
प्रियजन की मृत्यु का शोक करना
28 अगस्त 2025
क्या परमेश्वर सदैव ख्रीष्टियों से प्रसन्न रहता है?
4 सितम्बर 2025संतोष को पाने के पाँच मार्ग
आपने अंतिम बार कब दर्पण में स्वयं को देखा और जो देखा उसे बदलना चाहा? पिछले महीने में किस बात आपने कहा, “मुझे यह चाहिए”? जब आपके मित्र को वह पदोन्नति, वस्तु, या प्रतिष्ठा प्राप्त हुई, जिसे आपने सोचा था कि आपको मिलेगी, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या थी?
अधिकाँश लोगों के लिए संतोषी होना अत्यंत कठिन होता है। संतोष कठिन है क्योंकि हम पतित लोग एक पतित संसार में रहते हैं। अब हम केवल परमेश्वर की आराधना नहीं करते और न ही केवल उसकी महिमा के लिए कार्य करते हैं। जब तक यीशु लौटकर नहीं आता, हम इस लालसा से जूझते रहेंगे कि हमें ख्रीष्ट के साथ-साथ किसी अन्य व्यक्ति या वस्तु भी चाहिए। परन्तु हिम्मत रखें। यदि आप विश्वास द्वारा ख्रीष्ट के साथ एक हैं, तो आप वास्तव में, यद्यपि पूर्ण रूप से नहीं, फिर भी संतोषी हो सकते हैं। बाइबल हमें संतोष को अपनाने के लिए कम से कम पाँच मार्ग सिखाती है।
1. प्रभु में आनंदित रहें।
क्योंकि “सब ने पाप किया और परमेश्वर की महिमा से रहित हो गए” (रोमियों 3:23), हमारे हृदय अब केवल परमेश्वर की आराधना नहीं करते। हमने “परमेश्वर के सत्य को झूठ से बदल दिया और सृष्टि की अपेक्षा सृष्टिकर्ता की आराधना और सेवा की” (रोमियों 1:25)। अतः, यदि हमें संतोष पान, तो हमें फिर से केवल परमेश्वर की आराधना करने की ओर लौटना होगा। हमारी परिस्थितियों कैसी भी हों, हमें प्रभु में आनन्दित रहना होगा:
चाहे अंजीर का वृक्ष न फूले….
फिर भी यहोवा के कारण मैं आनन्दित रहूंगा;
अपने उद्धार कर्त्ता परमेश्वर में मग्न रहूंगा। (हबक्कूक 3:17–18)
2. प्रभु पर भरोसा रखें।
हमारे लिए संतोषी होना इसलिए कठिन है क्योंकि हम वास्तव में यह भरोसा नहीं करते कि परमेश्वर हमसे प्रेम करता है और हमारे भले के लिए सब कुछ कार्य कर रहा है (रोमियों 8:28)। परन्तु जब हम “देखते हैं कि पिता ने हमसे कैसा प्रेम किया कि हम परमेश्वर की सन्तान कहलाएँ” (1 यूहन्ना 3:1) और विश्वास करते हैं कि “जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए सब कुछ मिलकर भले के लिए होता है” (रोमियों 8:28), तब हम उसके हमारे जीवन के लिए बनाए गए योजनाओं में विश्राम कर सकते हैं। क्योंकि उसने हमारे “निवास स्थान की सीमाएँ और नियत समय निश्चित किए हैं” (प्रेरितों 17:26), हम यह नियन्त्रित करने का प्रयास बंद कर सकते हैं कि हम कौन हैं और हमारे पास क्या है, और इसके स्थान पर, इस सत्य में संतोष करना चाहिए कि प्रभु सब कुछ पर, यहाँ तक कि हमारे जीवन पर भी, राजा है:
यहोवा पर भरोसा रख, और भला कर…. यहोवा में मग्न रह, और वह तेरे मनोरथों को पूरा करेगा। (भजन 37:3–4)
3. अनन्त दृष्टिकोण रखें।
यदि हम इस संसार की वस्तुओं के लिए जी रहे हैं, तो हम कभी संतोषी नहीं हो सकते। यीशु ने अपने चेलों को प्रोत्साहित किया कि “अपने लिए स्वर्ग में धन संग्रह करो, जहाँ न तो कीड़ा और न काई नष्ट करती है, और न चोर सेंध लगाकर चुराते हैं। क्योंकि जहाँ तेरा धन है, वहाँ तेरा मन भी होगा” (मत्ती 6:20–21)। पौलुस ने तीमुथियुस को सिखाया, “परन्तु सन्तोष सहित भक्ति वास्तव में महान् कमाई है, क्योंकि न तो हम संसार में कुछ लाए हैं, न यहाँ से कुछ ले जाएँगे।” (1 तीमुथियुस 6:6–7)।” परन्तु हे परमेश्वर के जन, तू इन बातों से भाग, और धार्मिकता, भक्ति, विश्वास, प्रेम, धैर्य और नम्रता का पीछा कर। और उस अनन्त जीवन को पकड़े रह जिसके लिए तू बुलाया गया था और जिसकी उत्तम गवाही तू ने अनेक गवाहों के सम्मुख दी थी (1 तीमुथियुस 6:11–12)
4. अपनी निर्बलताओं मे ख्रीष्ट की सामर्थ को महिमामय होने दें।
यदि हम सच्चे हों, तो हममें से कोई भी दुर्बल होना नहीं चाहता है। हममें से कई लोगों को अपनी निर्बलताओं को छिपाने और अपने सामर्थ को दिखाने की शिक्षा दी गई है। परन्तु बाइबल सिखाती है कि “जब मैं निर्बल हूँ, तभी बलवन्त हूँ” (2 कुरिन्थियों 12:10)। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारी निर्बलताएँ ख्रीष्ट के अनुग्रह की पर्याप्तता को प्रकट करती हैं, और ख्रीष्ट की सामर्थ “निर्बलता में सिद्ध होती है” (2 कुरिन्थियों 12:9)। अतः हम “निर्बलताओं में भी संतोष” कर सकते हैं (2 कुरिन्थियों 12:10)।
5. दूसरों के पास जो है, उसकी लालसा न करें।
परिवार के सदस्यों, मित्रों, कलीसिया के सदस्यों, पड़ोसियों, और सहकर्मियों को देखकर उनके पास जो है, उसकी चाह रखना बहुत प्रलोभनकारी होता है। हम प्रायः सोचते हैं कि परमेश्वर ने हमें उन्हीं बातों से क्यों वंचित रखा है जिनके लिए हमने प्रार्थना की, विशेषकर जब वे अच्छी और उचित प्रतीत होती हैं, जैसे कि जीवनसाथी या सन्तान। परन्तु बाइबल हमें सिखाती है कि परमेश्वर ने प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का समय और “उनके निवास स्थान की सीमाएँ” निश्चित की हैं (प्रेरितों 17:26)। सबसे उत्तम यह है कि इन निश्चित क्षणों और स्थानों में, परमेश्वर चाहता है कि हम उसकी खोज करें क्योंकि “वह हममें से प्रत्येक से वास्तव में दूर नहीं है, क्योंकि ‘उसी में हम जीवित हैं, चलते-फिरते हैं, और हैं’” (प्रेरितों 17:27–28)।
दूसरों के वरदानों को देखकर उनकी लालसा करना भी प्रलोभनकारी हो सकता है, परन्तु “हममें से प्रत्येक को ख्रीष्ट के वरदान के माप के अनुसार अनुग्रह दी गई है” और वही है जिसने “मनुष्यों को वरदान दिए… ख्रीष्ट के देह के निर्माण के लिए” (इफिसियों 4:7–8, 12)। इसलिए हम निश्चिन्त हो सकते हैं कि हमारे पास वही वरदान हैं जो ख्रीष्ट ने हमारे लिए ठहराए हैं, और हमें दूसरों के वरदानों की लालसा करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बजाय, हम दूसरों को प्रोत्साहित कर सकते हैं कि वे अपने प्राप्त वरदानों का उत्तम प्रबन्धन करें जिससे कि “परमेश्वर की यीशु ख्रीष्ट के द्वारा महिमा हो” (1 पतरस 4:10–11)।
अन्ततः, हमारा असंतोष परमेश्वर के साथ है, जिसने हमारी परिस्थितियों को नियत किया है। यदि आप आज इस पाप से जूझ रहे हैं, तो प्रभु में आनन्द करने और उस पर भरोसा रखने, अनन्त दृष्टिकोण बनाए रखने, ख्रीष्ट की सामर्थ को महिमामय होने देने, और दूसरों के पास जो है उसकी लालसा न करने को स्मरण करें। तब, परमेश्वर के अनुग्रह से, आप यह साक्षी दे सकेंगे, “मैंने जो कुछ भी स्थिति में हूँ, उसमें संतुष्ट रहना सीख लिया है… मैं उसमें सब कुछ कर सकता हूँ जो मुझे सामर्थ देता है” (फिलिप्पियों 4:11, 13)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

