
हृदय पर एक धर्मप्रश्नोत्तरी
18 नवम्बर 2025
आत्मिक युद्ध क्या है?
25 नवम्बर 2025प्रेम जो कि धैर्यवान और कृपालु है
1 कुरिन्थियों 13 पवित्रशास्त्र के सबसे प्रसिद्ध खण्डों में से एक है, क्योंकि इसमें प्रेरित पौलुस हमें ईश्वरीय प्रेम के स्वभाव का एक अद्भुत अर्थप्रकाशन देता है। वह प्रेम के महत्व को दिखाने से आरम्भ करता है, यह लिखते हुए कि यदि हमारे पास सभी प्रकार के वरदान, योग्यताएँ और उपलब्धियाँ हों, परन्तु प्रेम न हो, तो हम कुछ भी नहीं हैं (पद 1–3)। फिर पद 4 में वह बताना आरम्भ करता है कि ईश्वरीय प्रेम कैसा दिखता है, यह कहते हुए, “प्रेम धैर्यवान और कृपालु है,” या एक पारम्परिक अनुवाद के शब्दों में, “प्रेम लंबे समय तक सहता है और कृपालु है।” मुझे यह युग्म—धैर्य और कृपालुता—अत्यन्त मनोहर विचारणीय लगता है। पौलुस ने प्रेम के वर्णन में इन गुणों को पहले क्यों रखा, और क्यों उन्हें एक साथ जोड़ा?
पौलुस हमें बताता है कि प्रेम धैर्यवान होता है अर्थात् वह “लम्बे समय तक सहता है।” मुझे यह पारम्परिक अनुवाद इसलिए पसंद है क्योंकि यह यह विचार प्रकट करता है कि दूसरों से प्रेम करना कभी-कभी कठिन हो सकता है। दूसरों से प्रेम करने का अर्थ यह नहीं कि जब वह हमें पहली बार ठेस पहुँचाए तो हम उसे अस्वीकार कर दें। अपने सम्बन्धों में, हम कुछ लोगों के प्रति दूसरों की तुलना में अधिक धैर्य रखते हैं। यदि कोई पुराना मित्र मुझे खीझाने या चिढ़ाने के लिए कुछ करता है, तो मैं सामान्यतः कहता हूँ, “अरे, यह तो उसकी आदत है, उसका स्वभाव है; हम सब मनुष्य हैं, हममें से कोई भी सिद्ध नहीं।” मैं उसके लिए छूट देता हूँ। पर यदि मैं किसी अन्य व्यक्ति से मिलूँ और देखूँ कि वह उसी प्रकार व्यवहार करता है जैसे मेरा मित्र करता था, तो सम्भव है कि मैं उससे कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहूँ। हम अपने मित्रों में वह बातें सह लेते हैं जिन्हें हम अपरिचितों में नहीं सह पाते।
सच्चा, लम्बे समय तक सहनेवाला प्रेम कोई गिनती नहीं रखता। जब तुम पहली बार मुझे ठेस पहुँचाओगे, तो मैं कह सकता हूँ, “पहली गलती,” और फिर दो और अवसर दूँगा, उसके बाद अब बस। पर यदि मेरा प्रेम लंबे समय तक सहने वाला है, तो तुम सत्तहत्तरवीं (77वीं) गलती तक भी पहुँच जाओ, मैं तब भी तुम्हारे साथ बना रहूँगा।
मसीही प्रेम इतना सहनशील क्यों होता है? क्योंकि मसीही लोग ख्रीष्ट का अनुकरण करते हैं, जो पिता परमेश्वर का अनुकरण करता है और लम्बे समय तक सहना परमेश्वर के स्वभाव का एक प्रमुख गुण है। बाइबल बार-बार यह बात स्पष्ट करती है कि परमेश्वर क्रोध करने में धीमा है और अपने हठीले लोगों के साथ अत्यन्त धैर्य रखता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर स्वयं को इस प्रकार वर्णित करता है: “यहोवा, यहोवा, दयालु और अनुग्रहकारी ईश्वर, जो क्रोध करने में धीमा और अटल प्रेम व विश्वासयोग्यता में धनी है” (निर्गमन 34:6)। इसी प्रकार, पौलुस “उसकी कृपा, सहनशीलता और धैर्य के धन” की बात करता है (रोमियों 2:4)।
यदि आप मसीही हैं, तो सोचिए—आपके उद्धार से पहले परमेश्वर ने आपकी अविश्वासिता को कितने समय तक सहा? और उद्धार के बाद भी आपके बने रहनेवाले पापों को कितने समय से सह रहा है? यदि परमेश्वर सहनशील न होता, तो हम नाश हो जाते। यदि परमेश्वर हमारे साथ उतना ही अधैर्य दिखाता जितना हम दूसरों के साथ दिखाते हैं, तो हम अभी नरक में दुःख भोग रहे होते। उसने हमारी अवज्ञा, हमारी निन्दा, हमारी उदासीनता, हमारी अविश्वासिता, और हमारे पापों को सहा है और वह फिर भी हमसे प्रेम करता है। यही परमेश्वर का स्वभाव है। यही वह तरीका है जिससे वह अपने प्रेम को प्रकट करता है। वह अपने प्रेम को अपने धैर्य के द्वारा दिखाता है, जो दीर्घकाल तक बना रहता है।
हमें केवल धैर्यवान ही नहीं, वरन् लम्बे समय तक सहने के लिए बुलाया गया है। हमें लोगों के पापों, कमजोरियों और कमियों के प्रति केवल तब तक ही धैर्य नहीं रखना है जब तक वे हमें पीड़ा नहीं पहुँचाते। लम्बे समय तक सहने का अर्थ है, प्रेम करना, यहाँ तक कि तब भी जब हम स्वयं दुःख और पीड़ा का अनुभव कर रहे हों। इसका अर्थ है कि हम “एक दूसरे के प्रति प्रेम में सरगर्म बने रहना, क्योंकि प्रेम अनेक पापों को ढाँप देता है” (1 पतरस 4:8)। इस प्रकार हम परमेश्वर के उस प्रेम को प्रतिबिंबित करते हैं जो सहनशील है।
तो फिर, पौलुस धैर्य या सहनशीलता को कृपालुता के साथ क्यों जोड़ता है? यह सम्भव है कि हम बहुत लम्बे समय तक किसी चोट या शत्रुता को सहें, पर भीतर से बैर और प्रतिशोध लेने की भावना पालें। परन्तु बाइबल की दृष्टि में सहनशीलता का यह अर्थ नहीं है। सहनशीलता में कृपालुता शामिल है, क्योंकि हमें अपने कष्ट के कारणों के प्रति भी कृपालु रहना है। कृपालु व्यक्ति न तो अशिष्ट होते हैं, न कठोर, न ही निर्दय। उनका हृदय उदार होता है। वे दूसरों के प्रति संवेदनशील और कोमल होते हैं।
मेरा मानना है कि मेरे पिता इस गुण का एक आदर्श उदाहरण थे। वे वास्तव में कृपालु थे। उन्होंने मुझे परमेश्वर की कृपालुता दिखाई। मुझे बहुत बुरा लगता था जब मैं स्कूल से घर आता और यह पता चलता कि मैंने कुछ गलत किया है और अब मुझे डाँट पड़ने वाली है। मेरी माँ कहतीं, “तुम्हारे पिताजी तुमसे बात करना चाहते हैं।” मैं उनके कार्यालय में जाता, द्वार बन्द करता, और वे कहते, “बेटा, हमें बात करनी है।” वह मुझे अनुशासित करते समय कभी अपनी आवाज़ ऊँची नहीं करते थे, न ही मेरे प्रति क्रोध प्रकट करते थे। फिर भी, किसी अद्भुत ढंग से, जब वे मुझे “अलग-अलग करके” समझाते थे, तो उसी कोमलता से वे मुझे “फिर से जोड़” भी देते थे। उसके बाद जब मैं उनके कार्यालय से बाहर निकलता, तो ऐसा लगता मानो मैं हवा में चल रहा हूँ। मेरा मन प्रसन्न होता, पर साथ ही भीतर यह बोध भी होता कि अगली बार मुझे और अच्छा करना चाहिए। उन्होंने मुझे प्रेरित किया, क्योंकि उनका व्यवहार इतना कृपालु था।
मुझे डर है कि एक सच्चा कृपालु व्यक्ति मिलन बहुत दुर्लभ है। परन्तु कृपालुता को लम्बे समय तक सहनेवाले प्रेम के साथ अवश्य जुड़ा होना चाहिए, क्योंकि यही प्रेम का प्रकटीकरण है। सरल शब्दों में, प्रेम न तो अधैर्यवान होता है और न ही अकृपालु। यह परमेश्वर के प्रेम का चित्र है, वही प्रेम जिसे पवित्र आत्मा परमेश्वर के लोगों के भीतर विकसित करता है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

