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विश्व के बहुत से अधार्मिक लोग भी रोमी काथलिक परम्परा की इस प्रसिद्ध वाक्य से परिचित हैं, “पिता, मुझे आशीष दें, क्योंकि मैंने पाप किया है।” जब कोई सदस्य किसी पुरोहित के साथ निजी पाप स्वीकार पीठिका (Confessional) में प्रवेश करता है, तब कहे जाने वाले ये शब्द पाप की वास्तविकता और अनुग्रह की आवश्यकता दोनों को प्रकट करते हैं। इस दृश्य में इसके बाद क्या होता है? स्वीकार किए गए पापों की सूची के उत्तर में, याजक पश्चात्ताप के कुछ निश्चित कदम निर्धारित करता है और अन्त में दोषमुक्ति की घोषणा करता है। धर्मसुधारवादी परम्परा भी पाप को स्वीकार करने और क्षमा प्राप्त करने के महत्व की पुष्टि करती है, परन्तु कुछ महत्वपूर्ण भिन्नताओं के साथ।
पहली भिन्नता यह है कि हम किसके समक्ष अपने पापों को स्वीकार करते हैं। क्योंकि बाइबल हमें बताती है कि “परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एक ही मध्यस्थ है, अर्थात् मनुष्य यीशु ख्रीष्ट” (1 तीमुथियुस 2:5), इसलिए हम विश्वास करते हैं कि हमारे पापों के कारण उत्पन्न हुई दूरी को केवल ख्रीष्ट ही दूर कर सकता है, न कि कोई मानवीय पुरोहित या पास्टर। हम अपने पापों को परमेश्वर के सामने स्वीकार करते हैं, और अपने महान् महायाजक, यीशु ख्रीष्ट के गुणों की दुहाई देते हैं (इब्रानियों 4:14–16)।
दूसरी भिन्नता उस स्थान से सम्बन्धित है जहाँ हम मानते हैं कि पापों का अंगीकार होना चाहिए। धर्मसुधारवादी लोग उस बात को, जो पाप स्वीकार पीठिका की गोपनीयता में होती है, “सामने” अर्थात् सार्वजनिक आराधना के एक केन्द्रीय भाग के रूप में स्थापित करते हैं। शताब्दियों से धर्मसुधारवादी आराधना-विधियों (आराधना के क्रम) की एक विशेष पहचान “शुद्धिकरण” का भाग रही है। इसका उदाहरण इस प्रकार हो सकता है: परमेश्वर का वचन पढ़ा जाता है, लोग उसके प्रत्युत्तर में अपने पापों का अंगीकार करते हैं, और फिर सेवक उन लोगों के लिए क्षमा की घोषणा करता है जो यीशु ख्रीष्ट पर विश्वास कर रहे हैं।
इसे सार्वजनिक आराधना का भाग क्यों बनाया जाए? पापों का अंगीकार करना अत्यन्त व्यक्तिगत और निजी विषय प्रतीत हो सकता है। सम्भव है कि आपने किसी कलीसिया की सभा में असहज अनुभव किया हो, जहाँ आपसे बीते हुए सप्ताह के अपने पापों का सीधे सामना करने की अपेक्षा की गई हो। अनेक कलीसियाओं ने व्यवस्था का पढ़ा डाना या किसी भी प्रकार के पाप अंगीकार को इसलिए हटा दिया है क्योंकि वे नहीं चाहते कि लोगों को असहज लगे। किन्तु धर्मसुधारवादी एक भिन्न मार्ग पर स्थिर रहे हैं, और इसका कारण आराधना के स्वभाव से सम्बन्धित है।
आराधना परमेश्वर के साथ एक भेंट है, और पापी लोग पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति में नहीं आ सकते। पापों का अंगीकार और उस धार्मिकता की घोषणा जो यीशु ख्रीष्ट में पाई जाती है, यह एक सामर्थी स्मारक है कि सुसमाचार के बिना आराधना सम्भव ही नहीं है। इसके अतिरिक्त, आराधना का उद्देश्य है ख्रीष्टीय पहचान को आकार देना और दृढ़ भी करना। मसीही होने के नाते हम एक साथ पापी भी हैं और पवित्र भी, और दोनों ही सत्य महत्वपूर्ण हैं (1 यूहन्ना 1:8–9)। सामूहिक आराधना में एक उल्लास का क्षण तब आता है जब सेवक उस क्षमा की घोषणा करता है जो हमें यीशु ख्रीष्ट में प्राप्त है, और वह हमारे मन में यह पहचान दृढ़ करता है कि हम अनुग्रह से बचाए गए पापी हैं—ऐसे लोग जो परमेश्वर की दृष्टि में चुने हुए और बहुमूल्य हैं।
यह पापों की क्षमा के विषय में रोमी काथलिक और धर्मसुधारवादी दृष्टिकोणों के बीच तीसरी भिन्नता की ओर ले जाता है: जब सेवक क्षमा की घोषणा करता है तब वास्तव में क्या घटित हो रहा होता है। जब सेवक ऐसा करता है तब वह कोई आदेश (Decree) नहीं दे रहा होता, वरन् वह केवल उसी सत्य की घोषणा (Declare) करता है जो पवित्रशास्त्र के अनुसार पहले से ही सत्य है। इसके विपरीत, “दोषमुक्ति” (लातीनी शब्द absolvere से, जिसका अर्थ है “मुक्त करना”) उस कार्य को दर्शाता है जिसमें पुरोहित किसी व्यक्ति को उसके पाप के दोष से वास्तव में मुक्त करता है। परन्तु मनुष्यों में पापों को क्षमा करने का कोई अधिकार नहीं है (मरकुस 2:7), यद्यपि यह अधिकार अवश्य है कि पापों की क्षमा का प्रचार किया जाए (प्रेरितों के काम 13:38)। धर्मसुधारवादी आराधना सभा के इस महत्वपूर्ण क्षण में सेवक परमेश्वर के स्थान पर खड़ा नहीं —वरन् परमेश्वर की ओर से वचन सुनाने वाला—होता है, और उसके होंठों से हम अपने क्षमाशील और दयालु परमेश्वर के वचन सुनते हैं: “अब जो ख्रीष्ट यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं” (रोमियों 8:1)। इसी कारण अनेक धर्मसुधारवादी कलीसियाओं में क्षमा की घोषणा प्रायः बाइबल के ऐसे खण्ड को पढ़कर की जाती है जो सुसमाचार की क्षमा और आशा को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है। परमेश्वर का वचन और उसकी प्रतिज्ञा ही हैं जहाँ हम पापों की क्षमा का आश्वासन पाते हैं।
इस बात को ध्यान में रखते हुए, पापों की क्षमा की घोषणा धर्मसुधारवादी आराधना-विधि का एक उच्चतम क्षणों है। पाप हमें नीचे गिरा देता है, परन्तु सुसमाचार हमें ऊपर उठाता है (भजन 32:3–5)। यही हमारी आशा का उत्साहित करता है और हमारी आज्ञाकारिता की सामर्थ्य है। आराधना वह समय है जब हम “सम्पूर्ण अनुग्रह के परमेश्वर” से भेंट करते हैं (1 पतरस 5:10)—उसी परमेश्वर से जो अयोग्य विद्रोहियों की ओर स्वयं बढ़ता है और दाऊद के शब्दों में “मेरा सिर उठाने वाला” (भजन 3:3) बन जाता है। वह ऐसा परमेश्वर है जो “कोप करने में धीमा और करुणा तथा सत्य से भरपूर” है (निर्गमन 34:6)। सार्वजनिक आराधना में उसका हृदय पूर्ण रीति से प्रकट होता है, और सम्भवतः विशेष रूप से पापों की क्षमा की घोषणा में यह और भी स्पष्ट दिखाई देता है।
जो लोग पहले से ही ख्रीष्ट पर विश्वास कर रहे हैं, वे सेवक द्वारा घोषणा करने से पहले ही क्षमा किए जा चुके होते हैं। उस क्षण वस्तुनिष्ठ रूप से न तो हमारे भीतर और न ही हमारे और परमेश्वर के सम्बन्ध में कोई नया परिवर्तन होता है। परन्तु यद्यपि हमें पहले ही क्षमा मिल चुकी है, हम प्रायः इसे भूल जाते हैं, जिसके कारण सन्देह और अनाज्ञाकारिता उत्पन्न होती है। इसलिए पापों की क्षमा का आश्वासन इस बात का आवश्यक स्मारक है कि हम परमेश्वर की प्रजा के रूप में कौन हैं: “एक समय तुम तो प्रजा न थे पर अब परमेश्वर की प्रजा हो; उस समय तुम पर दया न हुई थी, पर अब दया हुई है” (1 पतरस 2:10)।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

