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क्या ख्रीष्टियों के लिए शोक करना उचित है?

Is-It-OK-for-Christians-to-Grieve

कीथ इवांस

यह बात अनियमित रूप से परन्तु बार-बार घटती है: दु:ख हमारे अन्यथा सुखद जीवन में घुस आता है और उसे पुनः व्यवाधित कर देता है। शोकपूर्ण अनुभवों की यही अवांछित तरीका है। वे बिन बुलाए आ जाते हैं, प्रभावित लोगों को शोकाकुल, दु:खी और क्षीण महसूस कराते हैं। ये दुखद प्रावधान वास्तविक हानि और क्षति लाते हैं। साथ ही, वे कभी भी वांछनीय या उचित समय पर नहीं आते, क्योंकि सत्य कहें तो, कठिनाइयों का सामना करने का कोई वांछनीय या उचित समय नहीं होता।

फिर भी, कलीसिया में कभी-कभी यह मानसिकता पाई जाती है कि हमें अपने शोक को छिपाने का प्रयास करना चाहिए, प्रसन्न मुख लगाना चाहिए, और जीवन को ऐसे जीना चाहिए जैसे ये चुनौतियाँ “सामान्य” हों। हम नियमित अभिवादन “आप कैसे हैं?” का उत्तर देते हैं, “मैं ठीक हूँ, धन्यवाद,” जबकि भीतर से हम थोड़ा भी  “ठीक” नहीं होते हैं। हम आराधना के लिए जाते हैं और ऐसे गीत गाते हैं जो हमारी वर्तमान परिस्थिति के लिए कुछ अधिक उत्साहपूर्ण लगते हैं।

ऐसा प्रतीत होता है मानो सोच यह है कि ख्रीष्टियों को, प्रभु की सामर्थ से उठाए गए होने के कारण, शोक को स्वीकार नहीं करना चाहिए (कदाचित् शोक ही नहीं करना चाहिए)—कि कठिनाइयों को कम करके दिखाना ही सामर्थ है। आखिरकार, हमें विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं का सामना करने पर इसे पूरे आनन्द की बात माननी चाहिए (याकूब 1:2)।

इस दृष्टिकोण के साथ, विश्वासी यह सोचते रह जाते हैं कि शोक के लिए स्थान कहाँ है। सभोपदेशक 7:2–4 हमारी दैनिक ईश्वरविज्ञान में प्रायः अनुपस्थित रहता है:

शोक-गृह में जाना
भोज-गृह में जाने से उत्तम है,
क्योंकि यह तो सब मनुष्यों का अन्त है,
और जीवित लोग इसको मन में रखेंगे।

हँसी से दु:ख उत्तम है,
क्योंकि चेहरे की उदासी से हृदय प्रसन्न होता है।
बुद्धिमानों का हृदय शोक-गृह में रहता है,
परन्तु मूर्खों का हृदय भोज-गृह में।

हम समझ सकते हैं कि संसार शोक नहीं करना चाहता, क्योंकि वे बिना आशा के शोक करते हैं (1 थिस्सलुनीकियों 4:13)। दर्द को नकारना संसार के दृष्टिकोण के लिए समझ में आता है। परन्तु कलीसिया के विषय में क्या? हम इस झूठ को क्यों स्वीकार करने के लिए प्रलोभित होते हैं कि दु:ख को छोटा और तुच्छ मानना चाहिए? और क्यों हम शोक-गृह से बचते हैं और इसके भोज-गृह, हँसी, और उल्लास की ओर तेजी से भागते हैं?

सम्भवता हम अपने को संसार का यही उपदेश सुनाने लगे हैं, “खाओ, पियो, और आनन्द करो” (सभोपदेशक 8:15) “क्योंकि कल हम मर जाएँगे” (यशायाह 22:13)। हमने उस चीज को, जो घृणित है; जो परमेश्वर के मूल अभिप्राय और सृष्टि के लिए असामान्य है; जो उस सब पर, जिसे उसने “अति उत्तम” बनाया, घुस आई और इस जीवन, आशीष, और प्रचुरता के क्षेत्र को दूषित कर दिया; हमने उस घुसपैठिए को वह बना दिया जो वह नहीं है। हमने इस शत्रु, दु:ख—परमेश्वर के उत्तम अभिप्राय का यह घुसपैठिया और आक्रमणकारी—जो हमारे पाप में पतन के परिणामस्वरूप आया, उससे कहा, “तू इतना बुरा नहीं है।” तथापि, परमेश्वर का सत्य केवल नीरस सहनशीलता के साथ शोक का सामना करने की तुलना में कहीं अधिक गौरवशाली है।

परमेश्वर की व्यवस्था में, विश्वासी दु:ख को वही कह सकता है जो वह है: भयानक और अप्रिय। हम शोक-गृह में जा सकते हैं, इन दु:खों को ठीक रूप से प्रभु के पास ले जा सकते हैं (1 पतरस 5:7) और इन्हें ठीक रूप से हृदय में ले सकते हैं (सभोपदेशक 7:2)। अन्तः, भजनसंहिता में विलाप के ईश्वरीय अभिव्यक्तियों से भरा हुआ है। वास्तव में, बाइबल की एक पूरी पुस्तक इसके लिए समर्पित है (विलापगीत)!

हम साथ ही यह आशापूर्ण सत्य भी धारण करते हैं कि परमेश्वर ने यीशु ख्रीष्ट में अभिशाप पर विजय प्राप्त की है। उसने पाप और दु:ख के इस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की है और हमारी सभी विपत्तियों को भी छुड़ा लिया है, कठिनाइयों को हमारे जीवन में अपने उत्तम उद्देश्यों के लिए उपयोग में लाते हुए। अतः हम बिना आशा के शोक नहीं करते। हम सही रूप से शोक करते हैं, परन्तु हम शोक के मध्य में प्रभु के उत्तम प्रावधान पर भी ठीक रूप से भरोसा करते हैं। दोनों सत्य परमेश्वर की दृष्टि में एकता में खड़े हैं, विरोधाभास में नहीं।

अतः, हे प्रिय ख्रीष्टीय, आइए हम उचित रिती से शोक करें। आइए हम रोएँ और दु:खी हों, परन्तु निराश न हों। आइए हम अपने भाइयों और बहनों को शोक करने दें और उनके शोक पर कोई समय सीमा न —कि कितने दिन तक ख्रीष्टीय रीति से शोक करना उचित है, जिसके पश्चात् उन्हें केवल हँसना चाहिए। और हम सभी हृदय से स्मरण करें, क्योंकि यद्यपि हम इस संसार में हर प्रकार की कष्टों का सामना करते हैं, ख्रीष्ट ने संसार पर विजय प्राप्त की है (यूहन्ना 16:33)।

एक दिन ऐसा आएगा जब हर आँसू पोंछा जाएगा (प्रकाशितवाक्य 21:4)। परन्तु आज वह दिन नहीं है। तब तक, हम कहते हैं, “आ, हे प्रभु यीशु।”                

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।