The Ways of a Father in Challenging Times

चुनौतियों के समय में एक पिता की भूमिका 

14 अक्टूबर 2026
The Ways of a Father in Challenging Times

चुनौतियों के समय में एक पिता की भूमिका 

14 अक्टूबर 2026

पश्चात्ताप क्या है? 

What-Is-Repentance

मरकुस 1:14–15 में यीशु के सार्वजनिक प्रचार-कार्य के प्रथम शब्दों का वर्णन किया गया है: “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।” क्योंकि सुसमाचार में यीशु की पहली प्रचार में पापों से पश्चात्ताप करने का आह्वान सम्मिलित था, इसलिए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि पश्चात्ताप मसीही शिष्यता का एक अनिवार्य तत्व है। हमें विश्वासयोग्यता के साथ यीशु का अनुसरण करना है, तो अवश्य ही हमें इस प्रश्न का उत्तर देना आना चाहिए: पश्चात्ताप क्या है?

जीवन के लिए पश्चात्ताप

वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार वचन तथा उसके लघु और बृहत् प्रश्नोत्तर बाइबल की अनेक शिक्षाओं का अत्यन्त उपयोगी सार प्रस्तुत करती हैं, इनमें से एक विषय है “जीवन के लिए पश्चात्ताप” जिसे कुछ ईश्वरविज्ञानी “सुसमाचारगत पश्चात्ताप” भी कहते हैं। इन दोनों अभिव्यक्तियों का उद्देश्य सच्चे, उद्धारदायी पश्चात्ताप को उस सांसारिक शोक से अलग करना है जो वास्तव में पश्चात्ताप नहीं है। पौलुस उस ईश्वरभक्तिपूर्ण शोक की चर्चा करता है जो बिना पछतावे के उद्धार की ओर ले जाता है, और वह उस सांसारिक शोक के विषय में भी चेतावनी देता है जो केवल मृत्यु उत्पन्न करता है (2 कुरिन्थियों 7:10–11)। मूलतः वह उस शोक के बीच अन्तर स्पष्ट करता है जो इस कारण होता है कि हमारे पाप ने परमेश्वर का अपमान किया और दूसरों को हानि पहुँचाई, तथा उस शोक के बीच जो केवल हमारे पापों के परिणामों के कारण होता है। जो पश्चात्ताप उद्धार नहीं देता, वह केवल इस बात का दुःख है कि हमारे पापों ने हमें कष्ट पहुँचाया है, या इस बात का खेद कि हम गलत कार्य करते हुए पकड़ लिए गए। यह उसी प्रकार का शोक है जैसा कोई बच्चा तब व्यक्त करता है जब उसका हाथ बिस्कुट के डिब्बे में पकड़ा जाता है, न कि तब जब वह स्वयं आगे बढ़कर अपने माता-पिता की आज्ञा तोड़ने की बात स्वीकार करता है। ऐसा ही शोक एसाव ने भी प्रकट किया। उसने अपने पहिलौठेपन का अधिकार और आशीष खो देने पर दुःख किया। उसका शोक इस कारण नहीं था कि उसने एक कटोरा दाल के लिए परमेश्वर की भलाई का तिरस्कार किया था, परन्तु इस कारण था कि वह सर्वोत्तम उत्तराधिकार से वंचित हो गया (उत्पत्ति 25:29–34; 27:1–41; इब्रानियों 12:16)।

सच्चे पश्चात्ताप के घटक

उद्धार की ओर न ले जाने वाले, सांसारिक पश्चात्ताप के विपरीत, जीवन के लिए पश्चात्ताप हमें पाप से फिरकर ख्रीष्ट के द्वारा परमेश्वर की ओर लौटाता है। वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 15.2 सच्चे, उद्धारदायी पश्चात्ताप के घटकों को स्पष्ट करने में हमारी सहायता करता है। उसमें लिखा है कि: “जीवन के लिए पश्चात्ताप के द्वारा पापी न केवल अपने पापों के संकट को, वरन् उनकी मलिनता और घिनौनापन को भी देखता और अनुभव करता है, क्योंकि वे परमेश्वर के पवित्र स्वभाव और उसकी धर्मी व्यवस्था के विरोध में हैं। साथ ही, वह ख्रीष्ट में पश्चात्ताप करने वालों के लिए परमेश्वर की दया को ग्रहण करता है; इसलिए वह अपने पापों के कारण शोक करता है और उनसे ऐसी घृणा करता है कि उन सबको छोड़कर परमेश्वर की ओर फिरता है तथा उसकी सभी आज्ञाओं के मार्गों में उसके साथ चलने का निश्चय और प्रयत्न करता है।”

सबसे पहले, जीवन के लिए पश्चात्ताप केवल यह नहीं पहचानता कि पाप हमारे लिए विनाशकारी है, परन्तु यह भी समझता है कि पाप मलिन और घृणित भी है, क्योंकि प्रत्येक अपराध परमेश्वर की धर्मी व्यवस्था का उल्लंघन है और उसके पूर्णतः पवित्र चरित्र का अपमान है। इस सत्य को हम भजन 51:4 में देखते हैं, जहाँ दाऊद बतशेबा और ऊरिय्याह के विषय में किए गए अपने पाप को स्वीकार करते हुए कहता है कि उसने केवल परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है। यह काव्यात्मक अतिशयोक्ति है। स्पष्ट है कि ऊरिय्याह की हत्या करवाना परमेश्वर और ऊरिय्याह—दोनों के विरुद्ध पाप था। दाऊद का मतलब यह है कि उसके सभी अपराध सबसे पहले और सबसे बढ़कर परमेश्वर के विरुद्ध हैं। क्योंकि परमेश्वर पवित्र सृष्टिकर्ता और व्यवस्था देनेवाला है तथा हम उसके स्वरूप में बनाए गए हैं, इसलिए प्रत्येक पाप किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध होने से पहले परमेश्वर के विरुद्ध होता है। जब हम दूसरों के विरुद्ध पाप करते हैं, तब हम वास्तव में परमेश्वर के स्वरूप के विरुद्ध पाप करते हैं; इसलिए परोक्ष रूप से हम परमेश्वर का ही अपमान करते हैं। आर. सी. स्प्रौल प्रायः कहा करते थे कि प्रत्येक पाप “सम्पूर्ण सृष्टि के राजा के विरुद्ध राजद्रोह” है। प्रत्येक पाप में हम परमेश्वर और उसकी आज्ञाओं के स्थान पर स्वयं को और अपने मापदण्डों को स्थापित करने का प्रयास करते हैं। जीवन के लिए पश्चात्ताप केवल यह नहीं पहचानता कि हमारे पाप मुख्यतः परमेश्वर के विरुद्ध हैं, परन्तु यह भी ग्रहण करता है कि ख्रीष्ट में परमेश्वर पश्चात्ताप करने वाले पापियों पर दया करता है। यही दया पापी को प्रेरित करती है कि वह परमेश्वर की ओर फिरे, अपने पाप को स्वीकार करे और क्षमा की याचना करे (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 15.2)। हम इसे भजन 51 में भी देखते हैं, जहाँ दाऊद अपने पाप को स्वीकार करता है और परमेश्वर की दया की प्रार्थना करता है। यहूदा इस्करियोती और प्रेरित पतरस के बीच के अन्तर पर भी ध्यान दीजिए। दोनों ने घोर पाप किया। यहूदा ने यीशु को अधिकारियों के हाथ सौंप दिया और पतरस ने यह अस्वीकार कर दिया कि वह यीशु का चेला है (मत्ती 26:14–16, 69–74)। दोनों ने अपने पाप के लिए दुःख भी व्यक्त किया (मत्ती 26:75; 27:3–4)। फिर भी यहूदा का शोक आत्महत्या पर समाप्त हुआ, जबकि पतरस का शोक उसे पुनः सेवा में बहाल किए जाने तक ले गया (मत्ती 27:5–10; यूहन्ना 21:15–19)। इस अन्तर का कारण क्या था? अपने पाप के बावजूद पतरस लगातार यीशु के पास लौटता रहा—पहले खाली कब्र देखने के लिए और बाद में समुद्र के किनारे उसके साथ भोजन करने के लिए (यूहन्ना 20:1–10; 21:1–14)। पतरस यीशु की ओर दौड़ा, क्योंकि वह जानता था कि पश्चात्ताप करने वालों पर वह दयालु है। परन्तु यहूदा उद्धारकर्ता की दया पर विश्वास न कर सका; इसलिए वह यीशु से दूर भागा और अन्ततः अपने ही हाथों अपनी मृत्यु का कारण बना। 

अन्त में, जीवन के लिए पश्चात्ताप में पापी अपने पापों के कारण इतना शोक करता है और उनसे इतनी घृणा करता है कि वह उनसे फिर जाता है। वह परमेश्वर की आज्ञा मानने का नया संकल्प करता है और उस संकल्प के अनुसार जीवन बिताने का प्रयत्न भी करता है (वेस्टमिन्स्टर विश्वास-अंगीकार 15.2)। दूसरे शब्दों में, पश्चात्ताप का अर्थ केवल यह कहना नहीं है कि हमें अपने पाप का दुःख है, और फिर अपने जीवन में कोई परिवर्तन लाने का प्रयास ही न करना। हमें अन्धकार के कार्यों को त्याग देना है और ख्रीष्ट को धारण करना है (रोमियों 13:11–14)। हमें स्मरण रखना है कि हम ख्रीष्ट में नई सृष्टि हैं; इसलिए हमें उसी नई सृष्टि के अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। पाप से यह फिरना हमारे हृदय-परिवर्तन के समय निर्णायक रूप से आरम्भ होता है, परन्तु उसके बाद हमारे शेष जीवन में प्रतिदिन चलता रहता है। यदि हम कहते हैं कि हममें पाप नहीं है, तो हम स्वयं को धोखा देते हैं। परन्तु यदि हम अपने पापों को मान लेते हैं, तो परमेश्वर विश्वासयोग्य और धर्मी है कि वह हमारे पापों को क्षमा करे और हमें समस्त अधर्म से शुद्ध करे (1 यूहन्ना 1:8–9)।

पश्चात्ताप: हमारा कर्तव्य और विशेषाधिकार

इन सब बातों का अर्थ यह नहीं है कि यदि हम किसी एक ही पाप में एक से अधिक बार गिर जाएँ, तो हमारा पश्चात्ताप सच्चा हीं था। इसका अर्थ यह है कि यदि हम अपने पाप से प्रेम करते रहें और उसे छोड़ने का कोई भी प्रयास न करें, तो हमें अपने पश्चात्ताप की वास्तविकता की जाँच करनी चाहिए। जो लोग ख्रीष्ट को जानते हैं, उनके लिए जीवन के लिए पश्चात्ताप एक ओर पालन करने योग्य कर्तव्य है, तो दूसरी ओर ऐसा महान् विशेषाधिकार भी है जिसके द्वारा हम अपने उद्धारकर्ता के साथ बाधारहित संगति में बने रह सकते हैं। इसलिए, आइए हम पाप से घृणा करें, क्षमा माँगें, ख्रीष्ट के मार्ग को सीखने का प्रयास करें, और परमेश्वर की व्यवस्था का उल्लंघन करने के स्थान पर उसकी आज्ञाओं का पालन करने के लिए प्रयत्नशील रहें।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

रॉर्बट रॉथवेल

रॉर्बट रॉथवेल

रेव रॉबर्ट रोथवेल लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ के वरिष्ठ लेखक, टैबलेटटॉक पत्रिका के एसोसिएट एडिटर, रिफॉर्मेशन बाइबिल कॉलेज में रेजिडेंट एडजंक्ट प्रोफेसर और पोर्ट ऑरेंज, फ्लोरिडा में स्प्रूस क्रीक प्रेस्बिटेरियन चर्च के एसोसिएट पास्टर हैं।