
जीवन का उद्देश्य क्या है?
20 अक्टूबर 2026जब आपकी मृत्यु होती है, तो आपकी आत्मा के साथ क्या होता है?
हम सब ने कभी न कभी इस विषय में विचार किया है। जब हम अपनी अन्तिम साँस लेते हैं, हमारा हृदय धड़कना बन्द कर देता है, और हमारी आत्मा हमारे अब मृत शरीर से अलग हो जाती है, तब क्या होता है? सच कहा जाए तो, हममें से अधिकतर लोग मरने की प्रक्रिया से डरते हैं, भले ही हमें मृत्यु से भय न लगता हो। मरने की प्रक्रिया प्रायः पीड़ादायक संघर्ष होती है। यह प्रायः एक निर्जीव-से चिकित्सकीय वातावरण में घटित होती है और सामान्यतः एक अप्रिय प्रक्रिया होती है। फिर भी, इस प्रतिज्ञा पर भरोसा रखने के द्वारा कि मृत्यु का अर्थ प्रभु की उपस्थिति में अनन्त जीवन में प्रवेश करना है, और मरे हुओं को जिलाने की ख्रीष्ट की सामर्थ्य पर भरोसा रखने के द्वारा, मसीहियों को मृत्यु के परिणाम से डरने की आवश्यकता नहीं है, भले ही मरने की प्रक्रिया के विषय में उनके मन में भय या आशंका हो।
मृत्यु और मरने की प्रक्रिया के बारे में अनेक कहानियाँ और किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पवित्रशास्त्र में मरने के प्रक्रिया के बारे में वर्णन नहीं करता,यद्यपि वह ऐसे कई व्यक्तियों का उल्लेख करता है जो मर गए थे, परन्तु जिन्हें यीशु ने फिर से जीवित कर दिया। इनमें लाज़र का उदाहरण स्मरण आता है (यूहन्ना 11) और उसके अतिरिक्त अन्य लोग भी हैं (जैसे, लूका 7:11–17 में विधवा नाइन के बेटे की)। परन्तु हमारे पास इन लोगों में से किसी का भी—यहाँ तक कि लाज़र का भी—ऐसा प्रत्यक्ष विवरण नहीं है कि मरने के समय उन्होंने क्या अनुभव किया था। हम केवल कल्पना ही कर सकते हैं कि जब लाज़र दूसरी बार मरा, इस बार अनन्त जीवन में प्रवेश करने के लिए, तब उसके मन में क्या विचार रहे होंगे। अब, हम यह अवश्य जानते हैं कि हमारे पुनरुत्थान के शरीर कैसे होंगे, क्योंकि पौलुस उस सम्पूर्ण रूपान्तरण का अद्भुत वर्णन करता है जो मसीह के लौटने और हमारे अविनाशी दशा में जिलाए जाने पर होगा (1 कुरि. 15:35–49)। परन्तु मध्यवर्ती अवस्था के विषय में बाइबलीय जानकारी बहुत कम है। मध्यवर्ती अवस्था वह समय है जिसमें विश्वास करने वाले मृतकों की आत्माएँ अपने शरीरों के पुनरुत्थान और शाप—अर्थात् मृत्यु—के अन्तिम तथा पूर्ण रूप से उलट दिए जाने की प्रतीक्षा करती हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस प्रश्न (जब हम मरते हैं, तो हमारी आत्मा के साथ क्या होता है?) का स्वभाव ही कल्पना-आधारित अटकलों को बढ़ावा देता है। मुझे स्मरण है कि मेरी विश्वासी दादी (जो एक पास्टर की बेटी थीं) कलीसिया के उन सदस्यों के पास बैठकर उनकी अन्तिम घड़ियों में जागते हुए बिताए गए समय के विषय में बताया करती थीं। वह बाताती थी कि अन्तिम साँस लेने से पहले, मरता हुआ व्यक्ति प्रायः अपनी आँखें खोलता, स्वर्ग की ओर देखता, किसी प्रकार का आनन्द और प्रत्याशा व्यक्त करता, और फिर अपरिहार्य मृत्यु के सामने समर्पण कर देता था। उनका विश्वास था कि इन सन्तों को उस बात की एक क्षणिक झलक दिखाई गई थी—या उस व्यक्ति की झलक, जो उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसा हो सकता है, परन्तु इसकी उतनी ही सम्भावना है कि शरीर के काम करना बन्द करते समय मस्तिष्क में होने वाली जैव-रासायनिक प्रतिक्रियाएँ अनेक प्रकार की संवेदी गतिविधियाँ उत्पन्न करती हों। ऐसे विवरण, चाहे कितनी ही सच्चाई से सुनाए गए हों, व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित वृत्तान्त मात्र हैं और धर्मसिद्धान्त स्थापित करने के लिए कोई आधार प्रदान नहीं करते।
हम सबने उन लोगों के बारे में कहानियाँ सुनी हैं जो कथित तौर पर मर गए और फिर जीवन के बाद के जीवन से लौट आए। ऐसी कहानियाँ आकर्षक होती हैं, यही कारण है कि मृत्यु के निकट के अनुभवों पर लिखी गई पुस्तकों का एक छोटा-सा व्यावसायिक उद्योग विकसित हो गया है। इन पुस्तकों के लेखक अपने स्वर्ग-भ्रमण के व्यक्तिगत अनुभवों की कहानियाँ सुनाते हैं और फिर लौटकर उन अनुभवों पर पुस्तक लिखते हैं। इन पुस्तकों में प्रायः उन प्रिय जनों से भेंट होने के विवरण मिलते हैं जो पहले ही मर चुके हैं, इनमें प्रायः स्वर्ग के बारे में जानकारी (आम तौर पर संसार के दृश्यों को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है), साथ ही यीशु से मिलने, परमेश्वर से बात करने और स्वर्ग की वस्तुओं के बारे में जानकारी सम्मिलित होती है।
परन्तु सम्भवतः ये सभी विवरण मनगढ़न्त हैं और परमेश्वर की उपस्थिति में प्रवेश करने के विषय में बाइबल में कही गई बातों से विपरीत हैं। यशायाह 6:1–7 में यशायाह वर्णन करता है। जब यशायाह को प्रभु का दर्शन मिलता है, तो वह अपनी अयोग्यता से अभिभूत हो जाता है। परमेश्वर के साथ भेंट के बाइबिल विवरण – जैसे कि मूसा द्वारा प्रभु की महिमा की झलक (निर्गमन 33:18-23) या इम्माऊस के मार्ग पर यीशु का अपने दो शिष्यों को दर्शन देना (लूका 24:37) – पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति में होने के कारण भय, यहाँ तक कि आतंक, उत्पन्न करते हैं। बाइबिल की बातें “मैंने स्वर्ग को देखा” या “मैं यीशु के साथ चला” जैसी पुस्तकों की सहज, वरन् तुच्छ प्रकृति से मेल नहीं खाते। क्योंकि बाइबल मरने की प्रक्रिया या मरते हुए लोगों के विचारों का वर्णन नहीं करती, इसलिए बहुत-से लोगों ने इस रिक्त स्थान को मनगढ़न्त कहानियों से भरने का प्रयास किया है। दुःख की बात है कि इस प्रयास में उन्हें बहुत सफलता मिली है। अनेक लोग इन किंवदन्तियों को सत्य मान लेते हैं।
धन्यवाद हो कि बाइबल मध्यवर्ती अवस्था के विषय में हमें दो ऐसे आधार प्रदान करती है, जो हमें मृत्यु के लिए तैयार होने में सहायता करते हैं। पहला, पौलुस कई प्रसिद्ध बाइबलीय खण्डों में विशेष रूप से इस विषय पर बात करता है कि विश्वासियों के मरने और मसीह के लौटने के बीच उनके साथ क्या होता है। 2 कुरिन्थियों 5:8 के अनुसार, पौलुस सिखाता है कि विश्वासी की मृत्यु के क्षण ही हम तुरन्त प्रभु की उपस्थिति में प्रवेश कर जाते हैं। प्रेरित लिखता है, “हम देह से अलग होकर प्रभु के साथ रहना और भी उत्तम समझते हैं।” पौलुस ने यह भी बताया कि “मेरी लालसा तो यह है कि कूच करके ख्रीष्ट के पास जा रहूं, क्योंकि यह अति उत्तम है”। जब हम मरते हैं, हम तुरन्त “ख्रीष्ट के साथ” हो जाते हैं और परमेश्वर की उपस्थिति में चले जाते हैं। सामान्यतः “स्वर्ग” कहने से हमारा यही आशय होता है।
दूसरा, प्रकाशितवाक्य 4–6 में यूहन्ना द्वारा वर्णित स्वर्गीय दृश्य हमें उस अनदेखी वास्तविकता की झलक देता है जिसका अनुभव हम मरने पर करेंगे। हम जिन्होंने केवल ख्रीष्ट पर भरोसा रखा है, परमेश्वर की उपस्थिति में स्वर्ग के सिंहासन के सामने छुड़ाए गए संतों के साथ सम्मिलित होंगे। हम सचेत होंगे, हमें यह बोध होगा कि हम कहाँ हैं, और हम आनन्दपूर्वक परमेश्वर की स्तुति कर रहे होंगे। सरल शब्दों में कहें तो, यह स्वर्गीय दृश्य हमारे पास उपलब्ध सबसे स्पष्ट चित्र है कि मरने पर हमारी आत्मा के साथ क्या होता है। इन तीन अध्यायों में, यूहन्ना स्वर्ग एक महिमामय चित्र प्रस्तुत करता है, जहाँ युग के अन्त में हमारे शरीरों के पुनरुत्थान तक परमेश्वर अपनी प्रजा के बीच निवास करता है। यही स्वर्ग है—छुड़ाई गई प्रजा का पवित्र परमेश्वर की उपस्थिति में निवास करना और अपने सृष्टिकर्ता तथा उद्धारकर्ता को समस्त स्तुति और महिमा अर्पित करना।
यद्यपि यह दृश्य अद्भुत है, और अनेक दृष्टियों से हमारी समझ से परे है, परन्तु यह ध्यान देने वाली बात है कि स्वर्ग में विश्वासी उच्च स्वर से पुकार कर कह रहे हैं, “हे पवित्र और सच्चे प्रभु, तू कब तक न्याय न करेगा? तथा कब तक पृथ्वी के निवासियों से हमारे रक्त का प्रतिशोध न लेगा” (प्रकाशितवाक्य 6:10)। जो लोग पहले से ही परमेश्वर के सिंहासन के सामने उसकी उपस्थिति में हैं—जो हमसे पहले मर चुके हैं और अब मध्यवर्ती अवस्था में, अर्थात् मृत्यु और प्रभु के लौटने के बीच के समय में हैं—वे उस दिन की लालसा करते हैं जब यीशु ख्रीष्ट पुनरुत्थान और न्याय के दिन पृथ्वी पर लौटेगा।
तो, जब हम विश्वासी मरते हैं, तब हमारी आत्माओं के साथ क्या होता है? हम तुरन्त प्रभु की महिमामय उपस्थिति में प्रवेश करते हैं, जहाँ हम युग के अन्त में अपने शरीरों के पुनरुत्थान की प्रतीक्षा करते हैं।
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

