मीनार का अनुभव
पाप से उत्पन्न और उसके द्वारा संचालित व्यक्तिवादी वैश्विक समाज, इस धारणा के अनुसार कार्य करते हैं कि जीवन की सफलताएँ और असफलताएँ केवल व्यक्ति के अपने निर्णयों और कर्मों का परिणाम हैं। मनुष्य स्वयं को स्वतन्त्र और आत्मनिर्भर प्राणी मानता है। इसलिए अभ्यारोपित धार्मिकता (अर्थात् किसी अन्य की धार्मिकता को दूसरे के खाते में लगाया जाना) की धारणा स्वाभाविक रूप से लोगों को स्वीकार्य नहीं होती।
फिर भी, वास्तविक जीवन बार-बार इस विचार को असत्य सिद्ध करता है। जीवन के प्रत्येक चरण में हम दूसरों के कर्मों के प्रभाव को अपने जीवन पर स्थायी और अनियन्त्रित रूप में अनुभव करते हैं जैसे हमारे कर्म भी दूसरों के जीवन को प्रभावित करते हैं। इस पाठ में, मार्टिन लूथर अभ्यारोपित धार्मिकता की धारणा का सामना करते हैं अर्थात् एक ऐसी शिक्षा जो रोमन कैथोलिक चर्च के प्रभाव के अधीन रहते समय उनके लिए अपरिचित थी।