
एक प्रभु
25 दिसम्बर 2025
समस्त सत्य परमेश्वर का सत्य है
1 जनवरी 2026शुभ शुक्रवार (गुड फ्राइडे) को “शुभ” क्यों कहा जाता है?
शुभ शुक्रवार (Good friday), जो यीशु के दुःखभोग तथा उसकी मृत्यु को स्मरण करने का दिन है, बहुत समय से मसीही कलीसिया में मनाया जाता रहा है। ऐतिहासिक अभिलेख यह स्पष्ट नहीं करते कि कलीसिया ने इस दिन को “शुभ शुक्रवार” कहना कैसे प्रारम्भ किया, क्योंकि पवित्रशास्त्र में इस शब्द का उल्लेख नहीं मिलता। कुछ लोगों ने यह सुझाव दिया है कि आरम्भ में इसे “परमेश्वर का शुक्रवार” (God’s Friday) कहा जाता था जो समय के साथ परिवर्तित होकर “शुभ शुक्रवार” (Good Friday) हो गया; किन्तु अधिकांश भाषाविद् इस विचार को अस्वीकार करते हैं। अधिक सम्भावना यह है कि “गुड” (good) शब्द का प्राचीन अर्थ “पवित्र” था—अर्थात् “गुड फ़्राइडे” का अर्थ “पवित्र शुक्रवार” था।
इस शब्द का ऐतिहासिक रूप से कैसे विकास हुआ, यह बात चाहे जो भी हो, यह तथ्य बना रहता है कि मसीही लोग आज जिस अर्थ में “शुभ” शब्द को समझते हैं, उसी अर्थ में शुभ शुक्रवार को वास्तव में शुभ मानते हैं — और यह बात कुछ लोगों को उलझन में डाल सकती है। आखिर मसीही लोग उस दिन को “शुभ” क्यों कहेंगे जिस दिन उनके प्रभु को भ्रष्ट धार्मिक शासकों ने भयानक अन्याय सहने पर विवश किया और रोमी शासन ने उसे एक अपमानजनक यातना देकर मार डाला?
पहली दृष्टि में तो इस दिन में कुछ भी शुभ प्रतीत नहीं होता। जब यीशु के अनुयायियों ने शुक्रवार और शनिवार को उनकी मृत्यु पर शोक मनाया, तब उन्हें भी यह दिन अच्छा नहीं लगा। वे चेले, जिन्होंने अपने जीविकोपार्जन तक यह विश्वास करते हुए त्याग दिया था कि वे उस मसीही राज्य में प्रमुख भूमिका निभाएँगे जो रोम के शासन को उखाड़ फेंकेग, पर उनकी सभी आशाएँ और सपने टूट चुके थे। वास्तव में, यदि उस अन्धकारमय दिन पर यीशु की मृत्यु ही कहानी का अन्त होता, तो लोग मसीहीयों को वास्तव में दया के योग्य समझते (1 कुरिन्थियों 15:17–19)।
तो फिर, मसीही “शुभ शुक्रवार” को शुभ क्यों कहते हैं? इसका उत्तर यह है कि पुनरुत्थान रविवार शुभ शुक्रवार की व्याख्या करता है और उसे रूपान्तरित करता है। पवित्रशास्त्र में हम बार-बार यह नमूना देखते हैं कि जो बातें पहले “अच्छी नहीं” लगती हैं, उन्हें बाद में परमेश्वर अपनी सार्वभौमिक योजना में प्रयोग करके भलाई का कारण बना देता है।
उदाहरण के लिए, उत्पत्ति की पुस्तक में यूसुफ की कहानी पर विचार करें। अपने ही भाइयों द्वारा धोखा दिया जाना, किसी दूसरे देश में दास के रूप में बेचा जाना, और जब परिस्थितियाँ सुधरती प्रतीत होने लगी तब झूठा आरोप लगाकर बन्दीगृह में डाल दिया जाना और वहाँ एक साथी कैदी जो स्वतंत्र हो गया के द्वारा भुला दिया जाना—इन सबमें स्वभाविक रूप से कुछ भी “अच्छा” नहीं है। यूसुफ की कहानी के इन हिस्सों पर “अच्छा नहीं” की मुहर लगाना स्वाभाविक बात होगी।
फिर भी, परमेश्वर की रहस्यमयी किन्तु अद्भुत ईश्वरीय-प्रावधान में, वह इन “अच्छा नहीं” कच्चे पदार्थों से भी भलाई उत्पन्न करता है। वह यूसुफ और मिस्र में उसकी उच्च स्थिति का उपयोग करके न केवल यूसुफ के परिवार को परन्तु पूरे क्षेत्र को भी अकाल से बचाता है। पीछे मुड़कर देखने पर यूसुफ अपने भाइयों द्वारा किए गए दुष्ट कार्यों के बारे में कह सकता है, “तुमने तो मेरे साथ बुराई करने की ठानी थी, परन्तु परमेश्वर ने उसी को भलाई के लिए ले लिया, जैसा कि आज के दिन हो रहा है कि बहुत से लोगों के प्राण बचें” (उत्पत्ति 50:20)।
यही बात यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने और उसकी मृत्यु की बुरी घटनाओं के विषय में भी सत्य है। जैसा कि प्रेरित पतरस पिन्तेकुस्त के दिन अपने उपदेश में स्पष्ट रूप से बताता है, यीशु वास्तव में “विधर्मियों के हाथों क्रूस पर कीलों से ठुकवा कर मार डाला गया” (प्रेरितों के काम 2:23), और उन्हीं लोगों ने “जीवन के कर्ता को मार डाला” (प्रेरितों के काम 3:15)। यह निश्चय ही उन लोगों के लिए बुराई थी कि उन्होंने जानबूझकर एक निर्दोष मनुष्य जो स्वयं देहधारी परमेश्वर था, को मृत्यु दण्ड दिया।
परन्तु इन सब घटनाओं के ऊपर परमेश्वर अपनी सार्वभौमिक प्रभुता में उस योजना को पूरा कर रहा था, जिसकी भविष्यवाणी युगों से होती आई थी जिससे कि वह सबसे बड़े पाप और सबसे बड़ी बुराई से सबसे बड़ी भलाई उत्पन्न करे। तो उस शुक्रवार यीशु की मृत्यु में परमेश्वर कौन-सा भला कार्य कर रहा था?
पवित्र शास्त्र स्पष्ट करता है कि समस्त मानवजाति एक गम्भीर संकट में है। हम सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं (रोमियों 3:23)। पाप की बुराई और कुरूपता हमें उस महिमामय, सिद्ध और पवित्र परमेश्वर से अलग कर देती है, जो अपनी धार्मिकता और न्याय में पाप का दण्ड देना आवश्यक समझता है (रोमियों 2:5–6; 5:9–10; 1 थिस्सलुनीकियों 1:10)। तो हमारे पास क्या आशा है जब हम परमेश्वर के प्रेम से अनन्त अलगाव की ओर बढ़ते जा रहे हैं और इसके बदले अपने पाप के विरुद्ध उसके धार्मिक क्रोध का सामना करना है? हम उस धार्मिकता से रहित हैं जो परमेश्वर की उपस्थिति में खड़े होने के लिए आवश्यक है, और हम अपने पाप का वह ऋण भी नहीं चुका सकते जो हम पर है।
हमारे पास कोई आशा नहीं होती यदि त्रिएक परमेश्वर ने सनातन काल पूर्व में ही हमारे उद्धार की योजना न बनाई होती, ऐसा उद्धार जिसे हम अपने बल पर कभी प्राप्त नहीं कर सकते। त्रिएक परमेश्वर का द्वितीय व्यक्ति अर्थात् पुत्र ने मनुष्य का रूप धारण किया और उसने पूर्ण रीति से धर्मी जीवन व्यतीत किया जिसे हम जीने में असफल रहते हैं। क्रूस पर, परमेश्वर की अपनी योजना के अनुसार (प्रेरितों 2:23), यीशु ने केवल यहूदी अगुवों तथा रोमी सैनिकों के क्रोध का सामना नहीं किया, परन्तु उसने उन सभी लोगों के पापों के लिए जो उसके हैं, स्वयं परमेश्वर के उस क्रोध को भी सहा और उसे संतुष्ट किया (या “प्रकोप शान्त” किया) (रोमियों 5:9–10; इब्रानियों 2:17; 1 यूहन्ना 2:2)। पुराने नियम की बलिदान व्यवस्था भविष्य में आने वाले यीशु की ओर संकेत करती थी, जो स्वयं सिद्ध महायाजक और सिद्ध बलिदान दोनों है (इब्रानियों 9:12, 26)। उसका सिद्ध जीवन तथा प्रतिस्थापनीय बलिदानपूर्ण मृत्यु ने परमेश्वर के धर्मी क्रोध और न्याय को उन सबके पापों के लिए शान्त किया जो केवल ख्रीष्ट पर भरोसा करते हैं। यीशु, जो पूर्ण रीति से धर्मी है, उसने हमारे पापों का दण्ड अपने ऊपर ले लिया और हम जो अपनी अधार्मिकता के कारण अनन्त दण्ड के योग्य थे, ख्रीष्ट की पूर्ण धर्मिकता प्राप्त करते हैं।
इसलिए गुड फ्राइडे अच्छा है क्योंकि उस दिन यीशु ने अपनी मृत्यु के द्वारा व्यवस्था के शाप से हमें मूल्य चुका कर छुड़ाया, और स्वयं हमारे लिए शापित बना, जिससे कि हमें लेपालक पुत्र होने का अधिकार प्राप्त हो (गलातियों 3:13–14; 4:5)। क्योंकि यीशु ने अपनी देह में क्रूस पर हमारे पापों को उठा लिया (1 पतरस 2:24), हमें, उसमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात हमारे अपराधों की क्षमा मिली है (इफि. 1:7)। हम ख्रीष्ट के बहुमूल्य लहू के द्वारा छुड़ाए गए हैं (1 पतरस 1:18–19)। हम धर्मी ठहराए गए हैं, परमेश्वर के प्रकोप से बचाए गए हैं, और परमेश्वर से हमारा मेल हो गया है (रोमियों 5:9–10)।
तीसरे दिन यीशु ख्रीष्ट का पुनरुत्थान शुभ शुक्रवार (गुड फ्राइडे) पर पूर्ण किए गए प्रत्येक कार्य को सिद्ध ठहराता है, यह दिखाते हुए कि मृत्यु का उन पर कोई अन्तिम अधिकार नहीं है (प्रेरितों 2:24)। उसका पुनरुत्थान यह प्रमाणित करता है कि वह हमारी धार्मिकता को सुनिश्चित करने की सामर्थ्य रखता है (रोमियों 4:25)। यह भी सिद्ध करता है कि वह वास्तव में परमेश्वर है (रोमियों 1:4) और कि परमेश्वर का क्रोध उसके बलिदान में मृत्यु द्वारा पूरी तरह शान्त हुआ। क्योंकि यीशु ने उन सभी के पापों के लिए परमेश्वर के क्रोध को सहा जो विश्वास द्वारा इस उद्धार को ग्रहण करते हैं, इसलिए मसीही कभी भी अपने पापों के लिए परमेश्वर के प्रकोप का सामना नहीं करेंगे, न परमेश्वर से अलग होंगे, क्योंकि वे ख्रीष्ट में उसकी मृत्यु और जीवन दोनों में एक किए गए हैं।
संक्षेप में, शुभ शुक्रवार अच्छा या शुभ इसलिए है क्योंकि इसी दिन सबसे बड़ा अदान-प्रदान हुआ: “जो पाप से अनजान था, उसी को उसने हमारे लिए पाप ठहराया कि हम उसमें परमेश्वर की धार्मिकता बन जाएँ।” (2 कुरिन्थियों 5:21)। अतः हम प्रेरित पौलुस के साथ यह घोषणा करें, “परमेश्वर को, उसके उस दान के लिए जो वर्णन से बाहर है, धन्यवाद!” (2 कुरिन्थियों 9:15)
यह लेख मूलतः लिग्निएर मिनिस्ट्रीज़ ब्लॉग में प्रकाशित किया गया।

