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15 जनवरी 2026
छुटकारे में पवित्र आत्मा का कार्य
22 जनवरी 2026इतिहास में पवित्र-आत्मा का कार्य
आठवीं शताब्दी में रचित और रोमी ब्रेवीअरी की वेस्पर्स प्रार्थना-पुस्तक का अंग, Veni Creator Spiritus पवित्र आत्मा की स्तुति करने वाला एक भजन है। जॉन ड्राइडन का भव्य अनुवाद इसके आरम्भिक पंक्तियों को इस प्रकार प्रस्तुत करता है: “हे सृष्टिकर्ता आत्मा, जिसकी सहायता से जगत की नींव सबसे पहले रखी गई थी।”
सृष्टिकर्ता के रूप में पवित्र आत्मा के कार्य बाइबल के दूसरे पद में प्रकट होता है। अविकसित सृष्टि को “बेडौल और वीरान” और “अन्धियारे में” बताते हुए, लेखक परमेश्वर की आत्मा को “जल की सतह पर मण्डराते हुए” बताता है (उत्पत्ति 1:2)। पवित्रशास्त्र के इस आरम्भिक अध्याय के अन्त में मनुष्य की सृष्टि की घोषणा है: “हम मनुष्य को अपने स्वरूप में, अपनी समानता के अनुसार बनाएँ” (पद 26)। सर्वनाम “अपने” प्रायः त्रिएक परमेश्वर की ओर संकेत माना जाता है, जिसमें पवित्र आत्मा भी सम्मिलित है। आरम्भ से ही, पवित्र आत्मा ने परमेश्वर की सृजनात्मक कार्य को सम्पन्न किया है। संसार की सृष्टि में, और विशेष रूप से मनुष्य की सृष्टि में, पवित्र आत्मा विशेष रूप से प्रकट होता है।
पिन्तेकुस्त
नयी वाचा के युग के उदय पर, पिन्तेकुस्त भी एक समान सृजनात्मक कार्य—या अधिक ठीक कहें तो, पुनः-सृजन—को दर्शाता है। पतित मानवता को आत्मा के द्वारा उस स्तर तक रूपान्तरित किया जाना थ, जो पुरानी वाचा के अधीन अज्ञात था।
अपने पुनरुत्थान के बाद, यीशु ने पिन्तेकुस्त के महत्व को अपने चेलों पर साँस फूँककर और यह कहकर स्पष्ट किया, “पवित्र आत्मा लो” (यूहन्ना 20:22)। यह कार्य उत्पत्ति के आरम्भिक अनुक्रम को स्मरण दिलाता है: पवित्र आत्मा, परमेश्वर का श्वास, “जीवन की साँस” का साधन है (उत्पत्ति 2:7; यूहन्ना 20:22 भी देखें)। जैसे परमेश्वर ने आदम में जीवन फूँका था, वैसे ही यीशु , आखिरी आदम ने, अपने लोगों में नया जीवन फूँका। पवित्र आत्मा को भेजने के कारण यीशु पौलुस की भाषा में, “जीवनदायक आत्मा” बना (1 कुरिं. 15:45)। पिन्तेकुस्त एक युगान्तकारी घटना थी, जो एक नए युग के आरम्भ का सन्केत देती है।
सृष्टि की उत्पत्ति और समस्त सृष्टि के अंतिम पुनर्निर्माण के बीच में, पिन्तेकुस्त वह बिन्दु है जहाँ यह कहा जा सकता है, “युग का अन्त आ पहुँचा है” (1 कुरिं. 10:11)। आत्मा ने चेलों को उद्धार और समापन में यीशु की भूमिका की स्पष्ट समझ प्रदान की, और उन्हें असाधारण निर्भीकता से यीशु का प्रचार करने के लिए सुसज्जित किया। पवित्र आत्मा के आगमन के साथ प्राप्त हुई अन्य भाषाओं में बोलने की क्षमता ने विभिन्न देशों के लोगों को अपनी-अपनी भाषाओं में सुसमाचार सुनने में सक्षम बनाया। एक पल में, बाबेल का श्राप पलट गया (उत्पत्ति 11:7–9)। इस तरह आत्मा से सामर्थ्य पाने वाले चेले संसार के देशों तक मेल-मिलाप का संदेश ले जाने के लिए प्रेरित और योग्य हुए, इस भरोसे के साथ कि परमेश्वर वह पूरा करेगा जिसकी उसने प्रतिज्ञा की थी (लूका 24:48; प्रेरितों के काम 1:4)। जो गैर-यहूदियों के लिए एक आशीर्वाद लगता है, वह उन इस्राएलियों पर एक दण्ड प्रतित होता है जिन्होंने अपने मसीहा को ठुकरा दिया था। उनकी अपनी भाषा के अलावा अन्य भाषाओं में सुसमाचार की ध्वनि ने ही यशायाह में परमेश्वर की वाचागत चेतावनी की पुष्टि की: “निश्चय ही वह इन लोगों से पराए होंठो से, हां, विदेशी भाषा में बोलेगा” (यशायाह 28:11)। जो राष्ट्रों के लिए आशीष होना था, वही इस्राएल के लिए कठोर होने का साधन ठहरा, जब तक कि गैर-यहूदियों की “पूर्णता” भीतर नहीं आ जाती (रोमियों 11:25)।
पिन्तेकुस्त की इस समझ के साथ, इसकी पुनरावृत्ति की कल्पना नहीं की जा सकती। यद्यपि इतिहास में आत्मा के अनेक “उण्डेले जाने” और जागरणों के अद्भुत प्रदर्शन मिलते हैं, फिर भी कठोर अर्थ में इनमें से कोई भी पिन्तेकुस्त की पुनरावृत्ति नहीं है। पिन्तेकुस्त ने पुरानी और नयी वाचागत व्यवस्थाओं के बीच एक निर्णायक मोड़ चिन्हित किया। प्रतिरूप और छाया के दिन पूर्णता और वास्तविकता के दिनों में परिवर्तित हो गए। पिन्तेकुस्त ने एक ऐसी उद्धारकारी व्यवस्था के अन्त का संकेत दिया जो मुख्यतः (यद्यपि पूर्णतः नहीं) जातीय इस्राएल पर केंद्रित थी, और इसके स्थान पर सभी जातियों से बने एक वाचा समुदाय के उदय की घोषणा की, जिसका पुराने नियम में स्पष्ट संकेत दिया गया था, पर जो तब तक साकार न हुआ था। पिन्तेकुस्त के साथ हुई चमत्कारिक घटना स्वयं उस क्षण की विशिष्टता की सूचक थी। इसने प्रेरितों के आगमन को चिह्नित किया—परमेश्वर के मूलभूत, न कि निरंतर, कलीसिया निर्माता (इफिसियों 2:20)।
पवित्रशास्त्र
पवित्र आत्मा के द्वारा नया जन्म पाए हुए, उसके भीतर वास किए हुए और उसके द्वारा पवित्रीकृत तीर्थयात्री–पवित्र जन के रूप में, जो नये यरूशलेम की ओर अग्रसर हैं, हमें अब भी बुद्धि की आवश्यकता रहती है; और यह बुद्धि पवित्र आत्मा ही प्रदान करता है।। उसी ने यह सुनिश्चित किया कि परमेश्वर की प्रजा को स्वर्ग तक ले जाने वाला एक विश्वसनीय मार्गदर्शक दिया जाए। पुराने नियम के विषय में बात करते हुए, पतरस कह सकता था कि इसका कोई भी भाग मनुष्य की रचना नहीं है, “परन्तु लोग पवित्र आत्मा की प्रेरणा द्वारा परमेश्वर की ओर से बोलते थे” (2 पतरस 1:21)। और पौलुस भी यही प्रतिध्वनित करता है कि “सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है” (2 तीमुथियुस 3:16)। आत्मा ने यह कार्य ठीक-ठीक किस प्रकार सम्पन्न किया, यह एक रहस्य बना हुआ है। बाइबल में जगह-जगह मानव लेखकों के स्पष्ट निशान दिखाई देते हैं। साथ ही, इसका हर भाग, कलम की एक छोटी सी रेखा तक (देखें मत्ती 5:18), परमेश्वर की श्वास का परिणाम है। पवित्र आत्मा दो प्रक्रियाओं में—बाइबल के लेखकों को ज्ञान और सत्य प्रकट करने और प्रेरणा प्रदान करने में—अपना प्रभुत्व स्थापित करते हुए पवित्रशास्त्र को अचूक रूप से प्रेरित करता है। कलीसिया पवित्रशास्त्र को आकार देने में पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तीन प्रक्रियाओं में प्रतिउत्तर देती है—स्वीकार करना और मान्यता देना (ग्रन्थ-संंग्रहीकरण), संरक्षण करना और अनुवाद करना।
बाइबिल, जो पवित्र आत्मा का शासन और मार्गदर्शक है, वही पवित्रता और अन्तिम उद्धार के लिए मसीहियों की आवश्यकता है। पवित्र आत्मा द्वारा लिखित पाठ के प्रकाश से परमेश्वर की इच्छा स्पष्ट होती है। मसीहियों के रूप में, हम वर्तमान में “नए स्वर्ग और नई पृथ्वी की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जिसमें धार्मिकता का वास होगा” (2 पतरस 3:13)। डच ईश्वरविज्ञानी गीरहार्डस वोस के अनुसार, महिमा की अवस्था में पवित्र आत्मा “पुनरुत्थान-जीवन का स्थायी आधार” होगा। पवित्र आत्मा, जिसने पिता की सेवा की और पुत्र को महिमा दी, तब संतों के अनन्त जीवन को बनाए रखने वाला होगा। उस दिन तक, जब “परमेश्वर सब में सब कुछ होगा” (1 कुरिन्थियों 15:28), हम बाधाओं और कठिनाइयों से भरे मार्ग पर चलते हैं। हमें तीन प्रकार के शत्रुओं का सामना करना पड़ता है: संसार, शरीर और शैतान। पवित्र आत्मा, जो हमारे हृदयों में ख्रीष्ट का प्रतिनिधि है, यह सुनिश्चित करता है कि विजय निश्चित है। वह यह सुनिश्चित करता है कि आदम के पतन के कारण संसार में आई दास्तव और निराशा दूर हो जाए।
नई सृष्टि
बाइबल के दूसरे छोर पर, प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में उन “सात आत्माओं” का वर्णन है जो “समस्त पृथ्वी पर भेजी गई हैं” (प्रकाशितवाक्य 5:6; 1:4 भी देखें); ये आत्माएँ पवित्र आत्मा का प्रतीक हैं, जो परमेश्वर के उद्देश्यों को पूरा करने वाला, अन्तःस्थित कार्यकर्ता है। जो आत्मा निराकार सृष्टि पर मण्डराता हुआ देख रहा था, वही अब सम्पूर्ण विश्व पर ध्यानपूर्वक छाया करता है, जिससे कि एक नई सृष्टि को अस्तित्व में लाया जाए और उसे परमेश्वर की सिद्ध योजना के अनुसार रूप दिया जाए।
ईश्वरीय कलाकार के रूप में, पवित्र आत्मा ने अदन की सुन्दरता को उतना ही सुनिश्चित किया जितना कि सम्पूर्ण सृष्टि की सुन्दरता को: “वह बहुत अच्छा था” (उत्पत्ति 1:31)। ध्यान दें कि मूसा ने मिलापवाले तम्बू (अपने छुड़ाए हुए लोगों के साथ परमेश्वर की उपस्थिति का प्रतीक) के निर्माण में, उसके वास्तुकारों, बसलेल और ओहोलीआब को “परमेश्वर के आत्मा से भरा” पाया (निर्गमन 31:3)। मूसा उनकी सुन्दरता और व्यवस्था के प्रति चिन्ता से प्रसन्न प्रतीत होता है। तम्बू में एक स्पष्ट सौंदर्यबोध था—और यह पवित्र आत्मा की योजना को दर्शाता है (निर्गमन 35:30-35)। इसी प्रकार, प्रत्येक कलात्मक कार्य के पीछे भी पवित्र आत्मा का कार्य निहित है। जैसा कि जॉन कैल्विन ने लिखा है, “मानव जीवन में जो कुछ भी सर्वोत्तम है, उसका ज्ञान हमें परमेश्वर की आत्मा के द्वारा प्रदान किया जाता है।”
आत्मा का उद्देश्य महिमा है—वह महिमा जिसे आदम बाग में प्राप्त करने में असफल रहा। पवित्र आत्मा के विषय में नबी जब उसके कार्य का चित्रण करते हैं, तो वे उस महिमा की पुनःस्थापना को देखते हैं।
जब तक हम पर ऊपर से आत्मा न उण्डेला जाए,
और जंगल उपजाऊ भूमि न बन जाए,
और उपजाऊ भूमि जंगल न कहलाने लगे।
तब वह जंगल न्याय का वास होगा
तथा उपजाऊ भूमि में धार्मिकता बसेगी।
धार्मिकता का फल शान्ति होगी,
तथा धार्मिकता का परिणाम सदा का चैन और सुरक्षा। (यशायाह 32:15-17)
परमेश्वर का पवित्र आत्मा, जो सबसे पहले सृष्टि के जल पर मण्डराया, नबियों और प्रेरितों के द्वारा बोला और पिन्तेकुस्त के दिन ख्रीष्ट के एक और सहायक देने (सांत्वनादाता, सहारा देने वाला, सामर्थ्य प्रदान करने वाला, परामर्शदाता) की प्रतिज्ञा के साक्षी के रूप में उण्डेला गया। यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा, अपने व्यक्तिगत प्रतिनिधि कार्यकर्ता के रूप में, अपने चेलों के बीच अपनी सेवकाई को निरन्तर जारी रखता है। पवित्र आत्मा का कार्य हर समय ख्रीष्ट की ओर ध्यान आकर्षित करना है। यीशु ने कहा, “वह मेरी महिमा करेगा, क्योंकि वह जो मेरा है, वही लेकर तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:14)।
आरम्भ से अन्त तक, पवित्र आत्मा का उद्देश्य नई सृष्टि की रचना करना है जिसमें परमेश्वर के कार्य की महिमा प्रकट होगी। चार्ल्स वेस्ली के शब्दों में हम मुख्य रूप से पवित्र आत्मा के कार्य का ही गुणगान करते हैं:
तब अपनी नई सृष्टि को पूरा कर;
हमें शुद्ध और निष्कलंक बना;
हमें तेरे महान उद्धार को
तुझ में पूर्ण रूप से पुनःस्थापित देखने दे;
महिमा से महिमा में परिवर्तित होते जाएँ,
जब तक स्वर्ग में अपना स्थान न पा लें;
जब तक तेरे सामने अपने मुकुट न डाल दें,
आश्चर्य, प्रेम और स्तुति में लीन हो जाएँ।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

