What Is Repentance?

पश्चात्ताप क्या है? 

15 अक्टूबर 2026
What Happens to Your Soul When You Die?

जब आपकी मृत्यु होती है, तो आपकी आत्मा के साथ क्या होता है? 

22 अक्टूबर 2026
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जीवन का उद्देश्य क्या है? 

Whats the Point of Life?

मनुष्य होने का अर्थ है कि देर-सवेर हम सभी अपने आप से अस्तित्व से जुड़े कुछ मूलभूत प्रश्न पूछेंगे: मैं कौन हूँ? मैं यहाँ क्यों हूँ? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरे जीवन का क्या महत्त्व है? चाहे कोई किशोर यह समझने का प्रयास कर रहा हो कि वह अपने साथियों के बीच कहाँ उपयुक्त बैठता है, कोई महाविद्यालय का विद्यार्थी अपने अध्ययन-विषय और भावी व्यवसाय को लेकर संघर्ष कर रहा हो, या कोई अधेड़ वयस्क व्यक्ति यह सोच रहा हो कि उसका जीवन वैसा क्यों नहीं बना जैसा उसने कभी सोचा था—“जीवन का उद्देश्य क्या है?” यह प्रश्न हर समय में उतना ही प्रासंगिक रहा है। जीवन के विभिन्न समयों और अवस्थाओं में यह प्रश्न नए-नए रूपों में बार-बार हमारे सामने आता है। 

एक क्षण के लिए विचार कीजिए कि यदि इस प्रश्न का कोई उत्तर ही न होता, तो यह कितना दुःखद होता। यदि ऐसा होता, तो जीवन का कोई उद्देश्य ही न होता। हमारे जीवन का कोई प्रयोजन न होता, हमारे निर्णयों का कोई महत्त्व न होता, और अन्ततः सब कुछ व्यर्थ सिद्ध होता। तब शून्यवाद (Nihilism) का अन्धकार हमारे जीवन और सम्पूर्ण संसार पर एक गहरी छाया डाल देती।

फिर भी इस प्रश्न का गलत उत्तर देना भी उतना ही दुःखद है। हमारे चारों ओर लोग और समाज इस प्रश्न का उत्तर अनेक प्रकार से देने का प्रयास करते हैं। यद्यपि हम प्रायः अपने हृदय की वास्तविक प्रेरणाओं और इच्छाओं से पूरी तरह परिचित नहीं होते, फिर भी हम जीवन का जो उद्देश्य मानते हैं, वह हमारे मूल्यों, प्राथमिकताओं और जीवन की खोजों में अवश्य दिखाई देता है। लोग जीवन का उद्देश्य अनेक बातों में खोजते हैं—प्रेम, सामर्थ्य, सफलता, प्रसन्नता, विवाह, सन्तान, व्यवसाय, प्रसिद्धि, उपलब्धियाँ, प्रतिष्ठा, सम्बन्ध, लोकप्रियता, सौन्दर्य, रोमांच, धन, आराम, अथवा यहाँ तक कि यह सुनने में श्रेष्ठ लगने वाला विचार कि “संसार को एक बेहतर स्थान बनाना।”

और यद्यपि इनमें से कोई भी बात अपने-आप में बुरी नहीं है, फिर भी इनमें से कोई भी हमारे इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं है कि “जीवन का उद्देश्य क्या है?” इसका कारण यह है कि इनमें से कोई भी पार्थिव अस्तित्व के क्षैतिज स्तर से ऊपर नहीं उठती, अर्थात् हमारी आँखों के सामने विद्यमान भौतिक संसार और हमारे अपने विचारों तथा इच्छाओं से परे नहीं जाती। कुछ लोग यह दावा करते हैं कि परमेश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है और सम्पूर्ण सृष्टि  तथा उसमें विद्यमान सब कुछ किसी प्रकार शून्य से विकसित होकर स्वयं अस्तित्व में आ गया। किन्तु सत्य यह है कि मनुष्य सृजे गए प्राणी है। परमेश्वर ने हमें रचा है। इसलिए यह जानने के लिए कि हम कौन हैं, हम क्यों अस्तित्व में हैं, संसार क्यों अस्तित्व में है, और जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है, हमें परमेश्वर के प्रकाशन, (अर्थात् उसके द्वारा दिए गए संदेश) पर निर्भर रहना पड़ता है।

परमेश्वर सृष्टि और विवेक के माध्यम से सभी मनुष्यों से “बात करता है”, किन्तु वह अपने लिखित वचन, अर्थात् बाइबल, के माध्यम से सबसे स्पष्ट रूप से बोलता है। केवल यहीं इस उलझन भरे प्रश्न, “जीवन का उद्देश्य क्या है?” का सही उत्तर मिल सकता है। उदाहरण के लिए, रोमियों 11:36 हमें बताता है कि परमेश्वर ही सब वस्तुओं का स्रोत, साधन और लक्ष्य है: “क्योंकि उसी की ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिए सब कुछ है। उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे।” इस सत्य के कारण तार्किक रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य का प्रतिउत्तर यही होना चाहिए कि वह परमेश्वर की महिमा करे। प्रेरित पौलुस स्पष्ट रूप से विश्वासियों से कहता है: “तुम मूल्य देकर मोल लिए गए हो; इसलिए अपने शरीर के द्वारा परमेश्वर की महिमा करो (1 कुरिन्थियों 6:20)।” उसी पत्र में वह आगे लिखता है: “इसलिए चाहे तुम खाओ, चाहे पियो, चाहे जो कुछ करो, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिए करो (1 कुरिन्थियों 10:31)।” चाहे हम कार्य कर रहे हों या विश्राम कर रहे हों; चाहे जीवन में सुख का समय हो या दुःख का; चाहे हम युवा हों या वृद्ध; सप्ताह के कार्य-दिवस हों या सप्ताहान्त; चाहे हम सेवकाई में लगे हों या दैनिक साधारण कार्यों में, मनुष्य के जीवन का उद्देश्य अपने सृष्टिकर्ता की महिमा करना है। वही उन सबका उद्धारकर्ता और छुड़ाने वाला भी है, जो उद्धार के लिए केवल मसीह पर विश्वास करते हैं।

एकमात्र सच्चे परमेश्वर की महिमा करने और उसमें आनन्दित होने का यह उद्देश्य केवल नए नियम में ही नहीं, वरन् पुराने नियम में भी दिखाई देता है। सूर्य के नीचे जीवन की व्यर्थता और क्षणभंगुरता पर बारह अध्यायों तक विचार करने के बाद, सभोपदेशक की पुस्तक इस निष्कर्ष पर पहुँचती है: “सब कुछ सुन लिया गया; निष्कर्ष यह है कि परमेश्वर का भय मान और उसकी आज्ञाओं का पालन कर, क्योंकि मनुष्य का सम्पूर्ण कर्तव्य यही है।”
(सभोपदेशक 12:13) यहाँ परमेश्वर का भय मानना और उसकी आज्ञाओं का पालन करना, वास्तव में उसी सत्य को दूसरे शब्दों में व्यक्त करना है कि हमें परमेश्वर की महिमा करनी है और उसके साथ आनन्दपूर्ण संगति में चलना है।

पृथ्वी पर इस प्रकार का जीवन उस अनन्त जीवन की एक झलक और पूर्वस्वाद है, जिसे परमेश्वर की प्रजा नए आकाश और नई पृथ्वी में सदा अनुभव करेगी। प्रकाशितवाक्य 4:11 में हम चौबीस प्राचीनों को परमेश्वर की आराधना करते हुए देखते हैं। वे कहते हैं:

“हे हमारे प्रभु और परमेश्वर,
तू ही महिमा, आदर और सामर्थ्य पाने के योग्य है,
क्योंकि तूने ही सब वस्तुओं की सृष्टि की,
और वे तेरी इच्छा से अस्तित्व में आईं तथा उनकी सृष्टि हुई।”

जब पवित्रशास्त्र का इतना बड़ा भाग यह सिखाता है कि मनुष्य का उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वेस्टमिन्स्टर लघु प्रश्नोत्तर का पहला प्रश्न पूछता है, “मनुष्य का मुख्य उद्देश्य क्या है?” और उसका उत्तर देता है: “मनुष्य का मुख्य उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना और सदैव उसमें आनन्दित रहना है।” परमेश्वर की महिमा करना कोई दमनकारी बोझ या अनिच्छा से  की जाने वाली सेवा नहीं है, जिसे हम विवश होकर उसके लिए पूरा करें। न ही यह उसके साथ हमारे प्रेमपूर्ण और व्यक्तिगत सम्बन्ध से अलग कोई कार्य है। इसके विपरीत, परमेश्वर की महिमा करना उस नए हृदय की स्वाभाविक अभिलाषा है, जिसे परमेश्वर ने नया जन्म दिया है। ऐसा हृदय वाचा बाँधने वाले अपने परमेश्वर के निकट संगति में आने की इच्छा रखता है; ऐसे मार्गों पर चलना चाहता है जो उसे प्रसन्न करते हैं; उसके महिमामय चरित्र और कार्यों के लिए उसकी स्तुति और धन्यवाद करना चाहता है; उसके वचन के द्वारा उसे और अधिक जानना चाहता है; और उसकी महानता को संसार में प्रकट करना चाहता है।

आज के तेज़ गति वाले जीवन में, हमारी दैनिक जिम्मेदारियों की लम्बी सूची, कार्यस्थल की बैठकों, पारिवारिक उत्तरदायित्वों, आवश्यक कार्यों और असंख्य अन्य व्यस्तताओं के बीच यह भूल जाना बहुत सरल है कि हमारा वास्तविक उद्देश्य परमेश्वर की महिमा करना और उसमें आनन्दित होना है। किन्तु परमेश्वर की महिमा करना और उसमें आनन्दित होना केवल कोई “आत्मिक” कार्य नहीं है, जिसे हम दिनभर के सारे सांसारिक कार्य पूरे करने के बाद करें। इसके विपरीत, हमें सावधान रहना चाहिए कि दिनभर के साधारण कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी हम अपने इस उद्देश्य को कभी न भूलें: चाहे डॉक्टर के पास जाना हो, बच्चों का खेल देखना हो, दोपहर का भोजन करना हो, वाहन की सर्विस करानी हो, किसी बैठक में सम्मिलित होना हो, कपड़े धोने हों, या विद्यालय का कोई कार्य पूरा करना हो।

परमेश्वर की महिमा करना और उसमें आनन्दित होना ही वह उद्देश्य है जिसके लिए हमें रचा गया है। जब हम ऐसा करते हैं, तब हम अपने जीवन के सर्वोच्च उद्देश्य को पूरा करते हैं और सबसे गहरे आनन्द का अनुभव करते हैं, क्योंकि ऐसा करने से हम अपने त्रिएक परमेश्वर के निकट आते हैं, जिसने हमें अपने लिए रचा है।

 यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

कैरी हैन

कैरी हैन

कैरी हैन लिगोनियर मिनिस्ट्रीज़ और टेबलटॉक की एसोसिएट एडिटर और एक प्रमाणित बाइबिल काउंसलर हैं। वह 'लिम्पिंग हेवनवर्ड: लिविंग बाय फेथ इन कॉम्प्रिहेंसिव एंड क्रॉनिक सफरिंग' पुस्तक की लेखिका हैं ।