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समस्त सत्य परमेश्वर का सत्य है

All Truth Is Gods Truth

मेरे द्वारा पढ़ी गई कुछ ही पुस्तकों ने मेरे मन और विचारों पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला है। उनमें से एक मैंने सम्भवत: पचास वर्ष से भी अधिक समय पहले पढ़ी थी। उस पुस्तक का शीर्षक था “द मेटाफ़िज़िकल फ़ाउडेशन्स ऑफ़ मॉडर्न साइंस” (The Metaphysical Foundations of Modern Science)। इस पुस्तक ने मुझ पर इसलिए गहरा प्रभाव डाला क्योंकि इसमें बहुत स्पष्ट रूप से दिखाया गया कि प्रत्येक वैज्ञानिक सिद्धान्त कुछ न कुछ दार्शनिक पूर्वधारणाओं पर आधारित होता है। वैज्ञानिक अन्वेषण के आधार में जो दार्शनिक पूर्वधारणाएँ होती हैं, उन्हें प्रायः स्वयंसिद्ध मान लिया जाता और उन पर गम्भीरता या सतही रूप से भी विचार नहीं किया जाता है। परन्तु ऐसे समय में, जब विज्ञान और ईश्वरविज्ञान के बीच तीव्र विवाद चल रहा  है, तो यह अत्यन्त आवश्यक है कि हम पीछे हटकर इस समस्त ज्ञान–प्रयास की पूर्व–वैज्ञानिक सैद्धान्तिक नींवों के विषय में प्रश्न पूछें। 

विज्ञान शब्द का अर्थ “ज्ञान” है। प्रायः हम इस शब्द को बहुत सीमित अर्थ में समझते हैं, मानो ज्ञान केवल अनुभवजन्य (empirical) अनुसन्धान तक ही सीमित हो। पर भौतिक ज्ञान के साथ-साथ हमें औपचारिक सत्य को भी ध्यान में रखना चाहिए।  इसी कारण गणित को एक वास्तविक विज्ञान माना जाना चाहिए क्योंकि गणित अपने औपचारिक आयाम में वास्तविक ज्ञान प्रदान करता है। वास्तव में, यदि हम वैज्ञानिक प्रगति के इतिहास पर दृष्टि डालें, तो देखते हैं कि नए आविष्कारों और नए प्रतिमानों को आगे बढ़ाने वाला मुख्य स्रोत प्राय: औपचारिक गणित ही रहा है। किन्तु यह देखना आश्चर्य की बात है कि भौतिक वैज्ञानिक अनुसंधान में लगे लोग कितनी बार अपने ही कार्य की दार्शनिक पूर्वधारणाओं को सरलता से अनदेखा कर देते हैं।

कार्ल सेगन की प्रसिद्ध पुस्तक Cosmos (कॉसमॉस) में जो इसी नाम की उसकी टेलीविज़न श्रृंखला पर आधारित है में यह कथन कहते हैं:  “Cosmos (कॉसमॉस) विश्व व्यवस्था के लिए एक यूनानी शब्द है। यह एक अर्थ में अव्यवस्था का विपरीत है। यह सभी वस्तुओं के गहरे पारस्परिक सम्बन्ध को दर्शाता है।” सेगन की इस प्रतीत होने वाली सरल परिभाषा में, जो उनके पूरे कार्य की संरचना को निर्धारित करती है, वे यह मान लेते हैं कि विज्ञान जिस विश्व की जाँच कर रहा है, वह अव्यवस्थित नहीं किन्तु विश्व व्यवस्था है। वे विश्व की बात करते हुए “सभी बातों की गहरी परस्पर‑सम्बद्धता” का उल्लेख करते हैं। यही वैज्ञानिक अनुसंधान की महान पूर्वधारणा है—कि जिस विश्व को हम जानने का प्रयास कर रहे हैं, वह सुसंगत है। इसमें सभी वस्तुओं की गहरी और गहन परस्पर‑सम्बद्धता निहित है। जैसा कि सेगन ने संकेत किया है, विश्व का विकल्प अव्यवस्था है। यदि विश्व अपने मूल स्वरूप में अव्यवस्थित हो, तो सम्पूर्ण वैज्ञानिक प्रयास ढह जाता है। यदि विश्व अव्यवस्थित और असम्बद्ध हो, तो किसी भी प्रकार का ज्ञान सम्भव नहीं होता। यहाँ तक कि परमाणुओं से जुड़े अलग-अलग आँकड़ों को भी पूर्ण अव्यवस्था के ढाँचे में समझा नहीं जा सकता। इसलिए सभी वस्तुओं के एक सुसंगत, तर्कसंगत क्रम की यह पूर्वधारणा वैज्ञानिकों की एक स्पष्ट और अनिवार्य धारणा है।

यह विचार कि वास्तविकता में एक निहित तर्कसंगतता (coherency) है, अपनी जड़ें प्राचीन दार्शनिक खोज में रखता है। उदाहरण के लिए, प्राचीन यूनानी अन्तिम सत्य की खोज करते थे। वे एकता के लिए एक मूलभूत सिद्धान्त चाहते थे जो विविधता में से अर्थ निकाल सके। यही परम एकता वह है जिसे ईश्वरविज्ञान का विज्ञान प्रदान करता है। ईश्वरविज्ञान आधुनिक विज्ञान के लिए आवश्यक पूर्वधारणा उपलब्ध कराता है। यही वह बात थी जिसने प्रसिद्ध दार्शनिक एंटनी फ़्लू को नास्तिकता से देववाद (deism) की ओर मोड़ दिया—अर्थात् यह समझ कि किसी भी ज्ञान को सम्भव बनाने के लिए वास्तविकता में एक सुसंगत और ठोस आधार का होना अनिवार्य है। यह परम सुसंगति इस संसार की अनिश्चितता से प्रदान नहीं किया जा सकता है। इसके लिए एक पारलौकिक क्रम की आवश्यकता होती है।

मध्य युग में दर्शन के क्षेत्र में एक संकट उत्पन्न हुआ, जब उस दर्शन का पुनरुत्थान हुआ जिसे मुस्लिम विचारकों ने “समग्र अरस्तूवाद” (Integral Aristotelianism) कहा। अरस्तू के दर्शन और इस्लामी ईश्वरविज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करने के प्रयास में इन विचारकों ने एक सिद्धान्त प्रस्तुत किया, जिसे “द्वि-सत्य सिद्धान्त” (Double-Truth Theory) कहा जाता है। द्वि-सत्य सिद्धान्त का तर्क यह है कि जो बात धर्म के क्षेत्र में सत्य है, वह विज्ञान के क्षेत्र में असत्य हो सकती है, और जो बात विज्ञान में सत्य है, वह उसी समय धर्म में असत्य हो सकती है। यदि इसे आज की श्रेणियों में समझें, तो इसका अर्थ कुछ इस प्रकार होगा: एक मसीही के रूप में कोई व्यक्ति यह विश्वास कर सकता है कि संसार की उत्पत्ति एक ईश्वरीय सृष्टिकर्ता के उद्देश्यपूर्ण कार्य के द्वारा हुई, और साथ-साथ यह भी मान सकता है कि संसार वैश्विक  दुर्घटना के रूप में बिना किसी कारण के अस्तित्व में आया। तर्क की दृष्टि से परखे जाने पर ये दोनों सत्य परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। फिर भी, द्वि-सत्य सिद्धान्त यह कहता है कि सत्य स्वयं विरोधाभासी है, और कोई व्यक्ति इन परस्पर विरोधी विचारों को एक ही समय में धारण कर सकता है। इस प्रकार की बौद्धिक विभ्रम आज के समय में भी व्यापक रूप से दिखाई देती है। लोगसप्ताह के छह दिन यह मानते हैं कि परमेश्वर का सृष्टि से कोई लेना–देना नहीं, और रविवार को सृष्टिवादी बन जाते हैं। वे यह समझने में असफल रहते हैं कि ये दोनों अवधारणाएँ मूल रूप से एक-दूसरे से मेल नहीं खाती हैं। 

इस बिन्दु पर यह प्रश्न उठता है, “क्या वास्तव में तर्क हमारी वास्तविकता को समझने के प्रयास में मायने रखता है?” यदि हम सुसंगति और विश्व व्यवस्था को मानते हैं, तो तर्क केवल किसी एक क्षेत्र के लिए नहीं, किन्तु प्रत्येक बात के लिए महत्त्वपूर्ण होना चाहिए। थॉमस एक्विनास ने मध्ययुगीन मुस्लिम दार्शनिकों के अरस्तूवाद का प्रत्युत्तर मिश्रित वस्तुओं की अवधारणा से दिया, जिसमें उसने प्रकृति और अनुग्रह के बीच भेद किया (उन्हें विभाजित नहीं किया, जैसा कि उनके कई आलोचक आरोप लगाते हैं)। एक्विनास ने कहा कि कुछ सत्य ऐसे हैं जिन्हें विशेष प्रकाशन के द्वारा जाना जा सकता है, जिन्हें प्राकृतिक संसार की जाँच-पड़ताल से नहीं जाना जा सकता। उसी समय, कुछ सत्य ऐसे भी हैं जिन्हें प्रकृति के अध्ययन से सीखा जाता है, परन्तु वे उदाहरण के लिए, बाइबल में नहीं पाए जाते। मानव शरीर की रक्त परिसंचरण प्रणाली पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं है। एक्विनास का कहना यह था कि कुछ सत्य ऐसे हैं जो “मिश्रित वस्तु” हैं—ऐसे सत्य जिन्हें जिन्हें बाइबिल से भी जाना जा सकता है और प्रकृति के अध्ययन से भी। इन मिश्रित सत्यों में उन्होंने सृष्टिकर्ता के अस्तित्व के ज्ञान को भी सम्मिलित किया।

निश्चित रूप से, मूल बात यह है कि एक्विनास, अपने प्रसिद्ध पूर्ववर्ती ऑगस्टीन से सहमत होते हुए, यह तर्क दे रहे थे कि समस्त सत्य परमेश्वर का सत्य है, और सभी सत्य अन्तत: एक ही शिखर पर मिलते हैं। यदि विज्ञान धर्म का विरोध करता है, या ईश्वर विज्ञान का विरोध करता है, तो उनमें से कम से कम एक अवश्य ही त्रुटिपूर्ण होगा। इतिहास में ऐसे अवसर आए हैं जब वैज्ञानिक समुदाय ने बाइबल को नहीं, वरन् बाइबल की त्रुटिपूर्ण व्याख्याओं को सुधारा है, जैसा कि हम गैलीलियो के प्रकरण में देखते हैं। दूसरी ओर, बाइबिलीय प्रकाशन उन वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर बौद्धिक नियंत्रण का काम कर सकता है जो बिना किसी आधार के हैं। किसी भी स्थिति में, यदि ज्ञान सम्भव है, तो कार्ल सेगन द्वारा मानी गई धारणा को बनाए रखना होगा—अर्थात, सत्य को जानने तथा विज्ञान को सम्भव बनाने के लिए एक सुसंगत वास्तविकता का होना आवश्यक है, जिसे हम जानने का प्रयास कर रहे हैं।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

आर.सी. स्प्रोल
आर.सी. स्प्रोल
डॉ. आर.सी. स्प्रोल लिग्नेएर मिनिस्ट्रीज़ के संस्थापक, सैनफर्ड फ्लॉरिडा में सेंट ऐन्ड्रूज़ चैपल के पहले प्रचार और शिक्षण के सेवक, तथा रेफर्मेशन बाइबल कॉलेज के पहले कुलाधिपति थे। वह सौ से अधिक पुस्तकों के लेखक थे, जिसमें द होलीनेस ऑफ गॉड भी सम्मिलित है।