
समस्त सत्य परमेश्वर का सत्य है
1 जनवरी 2026परमेश्वर का अटूट प्रेम
परमेश्वर की करुणा की निरंतरता और निष्ठा, सभी प्रकार की बाधाओं और क्लेशों के बीच बने रहने की उसकी क्षमता में प्रदर्शित होती है। इस निष्ठावान प्रेम की परम अभिव्यक्ति रोमियों 8 में पौलुस की शिक्षा में दिखाई देती है:
अब हम इन बातों के विषय में क्या कहें? यदि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो कौन हमारे विरुद्ध है? वह जिसने अपने पुत्र को भी नहीं छोड़ा परन्तु उसे हम सब के लिए दे दिया, तो वह उसके साथ हमें सब कुछ उदारता से क्यों न देगा? परमेश्वर के चुने हुओं पर कौन दोष लगाएगा? परमेश्वर ही है जो धर्मी ठहराता है; वह कौन है जो दोषी ठहराएगा? ख्रीष्ट यीशु ही है वह जो मरा, हां, वरन् वह मृतकों में से जिलाया गया, जो परमेश्वर के दाहिनी ओर है, और हमारे लिए निवेदन भी करता है। कौन हमको ख्रीष्ट के प्रेम से अलग करेगा? क्या क्लेश, या संकट, या सताव, या अकाल, या नंगाई, या जोखिम, या तलवार? जैसा लिखा है,
“तेरे लिए हम दिन भर घात किए जाते हैं;
हम वध होने वाली भेड़ों के सदृश समझे जाते हैं।”
परन्तु इन सब बातों में हम उसके द्वारा जिसने हम से प्रेम किया जयवन्त से भी बढ़कर हैं। क्योंकि मुझे पूर्ण निश्चय है कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न शक्तियाँ, न ऊँचाई न गहराई, और न कोई सृजी हुई वस्तु हमें परमेश्वर के प्रेम से जो हमारे प्रभु यीशु ख्रीष्ट में है, अलग कर सकेगी। (रोमियों 8:31–39)
इस खण्ड में प्रेरित उस सिद्धान्त को प्रस्तुत करता है जिसने सोलहवीं शताब्दी के धर्मसुधारकों को दृढ़ता से जकड़ लिया था: डेउस प्रो नोबिस (Deus pro nobis), जिसका सरल अर्थ है “परमेश्वर हमारे लिए” (या ‘परमेश्वर हमारे पक्ष में’)। ख्रीष्टी सांत्वना का स्रोत यह नहीं है कि हम परमेश्वर के लिए हैं या हम उसके पक्ष में हैं। वरन् यह है कि परमेश्वर हमारे लिए है और वह हमारे पक्ष में है। यह जानना कि परमेश्वर हमारे लिए है, यह जानना है कि कोई भी और कुछ भी कभी भी हमारे विरुद्ध प्रबल नहीं हो सकता। पौलुस का प्रश्न स्पष्ट रूप से शब्दाडंबरपूर्ण है: “यदि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो कौन हमारे विरुद्ध है?” इसका उत्तर स्पष्ट है: कोई नहीं। निस्संदेह, इसका अर्थ यह नहीं है कि ख्रीष्टी के कोई शत्रु नहीं होंगे। इसके विपरीत, हम शत्रुओं से घिरे रहेंगे। बहुत से लोग हमारे विरुद्ध खड़े होंगे। परन्तु जब परमेश्वर ने स्वयं को हम से बांध लिया है, तब इन असंख्य शत्रुओं के पास हमें नष्ट करने का कोई सामर्थ नहीं है। हम दोतान में एलीशा के समान हैं, जो उन अदृश्य स्वर्गदूतों से घिरा था जो स्वर्गीय सेना के रूप में हमारे लिए लड़ते हैं।
विशेष रूप से, जो हमारे शत्रु कभी नहीं कर सकते, वह यह है कि हमें ख्रीष्ट के प्रेम से अलग कर दें। “अलग करने” का अर्थ एक प्रकार का विभाजन है। हम इसे अधिकाँश विवाह-विच्छेद की ओर बढ़ते विवाहों में एक परीक्षण कदम के रूप में देखते हैं। अलग होना विवाह-विच्छेद से पहले होता है और अधिकाँश उसका सूचक होता है। परन्तु ख्रीष्ट और उसकी दुल्हन के विवाह में, न तो विवाह-विच्छेद है और न ही अलग होना। जिस ‘ख्रीष्ट के प्रेम’ की बात पौलुस करता है, वह हमारा उसके प्रति प्रेम नहीं, वरन् उसका हमारे प्रति प्रेम है।
पौलुस जी उठे और स्वर्ग पर चढ़ाए गए प्रभु की ओर संकेत करता है, जो परमेश्वर की दाहिनी ओर बैठा है और हमारे लिये मध्यस्थता करता है, हमारे महान महायाजक के रूप में कार्य करता है। यह उसका प्रेम और उसकी देख-भाल है जिससे हम अलग नहीं किए जा सकते। पौलुस उन विशिष्ट बातों की सूची बनाता है जो इस प्रेम में हमारी सुरक्षा के लिए खतरा हैं। वह क्लेश, संकट, सताव, अकाल, नंगाई और तलवार की बात करता है।
यह सूची किसी भी प्रकार से सम्पूर्ण नहीं है, परन्तु यह उन कई बातों की ओर ध्यान आकर्षित करती है जो हमें निर्बल कर सकती हैं या हमारे लिए ख्रीष्ट के प्रेम पर सन्देह उत्पन्न कर सकती हैं। जब हम सताव या अकाल के परिणामों को सहते हैं, तो हम यह भय मानने की ओर झुक सकते हैं कि ख्रीष्ट ने हमें त्याग दिया है। परन्तु पौलुस इन भरी बातों को उन दुःखों के रूप में देखता है जो ख्रीष्ट के प्रति हमारे शिष्यत्व के साथ आते हैं। वह भजन संहिता 44 को उद्धृत करता है: “तेरे लिए हम दिन भर घात किए जाते हैं; हम वध होने वाली भेड़ों के सदृश समझे जाते हैं” (भजन संहिता 44:22)।
यदि हमें शहादत तक भी सहनी पड़े, तो भी ऐसा दुःख उस प्रेम को तोड़ नहीं सकता जो ख्रीष्ट हम से रखता है। इन सब परिस्थितियों में ख्रीष्ट के प्रेम के कारण विजय है।
पौलुस घोषणा करता है कि इन सब बातों में हम “जयवन्त से भी बढ़कर” हैं। यह वाक्यांश “जयवन्त से भी बढ़कर” यूनानी भाषा में एक ही शब्द का अनुवाद है, जिसे हायपरनाइकोन के रूप में लिप्यन्तरित किया जा सकता है। इस शब्द का मूल विजय या जीत की धारणा से जुड़ा हुआ है (जैसा कि हमारी नाइकी मिसाइलों या दौड़ने वाले जूतों द्वारा संकेत दिया गया है)। उपसर्ग “हायपर” मूल शब्द को तीव्र करता है। पौलुस का कहना यह है कि ख्रीष्ट के प्रेम के कारण, हम न केवल सारी विपत्तियों के सामने विजेता हैं, परन्तु हम विजय के सर्वोच्च शिखर पर, विजय की चरम सीमा तक पहुँचते हैं।
यूनानी हायपरनाइकोन का लैटिन समतुल्य शब्द सुपरविन्सिमस है। यह दर्शाता है कि ख्रीष्ट में हम केवल विजेता नहीं हैं, परन्तु महाविजेता हैं।
यह ध्यान देना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यह विजय का यह शिखर “उसके द्वारा” प्राप्त किया जाता है। यह उसके बिना या उस से अलग होकर प्राप्त नहीं किया जाता है। और वह “उस” जिसकी बात पौलुस यहां करता है, “उसने हम से प्रेम किया” के रूप में परिभाषित और पहचाना गया है।
पौलुस फिर उन बातों की एक और सूची प्रदान करता है जिनके विषय में उसे निश्चय है कि उनमें हमें ख्रीष्ट के प्रेम से अलग करने की सामर्थ नहीं है। इस सूची में मृत्यु, जीवन, स्वर्गदूत, प्रधानताएं, सामर्थ्य, वर्तमान, भविष्य, ऊँचाई, गहराई और कोई अन्य सृजी हुई वस्तु सम्मिलित हैं।
एक बार फिर जो सूची पौलुस प्रदान करता है वह सम्पूर्ण नहीं है परन्तु उदाहरणात्मक है। वह एक सत्य को संचारित करने के लिए अतिशयोक्ति का उपयोग करता है। यहां तक कि स्वर्गदूतों के पास भी हमें ख्रीष्ट में परमेश्वर के प्रेम से छीनने की शक्ति नहीं है। न कोई स्पष्ट और वर्तमान संकट या भविष्य का भय है जिसके पास हमें उस से अलग करने की सामर्थ हो। प्रकृति की शक्तियाँ, सरकार की शक्तियाँ, नरक की शक्तियाँ—सभी में हमें ख्रीष्ट से अलग करने असमर्थ सिद्ध होती हैं। ख्रीष्ट में परमेश्वर के प्रेम के सामने, ये सृजी हुई शक्तियाँ निर्बल प्रकट होती हैं।
यह भी स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है कि यह अटूट प्रेम जिसकी बात पौलुस रोमियों 8 में करता है, विशेष रूप से परमेश्वर के चुने हुओं के लिए है। यह चुने हुए ही हैं जो इस अटूट प्रेम के आश्वासन का आनन्द लेते हैं। ख्रीष्ट में परमेश्वर के अटूट प्रेम की यह बात चुनाव के सन्दर्भ में होती है। जब पौलुस घोषणा करता है कि परमेश्वर हमारे लिए है, तो “हम” को चुने हुओं के रूप में परिभाषित किया गया है। पौलुस शब्दाडम्बरपूर्ण रूप से पूछता है, “परमेश्वर के चुने हुओं पर कौन दोष लगाएगा? परमेश्वर ही है जो धर्मी ठहराता है” (रोमियों 8:33)।
अतः, जिस “ख्रीष्ट के प्रेम” की चर्चा पौलुस करता है, वह हमारा उसके प्रति प्रेम नहीं, वरन् उसका हमारे प्रति प्रेम है।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

