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26 अगस्त 2025प्रियजन की मृत्यु का शोक करना

– जोश स्क्वॉयर
प्रियजन की मृत्यु से अधिक कुछ भी कष्ट नहीं देता। हम उन लोगों से, जिन्हें हम प्रिय मानते हैं, अलगाव का अनुभव करने के लिए सृजित या बनाए नहीं किए गए थे। मृत्यु पाप का परिणाम है और मूल सृष्टि-व्यवस्था का भाग नहीं है (रोमियों 5:12)—इसलिए इसमें आश्चर्य नहीं कि जब हम किसी प्रिय को खोते हैं, तो यह इतना दुःख देता है। हमारे प्राण उन प्रियजनों की आवाज़ सुनने, उनकी बाहों के आलिंगन की अनुभूति करने, उनकी आँखों में देखकर उनके प्राण के गहराई में फिर से खो जाने की चाह रखते हैं। यह पीड़ा विशाल, अत्यधिक और प्रायः अवर्णनीय होती है। यह दुःख, भय, उदासी और क्रोध का एक प्रचण्ड तूफान है। और यदि हम सावधान न हों, तो यह हमें अभिभूत कर सकता है। तो एक विश्वासी कैसे प्रियजन की मृत्यु के शोक से उचित रिती से गुजर सकता है?
सर्वप्रथम, आपको यह स्वीकार करना होगा कि आपको किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। शोक की प्रक्रिया को वर्णन करने के कई प्रयास किए गए हैं, परन्तु मैंने पाया कि तूफान का उदाहरण सबसे सहायक है। यह बाइबलीय चित्रण है—अक्षरशः (योना 2:3) और रूपक रूप में (भजन 42:7; 88:7)। जब हम स्वाभाविक रूप से शोक से अभिभूत होने की बात करते हैं, तो हम प्रायः इसे “डूब जाने” की अनुभूति के रूप में वर्णन करते हैं। अतः जान लें कि प्रियजन के खोने का शोक एक उफनते हुए समुद्र से गुजरने जैसा है। ऐसे क्षण आते हैं जब ऐसा प्रतीत होता है कि लहरें इतनी प्रबल हैं, कि हम स्वीकार करने की अवस्था के उस अपरिचित किनारे तक कभी नहीं पहुँच पाएँगे।
फिर भी, यहाँ थिस्सलुनीकियों के लिए पौलुस का प्रोत्साहन अत्यन्त सहायक है:
परन्तु हे भाइयो, हम नहीं चाहते कि तुम उनके विषय में अनभिज्ञ रहो जो सो गए हैं, और अन्य लोगों के समान शोकित होओ जो आशारहित हैं। हम विश्वास करते हैं कि यीशु मरा और जी भी उठा— इसलिए परमेश्वर उन्हें भी जो यीशु में सो गए हैं, उसके साथ ले आएगा। (1 थिस्सलुनीकियों 4:13–14)
चाहे शोक की लहरें कितनी ही ऊँची क्यों न हों — पर्वतों जैसी — एक न डूबने वाली नौका के समान, ख्रीष्ट आपको डूबने नहीं देगा। उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त की है (1 कुरिन्थियों 15:55)। और यद्यपि लालसा और हानि की पीड़ा अनन्त तक खिंचती प्रतीत हो सकती है, ख्रीष्ट अपनी मृत्यु के द्वारा हमें यह आश्वासन देता है कि यह केवल थोड़े समय के लिए है, क्योंकि वह दिन आ रहा है जब न मृत्यु होगी और न ही आँसू (प्रकाशितवाक्य 21:4)।
यदि यह सत्य है कि मृत्यु अस्थायी है और ख्रीष्ट ने उस पर विजय प्राप्त की है, तो फिर यह इतना अधिक कष्ट क्यों देता है? यह तूफान इतना हिंसक और भयानक क्यों है? संक्षेप में, इसका कारण यह है कि यह हमारे प्राणों की प्रकृति के विरुद्ध है कि हम उन लोगों से, जिन्हें हम प्रेम करते हैं, मृत्यु में अलग किए जाएँ। जो शोक हम अनुभव करते हैं, वह हमारे प्राण की पुकार है जब उसका एक अंश मानो खो जाता है। स्वयं ख्रीष्ट भी रोया जब मृत्यु ने उनके मित्र लाजर को ले लिया था (यूहन्ना 11:35)। यद्यपि ख्रीष्ट जानता था कि वह लाजर को जीवित करने वाला है (यूहन्ना 11:23), फिर भी वह अपने प्रियजन की मृत्यु को देखकर रोया, तो हम कैसे न रोएँ? क्यों हमारे प्राण भी इस पतित संसार की स्थिति पर पीड़ा में न पुकारे जिस कारण हम अपने प्रियजनों से थोड़े समय के लिए ही सही, अलग कर दिए जाते हैं?
अब, एक तूफान में कुछ समान विशेषताएँ हो सकती हैं (वर्षा, लहरें, हवा, बिजली, और गर्जन), फिर भी जब आप विवरणों में उतरते हैं, प्रत्येक तूफान अनोखा होता है। उसी प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति का शोक भी उसके लिए और उसके खोए हुए प्रियजन के लिए विशिष्ट होता है। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति अपने माता-पिता के खोने पर जिस प्रकार शोक करता है, वह अपने दादा-दादी के खोने पर किए गए शोक से भिन्न होगा। और दो भाई-बहन, चाहे वे कितने भी समान क्यों न हों, फिर भी एक ही प्रियजन को खोने पर उनके शोक करने के ढंग अलग-अलग होंगे। प्रत्येक को शोक के इस तूफानी समुद्र को अपनी गति से पार करना होगा। फिर भी दिशा एक ही है: ख्रीष्ट हमारा दिशासूचक है। हम आगे बढ़ते हैं इस गहरे विश्वास की ओर कि मसीह सक्षम, करुणामय और सांत्वनादाता है। जितना कोई व्यक्ति क्रूस को थामे रहता है — भले ही केवल नाखूनों के सहारे ही क्यों न हो — उतनी ही अधिक आशा उसके पास होगी जब यह तूफ़ान अंततः गुजर जाएगा। पौलुस रोमियों को स्मरण कराता है कि दुःख ही आशा का कारखाना है (रोमियों 5:3–5), और प्रियजन की मृत्यु से बढ़कर कोई पीड़ा नहीं।
अन्ततः, यद्यपि प्रत्येक मसीही की यात्रा अनोखी होती है, परन्तु विश्वासी कभी अकेले नहीं होते। परमेश्वर जानता है कि किसी प्रियजन के मृत्यु का सामना करना कैसा होता है। जब ख्रीष्ट क्रूस पर मृत्यु का सामना कर रहे थे, तो सम्पूर्ण प्रकृति पिता के साथ पुकारती प्रतीत हुई। लूका बताता है कि जब ख्रीष्ट को क्रूस पर चढ़ाया जा रहा था, तीन घंटों तक सूर्य का प्रकाश भी मद्धम पड़ गया (लूका 23:44–45)। यद्यपि तूफान से गुजरने का समय अनन्त प्रतीत हो सकता है, फिर भी पतवार पर एक स्थिर हाथ बना हुआ है। कील के निशानों वाला हाथ आपको उस पार तक ले जाएँगे (यूहन्ना 20:27)। इस बीच, वह प्रतिज्ञा देता है कि आपको कभी न छोड़ेगा और न त्यागेगा (इब्रानियों 13:5)—भले ही आप अकेला और त्यागे जाने की अनुभूति करें। वह उस दुःख से अपरिचित नहीं है जो आप अनुभव करते हैं। वह स्वयं भी इस तूफान से गुजर चुका है, और वह जानता है कि इसे पार कैसे करना है।
प्रियजन की मृत्यु का शोक एक दर्दनाक प्रक्रिया है जिसमें समय लगता है। यह पीड़ा अपरिहार्य है क्योंकि प्राण उनकी अनुपस्थिति से जूझता है। और तूफान के समान यह व्यथा इतनी प्रबल प्रतीत हो सकती है कि वह हमें नष्ट कर दे। फिर भी परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि जब हम सबसे निम्न अवस्था में हों, हम उससे और उसके वचन से सामर्थ्य के लिए पुकारते हैं (भजन 119:28)। वही वचन हमें बताता है कि मृत्यु अस्थायी है, और ख्रीष्ट विजयी है। इस बीच, हम स्वयं को उसके ऊपर डाल सकते हैं, और वह हमारा मार्गदर्शन करेगा, हमारी अगुवाई करेगा, और यहाँ तक कि हमें विश्राम भी देगा (मत्ती 11:28–30)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।