What Is the Procession of the Holy Spirit?

पवित्र आत्मा का अग्रसर होना क्या है? 

27 अक्टूबर 2026
What Is the Procession of the Holy Spirit?

पवित्र आत्मा का अग्रसर होना क्या है? 

27 अक्टूबर 2026

परमेश्वर हमारी चिन्ता करता है 

He Cares for Us

पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान मुझे ऐसे कई लोगों के साथ समय बिताने का अवसर मिला जिन्हें देखभाल और सहारे की आवश्यकता थी। जीवन में प्रायः ऐसा समय आता है जब व्यक्ति स्वयं पर निर्भर नहीं रह पाता और उसे दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है। ऐसी परिस्थिति भविष्य को लेकर गहरी चिन्ता और असुरक्षा उत्पन्न कर सकती है। जब आप दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं और भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है, तब चिन्तित होना स्वाभाविक है, क्योंकि अब परिस्थितियाँ आपके नियन्त्रण में नहीं रहतीं। दूसरी ओर, किसी की देखभाल करना एक बड़ा सौभाग्य है, यद्यपि हमारी संस्कृति इस सत्य पर बहुत कम ध्यान देती है और उसे वह सम्मान भी नहीं देती जिसकी वह वास्तव में अधिकारी है। इन दोनों ही परिस्थितियों में पवित्रशास्त्र देखभाल प्राप्त करने वालों और देखभाल करने वालों—दोनों से सामर्थ्यपूर्वक बात करता है और उन्हें बहुत प्रोत्साहन देता है। 

हाल ही में जब मैं 1 पतरस 5 से नम्रता के विषय पर प्रचार कर रहा था, तब एक बात ने विशेष रूप से मेरा ध्यान आकर्षित किया। पतरस कहता है कि नम्र व्यक्ति अपनी सारी चिन्ताएँ प्रभु पर डाल देता है, क्योंकि “उसको तुम्हारा ध्यान है” (1 पतरस 5:6–7)। परमेश्वर ही सबसे बड़ा देखभाल करने वाला है। यहाँ पतरस जिस शब्द का प्रयोग करता है, वह वर्तमान काल में है। अर्थात्, परमेश्वर निरन्तर हमारी चिन्ता करता है। वह कभी हमारी चिन्ता करना बन्द नहीं करता। उसके यहाँ कोई अवकाश का दिन नहीं होता; ऐसा कोई दिन नहीं होता जब वह अपने लोगों की चिन्ता न करता हो। वह निरन्तर उन पर ध्यान देता है, उनके लिए कार्य करता है, उनके प्रति अपनी चिन्ता प्रकट करता है और उनकी भलाई के लिए हर आवश्यक प्रयत्न करता है। परमेश्वर अपने लोगों के प्रति इसी प्रकार की चिन्ता रखता है।

भजन संहिता 8 इस सत्य को अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है:

मनुष्य क्या है कि तू उसका स्मरण रखता है,
और मनुष्य का पुत्र क्या है कि तू उसकी चिन्ता करता है?
(भजन संहिता 8:4)

जब मैं छोटा था, तब रविवार की पाठशाला में हम एक भजन गाया करते थे—“परमेश्वर जिसने पृथ्वी की रचना की”:

जिस परमेश्वर ने पृथ्वी,
आकाश, वायु और समुद्र बनाए,
जिसने प्रकाश को उत्पन्न किया,
वही मेरी चिन्ता करता है।

देखभाल और चिन्ता का यह विषय सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में निरन्तर दिखाई देता है। बार-बार परमेश्वर अपने लोगों को यह आज्ञा देता है कि वे उसकी आज्ञाओं के विषय में “सावधान रहें” और “ध्यान रखें।” प्रभु यीशु भी हमें सावधान करता है कि हम परमेश्वर के वचन को कैसे सुनते हैं। वह चेतावनी देता है कि इस संसार की चिन्ताएँ परमेश्वर के वचन को दबा देती हैं (मरकुस 4:19)। इसी प्रकार, विश्वासियों को एक-दूसरे की चिन्ता करने के लिए बुलाया गया है (1 कुरिन्थियों 12:25), और ख्रीष्ट की कलीसिया के प्राचीनों को उसकी भेड़ों की देखभाल करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है (प्रेरितों के काम 20:28)।

ये सभी आज्ञाएँ ऐसे परमेश्वर के सन्दर्भ में दी गई हैं जो अपनी सन्तानों की चिन्ता करता है। यही तथ्य कि वह महान्  देखभाल करनेवाला है, हमारे लिए गहरे सान्त्वना का स्रोत होना चाहिए। व्यवस्थाविवरण 11:12 में इस्राएलियों से उनकी विरासत के विषय में कहा गया है: “वह ऐसा देश है जिसकी चिन्ता तुम्हारा परमेश्वर यहोवा करता है; वर्ष के आरम्भ से लेकर वर्ष के अन्त तक तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की दृष्टि उस पर निरन्तर लगी रहती है।” व्यवस्थाविवरण की पुस्तक के अन्त में, मूसा द्वारा यहोशू को उत्तरदायित्व सौंपते समय दिए गए उपदेश में, वह परमेश्वर के लोगों से कहता है: 

क्योंकि यहोवा का भाग उसकी प्रजा है;
याकूब उसका निज भाग ठहराया गया है।
उसने उसे जंगल में पाया,
निर्जन और गरजते हुए मरुभूमि में;
उसने उसे चारों ओर से घेर लिया, उसकी देखभाल की,
और अपनी आँख की पुतली के समान उसकी रक्षा की।
(व्यवस्थाविवरण 32:9–10)

देखभाल करनेवालों के लिए यह अनुभव करना बहुत सहज है कि वे उत्तरदायित्व के भारी बोझ तले दब गए हैं। किसी दूसरे व्यक्ति की निरन्तर देखभाल करना शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से थका देनेवाला हो सकता है। ऐसे समय में यह जानना अत्यन्त सान्त्वना देता है कि परमेश्वर हमारी इस स्थिति को पूरी तरह समझता है। भजनकार कहता है,

“जब मेरे मन में बहुत-सी चिन्ताएँ उठती हैं,
तब तेरी शान्तिदायक बातें मेरे प्राण को आनन्दित करती हैं।”
(भजन संहिता 94:19)

जहाँ तक उन लोगों का प्रश्न है जिनकी देखभाल की जा रही है, उनके मुँह से एक बात प्रायः सुनने को मिलती है “मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता।” जॉन स्टॉट अपनी पुस्तक द रैडिकल डिसाइपल (The Radical Disciple) में इस विषय में उपयोगी बात कहते हैं: 

मैं कभी-कभी वृद्ध लोगों को, जिनमें ऐसे मसीही भी सम्मिलित हैं जिन्हें इससे बेहतर समझना चाहिए, यह कहते हुए सुनता हूँ, ‘मैं किसी दूसरे पर बोझ नहीं बनना चाहता। जब तक मैं अपनी देखभाल स्वयं कर सकता हूँ, तब तक जीवित रहना चाहता हूँ; परन्तु जैसे ही मैं दूसरों पर बोझ बनने लगूँ, मैं मर जाना अधिक अच्छा समझूँगा।’ परन्तु यह सोच सही नहीं है। हम सबको इस प्रकार बनाया गया है कि हम एक-दूसरे के लिए बोझ उठाएँ। तुम्हें मेरे लिए बोझ बनने के लिए बनाया गया है, और मुझे तुम्हारे लिए। परिवार का जीवन—और इसमें स्थानीय कलीसिया का परिवार भी सम्मिलित है—ऐसा जीवन होना चाहिए जिसमें हम एक-दूसरे का बोझ उठाएँ।”

मरकुस 4 में हम पढ़ते हैं कि चेले अचानक उठे एक भयंकर तूफ़ान में फँस गए। उसी समय यीशु नाव में सो रहा था। चेले यह समझ नहीं पा रहे थे कि ऐसी परिस्थिति में वह कैसे सो सकता है। इसलिए उन्होंने उसे जगाकर कहा, “क्या तुझे चिन्ता नहीं कि हम नाश हो रहे हैं?”  (मरकुस 4:38)। यह सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के सबसे आश्चर्यजनक प्रश्नों में से एक है। वास्तव में, प्रभु यीशु इस संसार में इसलिए आया ही था क्योंकि उसे हमारी चिन्ता थी। उसने स्वर्ग की उस महिमा को, जहाँ स्वर्गदूत उसकी आराधना करते थे और जहाँ वह अनन्त आनन्द का अनुभव करता था, स्वेच्छा से छोड़ दिया जिससे कि वह दुःखों का पुरुष बने, शोक से परिचित हो, और हमारे पापों तथा अधर्म को अपने ऊपर लेकर कलवरी के क्रूस तक जाए। इसलिए उससे यह पूछना, “क्या तुझे हमारी चिन्ता नहीं?” इस बात को पूरी तरह न समझना है कि वह कौन था और किस उद्देश्य से आया था। 

लूका 10 में मार्था भी लगभग यही प्रश्न पूछती है। जब वह रसोई में अकेली सेवा करते-करते थक जाती है और उसकी बहन मरियम प्रभु यीशु के चरणों में बैठकर उसकी शिक्षा सुन रही होती है, तब वह कहती है, “हे प्रभु, क्या तुझे चिन्ता नहीं कि मेरी बहन ने मुझे सेवा करने के लिए अकेला छोड़ दिया है? उससे कह कि आकर मेरी सहायता करे”  (लूका 10:40)। मार्था का यह प्रश्न भी प्रकट करता है कि वह अभी तक यह नहीं समझ पाई थी कि यीशु किस उद्देश्य से आया है और उसकी प्राथमिकताएँ क्या हैं। वास्तव में, वह जितनी चिन्ता करता था, उससे अधिक वह कर ही नहीं सकता था।

परमेश्वर की देखभाल के इस सत्य को हमें अपना बनाने का प्रयास करना चाहिए। । आप परमेश्वर के लिए बोझ नहीं हैं; वह आपकी चिन्ता करता है। जब यह सत्य हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व में गहराई तक उतर जाता है, तब यह हमारे जीवन को बदल देता है। अदन की वाटिका में मनुष्य के पतन के समय से ही हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति यही रही है कि हम यह सोचने लगते हैं कि परमेश्वर को हमारी चिन्ता नहीं है।

प्रभु यीशु हमें चेतावनी देता है कि इस संसार की चिन्ताएँ परमेश्वर के वचन को दबा देती हैं (मरकुस 4:19)। वह हमें भली-भाँति जानता है और हमारे हृदय की गहराइयों को देखता है। इसलिए वह यह भी बताता है कि संसार की चिन्ताएँ हमारे हृदयों को बोझिल कर सकती हैं (लूका 21:34)। पवित्रशास्त्र अनेक स्थानों पर हमें यह भी चेतावनी देता है कि हमें लोगों की राय और उनके विचारों के अधीन नहीं होना चाहिए। इसका एकमात्र उपाय यही है कि हम परमेश्वर के वचन को सुनें और उस पर विश्वास करें।

हम उन्हीं लोगों और वस्तुओं की चिन्ता करते हैं जो हमारे लिए बहुमूल्य होती हैं। परमेश्वर हमारी चिन्ता इसलिए करता है क्योंकि उसके पुत्र में हम उसके लिए बहुमूल्य हैं। इसलिए अपनी सारी चिन्ताएँ और व्याकुलताएँ उसी पर डाल दें, क्योंकि वह आपकी चिन्ता करता है। सारा बेट्स रोड्स के भजन “परमेश्वर जिसने पृथ्वी की रचना की” की ये पंक्तियाँ हमें इसी सत्य की स्मरण दिलाती हैं—

जिस परमेश्वर ने अपने पुत्र को
कलवरी पर मरने के लिए भेजा,
यदि मैं उसी पर भरोसा रखूँ,
तो वह मेरी चिन्ता करेगा।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

पॉल लेवी

पॉल लेवी

रेव. पॉल लेवी पश्चिमी लन्दन के ईलिंग स्थित इण्टरनेशनल प्रेस्बिटेरियन चर्च के सेवक हैं।