He Cares for Us

परमेश्वर हमारी चिन्ता करता है 

29 अक्टूबर 2026
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29 अक्टूबर 2026

एक पास्टर क्या करता है? 

What Does a Pastor Do?

जब मेरा बेटा बालवाड़ी में पढ़ता था तो एक दिन वह स्कूल में पूरा किया हुआ एक जीवनी-रेखाचित्र लेकर घर आया।  उसमें उसका स्वयं का चित्र और उसके तथा उसके परिवार के विषय में कुछ मूलभूत जानकारी सम्मिलित थी। उसमें पूछे गए प्रश्नों में से एक था, “तुम्हारे पिता क्या काम करते हैं?” 

मुझे बहुत अच्छा लगता यदि उसका उत्तर कुछ ऐसा होता, “वे कलीसिया के सेवक हैं,” “वे परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हैं,” या सम्भवतः, “वे लोगों को यीशु के विषय में बताते हैं।” परन्तु नहीं—उसने इनमें से कोई भी उत्तर नहीं दिया। मुझे बहुत निराशा हुई जब उसने बस इतना कहा, “वे अपने कम्प्यूटर पर काम करते हैं और कॉफी पीते हैं।” 

यद्यपि मुझे विश्वास है कि वर्षों के साथ अपने पिता के कार्य के विषय में मेरे बेटे की समझ अधिक परिपक्व हो गई है, फिर भी उस हास्यपूर्ण घटना ने मुझे यह सोचने पर विवश कर दिया कि “एक पास्टर क्या करता है?” इस प्रश्न का उत्तर देना इतना सरल नहीं हो सकता, यहाँ तक कि वयस्कों के लिए भी। 

तो, एक पास्टर क्या करता है?

एक विशिष्ट बुलाहट

सबसे पहले, एक पास्टर की सेवकाई उसकी बुलाहट से आरम्भ होती है। सुसमाचार की सेवकाई के लिए मिलनेवाली बुलाहट, उद्धार के लिए दी जानेवाली सामान्य बुलाहट से भिन्न होती है। प्रेरित पौलुस अपने युवा सहकर्मी तीमुथियुस को हाथ रखने के द्वारा मिली इस विशिष्ट बुलाहट का स्मरण कराते हुए इसे एक “पवित्र बुलाहट” कहता है (2 तीमुथियुस 1:6–9)। निश्चय ही यह एक पवित्र बुलाहट है, क्योंकि सेवक को कलीसिया के द्वारा और कलीसिया के लिए अलग ठहराया जाता है, जिससे कि वह प्रभु यीशु ख्रीष्ट के राजदूत के रूप में वचन और आचरण, दोनों के द्वारा उसका प्रतिनिधित्व करे। उसी को राज्य की अधिकारपूर्ण कुँजियाँ सौंपी गई हैं (2 कुरिन्थियों 5:20; मत्ती 16:19)।

प्रतिनिधित्व करने के इस अधिकार का उपयोग कभी भी अपने गौरव या प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए (2 कुरिन्थियों 4:5), और न ही उन लोगों पर प्रभुत्व जमाने के लिए जो उसकी देखभाल के अधीन हैं (1 पतरस 5:3)। इसके विपरीत, पास्टर का पद विनम्र सेवा का पद है, जिसका आदर्श स्वयं हमारा प्रभु है, जिसने अपने चेलों के पाँव धोए (यूहन्ना 13:1–17)। जो लोग इस प्रकार सेवा करते हैं और जिनकी दृष्टि में यह बुलाहट तथा उद्देश्य रहता है, उन्हें प्रभु आदर देते हैं—और उनकी देखभाल में रहने वाली कलीसिया को भी उनका आदर करना चाहिए (1 तीमुथियुस 5:17)। 

इसी बुलाहट से पास्टर के तीन मुख्य उत्तरदायित्व निकलते हैं।

1. अगुवाई करना

पास्टर की पहली जिम्मेदारी प्रभु यीशु ख्रीष्ट की कलीसिया की अगुवाई करना है। एक पास्टर निस्सन्देह एक अगुवा होता है। परन्तु उसकी अगुवाई की तुलना व्यापारिक जगत की नेतृत्व-शैली से नहीं की जानी चाहिए, जहाँ सफलता का मूल्याँकन प्रायः केवल उपलब्धियों और अन्तिम वित्तीय परिणामों के आधार पर किया जाता है।

ख्रीष्ट की कलीसिया में अगुवाई का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार उदाहरण प्रस्तुत करना है—भक्ति और मसीह के सदृश जीवन का उदाहरण। जब यहोवा ने यहोशू के द्वारा अपने लोगों को प्रतिज्ञात देश में पहुँचाया, तब उसने विजय का रहस्य किसी सैन्य रणनीति में नहीं बताया। इसके विपरीत, उसने यहोशू से कहा: “व्यवस्था की यह पुस्तक तेरे मुँह से न हटने पाए, परन्तु तू उस पर दिन-रात ध्यान देना, ताकि जो कुछ उसमें लिखा है उसके अनुसार करने की सावधानी रखे; क्योंकि तभी तू अपने मार्ग में सफलता पाएगा और तभी तेरा कार्य सिद्ध होगा।”  (यहोशू 1:8)

इसी प्रकार, जब प्रेरित पौलुस ने कुरिन्थुस की उस कलीसिया को लिखा, जो विभाजनों और नैतिक अव्यवस्था से ग्रस्त थी, तब उसने भक्तिपूर्ण जीवन के लिए अपने जीवन को ही एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया: “जैसे मैं ख्रीष्ट का अनुकरण करता हूँ, वैसे ही तुम भी मेरा अनुकरण करो।”  (1 कुरिन्थियों 11:1)

व्यक्तिगत खराई और ईश्वरभक्तिपूर्ण जीवन की इसी नींव पर खड़े होकर एक सेवक परमेश्वर की आराधना और कलीसिया की सेवकाई—दोनों में परमेश्वर के लोगों की अगुवाई कर सकता है। 

2. प्रबन्ध करना

दूसरा, पास्टर को प्रभु यीशु मसीह की कलीसिया के लिए प्रबन्ध करने की बुलाहट दी गई है। यह प्रबन्ध वचन की सेवकाई, कलीसियाई विधियाँ और प्रार्थना की सेवकाई के द्वारा होता है। ये अनुग्रह के विशिष्ट—फिर भी सामान्य—साधन हैं, जिन्हें परमेश्वर ने अपने लोगों की आत्मिक उन्नति के लिए नियुक्त किया है। इन्हीं के द्वारा वह ख्रीष्ट में प्राप्त उनके उद्धार के समस्त लाभों को उनके जीवन में लागू करता है।

एक सेवक का उत्तरदायित्व है कि वह विश्वासयोग्यता और निरन्तरता के साथ इन अनुग्रह के साधनों को उस झुण्ड तक पहुँचाए जिसकी देखभाल परमेश्वर ने उसे सौंपी है। चाहे अन्य आवश्यकताएँ कितनी ही उचित और महत्त्वपूर्ण क्यों न प्रतीत हों, उन्हें उसकी प्राथमिक सेवकाई से उसका ध्यान नहीं हटाना चाहिए। प्रेरित पतरस ने प्रारम्भिक कलीसिया में इस प्राथमिकता को स्पष्ट किया। जब प्रतिदिन भोजन के वितरण को लेकर एक व्यावहारिक समस्या उत्पन्न हुई, तब उसने कहा, “यह उचित नहीं कि हम परमेश्वर के वचन का प्रचार छोड़कर भोजन परोसने का काम करें… परन्तु हम तो प्रार्थना और वचन की सेवकाई में लगे रहेंगे।” (प्रेरितों के काम 6:2, 4)

इस प्राथमिकता पर बल देने का अर्थ यह नहीं कि कलीसिया की अन्य सेवकाइयाँ कम महत्त्वपूर्ण हैं। वरन्, इसका उद्देश्य उन्हें उनके उचित स्थान पर रखना है, जिससे कि कलीसिया का आत्मिक पोषण सदैव उसकी प्राथमिकता बना रहे। पतरस ने स्वयं यह प्राथमिकता अपने प्रभु से सीखी थी, जिसने तीन बार उससे कहा, “मेरी भेड़ों को चरा।” (यूहन्ना 21:17)

3. रक्षा करना

तीसरा, पास्टर को प्रभु यीशु ख्रीष्ट की कलीसिया की रक्षा करनी है। इस उत्तरदायित्व की जड़ें सृष्टि के आरम्भ तक जाती हैं। परमेश्वर ने प्रथम मनुष्य आदम को अदन की वाटिका में इस उद्देश्य से रखा कि वह “उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे” (उत्पत्ति 2:15)। आदम को वाटिका की देखभाल करने और उसे हर उस बात से सुरक्षित रखने का दायित्व सौंपा गया था जो उसकी उन्नति में बाधा बन सकती थी। परन्तु दुःख की बात है कि आदम इस उत्तरदायित्व में असफल रहा। उसने अपनी पत्नी हव्वा के माध्यम से सर्प के छल के आगे समर्पण कर दिया और परिणामस्वरूप सम्पूर्ण मानवजाति पाप के अधीन हो गई।

आज भी पाप और शैतान इस संसार को—और विशेष रूप से कलीसिया को—पीड़ित करते रहते हैं। इसलिए एक सेवक को सदैव सतर्क रहना चाहिए कि वह परमेश्वर के झुण्ड की रक्षा करे। उसे आत्मिक संकटों के प्रति लोगों को सचेत करना है और दुष्ट के आक्रमणों के विरुद्ध आत्मिक युद्ध लड़ना है (इफिसियों 6:10–20)। ऐसा करते हुए वह यह घोषणा करता है कि अन्तिम विजय पहले ही पुनरुत्थित और स्वर्गारोहित प्रभु यीशु ख्रीष्ट के द्वारा प्राप्त की जा चुकी है। यद्यपि हम अब भी इस पतित संसार और अपने पापपूर्ण स्वभाव के साथ संघर्ष करते हैं, फिर भी कलीसिया ख्रीष्ट में विजयी होकर स्थिर रहती है।

इसके अतिरिक्त, एक पास्टर को कलीसिया की शान्ति और पवित्रता दोनों की रक्षा के लिए परिश्रम करना चाहिए। प्रेरित पौलुस इफिसुस की कलीसिया के प्राचीनों को यह गम्भीर चेतावनी देता है:

“अपनी और उस सारे झुण्ड की सावधानी रखो, जिसके बीच पवित्र आत्मा ने तुम्हें अध्यक्ष ठहराया है, कि तुम परमेश्वर की उस कलीसिया की रखवाली करो, जिसे उसने अपने ही लहू से मोल लिया है। मैं जानता हूँ कि मेरे जाने के बाद भयंकर भेड़िए तुम्हारे बीच आएँगे और झुण्ड को न छोड़ेंगे… इसलिए जागते रहो।”
(प्रेरितों के काम 20:28–31)

ये तीन उत्तरदायित्व—अगुवाई करना, प्रबन्ध करना और रक्षा करना—परमेश्वर के लोगों के अगुवों के लिए बाइबिल में प्रयुक्त सबसे सामान्य उपमा में समाहित हो जाते हैं: चरवाहा। वास्तव में, “पास्टर” शब्द भी इसी चित्र से लिया गया है, जिसमें ख्रीष्ट के झुण्ड की देखभाल करना, उन्हें चराना और उनका पालन-पोषण करना सम्मिलित है।

चरवाहे का यह आदर्श अपने पूर्ण स्वरूप, निरन्तर सामर्थ्य और चिरस्थायी सुरक्षा को प्रधान चरवाहे, अर्थात् प्रभु यीशु ख्रीष्ट में पाता है, “जो भेड़ों के लिए अपना प्राण दे देता है” (यूहन्ना 10:11)। इसी कारण प्रेरित पतरस सुसमाचार के सेवकों को यह स्थायी आदेश देता है:

“परमेश्वर के उस झुण्ड की चरवाही करो जो तुम्हारे बीच है। उसकी देखरेख करने का कार्य विवश होकर नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा के अनुसार स्वेच्छा से करो; अनुचित लाभ की लालसा से नहीं, बल्कि तत्परता से करो; और उन लोगों पर प्रभुता मत जताओ जो तुम्हें सौंपे गए हैं, परन्तु झुण्ड के लिए आदर्श बनो। और जब प्रधान चरवाहा प्रकट होगा, तब तुम महिमा का वह मुकुट पाओगे जो कभी मुरझानेवाला नहीं।”
(1 पतरस 5:2–4)

परमेश्वर अपने अनुग्रह से ऐसे अनेक पास्टरों को खड़ा करे, जो विश्वासयोग्यता के साथ प्रभु यीशु ख्रीष्ट की कलीसिया की चरवाही करें।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

जोएल स्मिथ

जोएल स्मिथ

जोएल ई. स्मिट, स्मिर्ना, जॉर्जिया में स्मिर्ना प्रेस्बिटेरियन चर्च के वरिष्ठ पादरी हैं।