
यीशु ने अपने स्वर्गारोहण से पहले कौन-सी प्रतिज्ञा की थी?
30 अप्रैल 2026ख्रीष्ट में होने का क्या अर्थ है?
हमारे प्रभु यीशु ख्रीष्ट का परमेश्वर हो धन्य हो, `जिसने हमें ख्रीष्ट में स्वर्गीय स्थानों में सब प्रकार की आत्मिक आशिषों से आशीषित किया है। जैसा कि उसने हमें जगत की उत्पत्ति से पूर्व ख्रीष्ट में चुन लिया कि हम उसके समक्ष प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। उसने अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार पहिले से ही अपने लिए यीशु ख्रीष्ट के द्वारा लेपालक पुत्र होने के लिए ठहराया, कि उसके उस अनुग्रह की महिमा की स्तुति हो जिसे उसने हमें उस अति प्रिय में सेंतमेंत में दिया। हमें, उसमें, उसके लहू के द्वारा छुटकारा अर्थात् हमारे अपराधों की क्षमा, उसके अनुग्रह के धन के अनुसार मिली है, जिसे उसने समस्त ज्ञान और समझ से हमें बहुतायत से दिया है। उसने हमें अपनी इच्छा का रहस्य अपने भले अभिप्राय के अनुसार जिसे स्वयं निर्धारित किया था बाताया- ऐसे प्रबन्ध के उद्देश्य से कि समयों के पूरे होने पर वह सब कुछ जो स्वर्ग और पृथ्वी पर है, ख्रीष्ट में एकत्रित करे।
उसी में जो अपनी इच्छा की सुमति के अनुसार सब कुछ करता है, हमने भी उसके अभिप्राय के अनुसार, पहिले से ठहराए जाकर उत्तराधिकार प्राप्त किया है, कि हम, जिन्होंने ख्रीष्ट पर पहिले से आशा रखी थी, उसकी महिमा की स्तुति के कारण हों। उसी में तुम पर भी, जब तुमने सत्य का वचन सुना जो तुम्हारे उद्धार का सुसमाचार है- और जिस पर तुमने विश्वास किया- प्रतिज्ञा किए हुए पवित्र आत्मा की छाप लगी। वह हमारे उत्तराधिकार के बयाने के रूप में इस उद्देश्य से दिया गया है कि परमेश्वर के मोल लिए हुओं का छुटाकारा हो, जिस से परमेश्वर की महिमा की स्तुति हो। (इफिसियों 1:3-14)
जब लोग आपसे आपके विश्वास के विषय में पूछते है, तो आप अपने आप को कैसे वर्णित करते हैं? क्या आप कहते हैँ, “मैं प्रेस्बिटेरियन हूँ” या “मैं बैपटिस्ट हूँ”? या फिर “मैं एपिस्कोपेलियन हूँ”? या सम्भवतः आप सरलता से कहते हैं, “मैं एक मसीही हूँ”?
सम्भवतः हममें से कई लोगों के मन में यह विचार कभी भी नहीं आता कि यदि हम नए नियम के समय के विश्वासियों से पूछते कि वे अपने आप को कैसे वर्णित करते हैं, तो वे सम्भवतः कभी यह नहीं कहते, “हम मसीही हैं।” वास्तव में, “मसीही” शब्द का नए नियम में केवल तीन बार वर्णन है। शिष्यों को सबसे पहले अन्ताकिया में “मसीही” कहा गया था (प्रेरितों के काम 11:26)। बाद मे राजा अग्रिप्पा ने लगभग उपहास के साथ प्रेरित पौलुस से कहा, “क्या तू मुझे थोड़े ही समय में मसीही बनने को फुसला लेगा ?” (प्रेरितों के काम 26:28)। और इसके पश्चात शमौन पतरस अपने पहली पत्री में “मसीही” होने के कारण आने वाले दुःखों के विषय में बात करता है (1 पतरस 4:16)।
इन तीनों सन्दर्भों में “मसीही” शब्द सम्भवत: अपमानजनक रूप से उपयोग किया गया है, यहाँ तक कि तिरस्कारपूर्ण शब्द के रूप में जिसे सुसमाचार के विरोधियों ने गढ़ा हो, ठीक वैसे ही जैसे सत्रहवीं शताब्दी में “प्यूरिटन” शब्द का उपयोग किया गया था। “सम्भव है कि आज के समय में ‘कट्टरपंथी’ शब्द की तरह लगभग तिरस्कार के साथ बोला जाता रहा हो।” ये सभी “घृणासूचक शब्द” थे।
यदि मसीही शब्द इस प्रकार प्रचलन में आया तो यह आश्चर्य की त नहीं कि प्रेरितों के काम की पुस्तक में लूका प्रायः “शिष्य” शब्द का उपयोग करता है (उदाहरण के रूप में प्रेरितों के काम 6:1 आदि; ऐसे दो दर्जन से अधिक उदाहरण हैं) या कभी- कभी विश्वासियों को “मार्ग के” अनुयायी कहता है (प्रेरितों के काम 9:2; 22:4; 24:14), क्योंकि वे उसी का अनुसरण करते थे जिसने कहा था, “मैं ही मार्ग हूँ” (यूहन्ना 14:6)।
परन्तु यदि आप पौलुस से पूछते, “तुम अपने विषय में क्या सोचते हो?” तो सम्भवतः उसका उत्तर ऊपर दिए गए विकल्पों में कोई भी नहीं होता, वरन् वह कहता, “मैं ख्रीष्ट में एक मनुष्य हूँ।”
मुझे स्मरण है, कि किशोरावस्था में मैंने 2 कुरिन्थियों 12:1-10 के खण्ड को पढ़ा था, जिसमें पौलुस विशेष दर्शनों, प्रकाशनों के विषय में वर्णन करता है जो उसे प्राप्त हुए थे, और “शरीर के कांटे के विषय में भी जिसने उसे घमण्ड से दूर रखा। खण्ड का परिचय कराते हुए वह कहता है, मैं एक समय “ख्रीष्ट में एक मनुष्य” को जानता था, जिसे परमेश्वर की अद्भुत महिमा और अनुग्रह के ऐसे असाधारण प्रकाशन मिले थे, जो इतने अद्भुत थे कि उन्हें दूसरों के सामने वर्णन करना अनुचित होगा। मुझे स्मरण है, मैं सोचता था, “यह नाम रहित (अनाम) ख्रीष्ट में व्यक्ति कौन है जिसके विषय में पौलुस बात कर रहा है?” सम्भव है कि मेरी समझ धीमी थी किन्तु धीर-धीरे इसका उत्तर समझ में आया कि पौलुस अपने विषय में बात कर रहा है। वह अपने आप को इसी प्रकार वर्णित करता है, क्योंकि वह अपने विषय में मूल रूप से इसी प्रकार सोचता है कि वह “ख्रीष्ट में एक मनुष्य है”।
“ख्रीष्ट में” और इसके समानार्थक शब्दों (जैसे “उसमें”) को अपने मस्तिष्क में बैठा लीजिए और फिर अपने बाइबल के उन साठ पृष्ठों को जल्दी- जल्दी देखें जिनमें पौलुस के तेरह पत्र सम्मलित हैं, हम पाएँगे कि “ख्रीष्ट में” या इसके किसी रूप का उपयोग अस्सी से अधिक बार मिलेगा। “प्रभु में” (या कभी-कभी “प्रभु यीशु में”) जैसे समतुल्य शब्दों की संख्या लगभग दोगुनी है।
यदि आपने पहले कभी इस बात पर ध्यान नहीं दिया है, तो आप यह सोचकर आश्चर्यचकित होंगे कि पौलुस इन अभिव्यक्तियों का कितनी बार उपयोग करता है और सोचेंगे कि हमने इन पर कैसे पहले कभी ध्यान नहीं दिया। फिर भी यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति वर्षों, यहा तक कि दशकों तक पौलुस के पत्रों को पढ़ता रहे, और फिर भी इस छोटे से सम्बधसूचक (पूर्वसर्गीय अभिव्यक्ति) पद के महत्व को न देख पाए, जबकि यही वह स्पष्ट रूप से मूल तरीका है जिससे वह मसीही होने के अर्थ को व्यक्त करता है।
ये दोनों शब्द सम्बधसूचक शब्द, “पूर्वसर्ग “में” और उपाधि “मसीह” इन पृष्ठों का क्रेन्द्रिय विषय है। पुस्तक के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते आपको ऐसा भी लग सकता है कि अभी तक आपने केवल दो शब्दों की इतनी बड़ी व्याख्या पढ़ी है। फिर भी ये पृष्ठ इस समृद्ध और अद्भुत सिद्धान्त की केवल सतह को ही छू पाते हैं। तथापि मेरे पास आशा है कि ये आपको बाइबल के विभिन्न दृष्टिकोणों से यह समझने के लिए प्रेरित करेंगे कि “ख्रीष्ट में होने” का अर्थ क्या है। यदि आप उसके हैं, तो आपकी सच्ची पहचान यही है कि आप जीवन के प्रत्येक दिन ‘ख्रीष्ट में’ एक पुरुष या एक स्त्री है।
नए नियम के एक विद्वान ने ध्यान दिलाया है कि फ़िल्म द गाडफादर (The Godfather) में माफिया शब्द का उपयोग नहीं किया जाता है, फिर भी वही पूरी कहानी की आधारभूत धारणा है। इसी प्रकार, भले ही “ख्रीष्ट में” जैसी विशिष्ट शब्दावली का उपयोग न किया गया हो, फिर भी इसका जो अर्थ है, वह प्रेरित पौलुस के मसीही जीवन के बारे में कहे गए हर विचार की नींव है। इतना ही नहीं, यह उन अनेक समस्याओं का समाधान भी है जो किसी व्यक्तिगत विश्वासी या सम्पूर्ण कलीसिया को विचलित करती हैं।
नया नियम “ख्रीष्ट में” होने का कोई औपचारिक परिभाषा नहीं देता। इसके महत्व को समझने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि हम उन विभिन्न पदों पर मनन करें जो यह बताते हैं कि इसमें क्या सम्मिलित है। यहाँ हमारा मुख्य उद्देश्य स्वयं को “ख्रीष्ट में” होने के महत्व से परिचित कराना है । ऐसा करने का एक उत्तम मार्ग है कि हम पौलुस की इफिसियों के नाम लिखी पत्री के पहले अध्याय में इसके प्रयोग पर मनन करें।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

