, जितनी सीमा तक उसका बच्चा उसे ऐसा करने देता है। बिना शर्त प्रेम यह कहता है, “मैं तुमसे प्रेम करता हूँ, चाहे तुमने कुछ भी किया हो।” इसका सर्वोत्तम उदाहरण प्रभु यीशु द्वारा सुनाया गया उड़ाऊ पुत्र का दृष्टान्त है। अस्वीकार किए गए पिता ने अपने खोए हुए पुत्र की प्रतीक्षा करना कभी नहीं छोड़ा। वह प्रतिदिन चौकसी के साथ देखता था कि कहीं उसका पुत्र लौटता हुआ दिखाई दे। जब उसने अपने पुत्र को घर लौटते देखा, तो उसका हृदय करुणा से भर गया। वह दौड़कर उसके पास गया और उसे गले लगा लिया। उसने उसके अपव्ययी जीवन के कारण उसे अस्वीकार नहीं किया, वरन् उसे क्षमा करके पुनः परिवार में स्वीकार कर लिया। तब “आनन्द मनाया जाने लगा” (लूका 15:24)। अपने पुत्र या पुत्री को यह विश्वास दिलाइए कि आपके घर का द्वार उनके लिए सदैव खुला रहेगा।

अन्त में, हे पिताओं, स्वयं को और अपने बच्चे को प्रभु के हाथों में सौंप दीजिए। अन्ततः छुटकारा केवल उसी का कार्य है, और उसका हाथ कभी इतना छोटा नहीं होता कि वह उद्धार न कर सके।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

केनेथ बी. विंगेट

केनेथ बी. विंगेट

केनेथ बी. विंगेट दक्षिण कैरोलाइना के कोलंबिया नगर में वकालत करते हैं और प्रथम प्रेस्बिटेरियन कलीसिया में शासक प्राचीन के रूप में सेवा करते हैं। वे A Father’s Gift: Lessons from Proverbs तथा Rich Grace in Poor Soil: Growing in the Master’s Grip पुस्तकों के लेखक हैं।