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यीशु के समान सोचना

Thinking Like Jesus

कुछ वर्ष पहले मुझे अमेरिका के एक प्रमुख ईश्वरविज्ञानिय सेमिनरी के दीक्षान्त समारोह में भाषण देने हेतु आमन्त्रित किया गया था। उस भाषण में मैंने बाइबलिय व्याख्या में तर्कशास्त्र की महत्वपूर्ण भूमिका के विषय पर बोला और मैंने सेमिनरियों से यह आग्रह किया कि वे अपने अनिवार्य पाठ्यक्रमों में तर्कशास्त्र के पाठ सम्मिलित करें। सम्भवत: प्रत्येक सेमिनरी के अध्ययन पाठ्यक्रम में विद्यार्थियों को मूल बाइबलीय भाषाएँ — इब्रानी (Hebrew) और यूनानी (Greek) कुछ सीमा तक सिखाई जाती हैं। उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि स्थल के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को कैसे देखें और व्याख्या के मूल सिद्धान्तों को कैसे समझें। ये सब बातें परमेश्‍वर के वचन के अच्छे भण्डारी बनने के लिए बहुत आवश्यक और मूल्यवान हैं। फिर भी, बाइबल की व्याख्या में होने वाली त्रुटियों का मुख्य कारण यह नहीं है कि पाठक को इब्रानी भाषा या उस ऐतिहासिक परिस्थिति का ज्ञान नहीं है जिसमें बाइबल की पुस्तक लिखी गई थी। पवित्रशास्त्र को त्रुटिपूर्ण रीति से समझने का सबसे मुख्य कारण स्थल से असंगत निष्कर्ष निकालना है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि बाइबल के अर्थानुवादक तर्क के आधारभूत सिद्धान्तों में अधिक प्रशिक्षित हों, तो इस प्रकार की त्रुटिपूर्ण निष्कर्षों की सम्भावना बहुत कम हो जाएगी। 

मैं जिस प्रकार के त्रुटिपूर्ण निष्कर्ष की बात कर रहा हूँ, उसका एक उदाहरण देता हूँ। मुझे सन्देह है कि मैंने कभी भी परमेश्वर के सार्वभौमिक चुनाव (sovereign election) के विषय पर कोई चर्चा की हो जिसमें किसी ने यूहन्ना 3:16 का उद्धृत न किया हो और यह न कहा हो कि — “क्या बाइबल यह नहीं कहती कि “क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, कि जो कोई उस पर विश्वास करे वह नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए।” मैं तुरन्त इस बात से सहमत होता हूँ कि बाइबल यह कहती है। यदि हम इस सत्य को तर्कपूर्ण रीति से व्यक्त करें, तो हम कहेंगे कि जो कोई विश्वास करता है उसे अनन्त जीवन मिलेगा, और जिसे अनन्त जीवन मिला है वह नाश नहीं होगा—क्योंकि “नाश” और “अनन्त जीवन” विश्वास के परिणामों की दृष्टि से एक-दूसरे के विपरीत हैं। परन्तु यह पद मनुष्य की यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास करने की क्षमता के विषय में कुछ नहीं कहता। यह खण्ड हमें यह नहीं बताता कि कौन विश्वास करेगा।
यीशु ने कहा, “मेरे पास कोई नहीं आ सकता जब तक पिता जिसने मुझे भेजा उसे अपने पास खींच न ले” (यूहन्ना 6:44)। यहाँ हमारी क्षमता का वर्णन करने वाला एक सार्वभौमिक नकारात्मक कथन मिलता है, कि कोई भी व्यक्ति यीशु के पास आने की क्षमता नहीं रखता जब तक परमेश्वर स्वयं एक विशेष कार्य न करे। फिर भी, इस सत्य को लोग यूहन्ना 3:16 के प्रकाश में प्राय: भूल जाते हैं, जबकि वह पद विश्वास के लिए किसी भी पूर्वापेक्षा के विषय में कुछ नहीं कहता है। इस प्रकार, सम्पूर्ण बाइबल के सबसे प्रसिद्ध पदों में से एक यूहन्ना 3:16 को बार-बार, नियमित रूप से, और व्यवस्थित रीति से त्रुटिपूर्ण निष्कर्षों तथा निहितार्थों से विकृत किया जाता है। 

ऐसे असंगत निष्कर्ष क्यों निकलते हैं? पारम्परिक ख्रीष्टीय ईश्वरविज्ञान, विशेषकर धर्मसुधारवादी ईश्वरविज्ञान, “मन पर पाप के प्रभाव” (noetic effects of sin) के विषय में बात करता है। अंग्रेज़ी शब्द नोएटिक (noetic) यूनानी शब्द नूस (nous) से आया है, जिसका अनुवाद प्राय: “मन” होता है।  इसलिए, “मन पर पाप का प्रभाव” का अर्थ मनुष्य के पतन के परिणामस्वरूप उसकी बौद्धिकता पर पड़ने वाले प्रभाव हैं। सम्पूर्ण मानव व्यक्तित्व जिसमें हमारी सभी क्षमताएँ सम्मिलित हैं, मानवीय स्वभाव के भ्रष्ट होने से बुरी तरह प्रभावित हो गई हैं। मनुष्य की इच्छा नैतिक दासता की स्थिति में है, अर्थात् वह अपने हृदय की बुरी इच्छाओं और प्रवृत्तियों की कैद में है। इसी प्रकार, हमारी बुद्धि भी पतित हो गई, और सोचने-समझने की हमारी क्षमता पतन के कारण अत्यन्त क्षीण हो गई है। मुझे लगता है कि पतन से पहले आदम की बुद्धि असाधारण रूप से उच्च रही होगी। मुझे नहीं लगता कि वह वाटिका की देखभाल करते समय असंगत परिणाम निकालने की प्रवृत्ति रखता होगा। परन्तु, उसका मन तीव्र और सटीक था। किन्तु जब उसने पाप किया, तब उसने वह खो दिया और हम भी उसके साथ वह खो बैठे।

यद्यपि, यह तथ्य कि हम पतित हैं, इसका अर्थ यह नहीं है कि अब हमारे पास सोचने की क्षमता नहीं रही। हम सभी त्रुटि करने की प्रवृत्ति रखते हैं, परन्तु फिर भी हम व्यवस्थित, तार्किक और ठोस रीति से तर्क करना सीख सकते हैं। मेरी इच्छा है कि ख्रीष्टीय लोग अत्यन्त स्पष्टता और ठोस तर्कशीलता के साथ सोचें। इसलिए, एक अनुशासन के रूप में, हमारे लिए यह बहुत लाभदायक है कि हम तर्क के मूलभूत सिद्धान्तों का अध्ययन करें और उन पर अधिकार प्राप्त करें, ताकि हम पवित्र आत्मा की सहायता से अपनी सोच पर पाप के विनाशकारी प्रभावों को कुछ सीमा तक पराजित कर सकें।

मैं एक पल के लिए भी नहीं सोचता कि जब तक हमारे भीतर पाप है, हममें से कोई भी कभी भी अपने तर्क में पूर्ण सिद्ध हो पाएगा। पाप हमें जीवन भर परमेश्वर की व्यवस्था के विरोध में पूर्वाग्रही बना देता है, और हमें परमेश्वर के सत्य के इन मूलभूत विकृतियों से लड़कर उन पर विजय पाना होगा। परन्तु यदि हम परमेश्वर से अपने सारे हृदय, और अपने सारे प्राण, और अपनी सारी बुद्धि और अपनी सारी शक्ति से प्रेम करें (मरकुस 12:30), तो हम अपने मन को प्रशिक्षित करने के प्रयासों में सावधान और परिश्रमी होंगे।

हाँ, पतन से पहले आदम का मन बहुत तीक्ष्ण था। परन्तु मेरा विश्वास है कि संसार ने कभी भी इतनी सटीक और स्पष्ट सोच का अनुभव नहीं किया, जैसा कि ख्रीष्ट के मन में प्रकट हुआ। मेरा मानना है कि हमारे प्रभु की सिद्ध मानवता का एक पक्ष यह था कि उसने कभी भी किसी बात का असंगत निष्कर्ष नहीं निकाला। वह कभी ऐसे निष्कर्ष पर नहीं पहुँचा जो तर्क के आधार से असंगत हो। उसकी सोच पूर्ण रीति से स्पष्ट और सुसंगत थी। हमें प्रत्येक बात में, यहाँ तक कि सोच में भी, अपने प्रभु का अनुकरण करने के लिए कहा गया है। इसलिए, हमारे जीवन का एक प्रमुख और गम्भीर उद्देश्य यह हो कि हम उसे अपनी सम्पूर्ण मन से प्रेम करें।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

आर.सी. स्प्रोल
आर.सी. स्प्रोल
डॉ. आर.सी. स्प्रोल लिग्नेएर मिनिस्ट्रीज़ के संस्थापक, सैनफर्ड फ्लॉरिडा में सेंट ऐन्ड्रूज़ चैपल के पहले प्रचार और शिक्षण के सेवक, तथा रेफर्मेशन बाइबल कॉलेज के पहले कुलाधिपति थे। वह सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक थे, जिसमें द होलीनेस ऑफ गॉड भी सम्मिलित है।