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यीशु के समान सोचना
27 नवम्बर 2025आत्मिक युद्ध क्या है?
हमारे पिता परमेश्वर और प्रभु यीशु ख्रीष्ट की ओर से अनुग्रह और शान्ति मिले, जिसने हमारे पापों के लिए अपने आप को दे दिया कि हमारे परमेश्वर और पिता के इच्छानुसार, हमें इस वर्तमान बुरे युग से छुड़ा ले। उसकी महिमा सदा सर्वदा होती रहे। आमीन। (गलातियों 1:3-5)
इन वचनों के माध्यम से प्रेरित पौलुस परमेश्वर की उस छुटकारे का उत्सव मनाता है जो उसने अपने पुत्र के कार्य के द्वारा हमारे लिए किया है (कुलुस्सियों 1:13–14)। वह हमें यह भी स्मरण कराता है कि हम एक पतित संसार में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जहाँ हम ख्रीष्ट के साथ चलते हुए तथा उसके लिए कार्य करते हुए आत्मिक विरोध का सामना करते हैं (इफिसियों 2:1–10)।
आत्मिक युद्ध का सन्दर्भ
अपने महायाजकीय प्रार्थना में हमारा प्रभु यीशु हमारे लिए यह प्रार्थना करता है कि हम संसार में तो हैं (यूहन्ना 17:11), परन्तु संसार के नहीं हैं (यूहन्ना 17:14)। इसलिए वह पिता से यह विनती नहीं करता कि हमें संसार से उठा ले जाए, किन्तु यह कि वह हमें उस दुष्ट से बचाए रखे (यूहन्ना 17:15)। वह प्रार्थना जो यीशु ने अपने शिष्यों के रूप में हमें सिखाई, हमें परमेश्वर के राज्य की खोज करने के लिए जिसमें हम प्रवेश कर चुके हैं तथा आत्मिक शत्रु के विरोध को ध्यान रखते हुए, उसकी इच्छा को पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। (मत्ती 6:10, 13)।
अदन की वाटिका में परमेश्वर ने जिस छुटकारे की प्रतिज्ञा की, वह संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है (उत्पत्ति 3:15)। वह प्रतिज्ञात जन समय की परिपूर्णता में आएगा (गलातियों 4:4-5) और उससे युद्ध करेगा जिसे “इस संसार का शासक” (यूहन्ना 12:31) और “इस संसार का ईश्वर” (2 कुरिन्थियों 4:4) कहा गया है। ख्रीष्ट यीशु, जो परमेश्वर का अनन्त पुत्र है, हमारा उद्धार करने और शैतान के कार्यों का नष्ट करने के लिए सच्चाई तथा पूर्ण रीति से मानव रूप धारण करके संसार में आ गया (इब्रानियों 2:14–18; 1 यूहन्ना 3:8)।
आत्मिक युद्ध में हमारी भागीदारी की कुंजी इस सच्चाई को पहचानना है कि विजय ख्रीष्ट की है और वह विजय हमें ख्रीष्ट में प्राप्त हुई है। हम विजय प्राप्त करने के लिए नहीं, परन्तु उस विजय में रहकर युद्ध करते हैं। जब यीशु हमें शिष्य बनाने हेतू भेजने से पहले यह घोषणा करता है कि “स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार मुझे दिया गया है” (मत्ती 28:18; देखिए इफिसियों 1:20–23), तो वह अपने सिद्ध कार्य की घोषणा कर रहा है।
जब यीशु यह कहता है कि वह युग के अन्त तक हमारे साथ है, तो वह हमें अपनी उपस्थिति, सामर्थ्य और प्रतिज्ञा का आश्वासन देता है जिससे कि हम उसकी सेवा करें और उसके राज्य की खोज करें। ऐसा करने में अनिवार्य रूप से आत्मिक युद्ध सम्मिलित होगा, एक ओर हमारे आत्मिक वृद्धि के लिए (मत्ती 28:20; इफिसियों 5:1–14), और दूसरी ओर हमारे राज्य की सेवा के लिए (1 थिस्सलुनीकियों 2:18; 2 थिस्सलुनीकियों 3:1–3)।
हम विजय प्राप्त करने के लिए नहीं, परन्तु उस विजय में रहकर युद्ध करते हैं।
हम प्राय: आत्मिक युद्ध को ख्रीष्टीय जीवन की कोई असाधारण बात समझते हैं, परन्तु वास्तव में यह यीशु के प्रभुत्व के अधीन जीवन जीने और उसके राज्य तथा उसकी धार्मिकता को पहले खोजने का एक अभिन्न भाग है। हम प्रतिदिन एक आत्मिक शत्रु से संघर्ष करते हैं, जो इस पतित संसार के विचारधारा और मूल्यों के माध्यम से हमारी स्वेच्छाचारी इच्छाओं को उकसाता है, जिसमें हम परिश्रम करते हैं (याकूब 1:14)।
आत्मिक युद्ध का आचरण
आत्मिक युद्ध में कौन सी बातें सम्मिलित हैं? हम अपने अदृश्य शत्रु से कहाँ सामना करते हैं? पतरस यह निर्देश देता है: “संयमी और सचेत रहो। तुम्हारा शत्रु शैतान गर्जने वाले सिंह की भांति इस ताक में रहता है कि किसको फाड़ खाए। विश्वास में दृढ़ रहकर उसका विरोध करो” (1 पतरस 5:8-9)। पतरस हमें इस वास्तविकता के प्रति सचेत करता है कि हमारा शत्रु सर्वत्र उपस्थित है, उस रीति से नहीं जिस प्रकार परमेश्वर सर्वउपस्थित है किन्तु दुष्टात्माएँ कहलाने वाले पतित स्वर्गदूतों की सेना के द्वारा वह उपस्थित है।
जिस प्रकार पतरस आत्मिक विरोध के विषय पर बोलता है, उसी प्रकार प्रत्येक नए नियम के लेखक ने भी इस विषय पर लिखा है। हमें हमारे शत्रु के स्वभाव, उद्देश्य, योजनाओं और युक्तियों के विषय में बताया गया है, जो हमें युद्ध के लिए तैयार करती है, और राज्य के सुसमाचार की निश्चित आशा के द्वारा हमारे मनोबल को बढ़ाती है।
आत्मिक युद्ध में हमारे आचरण की नींव यह है कि हम ख्रीष्ट में दृढ़ बने रहें और शैतान की युक्तियों का दृढ़तापूर्वक सामना करें (इफिसियों 6:10–16)। शैतान के आरोपों के विरुद्ध, हमें ख्रीष्ट में दृढ़ रहना चाहिए, जिसने हमारे पापों का ऋण क्रूस पर चुका दिया और हमारे लिए परमेश्वर के क्रोध को शान्त किया (कुलुस्सियों 2:13–15)। शैतान की छल और धोखे के विरुद्ध, हमें परमेश्वर के वचन अर्थात् बाइबल में प्रकट सत्यों में दृढ़ रहना चाहिए (2 कुरिन्थियों 10:1–5; इफिसियों 6:17; कुलुस्सियों 2:6–8)। शैतान के प्रलोभनों के विरुद्ध, हमें जीवित ख्रीष्ट की सामर्थ्य में दृढ़ रहना चाहिए, जिसके द्वारा हम शैतान का विरोध कर सकते हैं और प्रभु के योग्य चाल चल सकते हैं (इफिसियों 6:10; कुलुस्सियों 1:9–12)। परमेश्वर के वचन के पन्नों में हम अपने शत्रु के किसी भी प्रयास के विषय में जो कुछ भी सीखें, हमें उन्हें सामना करने के लिए सदैव ख्रीष्ट की ओर देखना चाहिए।
यह जानते हुए कि हमारा एक आत्मिक शत्रु है जो हमारा विरोध करता है, हमारी प्रार्थना-जीवन और भी गहरा होना चाहिए, जिससे हम अपने प्रभु की उस पर्याप्तता को खोजें जिसकी हमें अत्यन्त आवश्यकता है। आत्मिक युद्ध का एक मूल सिद्धान्त यह है कि यह बुद्धि (याकूब 3:15) और निर्बलता (2 कुरिन्थियों 12:9–10) में लड़ा जाता है, जो हमें प्रत्येक बात में, हर समय, हर प्रकार से ख्रीष्ट की ओर ले जाता है (इफिसियों 6:18–20)।
अन्त में, हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि हम अकेले नहीं हैं, परन्तु हमारी रक्षा, मार्गदर्शन और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परमेश्वर के आत्मा द्वारा हमें ख्रीष्टीय परिवार में सम्मिलित किया गया है। हमें एक-दूसरे के लिए प्रार्थना करनी चाहिए (कुलुस्सियों 4:3), एक-दूसरे को उत्साहित करना चाहिए (इब्रानियों 10:23–25), एक-दूसरे को समझाना और प्रोत्साहित करना चाहिए (इब्रानियों 3:12–14), और एक-दूसरे का देखभाल करना चाहिए (याकूब 5:16, 19–20); क्योंकि हम मिलकर उस प्रभु की सेवा करते हैं जो अपनी कलीसिया का निर्माण कर रहा है, जिसके विरुद्ध अधोलोक के फाटक प्रबल नहीं होंगे। “ शान्ति का परमेश्वर शीघ्र शैतान को तुम्हारे पैरों तले कुचलवा देगा। हमारे प्रभु यीशु ख्रीष्ट का अनुग्रह तुम्हारे साथ हो। आमीन।” (रोमियों 16:20)
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

