The Role of Hope in the Christian Life

मसीही जीवन में आशा की भूमिका

21 अप्रैल 2026
The Role of Hope in the Christian Life

मसीही जीवन में आशा की भूमिका

21 अप्रैल 2026

क्या परमेश्वर सभी धर्मों की आराधना को स्वीकार करता है?

Does God Accept the Worship of All Religions?

आज के समय में परमेश्वर में विश्वास रखने वाले बहुत से लोग यह मानते हैं कि यदि उपासना सच्चे मन से की जाए, तो परमेश्वर सभी धर्मों की उपासना को स्वीकार करता है। परन्तु पवित्रशास्त्र में इस प्रकार के विचार का कोई भी प्रमाण नहीं पाया जाता है। वास्तव में तो, उत्पत्ति से लेकर प्रकाशितवाक्य तक, पवित्रशास्त्र ठीक इसके विपरीत बात को प्रकट करता है। 

यह स्पष्ट रूप से दस आज्ञाओं की पहली आज्ञा में दिखाई देता है: “तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना” (निर्गमन 20:3)। जिस प्राचीन निकट पूर्वी संसार में इस्राएल रहता था, वह अनेक प्रकार के धर्मों और “देवताओं” से भरा हुआ था। परमेश्वर इन अन्य धर्मों को अस्वीकार करता है। क्यों? क्योंकि इन अन्य धर्मों के “देवता” वास्तव में दुष्टात्माएँ हैं, और उनकी आराधना परमेश्वर के लिए घृणित है (लैव्यव्यवस्था 17:7; व्यवस्थाविवरण 32:16–17)। प्रेरित पौलुस भी नये नियम में यही शिक्षा देता है (1 कुरिन्थियों 10:20)। अपनी परीक्षा के समय यीशु ने व्यवस्थाविवरण 6:13 को उद्धृत करते हुए शैतान से कहा: “तू प्रभु अपने परमेश्वर को दण्डवत् कर और केवल उसी की सेवा कर” (मत्ती 4:10)। यही धार्मिक विशिष्टता है। देहधारण में, वह वचन जो परमेश्वर के साथ था और जो परमेश्वर था, देहधारी हुआ और हमारे बीच में निवास किया (यूह. 1:1, 14)। वही अब मनुष्यों और परमेश्वर के बीच एकमात्र मध्यस्थ है (1 तीमु. 2:5)। और उसके अतिरिक्त कोई और नहीं।

यदि परमेश्वर सभी धर्मों की आराधना को स्वीकार करता, तो ख्रीष्ट के देहधारण, मृत्यु और पुनरुत्थान की कोई आवश्यकता नहीं होती। 

स्वयं यीशु ने मसीहियत की विशिष्टता को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जब उसने कहा: “मार्ग और सत्य और जीवन मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता” (यूहन्ना 14:6)। “कोई नहीं” का अर्थ है—वास्तव में कोई भी नहीं। इसी कारण पतरस पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर, यीशु के विषय में यह घोषणा की: “किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया है, जिसके द्वारा हम उद्धार पाएँ” (प्रेरितों के काम 4:12)। जो लोग उद्धार की खोज में हैं, उनके लिए कोई दूसरा नहीं है। 

यदि परमेश्वर सभी धर्मों की आराधना को स्वीकार करता, तो तो प्रथम शताब्दी में पहले से ही अनेक धर्मों के होते हुए भी ख्रीष्ट के देहधारण, मृत्यु और पुनरुत्थान की कोई आवश्यकता नहीं होती। यदि परमेश्वर सभी धर्मों की आराधना को स्वीकार करता, तो महान् आदेश और सब जातियों में सुसमाचार के प्रचार की भी कोई आवश्यकता नहीं होती। यदि परमेश्वर सभी धर्मों की आराधना को स्वीकार करता, तो वह सुसमाचार प्रचार, जिसकी आज्ञा यीशु ने दी, समय की व्यर्थता होती।

परमेश्वर किसी भी ऐसे धर्म को स्वीकार नहीं करता जो उसने अनुग्रहपूर्वक स्वयं प्रदान नहीं किया है। वह उन धर्मों को स्वीकार नहीं करता जो सृष्टिकर्ता की आराधना के स्थान पर सृष्टि की आराधना करते हैं। परमेश्वर झूठी आराधना को स्वीकार नहीं करता। परन्तु वह किसी भी धर्म के आराधकों को स्वीकार करता है जब वे अपने उन धर्मों से मन फिराकर ख्रीष्ट पर विश्वास करते हैं।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

लिग्निएर संपादकीय

लिग्निएर संपादकीय

हम डॉ. आर. सी. स्प्रोल का शिक्षण संघ हैं। हम इसलिए अस्तित्व में हैं ताकि हम जितने अधिक लोगों तक सम्भव हो परमेश्वर की पवित्रता को उसकी सम्पूर्णता में घोषित करें, सिखाएं और रक्षा करें। हमारा कार्य, उत्साह, और उद्देश्य है कि हम लोगों को परमेश्वर के ज्ञान और उसकी पवित्रता में बढ़ने में सहायता करें।